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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 91 : प्रेरणा // विरेंदर ‘वीर’ मेहता

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प्रविष्टि क्र. 91

‘प्रेरणा’

विरेंदर ‘वीर’ मेहता

बचपन शरारत का दूसरा नाम हैं, और अगर उम्र दस साल की हो तो शरारत करना स्वाभाविक ही हैं। लेकिन कभी-कभी ये शरारतें ही अपराध की पहली सीढ़ी बन जाती हैं। ऐसा ही कुछ मुझे याद आ रहा हैं जब मैं अपने बचपन के कुछ पन्नो को पलटने बैठा हूँ।

शायद ये कक्षा चार की बात हैं। कुछ दिनों की शरारत आदत सी बनती जा रही थी, छुट्टी होते ही विद्यालय के बाहर लगी सब्जी मन्डी मे घूमना और भीड़-भाड़ वाले किसी 'ठीये' या 'रेहड़ी' से चुपके से आँख बचाकर कोई फल उठा लेना और अपने तीन हमजोली मित्रों के साथ मजे लेकर खाना। फल को आपस में बांटने का तरीका भी हमने लाजवाब ढूंढ निकाला था, पेंसिल छीलने के शार्पनर को तोड़कर उसके छोटे ब्लेड से हम बखूबी फल को चार भागों में काट लिया करते थे। बहरहाल मित्र भी मेरी तरह अबोध थे और शायद इन सब चीजों से जुड़े खतरों को भांप नहीं पाते थे। पर एक बात पक्की थी कि उठाये गए फल के स्वाद और उठाने में मेरी प्रयोग की गयी 'ट्रिक्स' पर घर पहुँचने तक खूब चर्चा होती थी।

कहते हैं शेर के मुहं में जब आदमी का खून लग जाता हैं तो उसे जानवर के खून में स्वाद नहीं आता। ऐसी ही कुछ हालत अपनी भी हो गयी थी, जब तक किसी फल वाले के ठीये से कोई एक फल न उठा कर खा ले तब तक घर के किसी खाने में स्वाद ही नहीं आता था।

ऐसा ही उस दिन भी हुआ। एक फल की रेहड़ी पर लाल-लाल सेब देखकर कदम वही रूक गये। हाथ मौके की तलाश करने लगे, लेकिन मौका था कि मिल ही नहीं रहा था। देर होती देखकर एक साथी ने चलने का इशारा भी किया।

"शी: शी:.... राज रहने दे, आ चले।"

पर लालची मन कहां मानता है, जमा रहा अपनी जुगाड़ में। और कुछ ही देर फल वाले को ग्राहक से बहस में उलझे देखकर मौका ढूँढा और एक बड़े से सेब पर हाथ मारकर चुपके से निकलने का प्रयास किया।

"ऐ चोरी करता है।" पीछे से एक दूसरे फल वाले की आवाज आयी और एक मजबूत हाथ ने मेरी बाजू को पकड़ लिया।

"अरे! इतना बड़ा सेब, दो सौ ग्राम से कम का क्या होगा?" फल वाला चीखा।

"कम से कम तीन रूपये का तो होगा, अरे जब इतने का रोजाना कोई चोरी कर लेगा तो हम कमाएंगे क्या?" एक दूसरे फल वाले ने तान में तान मिलाई।

"अरे तू तो धर्म बाबू का छोरा हें न!" रंगे हाथ पकड़ने वाले ने ध्यान दिया, तो पहचानते हुए बोल पड़ा। "तेरा बाप तो बड़ा शरीफ हैं रे, और तू ऐसा काम करे हैं।"

बातें सुन-सुन कर मन बैठने लगा था। मित्र क्षण भर में करीब दो सौ कदम दूर जा खड़े हए थे और मैं भीड़ के बीच आँखें झुकाये खड़ा, तरह-तरह की कल्पना कर रहा था। सहसा उधर से गुजरते हुए कक्षा अध्यापक डी.पी. वर्मा ने ये दृश्य देखा तो उन्हें बात समझते देर न लगी। और पूरी बात जानकार मुझे आड़े हाथों लिया।

"एक अच्छे घर के होते हुये चोरी जैसा काम करते हों, पढ़-लिखकर डाकू बनने का विचार है क्या?" उनके चेहरे पर रोष व्यक्त था। "कल ही पूरे विद्यालय के सामने तुम्हारा ये कारनामा बताता हूँ।"

बात को वही समाप्त करते हुए उन्होंने फल वाले को समझाया और मुझे उनसे छुटाकर घर जाने की आज्ञा दी। रास्ते भर सिर झुकाए मित्रों की बातें भी सुनता रहा और आने वाले कल की कल्पना से ही दिल काँपने लगा। घर पहुंच कर परिवार में किसी को बताने की हिम्मत ही नहीं थी। तबीयत ठीक नहीं हैं का बहाना लिए, भूखा प्यासा रात भर

बिस्तर पर करवटे बदलता रहा। अगले दिन विद्यालय में चोर कहलाये जाने का डर बार-बार सामने आ खड़ा होता और आंखों में भरी नींद को ले उड़ता। रात भर आंसुओं से तर-ब-तर तकिए पर हर आंसू के साथ परमात्मा से इस बार क्षमा करने की गुहार लगाता रहा और भविष्य में दोबारा ऐसा न करने की शपथ लेता रहा।

........ अगली सुबह फिर 'वर्मा सर' के सामने सिर झुकाये खड़ा था। आँखों में अभी भी आँसू थे। कल की अपेक्षा आज वे थोडा नरम थे।

"बेटा! होना तो ये चाहिए कि तुम्हें 'प्रेयर' में सबके सामने खड़ा कर तुम्हारी करनी बताई जाए, पर मुझे तुम्हारी आँखें तुम्हारे पश्चाताप की कहानी बता रही हैं।" सहसा उन्होंने गंभीर होते हुए मेरे सिर पर हाथ रख दिया। "बेटा, जीवन की यात्रा में 'छोटे-छोटे' लोभ अक्सर सामने आकर हमारी बुद्धि पर परदा डाल देते हैं और एक बार यदि हमने इन परदों को काटने की आदत नहीं डाली तो फिर कभी भविष्य में ये हमें संभलने का अवसर नहीं देते। अगर जीवन में एक अच्छे इन्सान बनना चाहते हो तो अपने इन आंसुओं को कभी मत भूलना... कभी मत भूलना।"

मैं सिर झुकाए, खामोश खड़ा उनकी बातों को सुन रहा था कि सहसा उनकी भर्रायी आवाज ने मेरा ध्यानाकर्षित किया। मैं कुछ समझ पाता इससे पहले ही "जाओ बेटा, अपनी कक्षा में जाओ।" कहते हुए वर्मा सर ने अपनी आँखों में झलकते आंसू पोंछ लिए थे।

............ आज भी उनके कहे शब्द मेरे प्रेरणास्त्रोत बनकर मेरा मार्ग दर्शन करते हैं, लेकिन उस बाल उम्र में मैं उनकी आंखों में झलकते आंसुओं को नहीं समझ सका था। हाँ ये तो बहुत बाद में जा कर मुझे मालूम हुआ था कि ऐसे ही छोटे-छोटे लोभ के परदों ने कभी उनके अपने पुत्र को भी अपराधी बना दिया था, जिसे वह सही दिशा में लौटा भी नहीं सके थे।

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