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लघुकथा - क्षमा - दान // देवेन्द्र सोनी , इटारसी।

लघुकथा - क्षमा - दान


           पिछले पांच साल से वृद्धाश्रम में रह रहे अमरनाथ आज अपनी आयु के 75 वे वर्ष में प्रवेश कर रहे थे । वहां रह रहे उनके अन्य साथी भी बहुत प्रसन्न थे । रमानाथ आज के दिन को ऐतिहासिक बनाना चाहते थे ।
       आश्रम में रह रहे साथियों के साथ ही उन्हें भी यह चाहत थी कि आज कुछ अलग सा दिन व्यतीत हो पर समझ नहीं आ रहा था । आश्रम की ओर से शाम को उनका जन्म दिन तो मनाया ही जाना था । प्रथा थी आश्रम की यह ।
   ....औऱ  हाँ , शाम को रमानाथ के परिजन भी तो उनके जन्मदिन में शामिल होने आ रहे थे । आश्रम प्रबंधक ने अभी अभी उन्हें यह सूचना  दी थी जिसे सुनकर वे असहज हो उठे थे। उनका उत्साह ठंडा पड़ते जा रहा था और अपने जीवन के उत्तरार्ध की कसैली यादें अब उन्हें सता रही थी। वे अतीत में जाना नहीं चाहते थे पर उन्हें लग रहा था आज वह वक्त आ गया है , जिसका संकल्प उन्होंने वर्षों पहले इस आश्रम में आते ही कर लिया था ।
        वे मुस्कुराते हुए अपने एक साथी के सहारे प्रबंधक के कक्ष में पहुंचे और उनके पास रखी अपने बैंक लॉकर की चाबी लेकर बैंक पहुंच गए , जहाँ उन्होंने अपनी वसीयत में अधिवक्ता के माध्यम से बदलाव करते हुए अपनी सारी जमा पूंजी , वृद्धाश्रम के नाम लिख दी और वापस आ गए ।
      रात को उनके परिजनों की उपस्थिति में उनका जन्मदिन मनाने के बाद फिर उनसे " वापस घर " चलने की औपचारिक क्षमा मांगी गई ।
      रमानाथ हौले से मुस्कुराए और बोले - बेटा ! क्षमा तो मैं हर साल करता हूँ पर आज दिल से क्षमा कर रहा हूँ । मैं यहां खुश हूँ , यहीं रहूँगा ।
     ...और हाँ आज तक मैं सिर्फ क्षमा ही करता रहा पर आज मैंने क्षमा के साथ दान भी कर दिया है ।
      "आज मेरा अंतिम क्षमा- दान पूरा हुआ । " - कहते हुए रमानाथ अपने कमरे की ओर चल दिए।


                       - देवेन्द्र सोनी , इटारसी।

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