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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 61 : ‘मैं और महाकवि के श्वसुर’ // दिलीप कुमार

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प्रविष्टि क्र. 61 ‘मैं और महाकवि के श्वसुर’ दिलीप कुमार ‘‘मैं घर से अमावस्या, परीवा और दिशाशूल देखकर शुभ घड़ी में दिल्ली के लिये निकला था अप...

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प्रविष्टि क्र. 61

‘मैं और महाकवि के श्वसुर’

दिलीप कुमार

‘‘मैं घर से अमावस्या, परीवा और दिशाशूल देखकर शुभ घड़ी में दिल्ली के लिये निकला था अपनी पाण्डुलिपि प्रकाशक को देने। प्रकाशक ने पाण्डुलिपि ले ली और समझाते हुये कहा ‘‘कि हे साहित्यकार महोदय, अब आप राजधानी से प्रस्थान करें। वरना लेखन से आप अमर हों या न हों, अलबत्ता दिल्ली के प्रदूषण से मर कर आप जरूर अमर हो जायेंगे’’। बड़ी हसरत थी कि प्रकाशक हमें कम से कम थ्री स्टार होटल में ठहरायेगा। ओला कैब बुक कराके दिल्ली के दिलकश नजारों की सैर करायेगा। फिर शाम को हमारे सम्मान में पार्टी देगा जिसमें दिल्ली की कला, साहित्य एवं मीडिया जगत की नामी हस्तियां होगी। लोग मुझसे मेरी अगली पुस्तक और प्रायोजनों की बात पूछेंगे और मेरे लेखन को कालजयी घोषित कर देंगे। अगले दिन राजधानी के अखबार मेरे फोटो से रंगे होंगे और फेसबुक की सेल्फियां तो अनगिनत होंगी। मैं वो कतरनें समेट कर पत्नी को भेजूंगा और प्रकाशक मेरी पत्नी को अच्छी सी साड़ी भी उपहार में देगा। पत्नी ये खबर और उपहार पाकर फूली न समायेगी तब उसके चेहरे पर एक अफसोस नुमाया होगा कि साहित्यकार से शादी करके उसने कोई गल्ती नहीं की है।

मगर मेरे ये सारे मंसूबे ऐसे फना हो गये जैसे हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के ख्वाब। बाकी झटके तो मैं सह गया मगर साड़ी मैंने खरीद ली पत्नी के कोपभाजन से सुरक्षा हेतु। क्योंकि पत्नी के मना करने के बावजूद दफ्तर से अवैतनिक अवकाश लेकर किस तरह मैं दिल्ली आया था। यहाँ की बेइज्जती पत्नी जान पाती तो फिर अल्ला-अल्ला खैरसल्ला। सो मजबूरी में मैंने एक नकली कांजीवरम की साड़ी ले ली और उस पर असली ब्रांड की मोहर भी लगवा ली वैसे ही जैसे दिल्ली में आलोचक अपने ब्रांड की मोहर लगाकर नकली लेखकों को बिल्कुल असली टाइप का लेखक बना देते हैं। दिल्ली में पैकेज के हिसाब से साहित्यिक मुहरें उपलब्ध है महान, महाकवि, कालजयी, साहित्य भूषण, साहित्य गौरव आदि-इत्यादि। मन की टीस को दबाये हुये कलपता, सहमता मैं स्टेशन पहुँचा और अपनी साख बचाये रखने के लिये थर्ड ए0सी0 का टिकट ले लिया ताकि मेरे गृहनगर में अगर किसी ने मुझे स्लीपर या जनरल डिब्बे से उतरते देख लिया तो मेरे महान टाइप लेखक होने की किरकिरी हो जायेगी।

