त्रेता : एक सम्यक मूल्यांकन - उद्भ्रांत के महाकाव्य त्रेता की पड़ताल - भाग 4 // दिनेश कुमार माली

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भाग 1  भाग 2  भाग 3 

उद्भ्रांत के महाकाव्य त्रेता की पड़ताल

भाग 4

दिनेश कुमार माली

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दसवाँ सर्ग

मंथरा की कुटिलता

दसवें सर्ग मंथरा में कवि उद्भ्रांत ने अपनी मौलिक कल्पना करते हुए, मंथरा को कैकेयी की दासी न बताकर बचपन की खास सहेली बताया है। उसके पिता कैकेय-नरेश के विश्वस्त भृत्य थे। बचपन से ही वह कूबड़ी थी। कवि के शब्दों में :-

कैकय प्रदेश की

सुंदर राजकुमारी कैकेयी की

मैं बालसखी।

बाल्यकाल से ही

उसके साथ उठी-बैठी

खेलकूद किया।

मेरे पिता कैकय नरेश के थे

भृत्य अतिविश्वस्त।

अपनी तार्किक बुद्धि से उद्भ्रांत कैकेयी के द्वारा यह कहलवाना चाहते हैं कि मंथरा के पेट में बहुत अधिक रहस्य छिपे होने के कारण जब वह उनका उदघाटन करना चाहती होगी, तो अधिक बल लगाने के कारण वह कुब्जा हो गयी होगी। मंथरा कैकेयी की सारी महत्वकांक्षाओ, गोपनीय बातें तथा उसके मनोविज्ञान को अच्छी तरह से जानती थी कि एक युवा राजकुमारी का वयोवृद्ध राजा दशरथ के साथ बेमेल विवाह होने पर उसका भावनात्मक संबल टूटता देख उसने मन ही मन यह निर्णय कर लिया था कि किसी भी तरह समय आने पर अपनी सर्वप्रिय बाल-सखी को उसका अधिकार दिलाकर रहेगी। उद्भ्रांत जी लिखते हैं:-

इसलिए अयोध्या के वयोवृद्ध

महाराजा दशरथ जब

उसका पाणिग्रहण कर

ले चले अयोध्या में,

तभी मुझे लगा

उसका भीतर से

विदीर्ण हो चुका हृदय

मुझे साथ लिए बिना

शांत न हो सकेगा।

इस वजह से अयोध्या के राजमहल के रनिवास में चलने वाले सूक्ष्म घात-प्रतिघातों के चक्रों को समझने का प्रयास करती थी और समर प्रांगण में महाराज दशरथ से मिले दो वचन को क्रियान्वित करने की मंत्रणा हेतु संकल्पबद्ध थी। पहला–शासन की डोर भरत के हाथ में हो, दूसरा-राम को चौदह वर्ष का वनवास मिले। समय आने पर उसने अपने षड्यंत्र को सफल अंजाम दिया। भले ही,उसकी इस कुमंत्रणा ने जहाँ महाराज दशरथ के चमचमाते सूर्यवंशी मुकुट को चकनाचूर कर दिया,वहीं केकैयी को विधवा बना दिया। इस सर्ग में कवि कहते हैं:-

अलग बात है कि

इस इस भयंकर षड्यंत्र ने

महाराज दशरथ के

सपनों को ही नहीं

उनके दिव्य, चमचमाते

सूर्यवंशी मुकुट धारण किए

मस्तिष्क को भी

चकनाचूर किया!

कवि उद्भ्रांत ने मंथरा शब्द की उत्पति के पीछे मंत्रणा, मंथर गति तथा जैसे शब्दों से जोड़ने का प्रयास किया है और कूबड़ को व्यंग्य रूप में अधोगामी विचारों का प्रतीक बताया है।

मंथरा नहीं

मंत्रणा था नाम मेरा, क्योंकि-

मेरी बुद्धि तीक्ष्ण

कठिन अवसरों पर

ढूंढ लेती थी समाधान युक्तिपूर्ण।

मेरी मंत्रणा के बिना

कोई कार्य कैकयी

न करती कभी।

भदंत आनन्द कौसल्यायन ने अपने आलेख “राम चरित मानस में नारी” में मंथरा को कैकेयी के अपयश को बाँटने के लिए तुलसीदास द्वारा उसका चरित्र खड़ा किया हैं। जिसके अनुसार कैकेयी के अपयश का कुछ हिस्सा सरस्वती ले लेती है, तो कुछ हिस्सा मंथरा ले लेता है। लिखा है :-

नाम मंथरा मदमति चेरी कैकइ केरि।
अजस पिटारी ताहि करी गई गिरा मति फेरि॥12॥
--अयोध्या कांड
, राम चरित मानस
कैकेयी की एक मंद बुद्धि वाली दासी थी, जिसका नाम मंथरा था। उसे अपयश की पिटारी बना कर सरस्वती उसकी बुद्धि फेर गई।

देवताओं में ब्रह्मा शुक्ल पक्ष का प्रतीक है और कामदेव कृष्ण पक्ष का। पता नहीं देवियों में सरस्वती के मुक़ाबले किसी कृष्णपक्षी देवी की कल्पना क्यों नहीं की गई? यह काम सरस्वती से न लिया जाता तो अच्छा था। अब मंथरा की करतूत देखिये :-

“करइ विचार कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजू कवनि बिधि राति॥
देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमी गवँ तकई लेउँ कोहि भाँति॥
भरत मातु पहि गई बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी॥
उतरु देइ न लेइ उसांसू। नारि चरित करि ढारइ आँसू॥

(- अयोध्या कांड
, राम चरित मानस)

खोटी बुद्धि वाली और नीच जाति वाली मंथरा विचार करने लगी कि रात ही रात में यह काम कैसे बिगाड़ा जाए? जिस तरह कुटिल भीलनी शहद के छत्ते को लगा देख कर अपना मौका ताकती है कि इस को किस तरह ले लूँ। वह बिलखती हुई भरत की माता कैकेयी के पास गई। उसको देखकर कैकेयी ने कहा कि आज तू उदास क्यों है? मंथरा कुछ जवाब नहीं देती और लंबी साँस खींचती है और स्त्री चरित्र करके आँखों से आँसू टपकाती है।

