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लघुकथा // उपहार // अजीत कुमार

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उपहार

आज पूरे दो साल बाद मैं शहर से घर वापस आया हूँ। सब बहुत खुश है और सबसे ज्यादा खुश है मेरा छोटा भाई ''छोटू '' भैया आ गए भैया आ गए की रट लगाए फिर रहा है।

माँ पानी लेकर आयी और बोली बेटा पढ़ाई कैसी चल रही है।

मैंने मुस्कुराते हुए कहा ''बढ़िया, पापा कहाँ हैं? तभी छोटू बोला कि भैया-भैया मेरे लिए क्या लाये।

छोटू के इस बात ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया, मैं कुछ नहीं लाया था।

माँ समझ गयी कि मेरे पास पैसे नहीं थे इसलिए कुछ नहीं ला पाया। क्योंकि पापा जो पैसे भेजते थे उससे रहना और खाना भी बहुत मुश्किल से चल पाता था और मैं बहुत मुश्किल से पढ़ाई कर रहा पा रहा था।

छोटू फिर बोला बताओ ना भईया क्या लाये हो। मैं चुप था समझ नहीं पा रहा था कि क्या बोलूँ तभी माँ बोली छोटू जरा पापा को देखना कहाँ हैं..?

छोटू चला गया लेकिन मैं फिर भी चुप था और बस यही सोच रहा था कि मैं कितना बद्किस्मत हूँ कि अपने छोटे भाई के लिए कुछ भी नहीं ला पाया,मैं अंदर ही अंदर घुट रहा था।

मैं वहां से निकला और पास के बाग में जा कर अपनी मनपसंद जगह पर बैठ गया, वहां बैठकर मेरे मन को शांति मिलती थी इसलिए मैं अक्सर वहां बैठा करता था लेकिन आज मुझे वहां भी सुकून नहीं मिल पा रहा था। मैं बस यही सोच रहा था कि मैं अपने छोटू के लिए कुछ नहीं ला पाया। तभी छोटू भागते हुए आया और हांफते हुए बोला भैया आप मेरे लिये घड़ी लाये हो बताया नहीं। मैंने आश्चर्य से पूछा कौन सी घड़ी।

वो अपनी कलाई दिखाते हुए बोला देखो ना कितनी अच्छी है ,बस थोड़ी सी बड़ी है। वो बहुत खुश था। मैंने उससे पूछा कि ये कहाँ मिला तो उसने बताया कि आपके बैग में एक लाल पैकेट था उसी में, बोलकर कुछ दूर खेल रहे बच्चों के पास चला गया।

लाल पैकेट....मुझे अचानक याद आया कि ये वही पैकेट था जो मुझे वेलेनटाइन डे पर प्रिया ने गिफ्ट किया था।

मैंने छोटू को देखा वो बहुत खुश था, और सबको अपनी नयी घड़ी दिखा रहा था। देखो देखो मेरे भैया लाये हैं। ये सुन मैं हंसते हुए वहां से उठा और घर की ओर चल दिया।

- अजीत कुमार

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