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पुस्तक समीक्षा // लघुता में प्रभुता की कथाएं-‘‘ जुनून तथा अन्य कहानियां‘‘ // वीरेन्द्र ‘सरल‘

लेखक अपनी अभिव्यक्ति के लिए चाहे कोई भी विधा का चयन करे पर सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहना ही उत्कृष्ट साहित्य की पहली शर्त होती है। हवा-हवाई बातें लिखकर अंधेरे में तीर छोड़ने से अभीष्ट की प्राप्ति कदापि नहीं हो सकती। विधा एक साधन है साध्य नहीं। लेखक का उद्देश्य हमेशा अपने लेखन के माध्यम से सामाजिक जागरूकता, लैंगिक संचेतना, मानवीय मूल्यों का संरक्षण, साम्प्रदायिक सद्भाव की स्थापना अर्थात समतामूलक समाज और सदृढ़ तथा समृद्ध राष्ट्र का निर्माण ही होता है। इन उद्देश्यों को केन्द्र में रखे बिना लिखी हुई बातों को हम चाहे कुछ भी नाम दें पर वह साहित्य कहलाने का हकदार नहीं हो सकता।

आज के अर्थ केन्द्रित और भागम-भाग के जीवन में मनुष्य स्वयं को सर्वोपरि मानकर परहित को हाशियें पर ढकेल चुका है। पद, पावर और पैसे के पीछे भागती जिन्दगी में मानवीय मूल्यों का तेजी से ह्रास हो रहा है तब किसी संवेदनशील रचनाकार, यथास्थितिवाद से समझौता कर मौन कैसे रह सकता है। जिसकी दृष्टि सजग है, हृदय में संवेदना है और मस्तिष्क चिन्तनशील है वह अपना विचार सम्प्रेषित करने के लिए सदैव व्यग्र ही होता है।

बस इसी व्यग्रता और छटपटाहट का परिणाम है जुनून तथा अन्य कहानियां। हिन्दी साहित्य के सुपरिचित और ख्यातिलब्ध लघु कथाकार डॉ श्रीमती शैला चन्द्रा की लेखनी से निसृत मानवीय मूल्यों और अनुभूतियों से उपजी कहानियों में जीवन के विविध रंग समाहित है। छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से बड़ी-बड़ी बातें कहने में दक्ष डॉ शैल चन्द्रा ने जीवन को बहुत निकट से देखा, परखा और पाया है। मानवीय व्यवहार तथा कार्य का विश्लेषण किया है। मुखौटों के भीतर के चेहरे का पहचाना है तब इन कहानियों की सर्जना की है। ऐसी बात नहीं है कि डॉ चन्द्रा लंबी कहानियां लिखने में प्रवीण नहीं है। दरअसल शब्दों के सागर में भावों के सागर को समाहित करने का हुनर हर किसी के पास नहीं होता चूँकि डॉ चन्द्रा इस कार्य में सिद्धहस्त हैं। दूसरी ओर आज के व्यस्त जिन्दगी में पाठकों के पास स्वाघ्याय के समय को ध्यान में रखकर ही उन्होंने इस विधा का चयन किया है।

अरूण प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित ‘जुनून तथा अन्य कहानियां ‘ इस संग्रह में लेखिका ने अपनी पच्चीस उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह किया है। संग्रह में संकलित सभी कहानियों को पढ़ते हुए पाठकों को उसके पात्र और उनका चरित्र जाना-पहचाना लगता है। घटनाएं अपने ही आसपास की लगती है इसलिए पाठक इन कहानियों में एक जुड़ाव महसूस करता है और कहनियों में समाहित संदेशों को आत्मसात करते हुए चिन्तन करता है।

आज समाज शिक्षित हो रहा है पर समझदारी गायब हो रही है। धन लोलुपता के कारण ईमानदारी गायब हो रही है और भौतिक सुख-सुविधाओं के फेर में नैतिकता और जिम्मेदारी गायब हो रही है। आधुनिकता के नाम पर अंधानुकरनण और पाश्चात्य जीवन शैली का नशा आदमी के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। इन सबके कारण बाहर से हमें लगता है कि आज जिन्दगी हसीन हो गई पर वास्तव में जिन्दगी आज मशीन हों गई है। जिसमें संवेदना , उच्च आदर्श, जीवनमूल्य और मानवीय संबंधों तक के लिए स्थान नहीं बच रहा है। झूलेवाला घर इसी पीड़ा की परिणति है। पगली कहानी में दहेज उत्पीड़न से पागल हुई नवयुवती की व्यथा कहती है तो पराजित पढ़ी-लिखी आत्म निर्भर नारी की पुरूषप्रधान समाज की मानसिकता से हारने की व्यथा है। पच्चीस साल बाद शिक्षित समाज में भी जाति-पांति के भेदभाव की मानसिकता की कथा कहती है तो फारेन रिटर्न और गाँव की ओर लौटते हुए तथा दाग, पारिवारिक जिम्मेदारी से मुँह चुराते औलादों की कहानी है। परख कहानी आंतरिक और बाह्य सौंदर्य की विवेचना करते हुए सूरत और सीरत का भेद बतलाती है तो मंदाकिनी बालिका शिक्षा पर जोर देते हुए उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का संदेश देती है। पद चिन्हों पर और छांव तले कहानी संयुक्त परिवार की महत्ता बतलाती है तो खिल गई जिन्दगी विधवा विवाह का संदेश देती है।

संग्रह की सभी कहानियों में लेखिका ने समाज की किसी न किसी समस्या को केन्द्रीय विषय बनाया है और समाधान सुझाने की कोशिश की है। कथ्य, शिल्प और शैली की दृष्टि से भी संग्रह की कहानियां अद्वितीय है। ठोस धरातल और जीवन की जड़ों से जुडी हुई इन कहानियों में डॉ शैलचन्द्रा ने प्रेम की रूमानी दुनिया की बातें नहीं लिखी हैं बल्कि जीवन और जगत से जुडे बहुत ही महत्वपूर्ण समस्याओं से अवगत कराती हुई पाठकों के चिन्तन को झकझोरने और विचारों को परिष्कृत एवं परिमार्जित करने का स्तुत्य प्रयास किया है। इस वंदनीय और अभिनंदनीय प्रयास के लिए डॉ शैल चन्द्रा को मेरी हार्दिक बधाई।

वीरेन्द्र सरल

बोड़रा (मगरलोड़)

पोस्ट -भोथीडीह

जिला-धमतरी (छŸीसगढ़)

पिन-493662

समीक्षा 8346470523602381072

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