370010869858007
Loading...

संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 86 : मेरा गांव // देवेन्द्र कुमार पाठक

image

प्रविष्टि क्र. 86

मेरा गांव

देवेन्द्र कुमार पाठक

पिछले दिनों अरसा बाद अपने गाँव जाने का अवसर मिला. सेवानिवृत्ति के बाद पहली बार पत्नी, अनुज, अनुज वधू और दामाद के साथ जब गांव की सड़क पर पहुंचा तो मन को बड़ा सुकून और ख़ुशी मिली. पक्की सड़क, हर नाले पर पुल और आसपास से गुजरती कारें, बाइक, ट्रैक्टर और साइकलों पर सवार स्कूल जा रही लड़कियां- लड़के, शिक्षक.

जीन्स के पैन्ट पहने खेतिहर मजूर और बाइक पर सरसों, मसूर, चने के गट्ठर लादे युवा. बस अड्डे पर पतंजलि के उत्पादों, गिट्टी, सीमेंट, लोहे और चाय-पान, गुटके की दुकानें. चाट के ठेले, सैलून......घर तक पहुँचने में बड़ी मशक्कत उठानी पड़ी.

जिन गलियों से एक साथ 2-2 बैलगाड़ियाँ गुजरती थीं, उनसे कार निकालना आसान नहीं था. गांव को घेरकर बहनेवाला नाला बिना पानी मानो नग्न अवस्था में शर्मिंदा लगा. लोगों ने घरों के चबूतरे बढ़ा कर गलियों को संकरा कर दिया है. और घरों से निकली नालियों की गन्दगी गलियों में बह रही है. गांव एक ऊँची पहाड़ी के चौगिर्द आबाद है. सोलह वार्डों की पंचायत है. आरक्षित सरपंच पद पर चौथी जमात तक पढ़ी महिला. दस्तखत कर लेती सरपंच सचिव के बूते न अतिक्रमण रोक पाती है, न ही सचिव और ऊपर के अफसरों की मिलीभगत से होती खानापूरी और मनमानियां......

पहाड़ी पर शारदा देवी का मन्दिर है. मुझे छोड़ मेरी पत्नी, अनुज, अनुजवधू और दामाद सीढ़ियां चढ़ने लगे. पांच लड़कों और तीन लड़कियों का एक ग्रुप आपस में गुटका बांटकर ऐसे खा रहा है, मानो पूजा का प्रसाद हो-मुझे अपनी ओर हैरानी से देखते देख, वे न सहमे; न सकुचाये.

ब्रिटिशकालीन जमींदार की कोठी खण्डहर हो चुकी है. सामने ही उस खपरैल मिट्टी की दीवारों के मकान में, जिसमें बरसों पहले गौशाला थी, जमींदार की सबसे छोटी विधवा पुत्रवधू ने अपना आवास बना रखा है. बगल के घर से पानी की बॉटल झुलाता, बीड़ी फूंकता एक स्कूली उम्र का लड़का निकला और मुझसे बेपरवाह सीढ़ियां चढ़ गया. सामने ही पंचायती हैण्डपम्प पर औरतों की रेलमपेल और चख-चख मच रही है. छाती से पेटीकोट बाँधे नहाती औरतों को देख मैं वहां से आगे बढ़कर स्कूल की और चल पड़ा. जहाँ मैंने मिडिल तक पढ़ाई की और बाद में वहां शिक्षक के रूप में पदस्थ हुआ.

साहस फोन की रिंगटोन सुन देखा, दामाद का फोन था. वे पहाड़ी से उतर आये थे....... हमारे ढहते पुश्तैनी घर के दरवाजे पर अंदर से सांकल लगी पाकर हम सब हतप्रभ और अवाक एक दूसरे को देखते रह गए. मेरे दोनों छोटे भाइयों ने अपने-अपने हिस्से बाँट लिए हैं. सीढ़ियों पर माथा टेक हम लौट पड़े.

.........................

(देवेन्द्र कुमार पाठक, साईं पुरम् कॉलोनी,रोशननगर; कटनी,मध्यप्रदेश,483501 )

email- devendrakpathak.dp@gmail.com

संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 2475720593769566925

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव