संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 98 : महातीर्थ // डॉ. लता अग्रवाल

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प्रविष्टि क्र. 98

यात्रा विवरण

महातीर्थ

डॉ. लता अग्रवाल

बेटी के ब्याह से निवृत हुई तो साथियों ने बधाई दी ‘चलो गंगा नहा ली’। हाँ! आज बच्चों की जिम्मेदारियों से मुक्त होना किसी तीर्थ से कम नहीं। लगा क्यों न इसे क्रियात्मक रूप दूँ अत: पति महोदय से तीर्थयात्रा की मंशा व्यक्त की तो फौरन स्वीकृति की मोहर लग गई। कुछ मित्रों ने भी सहजता से मंजूरी दे दी। पंडित से शुभ मुहूर्त पूछ कर हम लोगों ने तीर्थयात्रा का दिन निश्चित किया , अपनी योजना में किसी प्रकार का विघ्न न देख यकीं हुआ की यदि कुछ दिल से चाहो तो सारी कायनात उसे तुमसे मिलाने में जुट जाती है। नियत दिन शुभ मुहूर्त पर यात्रा आरम्भ कर हम भोपाल से निकले अभी रायसेन रोड पर ही पहुंचे थे कि जाम लगा मिला।

“लगता है कोई दुर्घटना घट गई है।” कहते हुए बस के सारे पुरुष पड़ताल हेतु नीचे उतर गये।

‘कोई युवा है बेचारा! पता नहीं किस घर का चिराग है।’ भीड़ से स्वर उभरा। इतना सुनते ही पतिदेव स्वयं को रोक नहीं पाए भीड़ को चीरते हुए घटना स्थल पर पहुँच गए। सामने रक्त रंजित युवा बेहोश पड़ा था चारों ओर से भीड़ ने उसे घेर रखा था। कोई मोबाईल से वीडियो बना रहा था . कोई फोटो ले रहा था तो कोई अटकलें लगा रहा था आखिर यह घटना घटी कैसे ...?

“अरे! यह गंभीर अवस्था में है इसे फौरन अस्पताल ले जाना होगा।” इन्होंने कहा। मगर भीड़ से कोई प्रतिक्रिया न देख इनकी बेचैनी बढ़ने लगी।

“१०८ को फोन कर दिया है आती होगी।” किसी ने कहा।

“मगर इसे हम १०८ के भरोसे तो नहीं छोड़ सकते। चलो हम ही लिए चले हैं।” इतना कहते ही धीरे -धीरे भीड़ छंटने लगी, साथ ही भीड़ से मिला जुला स्वर उभरा ,

“इनसे मिलिए, आ गये हातिमताई।” भीड़ छंट चुकी थी रास्ता कुछ साफ हुआ तो ड्रायव्हर ने आवाज लगाई ,

“अरे! चलिए सर जी , वैसे ही काफ़ी लेट हो गये।’ मगर इन्हें कुछ सुनाई ही कहाँ दे रहा था।

“नहीं यार! पहले इस बच्चे को अस्पताल पहुंचा दें फिर चलते हैं। चोट गहरी है अगर समय पर सहायता न मिली तो अनर्थ हो जायेगा।” 

“अरे! क्यों चिंता करते हो हमारी सरकार ने १०८ की व्यवस्था इसीलिए तो की है|” बस में सभी उतावले हो रहे थे। इन्होंने दो टूक जवाब दे दिया ,

“आप लोग अपनी यात्रा आरम्भ करें , मैं बच्चे को लेकर अस्पताल ले जा रहा हूँ ,” साथ ही मेरे लिए भी हिदायत थी ,”तुम भी सबके साथ चलो मैं बाद में ज्वाइन करता हूँ।” सीता ने कब राम के बिना स्वर्ग स्वीकारा है ? सो मैं भी उस उक्ति को स्मरण कर उनके साथ हो ली कि , ‘मन का हो तो अच्छा न हो तो और भी अच्छा क्योंकि उसमें ईश्वर की मर्जी शामिल होती है, ईश्वर हमारा कभी अहित नहीं करेंगे।’ १०८ नहीं पहुंची आखिर एक रिक्शा रोक हम उस बालक को नेशनल हॉस्पिटल ले गए। आनन फानन में उसे भर्ती तो कर लिया मगर डॉक्टर द्वारा मरीज से हमारा सम्बन्ध और पता पूछने पर हम बच्चे की जेबें टटोलने लगे , कोई मोबाईल नम्बर , आई कार्ड ...’ये किस जमाने का बच्चा है मोबाईल तक नहीं!’