इन चौपाइयों में खोटी जाति वाली मंथरा की उपमा देते समय तुलसी दास ने इस बात का विचार नहीं किया है कि सारी की सारी किरात जाति की स्त्रियों को कुटिल कह देना कहाँ तक ठीक है? इसका मात्र समाधान यही हो सकता है कि उन्होंने तो मात्र मधुलोलुप किराती को ही कुटिल कहा है। तब इसी प्रकार मंथरा के आँसू टपकाने को भी तो सर्वसाधारण नारियों का चरित्र कह कर कुछ कम आपत्तिजनक स्थिति नहीं रहने दी है। स्वयं कैकेयी भी, जिस की बुद्धि अभी स्थिर है, कह रही है :-

काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।
तिय विसेषि पुनि चेरी कहि भरतमातु मुसुकानि॥ - मानस
, अयोध्या कांड (१४)

काने, लंगड़े, कुबड़े-ये बड़े कुटिल और कुचाली होते हैं और उनमें भी स्त्री और विशेष रूप से दासी–ऐसे कहकर भरत की माता मुसकाई।

विनोद में कही हुई बात में भी प्रायः सर्वथा स्वार्थ नहीं होता। यहाँ कैकेयी के मुख से भी प्रकृत स्त्रियों के संबंध में तुलसी दास की जो प्रतिक्रियावादी मान्यताएँ हैं, उन्होंने ही अभिव्यक्ति पाई प्रतीत होती है।

किन्तु कुछ ही देर में कैकेयी मंथरा के वशीभूत हो जाती है। तुलसी दास कहते है :-

गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।
सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि ॥१६॥
स्त्रियों की बुद्धि होठों में होती है अर्थात वह बातों में आकर चल-विचल हो जाया करती है। तदनुसार रानी कैकेयी ने गुप्त कपट भरे, प्यारे वचनों को सुनकर, देवताओं की माया के वश में हो कर भी मंथरा को अपना हितैषी जानकर उसका विश्वास नहीं किया।

यहाँ मंथरा भी दोषी है, देवताओं की माया भी दोषी है। किन्तु इस सबको दोष की क्या आवश्यकता? जब तुलसीदास के अनुसार स्त्रियों की बुद्धि होठों में ही होती है अर्थात वे बातों में आकर चल-विचल हो जाया करती हैं। स्त्रियों के बारे में कितनी दरिद्र सम्मति है? बातों में आकर तो समय-समय पर सभी चल-विचल हो जाया करते हैं -

जद्यपि नीति निपुण नर नाहू, नारी चरित जलनिधि अवगाहु। - मानस, अयोध्याकांड (२७)

यद्यपि नरनाथ दशरथ राजनीति में दक्ष थे, परंतु स्त्री चरित्र रूपी समुद्र अथाह है।

उस युग में जब राज्य किसी भी राजा की व्यक्तिगत संपत्ति समझा जाता था और उसे राजा जिसे चाहे दे सकता था। पत्नी आसक्त वृद्ध दशरथ से कोई भी विवेकपूर्ण निर्णय करने के लिए किसी अथाह समुद्र की आवश्यकता नहीं थी।

रामचरित मानस (२/१४) में तुलसी दास जी ने लिखा कि विकृत शरीर में विकृत मन का निवास होता है अर्थात :-

“काने, खोरे, कूबरे, कुटिल कुचली जानी।
तिय विसेषि पुनि चेरी कहि
, भरतमातु मुसुकनी”॥- मानस, अयोध्याकांड (१४)

स्वस्थ शरीर का मन भी स्वस्थ होता है। स्वस्थ मन से अभिप्राय विकार रहित मन से होता है। शारीरिक स्वस्थता के लिए उसकी स्वच्छता अनिवार्य है। शरीरस्थ मल निवारण से शरीर स्वच्छ एंव स्वस्थ रहता है। शास्त्रों में द्वादश मलों का वर्णन मिलता है।

मगर वाल्मीकीय रामायण (अयोध्या काण्ड) के अनुसार मंथरा एक श्रेष्ठ सुंदर और आकर्षक स्त्री थी। उसकी जांघें विस्तृत, दोनों स्तन सुंदर और स्थल उसका मुख निर्मल चंद्रमा के समान अदभुत शोभायमान और करधनी की लड़ियों से विभूषित उसकी कटि का अग्रभाग बहुत ही स्वच्छ था। उसकी पिंडलियाँ परस्पर सटी हुई थी और दोनों पैर बड़े-बड़े थे। वह जब रेशमी साड़ी पहनकर चलती थी, तो उसकी बड़ी शोभा होती थी। इस शारीरिक सुंदरता के साथ – साथ वह बुद्धि में भी श्रेष्ठ थी। बुद्धि के द्वारा किसी कार्य का निश्चय करने में उसका कोई सानी नहीं था। मति, स्मृति, बुद्धि,क्षत्रविद्या,राजनीति और नाना प्रकार की मायाएँ (विद्याएँ) उसमें निवास करती थी।

मंथरा द्वारा कैकेयी के भड़काये जाने का वाल्मीकि रामायण के दाक्षिणात्य पाठ में कोई विशेष कारण नहीं दिया गया है। अन्य वृत्तान्तों में इसके लिए भिन्न-भिन्न कारणों की कल्पना की गई है।

1. महाभारत के रामोपाख्यान में जब राम की सहायता करने के लिए देवताओं द्वारा रीछों तथा वानरों की स्त्रियों से पुत्र उत्पन्न करने का उल्लेख किया गया है, गंधर्व दुंदुभि के मंथरा के रूप में प्रकट होने की चर्चा मिलती है। पद्मपुराण के पाताल खण्ड के गौड़ीय पाठ, आनन्द रामायण, कृतिवास रामायण, वसुदेवकृत रामकथा आदि में भी इसका निर्देश किया गया है। तोरवे रामायण में मंथरा को विष्णुमाया का अवतार माना गाया है। बलराम दास के अनुसार मंथरा वास्तव में गोमाता सुरभि है जिसे देवताओं ने पृथ्वी पर भेजा था।

2. बाद के अनेक वृतन्तों में मंथरा को मोहित करने के लिए सरस्वती के भेजे जाने का वर्णन मिलता है। भावार्थ रामायण के अनुसार ब्रह्मा ने मंथरा के मन में ईर्ष्या उत्पन्न करने के उद्देश्य से विकल्प को भेजा था।

3. वाल्मीकि रामायण में शत्रुघ्न राम के निर्वासन के कारण मंथरा को पीटते हैं। बाद में राम द्वारा मंथरा का उत्पीड़न वनवास का कारण बताया गया है।

