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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 53 : सुबह का सूर्य ग्रहण // धीरेन्द्र ठाकोर

प्रविष्टि क्र. 53

सुबह का सूर्य ग्रहण

dhirendra thakore

धीरेन्द्र ठाकोर 

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शब्दों से प्रतिबिम्ब ... नहीं..

नहीं,  वह  नहीं बन पा रहा ....

पर उस अनूठे अहसास को ....

अपने पास भी तो  संजोकर नहीं रखना चाहता ....

यह संस्मरण अक्टूबर 1995 में घटित सूर्यग्रहण का है..

आप कहेंगे कि ग्रहण तो होते रहते हैं ....

इस पर क्या संस्मरण......


यह अल सुबह आठ बजे ही घटित पूर्ण सूर्यग्रहण था....

सूर्योदय के बाद से घटित सौंदर्य को ...

सूर्य जो सुबह पूरा दीप्तिमान हो चुका था..

अब घटने लगा था ....

राह का यातायात भी थमने लगा था ...

वह थम सा गया था ....

एक अजीब सी नीरवता पसर रही थी .....

जैसे जैसे सूर्य घट रहा था .....

पक्षियों की फड़फड़ाहट बढ़ने लगी थी.....

वह उस नीरवता में साफ सुनाई पड़ रही थी...

घर के पास कई ऊँचे ऊँचे वृक्ष थे......

सारे पक्षी उन वृक्षों के आस पास मंडरा रहे थे......

सूर्य घटता जा रहा था....


पक्षियों की चहचहाहट बढ़ने लगी थी.....

सुबह के आठ बजे गोधूलि सा आभास.....

प्रकाश मंद होता सा .....

पक्षियों की चहक बढ़ती हुई........

इस क्षण का प्रतिबिम्ब बने तो कैसे.....

वह तो आभास में बना था.....

आभास की अभिव्यक्ति कैसे हो......

सब क्षण दर क्षण हो रहा था.......

मैं अवाक सा ....

घटना का साक्षी.......

प्रकृति के अनूठे दृश्य का.......


पक्षियों ने अभी तो पूरा सा ...

दाना भी नहीं लिया था ...

उनके नवजात अभी भूखे थे.....

एक अजीब सी व्याकुलता ....

छटपटाहट सब जल्द जल्द समेटने की ...

फड़फड़ाहट व चहचहाहट बढ़ती गई.....

एक क्रंदन था पक्षियों की चहचहाहट में....

हर रोज पक्षियों की चहचहाहट सुनता था.....

पर आज उनकी चहचहाहट में क्रंदन था....

उनका वह क्रंदन में महसूस कर रहा था....


में भी विचलित व व्याकुल था.....

इंसानों ने तो पढ़ कर जान लिया कि ग्रहण होने वाला है....

और वे पूर्व के अनुभवों से परिचित होते हैं.....

अपना दैनिक कर्म बदल लेते हैं.....

पर पशु-पक्षी , उनके लिये तो यह एक प्रकोप ही है.....

उन्हें नहीं पता कि यह क्यों हो रहा है ...

और कब तक घटित होगा...

गली में खड़ी गाय भी रंभा रही थी ...

शायद अपने बछड़े से बिछड़ी हो....

उसे भी घर जाना है..

गली के श्वान भी कहीं दुबक कर...

जगह खोजते से....


सुबह आठ बजे...

सब कुछ गोधूलि सा.....

नहीं , ......

उससे भी कुछ अलग........

बहुत कुछ अलग ....

अद्भुत .....

सूर्य फिर घटता , सिर्फ एक लालिमा सा...

स्तब्ध करता हुआ.....

.....अवाक मैं......

पर क्षण को तो परिवर्तित होना था....


सूर्य फिर से बढ़ने लगा .....

प्रकाश क्षण क्षण फैलने लगा......

पक्षी दानों के उपक्रम में चहके.....

सूर्य और बढ़ा .....

..... प्रकाश फैलने लगा ...

कुछ देर बाद सब सामान्य होता गया.....

पर आज भी उस खगोलीय घटना को ....

अवाक देखता हूँ ....

पक्षियों की व्याकुलता को समझना चाहता हूँ.....

अल सुबह ही दिनचर्या प्रारंभ के साथ ही...

दिन के समाप्त होने का भय.....

पक्षियों के लिये निर्मम होती प्रकृति....

या प्रकृति के सौंदर्य का अनूठा पहलू ....

भूखे प्यासे कैसे होगा जीवन ......

पर सही प्रतिबिम्ब नहीं बनता ......

सब आभास में समाया सा.....


सूर्य हर रोज ....

वह हर रोज नया है.....

नई आभा  के साथ.......

प्रकृति  का  वरदान......


धीरेन्द्र ठाकोर 

Dhirendra Kumar Thakore

120 - Heera Nagar,

D . C . M .

Ajmer road,

Jaipur ( Rajasthan ). 302021.

संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 2656747055453909838

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