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यादों के सहारे // सुशील शर्मा

यादों के सहारे

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(राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक स्व. पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी की  पुण्य तिथि पर विशेष )

राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक स्वर्गीय प्रेमनारायण त्रिपाठी शैक्षणिक मधुवन के प्राणों के प्राण थे । आपकी पारदर्शी मेधा का मणि दीप सरकारी विद्यालय के ज्ञान गगन का श्रृंगार थी  । आपके मानस मंदार से फूटनेवाली प्रतिभा की निर्झरणी की रागिनी शारदा की वीणा की मधुर झंकार थी । आपके ज्ञान के कलधौत कलश से छलछल छलकते रस का छककर जिसने रसपान किया वह ज्ञान का दिनमान और विवेक का वागीश  हो गया। आपके जैसा समदर्शी विद्वान और  पारदर्शी चरित्रवान अब सिर्फ स्वप्न है ।

आप कला के कलाधर, विद्या के वारिद और रेणु की मणिमाला में मेरु के मनका गूँथनेवाले कुशल कलावंत थे । आप  वस्तुतः आधुनिक युग के भगीरथ थे जिनके तप त्याग के तटों में बंधकर सफलता की तटिनी ने  अनेक शुष्क पौधों को भी सींच सींचकर उन्हें पुष्पित एवं पल्लवित कर दिया । आप सदा निर्भीक , निर्विवाद, निष्कलंक, निश्छल और निःस्पृह रहे और आपका पासंग गुण भी अगर आज की पीढ़ी में आ जाए तो शायद इस पीढ़ी के लिए इससे ज्यादा सौभाग्यशाली कुछ नहीं होगा ।

स्वर्गीय पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी जी एक ऐसा किरदार एक ऐसी शख्शियत थे ,जीवन का एक ऐसा आधार थे जो अपने कन्धों पर उच्च आदर्शों की मशाल जलाये नयी पीढ़ी को मार्गदर्शित करते रहे। एक ऐसा व्य‌क्तित्व ,जो सख्त दिखता था किन्तु मख्खन सा कोमल ह्रदय लिए जीवन के पग-पग पर हमको राह दिखाता था एक नाम जो हमारी पह्चान की धुरी है।

पूज्य  स्वर्गीय पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी जी जिन्होंने जीवन में सभी आन्तरिक आध्यात्मिक, भौतिक, व सामाजिक ज्ञान को हमेशा आत्मसार करने में सम्पूर्ण विवेक और वैज्ञानिक द्रष्टि कोण का सहारा लिया। हम धन्य कि हमें आपका सान्निध्य मिला …आप सदैव हमारे आदर्श रहेंगे। हे तात, 'प्रेम' आपका नाम था और प्रेम ही आपका धर्म। आपको गए हुए अब 12 वर्ष हो गए हैं। आज ही के दिन हमारे ऊपर से आपका साया उठा था।  समय कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है, मालूम ही नहीं पड़ता। आपकी इस पुण्यतिथि पर आपके श्री चरणों में शत-शत नमन।

कुशल-क्षेम पूछने स्वप्न में अब भी आते हैं,

देकर शुभ आशीष पीठ अब भी सहलाते हैं,

सुशील शर्मा

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