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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 110 : नौकरी के पहले दिनों की यादें // विवेक रंजन श्रीवास्तव

प्रविष्टि क्र. 110

मण्डला में नौकरी के उन दिनों की यादें , संबंध और उपलब्धियां मेरे जीवन की अविस्मरणीय पूंजी है .
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर


मण्डला आदिवासी बहुल जिला मुख्यालय है . मेकल पर्वत श्रेणियों , साल और सागौन के सघन वनों का प्राकृतिक परिवेश यहां की विशेषता है . स्वयं मण्डला नगर को प्रदेश की जीवन धारा माँ नर्मदा ने तीन ओर से अपने सतत प्रवाह से घेर रखा है . यहाँ रानी दुर्गावती का खण्डहर होता हुआ प्राचीन किला है . अवशेष रूप में किले की मोटी बड़ी बाहरी दीवारें, दो बुर्ज , कुछ मंदिर , बड़ी मात्रा में अनाज एकत्रित करने की कुछ वृताकार कोठियां आदि आज भी मौजूद हैं . किले के बाहर तीन ओर से नर्मदा के वृताकार बहाव का लाभ उठाते हुये गौंड राजाओं द्वारा निर्मित तिर्यक रेखा सी छोटी और फिर उसके बाहर बड़ी खाई हैं , जिनमें समय के साथ पुराव के चलते अब पानी का बहाव केवल नर्मदा में बाढ़ आने पर ही होता है . मण्डला मेरा पैतृक शहर है . यहाँ मेरा जन्म हुआ था . हमारे पैतृक निवास को महलात कहा जाता है , इसका निर्माण किले के समकालीन है  . हमारे घर की मूल बनावट भी मेहराब वाले दरवाजों , बहुत मोटी गुड़ , बेल , चूने , दाल आदि के गारे से जुड़ी किसी बड़ी पोथी के आकार जैसी ईंटों की दीवारों , और सागौन की मोटी मोटी भव्य म्यारों से बनी हुई है .दीवानी कार्य के लिये हमारे पूर्वज उत्तर प्रदेश के मुगलसराय से यहां बुलाये गये थे .


माता पिता की शासकीय सेवा के चलते मेरी प्रारंभिक शिक्षा , व बाद में इंजीनियरिंग शिक्षा की सुविधा मण्डला में न होने के कारण बाहर ही हुई . जब मैं नौकरी में आया तो पिछली सदी के अंतिम दशक में मुझे अपने गृह नगर में पदस्थ रहने का और अपनी जन्मभूमि के लिये कुछ कर सकने का सुअवसर मिला . आज मण्डला जिले में बरगी जलाशय के तट पर चुटका नामक गांव के किनारे परमाणु बिजली घर निर्माणाधीन है , इसके प्रारंभिक सर्वे व इसे यहां प्रस्तावित करने का गौरव मुझे हासिल है  . आबादी का न्यूनतम घनत्व , फाउंडेशन हेतु मजबूत जमीन , और पानी की पर्याप्त उपलब्धता के आधार पर प्रदेश में परमाणु बिजलीघर हेतु स्थल चयन का अवसर मुझे मिला था . मुझे स्मरण है कि तब हम  " सीक्रेट " मार्कड लिफाफे में राजस्व व अन्य विभागों से परमाणु ऊर्जा आयोग के लिये कार्य करते थे . प्रबल राजनैतिक नेतृत्व के अभाव में मण्डला सरकारों से लगातार उपेक्षित रहा . बाद में वर्षों की राजनैतिक जद्दोजहद के बाद जब यह परियोजना स्वीकृत हुई तो मुझे जन्मस्थली के विकास में किंचित भूमिका निभा पाने का गहन संतोष अनुभव हुआ .