पादौ गृहित्वा रामेण कर्षिता ताड़पराधतः।
तेन वैरेन सा राम वनवास च काक्षति॥
(अग्निपुराण, अध्याय - 5)

4. वाल्मीकि रामायण के उदीच्य पाठ पूर्व की कुछ हस्तलिपियों में मंथरा के पूर्ववैर का उल्लेख इस प्रकार है :-

रामे सा निरिचता पापा पूर्व बैरमनुस्मरन।
कस्मिरिचदपराधे हि क्षिणता रामेण सा पूरा।

चरणेण क्षिति प्रणता तस्मादैरमनुत्तमम॥

(द॰ बड़ौदा संस्करण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग ७, ९)

“रामायणमंजरी” में भी राम के प्रति मंथरा के बैर का कारण उलेखित है :-

शैशवे किल रामने पूरा प्रणयकोपतः।
चरणोनाहता तत्र चिरकोप्भुवाह सा॥ (१.६६७)

बलराम दास के अनुसार मंथरा ने विवाह के अवसर पर राम का उपहास किया था और राम ने उसे पीटा था। कंबन रामायण में इसका उल्लेख मिलता है कि लड़कपन में राम ने मिट्टी के ढेलों को अपने धनुष पर चढ़ाकर मंथरा के कुबड़ पर मारा था।

तेलुगू र्ंगनाथ रामायण के अनुसार राम ने बचपन में मंथरा की एक टांग को तोड़ दिया था, सेरी राम और रामकियेन के अनुसार राम ने उसके कुब्ज में बाण चलाया था। तेलुगू भास्कर रामायण में माना गया है कि राम ने मंथरा को लात मारी थी।

5. रामप्योपाख्यान के अनुसार मंथरा ने पूर्व-जन्म के बैर के कारण राम को वनवास दिलाया था। वह दैत्य विरोचन की पुत्री थी और दैत्य-देवता युद्ध में उसने पाशों से देवताओं के विमान और वाहन बाँधे थे। इस पर विष्णु की आज्ञा से इन्द्र ने उसे वज्र द्वारा मारा था।

मंथरा के अगले जन्म का भी उल्लेख किया गया हैं। आनन्द रामायण के अनुसार वह कृष्णावतार के समय पूतना के रूप में प्रकट होगी और कृष्ण द्वारा मार डाली जायेगी, लेकिन इस रचना के अन्य स्थल पर कहा गया है कि वह कंस के यहाँ कुब्जा के रूप में अवतार लेगी।

श्री रंगनाथ रामायण के तेलुगू संस्करण में राम और मंथरा की कहानी का उल्लेख बालकाण्ड में मिलता हैं। राम जब गुल्ली-डंडा खेल रहे थे तो अचानक मंथरा ने उसकी गुल्ली को दूर फेंक दिया, तो राम ने गुस्से में आकर डंडा मंथरा की ओर फेंका जिससे उसका घुटना टूट गया। कैकेयी ने यह बात महाराज दशरथ को बतायी तो उन्होंने राम और अन्य पुत्रों को गुरुकुल में पढ़ने के लिए भेजने का निर्णय लिया। तभी से मंथरा के मन में राम के प्रति प्रतिशोध लेने की भावना पैदा हो गयी और वह हमेशा मौके की तलाश में रहती थी।

राम के वनवास के बाद रामायण में मंथरा केवल एक बार दिखाई देती हैं। कैकेयी से महंगे-महंगे कपड़े और जवाहरात इनाम के रूप में प्राप्त कर महलों के बगीचे में घूमते हुये देखकर शत्रुघ्न क्रोधवश उसपर जानलेवा हमला कर देता हैं। उसको बचाने के लिए कैकेयी भरत से प्रार्थना करती है।

समस्याओं की जड़ इच्छाएँ होती हैं और इच्छाएँ डर से पैदा होती हैं। मंथरा को अपना डर है और कैकेयी को अपना डर, दोनों राम के राज्य अभिषेक के परिणामों से भयभीत है और असन्तुष्ट भी।

साहित्यकारों के अनुसार, रामकथा में चरित्र विधान के तहत मुख्यपात्र के व्यक्तित्व को उभरने के लिए मंथरा का गठन किया गया। वास्तव में मंथरा में कैकेयी के अन्तस के भय को प्रकट किया हैं। कई श्रुतियों के अनुसार मंथरा और कैकेयी द्वारा राम को जंगल में भेजकर राक्षसों का अंत करना ही उद्देश्य था। आधुनिक प्रबंधन गुरुओं के अनुसार किसी भी संस्था में शक्ति के अलग-अलग स्तर होते हैं। उन स्तरों को पाने के लिए कुछ लोग अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं, तो कुछ लोग अपने संबंधों का प्रयोग करते हैं। प्रकृति में शक्तिशाली व्यक्ति ही नेतृत्व के योग्य होता हैं। रामकथा के अनुसार न केवल राम वरिष्ठ थे वरन बुद्धिमान और ताकतवर भी थे। अतः राज सिहांसान के सही हकदार थे। हिन्दू दर्शन के अनुसार प्रत्येक घटनाएँ प्रारब्ध का फल होती हैं। राम का वनवास जाना भी उनके भाग्य का विधान है। मंथरा और कैकेयी को दोष देना अनुचित है, क्योंकि वे तो कर्मसाधक मात्र हैं।

ग्यारहवाँ सर्ग

श्रुतिकीर्ति को नहीं मिली कीर्ति

श्रुतिकीर्ति को ग्याहरवें सर्ग में महाराज कुशीध्वज की सबसे छोटी पुत्री बताया है। कुशीध्वज के अग्रज महाराज जनक ने उसके विलक्षण गुणों को देखते हूए दूर-दूर तक उसकी कीर्ति व्याप्त होगी, शायद यही सोचकर उसका नाम श्रुतिकीर्ति रखा। कवि की भाषा में:-

मैं श्रुतिकीर्ति

सबसे छोटी पुत्री

महाराज कुशीध्वज की

इसलिए लाडली भी सर्वाधिक।

महाराज पिता ने

अपने अग्रज

महाराज जनक की सलाह से

नामकरण मेरा किया।

उसे शास्त्र श्रुतियाँ जल्दी से कंठस्थ हो जाती थी,वेदाध्ययन में वह सबसे आगे रहती थी। माण्डवी और उर्मिला उसकी दो बहनें थी। वह चंचल, चपल और शरारती भी थी। बड़ी बहन सीता के स्वयंवर में अपने पिता के साथ जनकपुर में पहुँची थी और शिव धनुष भंजन न होता देख वह काफी दुखी हो रही थी। उद्भ्रांत जी इस संदर्भ में कहना चाहते हैं:-

