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बालेन्दु शेखर तिवारी को याद करते हुए // यशवंत कोठारी

कल चंद्रा का फोन आया बालेंदुजी पर एक पुस्तक तय्यार कर रहा हूँ, कुछ भेजें. मैं आग्रह नहीं टाल सका.

मैं तिवारीजी से कभी नहीं मिला ,केवल लेखन के शुरुआती दिनों में पत्र व्यवहार हुआ था. वे रांची में रहते थे. उन्होंने एक व्यंग्य पत्रिका निकाली-अभीक उस के माध्यम से परिचय हुआ. फिर उन्होंने व्यंग्य ही व्यंग्य पुस्तक व क्रिकेट कीर्तन पुस्तकों का संपादन किया. इन पुस्तकों व् अभीक में मेरी रचनाएँ छपी, पारिश्रमिक भी मिला. श्रीकांत चौधरी का एक व्यंग्य उपन्यास भी उन्होंने छापा. नाम था- सब कुछ गलत हाथों में. इस का श्रीकांत चौधरी को उन्होंने पांच सौ रुपया पारिश्रमिक भेजा जो बहुत बड़ी बात थी. आज भी अख़बार या तो कुछ नहीं भेजते या ऊंट के मुंह में जीरा भेजते हैं.

तिवारी जी की पुस्तक रिसर्च गाथा भी पढ़ी. काफी व्यंग्य प्रभावित करते हैं.

उनकी पी. एचडी. थीसिस हिंदी का स्वातान्त्योत्तर हास्य व्यंग्य भी मेरे पास है. इसके बाद उन्होंने हिंदी व्यंग्य में डी. लिट् . किया जो शायद पहला डी . लिट् . था. इन सभी में मेरी रचनाओं पर टीप है. बाद के वर्षों में वे कभी कदा व्यंग्य लिखने व समीक्षा में व्यस्त हो गये. हिंदी में जो सबके साथ होता है , उनके साथ भी हुआ , वे उपेक्षित हो गए. साधन सम्पन्न लोग दूध मलाई खाने लग गए.

तिवारीजी ने हिंदी व्यंग्य के लिए बहुत काम किया. उनको मेरे प्रणाम...........


यशवंत कोठारी

,८६,लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी

३०२०००२,जयपुर

संस्मरण 3195660399776637161

एक टिप्पणी भेजें

  1. अभीक में मेरी रचना की स्वीकृति मिली थी ।मैं आजतक प्रकाशित सामग्री देख नही स का
    । उपलब्ध हो तो बताएं ।

    उत्तर देंहटाएं

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