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कर्मयोगी // लघुकथा // धर्मेन्द्र कुमार त्रिपाठी

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प्रोफेसर प्यारेलाल आवारा। यह असल नाम नहीं था उनका। लॉज में रहने वाले कुछ हितैषी मित्रों ने उनका यह नाम रख दिया था। प्रोफेसर साहब लॉज में रहते थे और चालीस-पचास किलोमीटर दूर कस्बे के एक कॉलेज पढ़ाते थे। नवनिर्मित राज्य की राजधानी की वह लॉज बस स्टैंड के पास स्थित थी। सस्ती और अच्छी थी इसलिए टूरिंग जॉब के सिलसिले में आने वाले उसी लॉज में ठहरते थे। मैं भी राज्य की राजधानी में स्थित एक कंपनी में सैल्स रिप्रेजेंटेटिव था, सो फील्ड से जब भी आता था उसी लॉज में ठहरता था। प्रोफेसर साहब दिन में एक बार ही खाना खाते थे। बजरंगबली के परम भक्त प्रोफेसर साहब राजधानी के प्रसिद्ध मंदिर में रोजाना शाम को दो घंटे पूजा किया करते थे..।

वे कॉलेज बस से आया जाया करते थे.। बस की हाड़-तोड़ यात्रा करने के बाद भी वे हमेशा ऊर्जावान बने रहते थे और लॉज में आने जाने वालों के साथ पर्याप्त वक्त बिताया करते थे। मैं भी जब वहॉं होता तो ऑफिस के अलावा उनके साथ ही उठना-बैठना पसंद करता था। हम रात का खाना कभी किसी होटल में तो कभी किसी होटल साथ ही खाया करते थे। कई बार मैंने प्रोफेसर साहब का बिल भरने की कोशिश की पर उन्होंने शालीनता से मना कर दिया था।

हंसोड़ और मिलनसार प्रोफेसर साहब की पत्नी उन्हें छोड़ चुकी थी.। घर परिवार पुराने अविभाजित राज्य के एक सुदूर जिले में रहता था। उन्होंने एक बार खुद ही बताया था कि एक पुलिस अधिकारी की बेटी से उनका विवाह हुआ था। पत्नी ने सुहागरात में अमेरिकन डायमंड के नेकलेस की मॉंग रख दी थी, जिसे ईमानदार प्रोफेसर साहब पूरा न कर पाये और पत्नी छोड़ कर चली गयी थी। उस घटना के बाद प्रोफेसर साहब ने दूसरी शादी न करने का निश्चय कर लिया था और अपने छात्रों को ही अपना परिवार बना लिया था।

प्रोफेसर साहब की ईमानदार छवि और पढ़ाने के प्रति उनके जुनून के कारण उनके छात्र भी उन्हें पसंद करते थे। लेकिन एक घटना से उन्हें इस नये बने राज्य के एक कॉलेज में ट्रांसफर कर दिया गया था.।

कॉलेज की परीक्षायें चल रही थीं। उस परीक्षा में स्थानीय मंत्री पुत्र भी परीक्षा दे रहा था। वह खुलेआम नकल कर रहा था। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उसे नकल करने से रोक सके। प्रोफेसर साहब तक यह बात पहुंची तो उन्होंने उस मंत्री पुत्र का नकल प्रकरण बनाकर परीक्षा से बेदखल कर दिया। काफी हंगामा हुआ लेकिन प्रोफेसर साहब टस से मस नहीं हुये और कुछ दिन बाद उनका ट्रांसफर यहां कर दिया गया.।

प्रोफेसर साहब हाड़तोड़ बस का सफर कर रोज कॉलेज जाकर अपने विद्यार्थियों को शिक्षित कर रहे हैं। उनके छात्र उनका बेहद सम्मान करते हैं। यही उनकी पूंजी और कमाई है।

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म.नं. 501, रोषन नगर,

रफी अहमद किदवई वार्ड नं.18,

साइंस कॉलेज डाकघर, कटनी म.प्र.

483501

ई-मेल-tripathidharmendra.1978@gmail.com

लघुकथा 223624388375971360

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