ताऊजी ने रखी थी

जो शर्त सीता-स्वयंवर की

उसे सुन

हम तीनों बहने भी मायूस थीं।

और वह मायूसी बढ़ी

शिव-धनु के भंजन में

निष्फल देख-

बड़े बड़े योद्धा को

मगर जब रामचन्द्र जी ने उस धनुष को तोड़ दिया तो वे सभी आनंद अतिरेक से उमड़ पड़ी। इसी घटना के बाद उसी राज घराने में तीनों राजकुमारियों का विवाह हुआ। महाराज दशरथ की सबसे छोटी पुत्रवधू बनकर सूर्यवंशी राजघराने को सामाजिक दृष्टि से उन्नत किया। शत्रुघ्न की पत्नी होने के कारण सभी उन्हें खूब प्यार करते थे। कौशल्या और कैकेई भी। शत्रुघ्न की प्रकृति लक्ष्मण की तरह महाक्रोधी थी। वह कैकेयी को जीवनभर क्षमा नहीं कर सका, यहाँ तक कि उनका व्यवहार असहज हो गया,जो कि रघुवंशी स्त्रियों के भाग्य की बिडम्बना थी।

रघुवंशी स्त्रियों की नियति में

लिखी हुई थी विडंबना बड़ी,

रानी, महारानी हों

या हों पुत्रवधुएं वे।

मैं उससे

वंचित कैसे होती।

कल्याण के नारी अंक के अनुसार मांडवी और श्रुति कीर्ति, राजा जनक के भाई कुशीध्वज की कन्याएँ थी और उर्मिला साक्षात राजा जनक की पुत्री थी। जनक के साले का नाम क्षीरध्वज था। श्रुति कीर्ति को राम के वनवास जाने की अप्रत्याशित घटना से बहुत पीड़ा हुई थी। मगर उसमें इतनी शालीनता थी, कि वह उस बात का विरोध न कर सकी। वे देवतुल्य जेठ का वनवास, अपनी लक्ष्मी-सी बहन का तपस्विनी बनकर वन में जाना आदि ऐसी बातें थीं जिनको याद करके उनका कोमल हृदय क्षणभर के लिए भी चैन नहीं पाता था। मगर उस आंतरिक वेदना को अंतर्यामी के सिवाय और कोई देख न सके। सीता वन में रहकर पति के समीप थी मगर मांडवी, उर्मिला और श्रुति कीर्ति महल के भीतर रहकर भी पति से दूर, अत्यन्त दूर थी। इनमें भी अंतर इतना ही था कि मांडवी और श्रुति कीर्ति को नन्दी ग्राम से पति के समाचार मिलते रहते थे, मगर उर्मिला के भाग्य में यह भी नहीं था। श्रुति कीर्ति के दो पुत्र थे एक का नाम सुबाहू था और दूसरे का नाम शत्रुघाती। सुबाहू मथुरा के राजा हुए और शत्रुघाती वैदिशा नगर के। जिस तरह भरत तीनों भाई श्री रामचन्द्र जी के साथ सरयू के गो प्रतार घाट में डुबकी लगाकर परम धाम को पधार गए, उसी तरह मांडवी, उर्मिला, श्रुति कीर्ति भी पतियों के साथ सरयू में गोता लगाकर उन्हीं लोगों को प्राप्त हुई।

कँवल भारती के अनुसार एक साधारण स्त्री भी अपने अपमान के खिलाफ विद्रोह की किसी भी सीमा तक जा सकती है, बशर्त उसमें अपने अपमान का बोध हो। मंथरा को अपने अपमान का बोध था, परंतु यह बोध श्रुति कीर्ति में देखने को नहीं मिला। शायद यही वजह है श्रुति कीर्ति को गुमनामी का जीवन जीना पड़ा। उनके अनुसार ‘त्रेता’ में स्त्री विमर्श के नाम पर उद्भ्रांत को कुछ भी नहीं मिला। केवल विरह वेदना को उभारने के सिवाय, मगर यह बात सही नहीं है।

शत्रुघ्न की उपेक्षा के कारण बिचारी निर्दोष निरीह श्रुति कीर्ति रामकथा में युगों तक अश्रुतकीर्ति बनकर रह गई। लेकिन ध्यान रखने योग्य बात यह है कि वह उपेक्षित होकर भी मध्यकालीन नायिकाओं के समान विरह में या अपने दुर्भाग्य पर आठ–आठ आँसू बहाना तो दूर एक आँसू भी नहीं टपकाती है। डॉ. आनन्द प्रकाश दीक्षित के अनुसार उद्भ्रांत नए जमाने के कवि है। उनके समय का स्त्री-विमर्श नारी को अबला नही मानता। वह सबला है, आत्मनिर्भर है तो रोना और दीन होना कैसा? उद्भ्रांत रामकथा और त्रेता युग को नए जमाने के प्रकाश में देख रहे हैं। स्वाभाविक है कि उनकी नारियाँ सब सहन करेगी या विद्रोहिनी होगी, खुलकर रोएगी नहीं, प्रिय की मृत्यु पर रोना बिलकुल अलग बात है।

देवदत्त पटनायक की पुस्तक ‘सीता रामायण’ के अनुसार वैदिक जमाने में शादी का अर्थ केवल आदमी और औरत का मिलन नहीं होता था। बल्कि दो नई संस्कृतियों को जोड़ने का अवसर प्रदान करना था, जिस कारण नए-नए रीति-रिवाज, आस्था, विश्वास जन्म ले सके। भारत में शादी के रीति-रिवाज कृषि-कर्म के प्रतीक थे जो आधुनिक मनुष्य को असंगत लग सकते हैं कि पुरुष किसान की तरह बीज बोता है और स्त्री उस बीज को पोषण करती है। तमिलनाडू, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक में लाल चन्दन की लकड़ी के आदमी पुरुषों के खिलौने लड़कियों को उनके प्रथम रजोधर्म अथवा उनके शादी के समय दिये जाते हैं। राजा-रानी के यह खिलौने नवरात्रि के त्योहारों में शुभ-लाभ के प्रतीक हैं।