मन में एक आशा थी बालक जल्द होश में आ जाये तो उसे उसके परिजनों को सौंपकर अपनी यात्रा पुन: आरम्भ करें। आखिर अगले जन्म के खाते में कुछ तो अर्जन करना था न।

श्रीमान की पीड़ित बालक के प्रति सम्वेदना के बारे में बताती चलूं , दरअसल कुछ साल पहले अपने छोटे भाई को सड़क हादसे में खो चुके श्रीमान को जब यह पता  चला कि उनका भाई दुर्घटना के बाद भी दो घंटे जीवित रहा  अगर समय पर डाक्टरी सहायता मिल जाती तो शायद वह बच जाता। मगर किसी ने उसकी सुध न ली वह सड़क पर छटपटाता रहा। यही अफ़सोस उन्हें कचोटता है , जब कभी किसी को लहूलुहान देखते हैं तो इसी तरह बेचैन हो सहायता के लिए दौड़ पड़ते हैं। आज इस हादसे ने उनकी यादों को पुन: जीवित कर दिया कारण वह युवा भी लगभग इसी उम्र का था।

डाक्टर ने सिर में गंभीर चोट बताई और फौरन इलाज करने को कहा वरना जान को खतरा हो सकता था , इस हेतु कुछ अग्रिम राशि जमा करनी थी इन्होंने मुझे आदेश दिया ,

“तुमने कुछ नगद रूपये रखे थे सफर के लिए ... वो काउन्टर पर जमा कर दो।” दो दिन के बाद बालक को होश आया तब तक ये उसकी सेवा में तन-मन -धन से जुटे रहे। पिछले जन्म का कोई रिश्ता था शायद। जयेश नाम था उसका। बिहार के एक छोटे से गाँव से भविष्य की तलाश में निकला जयेश बेहद गरीब परिवार से है। भोपाल में पढ़ाई के साथ बच्चों को ट्यूशन कर अपना खर्च चलाता है उस दिन भी ट्यूशन से लौट रहा था कि किसी अंजान वाहन ने टक्कर मार दी।

“ घर से इतनी दूर हो ,कम से कम मोबाईल तो रखा करो।”

“आंटी जी! मैं मोबाईल का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं , घर बात करनी होती है पी सी ओ से कर लेता हूँ।” खबर पाकर जयेश के पिता आ गये थे , कृतज्ञता जाहिर कर रो पड़े ,

“इसमें एहसान कैसा मैं न होता कोई और होता, ईश्वर को काम करना था सो मैं निमित्त बना।”

“मगर अंकल , आंटी आपकी तीर्थयात्रा मेरी वजह से अधूरी रह गई।”

“तुम इसकी चिंता मत करो जयेश! अब तुम पिता के संग जाओ पूरी तरह से स्वस्थ होकर लौटना।”

जयेश चला गया। चार दिन बीत गये थे , यात्रा पर जाने का मूड टल गया था। दिसम्बर की गुलाबी ठण्ड में शाम का सिंदूरी सूरज थके कदमों से अपना साम्राज्य समेट रहा था। टेलीविजन के आगे बैठी अपने दिन की यात्रा को अंजाम दे रही थी सच कहूँ तो खुद को बहला रही थी। पीछे से दबे पांव आकर इन्होंने मेरे कंधों पर हाथ रखा ,

“क्या सोच रही हो वसु , अपनी यात्रा के बारे में ...?”

“ उ... नहीं तो।”

“सॉरी वसु! मेरी वजह से तुम्हारी यात्रा अधूरी रह गई।”

“ऐसा क्यों कहते हैं आप ,मैं खुश हूँ ईश्वर ने हमें एक नेकी का हक़दार बनाया।” मेरे इतना कहते ही इन्होंने मेरा हाथ अपने हाथ में थाम लिया ,

“ सच कहूँ वसु तो ईश्वर ने उस बालक के निमित्त हमें यहीं तीर्थ का पुण्य दे दिया। अच्छा बताओ हम तीर्थ क्यों करते हैं ...?”

“अपने परिवार की मंगलकामना के साथ –साथ ईश्वर के निकट हो सकें।” अचानक  जयेश के पिता के वे शब्द मेरे हृदय को तृप्त कर रहे थे ,

“मुझ गरीब के बुझते चिराग को रौशनी दी है आपने , ईश्वर आपके बच्चों का जीवन खुशियों से भर दे। कुल को बरक्कत दे ....”