बात १९९२ की ही है ,तब मध्य प्रदेश में विद्युत मण्डल कार्यरत था. हमारा वेतन राज्य बल्कि केंद्र सरकार से भी बेहतर ही था . मेरे अधीन लगभग २५ तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी कार्यरत थे . उन दिनों आज की तरह बैंक में वेतन जमा नहीं होता था . माह के अंतिम दिन बैंक से सबका वेतन आहरित करके नगद वितरण की जिम्मेदारी उपसंभाग के प्रमुख के नाते मेरी ही थी . मैं देखता था कि रसीदी टिकिट पर हस्ताक्षर करके वेतन लेकर बाहर निकलते ही मोटर सायकिल पर आये हुये कुछ गुण्डे से लगने वाले लोगों को ये कर्मचारी वेतन में से बड़ी रकम दे देते हैं . मेरी पत्नी के उदार भाव को समझ चुके कर्मचारी किसी न किसी बहाने माह के पहले ही सप्ताह में ,  हमसे फिर उधार मांगने के लिये घर पहुंच जाते थे . मुझे उनके खर्चो पर आश्चर्य होता था . टीम लीडर के रूप में मैं समझता था कि कर्मचारियों में उत्साह पैदा करने ,और उनसे उनकी क्षमता के अनुरूप कार्य ले सकने के लिये पारिवारिक और आर्थिक रूप से उनका निश्चिंत होना आवश्यक था. मैंने समस्या के मूल में पहुंचने के लिये उनके घर परिवार तक पहुंचने की योजना बनाई जिसमें मेरी पत्नी ने मुझे बराबरी से सहयोग किया . जल्दी ही हमें समझ आ गया कि प्रायः कर्मचारी सट्टा खेलने के आदि हैं . वे शराब भी पीते हैं . इन व्यसनों से ग्रस्त होने के कारण शादी , बीमारी आदि किसी न किसी पारिवारिक समस्या के चलते लगभग सभी सूदखोरों के चंगुल में बुरी तरह फंसे हुये हैं . वेतन वाले दिन सूदखोर गुण्डे उनसे बहुत ऊंची दरों पर ब्याज की रकम वसूलने कार्यालय ही पहुंच जाते हैं . मजेदार बात यह पता चली कि यदि कोई कर्मचारी मूलधन लौटाने का प्रयत्न करता है तो उसे वापस लेने में सूदखोर महाजन कोई न कोई टालम टोल करता है , व वह चाहता है कि किसी प्रकार उधार बना रहे . सूदखोर महाजन बिना ब्याज मेरे द्वारा कर्मचारियों को दिये जाने वाले छोटे मोटे उधार के कारण मुझसे भी रुष्ट थे . हालात चिंताजनक थे .


हमने इस समस्या को समूल निपटाने का फैसला कर लिया . सभी में इसके लिये इच्छाशक्ति जगाना जरूरी था . धार्मिकता का सकारात्मक उपयोग करते हुये एक रविवार मैंने घर पर मानस पाठ का आयोजन किया . बातों बातों में बिना किसी औपचारिक शपथ के सबमें शराब पीने और सट्टा खेलने को छोड़ने की भावना जागृत की . मैं हरदम सबके साथ नहीं रह सकता था अतः उन्हीं लोगो में से एक दो अपेक्षाकृत समझदार लोगों को यह जिम्मेदारी सौंपी की अब कोई नया ॠण न लेने पावे , कोई सट्टा न खेले और शराब न पिये . मुझे अच्छी तरह स्मरण है अगले वेतन दिवस पर स्थानीय थानेदार की मदद से मैंने अपनी बचत के १४ हजार रुपये बैंक से निकाले और सूदखोर महाजनों का मूलधन सहित सारा ॠण चुकता किया , और उन्हें ताकीद दी कि अब इन कर्मचारियों को कोई भी उधार मेरी जानकारी के बगैर न देवें . बाद में धीरे धीरे मेरे सारे रुपये मुझे वापस मिल गये , पर उस जमाने में १४ हजार की रकम बड़ी थी .


इस ॠण मुक्ति का बहुत ही सकारात्मक प्रभाव जल्दी ही देखने को मिलने लगा . सभी में एकजुटता और परस्पर पारिवारिक भावना का विकास होने लगा . कर्मचारियों की कार्यालयीन कार्यदक्षता में वृद्धि स्पष्ट परिलक्षित होने लगी . उनके बच्चों की शिक्षा व पत्नी तथा परिवार के स्वास्थ्य की ओर वे ध्यान देने लगे .यह रचनात्मक वातावरण बना रहे इसलिये सबको कार्यालयीन समय के बाद भी किसी न किसी तरह व्यस्त रखना जरूरी था . समय समय पर पिकनिक , गणेशोत्सव , दुर्गोत्सव , नियमित मानस पाठ के आयोजन करके यह काम किया गया . बच्चों के खेलकूद व सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन भी हमने किये . दीर्घावधि में अब इन कर्मचारियों में से ज्यादातर ने स्वयं के पक्के मकान बनवा लिये हैं . अधिकांश के लडके और लड़कियां अब पढ़ लिखकर अपनी शिक्षा के अनुरूप नौकरी कर रहे हैं . दो तीन बच्चे तो इंजीनियर बन गये हैं .
विद्युत मण्डल कालोनी में स्फुटित इन सभी छोटी बड़ी गतिविधियों का ही सामाजिक विस्तार यह हुआ कि मण्डला में नर्मदा जयंती पर हमने कुछ स्थानीय समान रुचि के लोगों के साथ मिलकर माहिष्मती महोत्सव का आयोजन प्रारंभ किया , अब तो नर्मदा जयंती का यह आयोजन प्रदेश व्यापक हो चुका है .आज जब मैं अपनी नौकरी के लगभग पूर्णता के मुकाम पर हूं ,  मण्डला के उन दिनों की यादें , संबंध और उपलब्धियां मेरे जीवन की अविस्मरणीय पूंजी है .

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