जनक के चरित्र का निर्माण करने में वाल्मीकि का सीधा-सादा सवाल तत्कालीन राजाओं, किसानों और ग्वालों की बुद्धिहीन भौतिकवादिता पर उठाना है। जनक की पुत्रियों की खुशियाँ, वस्तुओं से नहीं विचारों से प्रदान करने की आशा की जाती है।

सीता का घर (मिथला), राम का घर (अयोध्या) के दक्षिण में है, और अयोध्या कृष्ण की मथुरा के दक्षिण में है। ये तीनों चित्र गंगा के मैदानों के हैं, सांस्कृतिक तौर पर अलग-अलग। जहाँ मिथला ग्रामीण कलाशिल्प से संबंधित है, वहीं अवध या अयोध्या शहरीकरण का केन्द्रबिन्दु है। जबकि ब्रज या बृज पार्थिव भक्ति का केन्द्र है। तीनों क्षेत्रों की अलग-अलग बोलियाँ है। जैसे मैथिली, अवधी और बृजभाषा। अनेक स्कॉलर राम को अवतारी राम से अलग समझते हैं। बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड को बाद में लिखा हुआ मानते हैं। यदपि रामायण का जादू आदमी को अपनी दिव्यता की पहचान करने का संघर्ष है। क्या हम अपने अहम से ऊपर उठकर आत्मा को जान सकते है? क्या अहम स्वार्थ है या आत्मा सत्य है? लेकिन राम या दिव्य राम में कौन ज्यादा प्रिय है? इस तरह हर किसी के जीवन में इस अनिश्चित जगत में निश्चित जीवन जीने का एक प्रश्न उठता है।

बारहवाँ सर्ग

उर्मिला का तप

तेलुगू महिलाएँ अपने गीतों में रामायण की वीर-गाथाओं पर कम बोलती हैं, बल्कि मानवीयों प्रगाढ़ संबंधों और भावनाओं को विशेष महत्व देती हैं। उनके गानों में उर्मिला के भय का वर्णन है, जब कोई आदमी उसे उठाता है, तो वह उसे पहचान नहीं पाती है, वनवास से लौटने के बाद लक्ष्मण द्वारा उर्मिला के बालों में कंघी करने का भी वर्णन मिलता है।

त्रेता के बारहवें सर्ग ‘उर्मिला’ में कवि उद्भ्रांत ने उर्मिला की भावना, दर्द और पीड़ा को केन्द्रबिन्दु बनाकर स्त्री-विमर्श के आदर्श पहलू की ओर ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास किया है। उर्मिला लक्ष्मण की पत्नी बनकर कितनी खुश थी और अपने आप को सौभाग्यशाली मानती थी। जब राम को वनवास मिला तो उसकी बहन सीता ने उनके साथ जाने की जिद की और जेठ राम ने उन्हें स्वीकृति दे दी। लक्ष्मण जब वन में जाने के लिए उर्मिला के कक्ष में गए तो उर्मिला ने अपनी आँखों में निर्बल भाव नहीं आने दिया। कवि ने उर्मिला की भावना का जिक्र करते हुए कहा कि वह भी लक्ष्मण के साथ वनवास जाना चाहती थी। मगर लक्ष्मण ने यह कहते हुए उसके आग्रह को स्वीकार नहीं किया कि वह राम और सीता की अच्छी तरह से सेवा नहीं कर पाएगा, वनवास के दौरान। मगर इस बात का आश्वासन दिया कि चौदह वर्षों तक कोई भी नारी उसके सपनों में आने का साहस नहीं कर पाएगी, उसके सिवाय क्योंकि उसे सपने देखने का भी अवकाश नहीं मिलेगा। कवि उद्भ्रांत लिखते हैं:-

इन चौदह वर्षों में

तुम्हारे सिवा कोई अन्य नारी

नहीं कर सकेगी साहस

आने का मेरे सपनों तक में,

क्योंकि सपने देखने का

नहीं रहेगा मुझे

कभी भी अवकाश।

रात्रि का कज्जल आँज कर

अपनी कल्पना की आंखों में

तुम्हें देखता ही रहूंगा मैं सतत

उस नातिदीर्घ काल के, कठिन

चुनौती देते दर्पण में।

वह अपने भैया और भाभी के प्रति निष्ठापूर्वक कर्तव्य निभा पाएगा। इस तरह उर्मिला वागयुद्ध में लक्ष्मण से हार गई और उर्मिला को अयोध्या में छोड़कर लक्ष्मण राम के साथ वनवास में चले गए। उद्भ्रांत जी के अनुसार,

तुम तो चले गए

एक अनुज का आदर्श करने स्थापित

जगत में;

लेकिन इन चौदह वर्षों के लिए

अभिशापित कर गए

अपनी उर्मिला को।

इन चौदह सालों में एक-एक घड़ी किस तरह उर्मिला को अनन्त काल की तरह लगी होगी, उस अनिर्वचनीय व्यथा का अनुमान सीता ही कर सकती है, जब अपने अपहरण के बाद लंका में अशोक वाटिका के नीचे बैठकर अपने पति राम को स्मरण करने के बाद एक-एक पल बिताते समय उसकी मानसिक अवस्था उर्मिला की व्यथा को याद दिला सकती है। उर्मिला उस भयानक काली रात्रि को कभी नहीं भूल सकती है, जब जेठ भरत के अमोध बाण से पर्वत को ले जाते समय हनुमान मूर्च्छित हो कर जमीन पर गिर पड़े थे और उसे पता चला था कि रावण पुत्र मेघनाद द्वारा छोड़ी गई अमोघ शक्ति ने उसके पति लक्ष्मण को मूर्च्छित कर दिया था।

कालिदास, सच-सच बतलाना,
इन्दुमति के मृत्यु शोक में
अज रोए थे या तुम रोए थे
?
कालिदास सच-सच बतलाना।

नागार्जुन की उपरोक्त कविता ‘कालिदास’ के कालीदास की तरह उद्भ्रांत ने भी उर्मिला के दुःख को अपने भीतर आत्मसात किया अर्थात्

और मुझे लगा जैसे

बैठे हो तुम उसमें

धनुष पर चढ़ाए बाण

अंधेरे के राक्षस का नाश कर

विजयी मुद्रा लिए हुए:

