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उत्तरी अमेरिका की लोककथाएँ // ईकटोमी, दो बहिनें और लाल आलूबुखारा // सुषमा गुप्ता

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देश विदेश की लोक कथाएँ — उत्तरी अमेरिका–ईकटोमी : चालाक ईकटोमी संकलनकर्ता सुषमा गुप्ता 12 ईकटोमी , दो बहिनें और लाल आलूबुखारा [1] एक बार एक ब...

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देश विदेश की लोक कथाएँ — उत्तरी अमेरिका–ईकटोमी :

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चालाक ईकटोमी


संकलनकर्ता


सुषमा गुप्ता


12 ईकटोमी, दो बहिनें और लाल आलूबुखारा[1]

एक बार एक बड़े जंगल में दूर दो बहिनें अपने छोटे छोटे बच्चों के साथ रहती थीं। उन दोनों के पति मर गये थे सो वे अपने बच्चों के साथ वहाँ अकेली ही रहती थीं।

एक बार उनके घर एक मेहमान आया जिसका नाम था ईकटोमी मकड़ा।


ईकटोमी जब जंगल में इधर उधर घूम रहा था तो कहीं से उसको बहुत ही बढ़िया लाल आलूबुखारे मिल गये थे। उसने सोचा मैं इन आलूबुखारों को रख लेता हूं और इन आलूबुखारों से मैं उन दोनों बहिनों को बेवकूफ बनाऊँगा। सो वह उन बहिनों के घर चला गया।

दोनों बहिनों ने उसको घर में बुलाया और बिठाया। बैठने के बाद उसने उनको वे लाल आलूबुखारे दिये। आलूबुखारे देखते ही वे बोलीं — “अरे ये तो बहुत ही अच्छे आलूबुखारे हैं। ये तुम्हें कहाँ से मिले?”

ईकटोमी अपनी जगह से उठा और एक लाल रंग के बादल की तरफ इशारा करके बोला — “उस बादल के ठीक नीचे आलूबुखारे का बागीचा है। वह बागीचा इतना बड़ा है और उसमें इतने सारे और इतने लाल आलूबुखारे लगे हुए हैं कि उनकी परछाईं से ही वह बादल देखो कितना लाल हो रहा है।

वे दोनों बहिनें बोलीं — “ओह काश कोई हमारे बच्चों की अगर देखरेख कर लेता तो हम भी वहाँ जा कर थोड़े से लाल आलूबुखारे तोड़ लाते। ”

ईकटोमी बोला — “मुझे कोई जल्दी नहीं है। मैं तो खाली ही हूं। अगर तुम लोग जाना चाहो तो वहाँ आलूबुखारे तोड़ने जा सकती हो तब तक मैं यहाँ अपने भतीजों की देखभाल कर लूंगा। ”

ईकटोमी जिससे भी मिलता था उसी से अपना रिश्ता जोड़ लेता था। बड़ी बहिन बोली — “ठीक है भैया। जरा इनका ठीक से खयाल रखना। हम जल्दी से जल्दी आने की कोशिश करेंगे। ”

दोनों ने एक बड़ा सा थैला उठाया जिसमें वे आलूबुखारे भर कर लातीं और उस लाल बादल की तरफ चल दीं। जैसे ही वे घर के बाहर गयीं तो ईकटोमी ने बच्चों को उनके झूलों में से निकाला और उन दोनों के सिर एक एक करके काट दिये।

फिर उसने कुछ कम्बल उठाये उनको बच्चों की शक्ल में लपेटा और उनको उनके पालनों में रख दिया।

फिर उसने बच्चों के शरीरों को काटा और एक पतीले में रख कर उसमें पानी डाल कर पतीला आग के ऊपर उबलने के लिये रख दिया।

उसने कुछ शलगम और छोटे छोटे काशीफल भी बच्चों के मांस के साथ मिला दिये और इस तरह से उसने पतीला भर कर सूप बना लिया।

जैसे ही वह सूप खाने के लिये तैयार हुआ तो दोनों बहिनें लौट आयीं। वे थकी हुई थीं और भूखी भी थीं। साथ में उनको एक भी आलूबुखारा भी नहीं मिला था।

ईकटोमी ने जब देखा कि वे घर में घुसने वाली हैं तो उसने दो लकड़ी के कटोरों में वह सूप निकाला और जा कर दरवाजे के पास बैठ गया ताकि वह तुरन्त ही वहाँ से भाग सके।

जैसे ही वे घर में घुसीं तो ईकटोमी बोला — “बहिनों मैं अपने साथ कुछ मांस भी लाया था सो उसको मैंने कुछ शलगम और छोटे काशीफल के साथ पका कर तुम लोगों के लिये एक पतीला भर कर सूप बना दिया है।

मुझे मालूम था कि तुम लोग जब आलूबुखारे के बागीचे से लौटोगी तो बहुत भूखी होगी। बच्चे अभी अभी सोये हैं सो तुम लोग पहले सूप पी लेना और बाद में ही उनको जगाना। ”