गाड़ी में सामान रखने के बाद चाय लेने उतरा तो किसी ने पूछा ‘‘अरे आप, यहाँ कैसे’’? खुद की प्रसिद्धि पर मैं थोड़ा गर्वित होता इससे पहले वो धीरे से बोले ‘‘तुम शुक्लाजी हो ना, वही जो घर-घर जाकर ट्यूशन पढ़ाते हो। मैं वंशीधर पांडे हूँ, महाकवि अनुज पांडे का श्वसुर। ये बात हैरानी का सबब थी कि वो डिफाल्टर, महाकवि कैसे बन गया जिसकी कविता ऊब का महाकाव्य एवं पैरोडी को मिसाल हुआ करती थी। तब तक अनुज पांडे स्वयं आ गये...... सर ये बाल नहीं, दाढ़ी-मूंछ, मुंह में घुसी, चश्मा मोटे फ्रेम का लम्बा कुर्ता एवं जींस पैंट यानि महाकवि का पूरा चोला। महाकवि के श्वसुर ने महाकवि से कहा ‘‘अब तुम जाओ, शुक्लाजी मिल गये हैं ये हमको सकुशल घर पहुँचा देंगे’’। महाकवि ने मुझे ऐसे देखा मानो वो मुझे कृतार्थ कर रहे हों। उन्होंने अपने श्वसुर को एक बीड़ी का बंडल दिया और मुझे तकाकर चलते बने। महाकवि के श्वसुर ने छूटते ही कहा ‘‘शुक्लाजी, जरा बीस का नोट दीजिये, चाय ले लूँ और मेरे पास बड़ी नोट है, छुट्टे नहीं हैं’’। महाकवि का भी ऐसा बर्ताव जगजाहिर था। वे लोगों से उनकी कवितायें देखने-पढ़ने को मांगते थे फिर उसे टीपकर अपने नाम से प्रकाशित करवा लिया करते थे। महाकवि के इस टीप रूपी अस्त्र से हमारे शहर के युवा कवि इतने आतंकित रहा करते थे कि वो महाकवि को अब ये भी नहीं बताते थे कि वे किस प्रकार के कविता लिख रहे हैं छंद वाली या छंद विहीन। मैंने महाकवि के श्वसुर को बीस का नोट थमाया और उनसे कहा कि ‘‘आप रूकिये, मैं आपके लिये और कुछ खाने-पीने का सामान लाता हूँ’’ ये सुनते ही उनकी बांछें खिल उठीं। मैं उन्हें चकमा देकर टे्रन से दूसरी तरफ निकल गया और तब तक छिपा रहा जब तक गाड़ी चल न दी।

जब गाड़ी ने गति पकड़ ली तब मैं तमाम डिब्बों से होता हुआ अपनी थर्ड ए0सी0 सीट पर पहुँचा तो महाकवि के श्वसुर वहाँ पहले से विराजमान थे। मैं चिंहुका, हैरान रह गया कि इन्हें मेरी सीट नम्बर कैसे मालूम। मगर वे छूटते ही बोले ‘‘कहाँ रह गये थे, मैं तो चेन खींचने वाला था कि शुक्ला कहाँ रह गये, कहीं छूट तो नहीं गये। खैर क्या लाये मेरे लिए’’? मैंने बमुश्किल सीट पर अपनी जगह बनाई और उनसे पूछा ‘‘आपको कैसे पता लगा मेरा सीट नंबर’’? वो खिलखिलाकर हंसते हुये बोले ‘‘शुक्ला दुनिया देखी है मैंने। स्लीपर क्लास में अकेला आदमी सामान छोड़कर चाय पीने नहीं जाता। इतना भी रामराज्य नहीं है भारतीय रेलों में। ऐसी ढिठाई ए0सी0 वाले ही करते हैं। सो पता लगाना आसान था। मैं ए0सी0 डिब्बे में बैठ गया टी0सी0 से पूछा कि टिकट मेरे छोटे भाई बी0डी0 शुक्ला के पास है। इसलिये उसने खोजकर तुम्हारी सीट बता दी। जानते हो टी0सी0 को सौ रूपये भी देने पडे़ इस बात के। वरना तुम्हारी सीट, सामान सब जाता। लाओ निकालो सौ रूपये क्योंकि मेरे पास बड़ा नोट है’’। डिब्बे के लोग मुझे ऐसे घूर रहे थे मानों मैं कितना लापरवाह और गैर जिम्मेदार आदमी हूँ। सबकी कहर भरी नजरों से बचने के लिये मुझे उनको सौ का नोट देना पड़ा। वो मेरी सीट पसरे बैठे रहे और मैं बाकी के लोगों के वक्रदृष्टि से बचने के लिये सिकुड़ा ही बैठा रहा। उनके पास एक झोला था जिसमें से उन्होंने महाकवि की हालिया रिलीज पुस्तक ‘‘देह ही कविता है’’ निकाल ली। टाइटिल दिलचस्प था मैंने महाकवि की पुस्तक का अवलोकन किया जो एक नयी विधा का सूत्रपात कर रही थी। महाकवि ने गजब गुगली डाली थी कि गूगल बाबा भी कन्फ्यूज हो जायें कि वे इस बेजोड़ कृति को दिखायें या पढ़ायें। मस्तराम सीरीज की कविता सामने थी जिसमें स्त्री के एक अंग का चित्र फिर उस पर दस पेज की कविता....... अंग, प्रत्यंग का चित्र फिर उस पर दे धड़ाधड़ कविता........ वाह रे महाकवि। उस पर तुर्रा ये था कि महाकवि चित्रकार भी थे उन्होंने हर अंग पर अलग-अलग चित्रकारी की थी और फिर उस पर उनकी प्रगतिशील अंतुकात कविता....... धन्य हो महाकवि।