कवि के अनुसार त्रेता के स्त्री पात्रों में सबसे अधिक शोक का सामना उर्मिला को करना पड़ा। उसके जीवन सर्वस्व उसके प्राणाधार पति लक्ष्मण वन में थे। वह उनके दर्शन से, उनके कुशल समाचार से भी वंचित हो गई थी। यदि सीता की भाँति वह भी वन में जाकर स्वामी की सेवा कर सकती तो उसे कुछ संतोष रहता, किन्तु वह ऐसा नहीं कर सकती थी। क्योंकि उसके स्वामी किसी के कहने से नहीं, वरन् स्वेच्छा से वन में गए थे, माता-पिता तुल्य भाई और भाभी की सेवा का शुभ उददेश्य लेकर। अगर वह साथ चली जाती तो स्वामी के कर्तव्य पालन में बाधा बनती। उसके कारण अगर उसके स्वामी के धर्म में कोई त्रुटि आ जाए तो वह कैसे बर्दाश्त कर सकती थी? इस वजह से उर्मिला ने चौदह वर्षो तक विरह की भयंकर आग में झुलसना स्वीकार किया, किन्तु पति के कर्तव्य पथ पर बाधा बनकर नहीं खड़ी हुई। कवि के शब्दों में,

क्या तुम यह करोगे विश्वास कि

इन चौदह वर्षों में

मैं भी कभी सोई नहीं!

दिन में, मैं_अपनी तीनों सासु-मांओं की

सेवा-सुश्रूषा मैं रहती,

भैया शत्रुघ्न,बहन श्रुतकीर्ति-

जो थी देवरानी-शत्रुघ्नप्रिया

जेठजी के साथ मांडवी बहन_जेठानी जी-

सभी का ध्यान रखना था मुझे।

उर्मिला के इस विषाद को मैथिलीशरण गुप्त ने अपने महाकाव्य ‘साकेत’ (साकेत अयोध्या का पुराना नाम था, मगर एक अलग शहर होने का भी पता चलता है) में प्रकट किया है, जो तुलसीदास के रामचरित मानस में नहीं दिखाया गया है। रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने एक स्थान पर लिखा है “रामायण में किसी देवता ने अपने को गर्व करके मनुष्य नहीं बनाया है, एक मनुष्य ही अपने गुणों के कारण बढ़कर देवता बन गया हैं। ’’ ‘साकेत’ में सीता ही उर्मिला को आत्मविश्वास की शिक्षा देती हैं।

धनुष के टूटने से पहले ही सीता ने राम को मन से वरण कर लिया है, इसी पर उर्मिला को जीवन में पहली चिंता हुई। वह घबराकर कहती है – प्रभु चाप जो न चढ़ा सकें – परन्तु सीता निश्चिन्त हैं। वे उससे कहती हैं –

चढ़ता उनसे न चाप जो,
वह होते न समर्थ आप जो
,
उठता यह मोह भी भला
,
उनके ऊपर तो अचंचला
?
दृढ़ प्रत्यय के बिना कहीं
,
यह आत्मार्पण दिखता नहीं।
’’

यही है आत्मविश्वास, जो भयानक कहा जा सकता है। परन्तु उर्मिला ने उसकी शिक्षा पाई है और वह भी यह कहने को समर्थ हुई है कि –

“यदि लोक धरे न मैं रही,
मुझको लोक धरे यही सही।
’’

इस दृढ़ प्रत्यय की समाप्ति यहीं नहीं हो जाती। अयोध्या में सुना जाता है कि लक्ष्मण को शक्ति लगी है और भरत की ओर से उर्मिला को शत्रुघ्न सांत्वना देते है -

“भाभी, भाभी, सुनो, चार दिन तुम सब सहना,
मैं लक्ष्मण-पथ-साथी आर्य का है यह कहना। ”

इस पर उर्मिला उत्तर देती है –

“देवर, तुम निश्चिन्त रहो, मै कब रोती हूँ,
किन्तु जानती नहीं
, जागती या सोती हूँ।
जो हो
, आँसू छोड़ आज प्रत्यय पीती हूँ;
जीते हैं वे वहाँ
, यहाँ जब मैं जाती हूँ। "

सीता के उस विश्वास के समान ही यह दृढ़ है, परंतु मेरा हृदय भीत न होकर स्फीत होता है। इसीलिए सीता राम के समीप मुझे जो भय लगता है, वह उर्मिला और लक्ष्मण के समीप नहीं।

उर्मिला के विषाद में उसका यह विश्वास डूब नहीं गया। यदि अनुकरण करने वालों से ही अनुकरणीय की सार्थकता होती है। तो इसी आत्मविश्वास के अनुकरण के लिये ‘साकेत’ में उर्मिला का एक विशेष स्थान होना चाहिए। परंतु यदि हम उसे लेंगे, तो हमे उसका विषाद भी लेना पड़ेगा।

डॉ॰ आनंदप्रकाश दीक्षित ने अपनी पुस्तक “त्रेता एक अन्तर्यात्रा” के अन्तर्गत इस सर्ग की कमी की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए लिखा है कि इस अंतिम बिन्दु की ओर आकर पतिप्राणा विरहिणी उर्मिला की कथा भी चूक गई। पुनर्मिलन की घड़ियों का वर्णन करने की सुधि ही कवि को नहीं रही। लंका से अयोध्या लौटने के अवसर की स्थितियों का वह वर्णन ही नहीं करता। शायद इसलिए कि उस अवसर का मुख्य संबंध भरत-मिलाप और प्रजा से है और प्रस्तुत काव्य में पुरुष स्वतन्त्र पात्र नहीं है।

बुद्धारेड्डी के ‘रंगनाथ रामायण’ के अनुसार उर्मिला चौदह साल तक लगातार सोती रही और लक्ष्मण चौदह साल तक जागते रहे। कहानी के अनुसार निद्रा देवी ने लक्ष्मण को सोने के लिए निवेदन किया तो उन्होंने कहा कि अगर मैं सोऊँगा तो भैया राम और भाभी सीता की रक्षा कौन करेगा? इसलिए उन्होंने निद्रा देवी से प्रार्थना की कि वह अयोध्या चली जाए और उसके हिस्से की नींद बनकर उर्मिला को आ जाए।