“आपने तीर्थ नहीं जी महातीर्थ कराया है मुझे।” अब मेरे मन से धुंध छट चुकी थी।

डॉ. लता अग्रवाल

७३ यश विला

भवानी धाम फेस -१

नरेला शंकरी

भोपाल – ४६२०४१

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लेखिका परिचय

नाम- डॉ लता अग्रवाल

शिक्षा - एम ए अर्थशास्त्र. एम ए हिन्दी, एम एड. पी एच डी हिन्दी.

प्रकाशन - शिक्षा. एवं साहित्य की विभिन्न विधाओं में 53  पुस्तकों का प्रकाशन. जिनमें 2कविता 2कहानी 2समीक्षा संग्रह , ५ बाल संग्रह, २० रोल प्ले , 79 कहानियों का अब तक लेखन, लगभग 400 पेपर्स. कहानी . कविता. लेख प्रकाशित आकाशवाणी में पिछले 9 वर्षों से सतत कविता, कहानियॉं का प्रसारण . दूरदर्शन पर संचालन. पिछले 22 वर्षों से निजी महाविद्यालय में प्राध्यापक एवं प्राचार्य ।

सम्मान -

1. पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी शिलांग (मेघालय) द्वारा साहित्यक अवदान पर “महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान “

2. उद्गार मंच द्वारा लघु कथा “साँझ बेला” को सर्वश्रेष्ठ कथा पुरस्कार।

3. वनिका पब्लिकेशन (गागर में सागर) मंच द्वारा लघुकथा “अधूरा सच” को सर्वश्रेष्ठ कथा का पुरस्कार

4. उद्गार मंच द्वारा कविता “एक पाति प्रधानमंत्री के नाम ” को उत्कृष्ट कविता पुरस्कार।

5. प्रतिलिपि द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में कहानी “ हादसा” को द्वितीय पुरस्कार।

6. लघुकथा “मैं ही कृष्ण हूँ” को वनिका पब्लिकेशन एवं नव लेखन मंच द्वारा श्रेष्ठ लघुकथा

7. मध्यप्रदेश लेखिका संघ भोपाल द्वारा कृति ‘पयोधि होजाने का अर्थ’ को श्रीमती सुषमा तिवारी सम्मान।

8. विश्व मैत्री मंच द्वारा गुजरात यूनिवर्सिटी अहमदाबाद में , कृति तू पार्थ बन’ को ‘राधा अवधेश स्मृति सम्मान।

9. छत्तीसगढ़ साहित्य मंडल रायपुर द्वारा साहित्यिक अवदान हेतु ‘ प्रेमचंद साहित्य सम्मान

10. " साहित्य रत्न" मॉरीशस हिंदी साहित्य अकादमी ।

11. "श्रीमती सुशीला देवी भार्गव सम्मान " हरप्रसाद शोध संस्थान आगरा।

12. " कमलेश्वर स्मृति सम्मान" कथा बिंब मुम्बई।

13. "श्रीमती सुमन चतुर्वेदी श्रेष्ठ साधना पुरस्कार  " अखिल भारतीय भाषा परिषद भोपाल।

14. "श्रीमती मथुरा देवी सम्मान " सन्त बलि शोध संस्थान उज्जैन।

15. "तुलसी सम्मान " तुलसी मांस संस्थान भोपाल।

16. "डा उमा गौतम सम्मान" बालकल्याण शोध संस्थान भोपाल।

17. "कौशल्या गांधी पुरस्कार  " समीर पत्रिका भोपाल।

18. "विवेकानंद सम्मान" विपिन जोशी मंच इटारसी।

19. " शिक्षा रश्मि सम्मान" ग्रोवर मंच होशंगाबाद ।

20. "प्रतिभा सम्मान " अग्रवाल महा सभा भोपाल।

21. "माहेश्वरी सम्मान " कला मंदिर परिषद भोपाल।

22. "सारस्वत सम्मान " समानांतर साहित्य संस्थान आगरा।

23. "स्वर्ण पदक " राष्ट्रिय समता मंच दिल्ली।

24. " मनस्वी सम्मान" हिंदी साहित्य सभा आगरा।

25. अन्य की सम्मान एवं प्रशस्ति पत्र।

निवास - 73 यश बिला भवानी धाम फेस  - 1 , नरेला शन्करी . भोपाल - 462041

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