अब कोई अश्लील साहित्य पर शर्मिन्दा न होगा, मस्तराम टाइप की रचनायें अब किसी को छिपकर पढ़ने की जरूरत न पडे़गी। अब महाकवि का महाकाव्य घरों की बैठक की शोभा बना करेगा, श्लील-अश्लील का कोई फर्क नहीं रहेगा। मैं ये सब सोच ही रहा था कि महाकवि के श्वसुर ने कहा ‘‘जरा बीस का एक नोट देना, पान-मसाला लेना है, मेरे पास बड़ा नोट है। मैं हतप्रभ रह गया, ढिठाई से कहा ‘‘मेरे पास भी बड़ा नोट है। फिर ए0सी0 डिब्बे में धूम्रपान की पाबन्दी होती है। फाइन लग जायेगा’’। वे और भी ढिठाई से बोले ‘‘उसकी चिंता मत करो। दो तो सही’’। सीट के अगल-बगल वे लोग मुझे घूर कर देखने लगे, मानों मैं कितना निष्ठुर प्राणी हूँ। हारकर मैंने उन्हें सौ का नोट दिया क्योंकि फुटकर नहीं था और उन्हें ताकीद भी की, कि बाकी के अस्सी रूपये लौटा देना। थोड़ी देर बाद वे खूब सारा पान मसाला, बीड़ी का बंडल और माचिस लेकर लौटे। मैंने उनसे कहा ‘‘बाकी के अस्सी रूपये दीजिये’’। वे ढिठाई से मुस्कराते हुये बोले ‘‘अरे बेचने वाले के पास भी छुट्टे नहीं थे सो पूरे सौ का ले लिया’’। मैं अवाक रह गया अब डिब्बे के लोग भी मुस्करा रहे थे। महाकवि के श्वसुर कुटिल मुस्कान से बोले ‘‘लिख लो शुक्ला जी, घर चल के दे दूँगा। मैंने भुनभुनाते हुये कहा ‘‘छुट्टे नहीं थे तो ये मस्तराम टाइप की दस-बीस किताबें ही ले आते। वैसे भी गाड़ियों में ऐसे घटिया, अश्लील साहित्य बहुत बिकते हैं। रास्ते का खर्चा निकल जाता और आपके दामाद का प्रचार-प्रसार भी हो जाता’’।