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने वाल्मीकि की उर्मिला के योगदान की उपेक्षा करने के लिए आलोचना की है और मैथिलीशरण गुप्त को अपनी रामायण ‘साकेत’ में उचित स्थान देने के लिए प्रेरित किया था। कई कवियों को अपने पति द्वारा बड़े भाई की सेवा के लिए अपनी पत्नी को त्याग देना आश्चर्य चकित कर देता है। उनके अनुसार भारतीय नारी की अवस्था अपने पति के परिवार की सेवा के सिवाय कुछ भी नहीं था। भारतीय सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप परिवार के समक्ष किसी व्यक्ति विशेष की अवस्था गौण है। वैयक्तिकता एक संन्यास है, भले ही गृहस्थ क्यों न हो, गृहस्थी एक बंधन है, उन लोगों के लिए जो मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं। रामायण में इस बन्धन को एक दूसरे की संवेदना के रूप में उभारकर प्रस्तुत किया है। दूसरे शब्दों में संन्यासी वह है जो दूसरे की भूख से अलग–अलग है। सही अर्थों में उर्मिला अपने त्याग से वंश की कालिमा को मिटा देती है। अपने अतुलित कुल में जो कलंक प्रकट हुआ था, उसे उस कुल बाला ने चक्षु-सलिल से धो डाला। राम वनगमन दशरथ के कुल में एक कलकिंत प्रसंग है। उर्मिला का पति लक्ष्मण, राम के साथ वन जाता है। यह एक उदात्त भाव है, परंतु इस उदात्त भाव के पीछे उर्मिला का त्याग है। उर्मिला को पति का वियोग सहना पड़ता है। वह अपने आत्म-ज्ञान को विस्तृत कर देती है। वह प्रिय के अनुराग को अपने जीवन को जीने का स्रोत समझती है। उसमें समर्पण और निष्ठा है। वह आरती की तरह जलकर भी सुगंध बिखेरती है। लक्ष्मण जब उर्मिला से मिलने उसकी कुटिया में प्रवेश करते है, तब उन्हें मात्र उर्मिला की छाया रेखा ही दिखाई पड़ती है। उर्मिला का मानना है कि नारी जीवन के लिए बन्धन नहीं है। उसमें परिवार और कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए आत्म-बलिदान करने की अपूर्व क्षमता होती है। उर्मिला और लक्ष्मण के आगे तो राम के माता-पिता की आज्ञा से राज्य छोड़कर वनवास स्वीकार करने का गौरव भी फीका है।

“लक्ष्मण, तुम हो तपस्पृही,
मैं वन में भी रही गृही।
वनवासी है निर्मोही
,
हुए वस्तुतः तुम दो ही। ”

उर्मिला के विरह ने उसमें करुणा का जो संचार किया वह मानव की अमूल्य निधि है। उसकी करुणा केवल मनुष्य के प्रति ही नहीं रहती वह समस्त जीवधारियों के प्रति करुणा है। मकड़ी जैसे तुच्छ जीव के प्रति भी उसकी कोमल भावना है।

“सखि, न हटा मकड़ी को, आई है वह सहानुभूतिवश।
जालगता में भी तो
, हम दोनों की यहीं समान दशा॥”

करुणा को प्रत्यक्षतः संबोधित करके गुप्तजी ने उसका महत्व और भी बढ़ा दिया है।

वाल्मीकि को राम से कहीं अधिक ‘साकेत’ की उर्मिला मुदित मना है। यद्यपि यह प्रिय–वियोग में विदग्ध है, तथापि वह समग्र सृष्टि की मंगल कामना के लिए चिंतित है। अपने दुःख में भी दूसरों के सुख की चिंता उसकी मुनि वृत्ति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। :-

“तरसूँ मुझ-सी मैं ही, सरसे-हरसे-हँसे प्रकृति प्यारी,
सबको सुख होगा
, तो मेरी भी आएगी बारी। ”

उर्मिला भीतर से कितनी विदग्ध क्यों न हो, पर बाहर से सामाजिक जीवन में वह हरी-हरी ही रहती है। मुदित ही रहती है।

लक्ष्मण द्वारा कैकेयी के साथ अशिष्टता का व्यवहार करने पर वह लक्ष्मण को नीति पथ पर ले आती है। यही कारण है कि वह वन में जरा भी अनैतिक नहीं होते। वहाँ वह आत्म-संयम, इंद्रिय-निग्रह, सेवा और त्याग की प्रतिमूर्ति बन जाते हैं। मेघनाद से युद्ध करते समय वह अपनी इसी नैतिकता की दुहाई देकर वार करते है :-

“यदि मैंने निज वधू उर्मिला को ही माना,
तो बस अब तू संभल बाण यह मेरा छूटा
,
रावण का यह पाप पूर्ण हाटक घट फूटा। ” (साकेत – द्वादश सर्ग)

उर्मिला के दो पुत्र हुए, अंगद और चन्द्रकेतु। उन दोनों को कारूपथ नामक देश का प्रभुत्व प्राप्त हुआ। अंगद ने अंगड़िया नमक राजधानी बनाई और चन्द्रकेतु ने चंद्रकांत नामक नगर बसाया।

यह भी कहा जाता है कि जब राम ने सीता को जंगल में छोड़ दिया था, तब उसका विरोध करने वाली उर्मिला ही थी। उसने अपने पति लक्ष्मण को राम की आज्ञा का अनुपालन कर सीता को जंगल में छोड़ने के लिए फटकार भी लगाई थी।

रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार भारतीय साहित्य की विस्मृत नायिकाओं में से उर्मिला को एक मानते हैं। तेलुगू साहित्य में उर्मिला की भूमिका सीता की तरह ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। यहाँ तक कि उन्हें आदर्श पत्नी का दर्जा दिया जाता है और तेलुगू भाषा के रामायण में उर्मिला देवी की निद्रा पर विशेष तौर पर गायन होता है। कवि– कने की पुस्तक “सीता’स सिस्टर (sita’s sister)” में लेजेंड्री (legendry) उर्मिला की मिथकीय कहानी की विस्तृत पुनरावृत्ति हुई है।

तेरहवा सर्ग

माण्डवी की वेदना

माण्डवी राजा जनक के भाई कुशध्वज की कन्या थी, जिनका विवाह भरत के साथ हुआ। वह श्रुति कीर्ति की बहन थी। माण्डवी के दो पुत्र हुए, तक्ष और पुश्कल, दोनों ही बड़े वीर थे। पुश्कल ने शत्रुघ्न के साथ सम्पूर्ण देशों में घूमकर रामचन्द्र के अश्वमेघ यज्ञ से संबंधित अश्व की रक्षा की थी। तक्ष और पुश्कल ने भरत के साथ कैकय देशों में जाकर वहाँ रहने वाले तीन करोड़ गंधर्वों को परास्त किया और सिन्धु नदी के दोनों तटों पर अपने विशाल साम्राज्य की स्थापना की। वहाँ भरत ने दो समृदधशाली नगर बसाए। गंधर्व देश (सिंध), सिंध में तक्ष के नामपर तक्षशिला नामक नगरी बसाई और गांधार देश (अफगानिस्तान) में पुश्कल के नाम से पुष्कलवती नाम की नगरी बसाई गई।

