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व्यंग्य : दम बना रहै.. घर चुअत रहै // रामानुज श्रीवास्तव

कल किसी ने मेरे मेसेज बॉक्स में लिखा कि "दम है तो शेअर करो" मेरी समझ में अभी तक ठीक से नही आया है कि जनाब कौन से "दम" की बात कर रहें है....मेरे गांव में तो बीड़ी का सुट्टा मारते लोग भी पूछने पर यही बताते है कि भई !!  दोस्तों के बीच बैठा दम लगा रहा था। आजकल शहर में काम करने वाले मजदूर भी जब शाम को घर लौटते है..तो सभी दम लगाकर घर आते है....उनकी घरवालियों से अगर किसी में दम हो तो पूछ सकता है....वे सब एक स्वर में बोलेंगी...

" का करें भाई सा. कम कराते कराते ठेकेदार दम निकाल लेत है...इसलिये घर लौटन के लिये उन्हें दम लगाना जरूरी हो जात है कि नहीं !!   आप ही बताओ घर तक साइकल के पेडल मार के घर तक कइसे आमय..... बिना दम लगाये इआ सइकिलिया घर के बजाय अस्पताल पहुँचबा देत है।"

चिलम बाजों की बात छोड़िए.... वे तो बात बात पर दम लगाते हैं। मेरे गांव के एक पुराने तालाब में बने शंकर जी के मंदिर में एक साधू बाबा आये थे...फिर पता नहीं भोले से कैसे प्रेम हो गया कि वे दस साल तक मंदिर में ही रहकर रोज दम लगाते लगाते दम तोड़ गये। लेकिन उनकी दस सालों की मेहनत बेकार नहीं गई....बहुत से उनके अनुयायी चेला लोग है....जबरदस्त दम मारते है....उनकी एक फूँक से पूरी चिलम चिंगारी फेंक देती है....अलबत्ता एक रिस्क भी है....खुदा न खास्ता चिलम हाथ से जो छूट जाये तो पेट से कुशल सर्जन ही ढूंढ़ पायेगा। गांव के हर वय के लोगों को साधू बाबा दम लगाना सिखा के गये हैं.....कुछ लोगों ने तो ऐसा दम लगाया कि खेत बन्धी तक बेच दिया है दम लगाने के आगे लेकिन दम लगाना बंद नहीं किये हैं। कुछ को दम दमा नामक रोग भी हो गया है...कहते है ये दम के साथ जाता है।

जो दम लगाया सो लगाया..फिर पीछे मुड़कर किसने देखा है। गांव में तो लोगों के बीच एक कहावत भी प्रचलित है...."दम बना रहे घर चुअत रहे....फिर कालांतर में कुछ कवि टाइप के लोगो ने इस कहावत में रेल के पुराने ढांचे में बिजली के इंजिन की तरह दम लगा कर नया रूप दे दिया....अब इसे ऐसे कहने लगे...."दम बना रहय नाच बंगले मा होई।.....आगे नीतिपरक बात भी दम के साथ जुड़ गई.... "जिधर दम उधर हम" यानी बेदम लोगों के साथ अब कोई नहीं। बहुत वैरायटी है दम में...एक सूफी गाना तो आज तक उसी मान सम्मान से पहले की तरह गाया जाता है....

"दमा दम मस्त कलंदर" जिसका मतलब मुझे तक नहीं मालूम या यूँ कहिये मेरे भीतर इसे समझने का दम नहीँ है.......फिलम वाले भी दम की महिमा अपने एक गीत में कुछ यूँ कह गये है......

"दम मारो दम....

मिट जाए गम,

बोलो सुबह शाम,

हरे कृष्णा हरे राम।

आज रात सोच रहा हूँ कि आधी रात को जब नब्बे प्रतिशत मायावी लोग बेदम होकर सो जाएंगे सिर्फ हम और वो अर्द्ध बेहोशी में रहेंगे तब उन्हें जवाब लिखूँगा। मैं किसी भले आदमी को धोखे में नहीं रखना चाहता हूँ... ये मेरे संस्कारों में नहीँ है...न खून में है...मैं उन्हें साफ साफ बता दूँगा की भैया जी !!  मेरे पास बहुत थोड़ा सा दम है जिसके बल बूते कागज में गरज बरस लेता हूँ, बस ऐसा समझ ले अपना काम किसी तरह चला रहा हूँ.. थोड़ा सा दम रिजर्व में जरूर है..जिसे बताना या दिखाना अभी ठीक नही होगा....ये उस दिन काम आ सकता है जिस दिन बैंक के एटीएम से नोटों की तरह दुनिया की सन्दूक से दम भी गायब हो जायेगा...उस दिन इस रिजर्व दम के सहारे उस नदी तक तो पहुँच ही जाऊँगा जहाँ बहुत से "दम चोर" मेरे पहले से पहुँच गये होंगे।

आदरणीय भैया जी...आप दम वाले लोग है...मुझे माफ़ करने का आप में दम जरूर होगा। मैं आपके पास दो शेर भेज रहा हूँ... पहला ग़ालिब चचा का है दूसरा नाचीज़ का है...

हो सके तो........ज्यादा क्या कहें.. आप की समझदानी मुझसे बेहतर है।



वन....हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश में दम निकले।

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।



टू.....  जीने की आरजू में कहीं दम निकल न जाये।

मंदिर  'अनुज"  न जाना जूता बदल न जाये।


जय जय

रामानुज श्रीवास्तव

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