मैंने जानबूझकर उनको कड़वी बात कही थी ताकि वे नाराज हो जायें और मेरी सीट से चले जायें। मगर महाकवि के श्वसुर भी महाकवि की कविता की तरह अबूझ थे। उन्होंने मेरी अपेक्षा से उलट जवाब दिया ‘‘सही कहा, मेरा दामाद ऐसा ही लिखता है फिर भी उसकी किताबें क्यों नहीं बिकती’’? मैं उनकी बात का उत्तर देता तब तक गाड़ी में भोजन पूछने वाला आ गया। मुझे भूख तो बहुत लगी थी। मगर मैंने सोचा कि इनके रहते मुझे डबल प्लेट का आर्डर देना पडे़गा सो मैंने इंकार करने का मन बनाया। मैं ये कहता उसके पहले ही वे मेरी मनोदशा भांपकर तपाक से बोले ‘‘मुझे भूख नहीं है, शुक्लाजी आप अपना आर्डर दे दीजिये’’। मैंने चैन की सांस ली कि चलो अब न तो मुझे भूखा रहना पडे़गा न डबल भुगतान करना पडे़गा। जैसे ही खाना आया और मैंने उसको खोला वैसे ही महाकवि के श्वसुर आ धमके और बिना कुछ कहे खाना शुरू कर दिया। वे खाते-खाते ढिठाई से बोले ‘‘आज शुभ दिन है, भूखा नहीं रहना चाहिए पाप लगता है सो अन्न को प्रणाम करके उसका भोग लगा रहा हूँ। चिंता मत करो थोड़ा सा ही खाऊँगा। बाकी आप खा लेना’’। वे मुझे ऐसे कृतार्थ करते हुये बोले मानो भोजन उन्हीं का हो और मैं ही बिन बुलाया मेहमान हूँ। बिना धुले हाथ से भोजन और उनके नशापत्ती वाली जीभ-दाँत को देखकर मुझे घिन आने लगी और मैंने खाने से इंकार कर दिया। मैं खाने के पास से खिसक आया तो वे चौंकते हुये बोले ‘‘क्या हुआ, खाओ ना। देखो खाना कितना ज्यादा है। मुझे वैसे भी भूख नहीं है। बस थोड़ा सा ही खाऊँगा। मैंने अनमने भाव से कहा ‘‘नहीं, अब मैं नहीं खाऊँगा। मेरा मन नहीं है। आप खाइये और अगर आपका भी मन न हो और भूख न हो तो बाकी फेंक दीजियेगा’’। उन्होंने मुझे अपलक देखा और कहा ‘‘ठीक है, आपका मन नहीं है तो मत खाइये वर्ना तबियत खराब हो जायेगी। खाना फेंकना अन्न का अपमान है इसलिये तुम्हें पाप लगेगा। मैं भी ना खाता, मगर तुमको अन्न के पाप से बचाने के लिये मैं ये खाना खाये ले रहा हूँ’’ इतना कहकर वो खाने पर टूट पडे़ और मैदान साफ कर दिया।

मैं भूख से बिलबिलाते हुये अपनी मूर्खता पर कुढ़ता रहा। खाना खाने के बाद वो थोड़ा आडे-तिरछे हो लिये और मुझसे धीरे से बोले ‘‘खाने के बाद मैं थोड़ी देर लेट न लूँ तो मुझे गैस बनने लगती है। उनके द्वारा संभावित गंदगी के मद्देनजर मुझे खिसकना पड़ा। वो पसरकर लेट गये मैं दुबक गया। लेटे-लेटे उन्होंने बीड़ी सुलगा ली। सामने की सीट पर बैठी एक नव विवाहिता को बीड़ी के धुंए से घुटन हुई तो उसने प्रतिवाद किया। उस महिला के पति ने उनको समझाना चाहा तो पांडे जी उखड़ पडे़ ‘‘मेरी सीट है मैं जो चाहे करूँ। तुम्हारी पत्नी दो घंटे पहले सिंगार-पटार कर रही थी तो मैंने तुम्हें रोका था क्या’’? वो साढ़े छह फुट का नौजवान अंगड़ाई लेकर उठा तो मैं सहम गया कि ये युवक पहले पांडे को पीटेगा फिर मुझे। उसकी मार से पांडे का तो कुछ नहीं जायेगा। मगर मेरे जैसे मरियल आदमी की नौबत बिगड़ सकती है। मगर तब तक पांडे जी भी तेवर में आ चुके थे। बमुश्किल मैंने बीच-बचाव कराया। पांडे जी न माने वे लेटे-लेटे बीड़ी का कश लेते रहे। अंत में वो युवक उठकर कहीं चला गया। उसके जाते ही पांडे जी तड़कर बोले ‘‘देखा डर गया, तुमने बीच-बचाव करा लिया वरना उठाके पटक देता उसको’’ ये कहते हुये उन्होंने दूसरी बीड़ी सुलगा ली।