कवि उद्भ्रांत ने तेरहवें सर्ग ‘माण्डवी’ में उसकी मनोस्थिति का वर्णन किया है कि जब भरत, शत्रुघ्न के साथ ननिहाल से अयोध्या लौटे तो वहाँ हलचल मच गई थी। राम के वनवास के बारे में सुनकर वह भयभीत हो गई। जब भरत का निस्तेज विवर्ण मुख मण्डल देखा तो न केवल माण्डवी भयभीत हुई, वरन् कैकेयी भी भयाक्रांत हो गई थी, क्योंकि उसने जो भी किया वह उसके पुत्र की प्रकृति के विपरीत था। शादी के बाद की बातों को याद करते हुए वह कहती है कि भरत का राजमहल में कभी मन नहीं लगता था। राम के वन-गमन करते समय उन्हें अवश्य यह लगा होगा कि अगर उन्हें खुद को वन जाने का अवसर मिला होता, तो भगवत भक्ति की साधना के मार्ग में उनका एक पग और बढ़ा होता। कवि उद्भ्रांत जी यहाँ कहना चाहते हैं:-

“ प्रिया मांडवी!

अयोध्या के इस राजमहल में

रमता नहीं मन मेरा। ”

मुझे यह प्रतीत हुआ

भैया राम के

वन-गमन के बाद-

उन्हें लगा होगा यह_

वन में एकांत चिंतन करने का

यह अवसर

उन्हें मिला होता तो

भगवद्भक्ति की साधना के मार्ग में

उनका एक पग बढ़ा होता।

मगर माँ की राजलिप्सा के कारण भैया राम को व्यर्थ में चौदह वर्ष सपत्निक घूमना पड़ेगा, वह भी लक्ष्मण के साथ। महाराज दशरथ की खराब अवस्था को देखकर उन्होंने राम को वापस बुलाने का प्रयास किया। मगर वह प्रयास निष्फल हुआ, तो उनकी चरण पादुकाओं को प्रतीक का चिहन मानकर सिंहासन पर अवस्थापित कर राजकाज का प्रबंध देखते और सुबह-शाम राजमहल के बाहर निर्मित कुटिया में भगवत चिन्तन में लीन रहते हुए अपने आपको आदर्श पुरुष बना लिया था। कवि उद्भ्रांत ने भरत की व्यथा अपने शब्दों में अंकित की हैं :-

भैया राम को

वापस लौटाने का

उपक्रम जब उनका हुआ निष्फल तो

उनकी चरण-पादुकाओं को ही

मानकर प्रतीक-चिन्ह

आदर-सम्मान से

राजसिंहासन पर उन्हें

अवस्थित किया उन्होंने;

मानो स्वयं राम ही-

बैठे हो सिंहासन पर।

कभी भी उन्होंने यह नहीं सोचा कि वे विवाहित हैं, उनकी एक पत्नी है, जो अयोध्या वासियों की दृष्टि में महारानी है। वे खुद तो भूमि पर शयन करते थे, तो मैं किस तरह राजसी शैय्या पर सोने का सपना देख पाती। मैं भी भिक्षुणी की तरह जीवन बिताते हुए भूमि पर सोती थी, राजमहल के भव्य दिव्य रनिवास में। सादा,स्वाद रहित भोजन करते वे जीवन गुजार रही थी। सास कैकेई के इस कृत्य ने न केवल उसे विधवा बना दिया, वरनं लोक निंदा के परम दुःख ने उसके जीवन को दारुण बना दिया था। कवि कहना चाहता है :-

ऐसा कृत्य

जिसने उन्हें विधवा बनाते हुए

छीन लिया

स्त्री का स्वाभाविक तेज।

लोक कर उठा

निंदा प्रारंभ;

न तो राज सिंहासन मिला और न ही राम अयोध्या लौटे। दुःख का अवसाद उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई देता था। राजमहल में राजकीय प्रथा के अनुसार नियमों का आचरण होता था। सभी के लिए आत्मानुशासन और आचार सहिंता का पूरी तरह पालन होता था। वस्त्र पहनने ओढ़ने अथवा बिछाने में मुझ पर कोई प्रतिबंध न था। मगर मैंने अपने आप पर प्रतिबंध लगा दिया था। उत्तर दायित्व की भावना का निर्वहन करते हुए मेरे भीतर कभी भी राजा की बेटी होने का भाव पैदा नहीं हुआ था। मांडवी की भावना को कवि उद्भ्रांत अपने शब्दों में इस प्रकार अभिव्यक्त करते हैं:-

पर,मुझ पर तो न था

कोई बंधन,

मैं थी अयोध्या की महारानी,

और थी स्वतंत्र_

राजकीय गरिमा के अनुसार

आचरण करने_

वस्त्र पहनने,

ओढ़ने अथवा बिछाने।

महाराज ने लगाया नहीं था

कोई प्रतिबंध मुझ पर।

प्रतिबंध किंतु मैंने

लगाया था स्वयं पर था!

आत्मा को अनुशासन में रखने का

था मुझको बचपन से अभ्यास1

कवि उद्भ्रांत ने माण्डवी नाम के रहस्य उदघाटन करते हुए लिखा है कि – माँ ने उसकी रगरग में स्त्री धर्म को जल में गूँथे आटे की तरह माण्ड दिया था, इसलिए मेरा नाम माण्डवी हुआ। इस तरह मैंने सूर्यवंश की उजली छवि पर अपना आत्म संयम न खोकर सारा कलंक लगने से बचा दिया, अन्यथा भरत भी बड़े अपयश के भागी होते। मैंने अपना सारा जीवन जल में रहती मछली की तरह बिताया,वह भी थोड़े समय के लिए नहीं वरन् चौदह साल। कवि की मौलिकता निम्न हैं:-

जल में गूँथे आटे की तरह

मां ने मांड दिया था मुझको

पोर-पोर में

स्त्री-धर्म से।

स्त्री-धर्म में दीक्षित मांडवी से

हो सकता था_

अधर्म-कर्म नहीं;

पुरुष अपने धर्म की

परवाह करे या नहीं।

(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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