दोनों बहिनें वाकई बहुत भूखी थीं सो वे उन दोनों सूप के कटोरों पर टूट पड़ीं। जब उनका थोड़ा सा पेट भरा तो उनमें से एक बहिन उठ कर अपने बच्चे को देखने गयी कि वह आराम से सो रहा था या नहीं।

जब उसने कम्बल हटा कर देखा तो उसको अपने बच्चे के चेहरे का रंग कुछ अजीब सा लगा तो उसने उसका सिर कम्बल के नीचे से उठाया और लो उसका सिर उठाते ही वह तो चीख चीख कर रो पड़ी “हाय मेरा बेटा। हाय मेरा बेटा। ”

उसकी चीख सुनते ही उसकी बहिन भी दौड़ी दौड़ी अपने बच्चे को देखने गयी। उसने भी अपने बच्चे को ऊपर उठाया तो वह भी चीख मार कर रो पड़ी।

उन्होंने आपस में एक दूसरे से पूछा कि यह सब किसने किया होगा। दोनों एक ही नतीजे पर पहुंचीं कि यह ईकटोमी का ही काम है क्योंकि उनके जाने के बाद केवल वही एक घर में था और दूसरा तो कोई था ही नहीं।

उन्होंने तुरन्त ही आग में से एक एक जलती हुई लकड़ी उठायी जिससे वे ईकटोमी को तब तक मार सकें जब तक वह मर न जाये और उसके पीछे भागीं।

उधर ईकटोमी को तो यह लग ही रहा था कि ऐसा ही कुछ होगा सो वहाँ से वह तुरन्त ही भाग लिया और भाग कर एक बड़े से पेड़ की जड़ में बने बिल में घुस गया।

दोनों बहिनें उस बिल में ईकटोमी का पीछा नहीं कर सकीं सो उन्होंने उसका पीछा करने का विचार छोड़ दिया और वह दिन और रात अपने बच्चों के दुख में रो रो कर गुजारी।

इस बीच ईकटोमी उस बिल के दूसरे दरवाजे से बाहर आ गया। उसने अपना चेहरा कुछ ऐसे रंगा जिससे वह पहचाना न जा सके और एक नये तरीके से सज सँवर कर वह उन दोनों रोती हुई बहिनों के पास गया और उनसे उनके रोने की वजह पूछी।

तो उन्होंने उसको बताया कि ईकटोमी वहाँ आया था और उसने उनको आलूबुखारे दिखा कर बेवकूफ बनाया। वे बोलीं कि जब हम घर में नहीं थे तो उसने हमारे दोनों बच्चों को मार कर उनका सूप बनाया और फिर हम ही को पिला दिया।

हमको तो पता नहीं था सो हमने वह सूप पी लिया। पर जब हमको यह पता चला कि उसने हमारे साथ क्या किया है तो हमने उसको मारने की कोशिश की तो वह उस बिल में घुस गया और हम उसको उस बिल में से नहीं निकाल सके।

ईकटोमी बोला — “मैं निकालता हूं उसको बाहर। वह जायेगा कहाँ। ”

कह कर वह उस बिल में चला गया। वहाँ जा कर उसने अपना सारा चेहरा खुरच लिया जिससे कि वह उन बहिनों को यह विश्वास दिला सके कि वह उस बिल में ईकटोमी से लड़ता रहा है।

बाहर आ कर वह बोला — “मैंने उसको मार दिया है। और देखो मैंने यह बिल भी अब काफी बड़ा कर दिया है। तुम लोग चाहो तो खुद इसके अन्दर जा कर देख सकती हो और अगर चाहो तो उसके मरे हुए शरीर से अपना बदला भी ले सकती हो। ”

दोनों बेवकूफ बहिनों ने उसका विश्वास कर लिया और वे उस बिल में घुस गयीं। जैसे ही वे दोनों बहिनें बिल में घुसीं ईकटोमी ने तुरन्त ही कुछ लकड़ियाँ बटोरीं और उनसे उस बिल का मुंह बाहर से बन्द करके उनमें आग लगा दी।

वे बेचारी दोनों बहिनें उस बिल में से निकल ही नहीं सकीं और उसी बिल में जल कर मर गयीं।

इस तरह से उसने लाल आलूबुखारे का लालच दिखा कर उस पूरे परिवार को खत्म कर दिया जो इतना बेवकूफ था कि उन्होंने ईकटोमी को अपने घर में घुसने दिया।



[1] Iktomi, Two Widowa And the Red Plum – a foltale from Lakota Tribe of North America.

Taken from the Web Site :

http://www.firstpeople.us/FP-Html-Legends/Iktome-Coyote-And-The-Rock-Sioux.html


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रचनाकार: उत्तरी अमेरिका की लोककथाएँ // ईकटोमी, दो बहिनें और लाल आलूबुखारा // सुषमा गुप्ता
उत्तरी अमेरिका की लोककथाएँ // ईकटोमी, दो बहिनें और लाल आलूबुखारा // सुषमा गुप्ता
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