मैं कुछ समझ पाता उससे पहले वो युवक टी0सी0 के साथ हाजिर। टी0सी0 ने उन्हें उठाया, सीट और टिकट की दरयाफ्त की और फिर जी0आर0पी0 बुलाने की धमकी दी। मैं डर गया लेकिन टी0सी0 ने मुझसे उनका ए0सी0 का टिकट बनवाने और फाइन भरने को कहा। मैंने टी0सी0 से कहा ‘‘इनको ले जाइये, मैं फाइन क्यों दूँ। मेरे पास पैसे नहीं हैं। इन्हें चाहे जनरल डिब्बे में ले जायें या जेल मुझसे कोई मतलब नहीं’’। टी0सी0 उन्हें ले गया तो मैंने चैन की सांस ली। मुझे बाथरूम जाना था, वहाँ से लौटा तो पांडे जी सीट पर हाजिर थे। टी0सी0 भी वहीं था। टी0सी0 ने मुझे बुलाया, दीन-दुनिया, ऊँच-नीच समझाया और मेरी परेशानी समझकर जी0आर0पी0 सिपाही को सिर्फ सौ रूपया देकर मामले का रफा-दफा करने को कहा। मैं टी0सी0 की उदारता से अभिभूत था फिर पांडे जी के अश्रुपूर्ण नेत्र देखकर मुझे दया आ गयी सो मैंने जी0आर0पी0 सिपाही को सौ रूपये दे दिये। रास्ते में हमने और पांडे जी ने और कोई बात-चीत न ही।

स्टेशन पर हम उतरे तो घर जाने के लिये हमने टेम्पो ले लिया। मैंने उनका भी किराया अदा कर दिया था क्योंकि मेरा घर रास्ते में पहले पड़ता था। मुझे खुद पर कोफ्त हो रही थी कि खामखां मैंने महाकवि और उनके श्वसुर को गलत समझा। मैं अपने घर के सामने वाली सड़क पर उतरा और घर जाने को उद्धत हुआ तो पांडे जी बोले ‘‘अरे शुक्लाजी सुनिये, वो टी0सी0 मुझे जेल में डाल रहा था। आपके पास भी पैसे नहीं थे मैं जान गया था। इसलिये मैंने आपके बैग से वो कांजीवरम की साड़ी निकालकर टी0सी0 को दे दी थी। हिसाब में लिख लेना, वैसे भी वो साड़ी नकली कांजीवरम थी ना, कितने की थी’’? मैं अंगारों पर लोट गया। मैंने उनसे चीखते हुये कहा ‘‘पर आपके पास तो बड़ा नोट था ना’’।

तब तक टेम्पो वाले ने हार्न दिया वो दौड़कर उसमें बैठ गये और जाते-जाते बोले ‘‘हिसाब में लिख लेना’’। सब कुछ लुटा-गंवाकर मैं सोच रहा था कि महाकवि के श्वसुर मेरा हिसाब तो न जाने कब देंगे? मगर पत्नी को जो मैंने फोन पर बताया था उस कांजीवरम की साड़ी का हिसाब कौन देगा?।

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रचनाकार: संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 61 : ‘मैं और महाकवि के श्वसुर’ // दिलीप कुमार
संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 61 : ‘मैं और महाकवि के श्वसुर’ // दिलीप कुमार
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