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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 109 : विंध्याचल एक्सप्रेस ११/०३/२०१४ (जबलपुर से इटारसी) // केशव डेहरिया

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प्रविष्टि क्र. 109

विंध्याचल एक्सप्रेस     ११/०३/२०१४

(जबलपुर से इटारसी)

केशव डेहरिया

ज़िंदगी के इस सफ़र के सामने चारेल और क्या बस का सफर? सभी मनुष्य अपने में मस्त और मस्ती में चूर हैं ,कोई किसी के आंखों का नूर है तो कोई किसी के दिलों का कोहिनूर है। किसी के चेहरे में ऐसा है तो किसी के चेहरे में निराशा है।

विंध्याचल एक्सप्रेस का तीसरा सामान्य डब्बा सीट नंबर 45 के ऊपर वाले रेक पर बैठकर देख रहा हूं और लोगों के मनोभावों समझने की कोशिश कर रहा हूं, इस रेलगाड़ी में पहले भी कई बार मैंने यात्रा किया है पता चलता है इस में अधिकतर नौकरी पैसे वाले व्यक्ति प्रतिदिन आना जाना करते हैं अर्थात  अप-डाउन करते हैं ।यह रेलगाड़ी अपने समय पर चलती है और इंसान इसका समय मिलान करके अपने अपने स्टेशनों पर इंतजार करते हैं। अप-डाउन करने वालों में कुछ शिक्षक ,विद्वान ,डॉक्टर, इंजीनियर, छात्र और अन्य लोग होते हैं।

कोई व्यक्ति अकेला सफर करता है तो वह अनजान लोगों से कितनी बातें करता है यह उसके और दूसरों के व्यवहार तथा वाक्पटुता पर निर्भर करता है।

प्रतिदिन साथ-साथ आने जाने से अच्छा परिचय हो जाता है यहां कुछ पहले ही परिचित लग रहे हैं। देख रहा हूं मेरे नीचे वाली सीटों पर सभी शिक्षक विद्वान (बातों को सुनकर पता चला) ३ पत्ती खेल रहे हैं ,१००रुपए की बाजी लगी है इनकी बातों से लगता है हर दिन खेला जाता है यह खेल और चेहरों के भाव से पता लगता है कि इनका मनोरंजन भी हो रहा है।

इसी कंपार्टमेंट में दो महिला यात्री भी है जो खिड़की के पास बैठी कुछ समय अंतराल में इन्हें घूर लेती हैं। महिलाओं के चेहरों को देख कर लग रहा है मानो इन अधेड़ विद्वानों के इस मनोरंजन से परेशानी हो रही है, पर उन्हें कुछ कह भी नहीं रही !!

वहीं दूसरी ओर एकल सीटों पर एक में दो बच्चे (उम्र लगभग 10 से 12 वर्ष )और दूसरी में उनके दादा जी जो विद्वानों के इस मनोरंजन को देखने से मना करने का इशारा कर रहे हैं तथा बाहर की हरियाली को निहार रहे हैं। मेरे दाएं तरफ जाली से डब्बे के दूसरे भाग में बैठे कुछ लोगों को देख रहा हूं अखबार में ताजा खबर पढ़ते ,तो कुछ दोस्त चटपटी बातों के साथ एक दूसरे से मजाक कर रहे हैं। इस रेलगाड़ी में ज्यादा भीड़ नहीं होती है पर कुछ नौजवान खड़े रहने की शौकीन लग रहे हैं। और जगह भी वहां जहां युवतियां बैठी है और कुछ नौजवान युवक द्वार पर खड़े होकर फिल्मों की बातें करते हुए अपने बालों को हवा में लहराते हुए उन पर अनेकों बार हाथ फेर रहे हैं। अरे यहां विद्वानों का मनोरंजन खत्म हो गया है कोई जीत गया ₹300 अब शायद उनका स्टेशन आने वाला है। किसी को कितनी भी परेशानी हो पर गाने तो पूरी ध्वनि में बजते हैं चाहे वह रेलगाड़ी हो, बस हो या मोहल्ले का कोई आवारा नौजवान युवक ,अगर इन लोगों के पास बादल गरजे जितनी ध्वनि का कोई संगीत यंत्र हो तो भी वे उसकी बिना बादल बरसात कराएंगे।

समय और रेलगाड़ी के आगे बढ़ने के साथ इन सीटों पर नए-नए इंसान आ रहे हैं मैं अकेला बैठ कर चुपचाप नए चेहरों को निहार रहा हूं मेरा सफर भी जारी है इन सब लोगों के साथ।

हमारे देश में हजारों रेलगाड़ी प्रतिदिन करोड़ों लोगों के आवागमन का साधन बनी हुई है। इनमें से कई रेलगाड़ी ऐसी भी है जिनमें हमारे देश के समझदार कहे जाने वाले वर्ग के लोगों एवं देश के भविष्य कहे जाने वाले नौजवानों से हमारा समाज यह उम्मीद नहीं रखता कि आप अपने घर से निकलने के पश्चात यह भूल जाते हैं कि आब आगे किसी का घर नहीं है और ना ही कोई आपकी मां,बहन,बेटी या आपके छोटे भाई, बच्चे हैं।

दोस्तों हम सभी एक ऐसे समाज में जीवन की रेलगाड़ी चला रहे हैं जहां सभी अपने हैं ,संपूर्ण समाज एक परिवार है ,जहां सभी स्त्रियों का सम्मान किया जाता है। दादा-दादी ,माता-पिता,भाई-बहन, पति-पत्नी और बच्चे इन सभी रिश्तों को दिल से सोचिए तो आप कभी गलत कदम नहीं उठाएंगे ।हमेशा दूसरों की सहायता कीजिए दिल को सुकून मिलता है। मेरा स्टेशन तो आया नहीं पर लिखने की रेलगाड़ी को रोकना होगा वरना आप कहेंगे इसे पढ़ने और समझने में सहायता करो।

© केशव डेहरिया

मोबाइल:-9479305707

ई.मेल:-   keshavdehariya.05@gmail.com

8 टिप्पणियाँ

  1. समाज के प्रति आपकी उच्च कोटि कि सोच,आपको और आपकी लेखन यात्रा को सफल बनाये .........

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  2. समाज के प्रति आपकी उच्च कोटि कि सोच,आपको और आपकी लेखन यात्रा को सफल बनाये .........

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  3. Rail ke drasya aankhon ke samne aa gaye... Bahut badiya✌️

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  4. सार्वजनिक आवागमन में महिलाओं को होने वाली अव्यवस्था और असुविधा का अद्भुत चित्रण किया गया

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  5. आपने उपद्रवी तत्वों कि जो व्याख्या की है वह जीवंत प्रतीत होती हैं

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    1. धन्यवाद जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए

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