अभिषेक शुक्ला "सीतापुर" की कविताएँ

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याराना

प्रेम से भी बड़ा बन्धन,

सुकून आये दोस्ती में।

कभी कृष्णा कभी अर्जुन

याद आये दोस्ती में।

अपनी जिंदगी से

हार थक करके हर इन्सान,

सभी परेशानियां और

गम भूल जाये दोस्ती में।

बना दे जिंदगी सुंदर

निभाओ साथ जब दिल से

यकीन करना बड़ा मुश्किल

दग़ा गर कोई दे फिर से।

दोस्ती है बड़े विश्वास

और एहसास का बन्धन,

निभाओ इसको तुम निःस्वार्थ

हो विश्वास जब दिल से।

मेरे मन के मंदिर में

दोस्ती राज करती है,

मेरे यार की मूरत

ही मन में वास करती है।

मेरे दोस्त और मुझसे

है कुछ ज्यादा ही मीठापन

साथ बस कुछ ही पल का है

ये दुनिया बात करती है।

कर्ण ने दुर्योधन से

निभाया खूब याराना।

रक्त के रिश्तों को तोड़ा

निभाया खूब याराना।

कन्हैया ने तो अर्जुन को

गीता उपदेश दे डाला,

उठा हथियार वचन तोड़ा

निभाया खूब याराना।।


"धरा का भूषण"

"वृक्ष धरा का भूषण कहलाते है,

ये पर्यावरण प्रदूषण मिटाते हैं।

हमें पेड़ पौधे लगाना चाहिए,

पर्यावरण को स्वस्थ बनाना चाहिए।

हमें ये फल,फूल व प्राण वायु देते है,

अपनी छाया से हमारे सारे दुख दर्द हर लेते है।

पेड़ पौधों से ही पृथ्वी सुंदर दिखती है,

हरियाली से ही हमें सुख शांति मिलती है।

जीवन के लिए हमें पर्यावरण को बचाना होगा।

हमें अवश्य ही पेड़ पौधे लगाना होगा।। "

अभिषेक शुक्ला "सीतापुर"


"नेताजी"

*लपेटे में नेताजी*

मेरे देश के नेताओं का अजीब हाल हो गया,

गरीबों के लिए लड़ते लड़ते वो मालामाल हो गया।

चुनाव में हाथ जोड़कर घर घर जाता हैं,

हर किया वादा निभाने की कसम खाता है।

चुनाव जीतने पर वो खुशियां मनाता हैं,

फिर सबको जाति धर्म के नाम पर लड़ाता है।

किये गए सारे वादे वो पल में भूल जाता है,

नेताजी का दर्शन भी दुर्लभ हो जाता है।

हमारे देश में पचपन का भी युवा नेता कहलाता है,

देश का युवा पढ़ लिखकर भी

बेरोजगार रह जाता है।

अनपढ़ बन नेता अपना काम चलाता हैं,

अधिकारियों पर भी खूब रौब जामाता हैं।

दिन रात वो दौलत शोहरत कमाता है,

पांच साल बाद उसे जनता का होश आता है।


#व्यंग्य

रण बांकुरों को नमन

" देशहित में जो प्राण हते, वही माई का लाल हैं।

सीमा पर करे सुरक्षा,जागे दिन हर रात है।

उन सपूतों को वन्दन करता,मेरा देश महान है।

उन्हीं के कारण हम है सुरक्षित, उन्हीं से अपना मान है।

सर्दी,गर्मी ,बारिश में भी वो हमेशा तैनात है।

और हर हाल दुश्मन को देता मात है।

उन रण बांकुरों को अभिषेक दिल से करता सम्मान है।

उन्हीं से पावन धरा का पल पल बढ़ता मान है। "



क्षेत्रपाल

" सूखी धरती की देख दरारें,

भृकुटी पर बन गयी मेरी धराये।

नित नवीन चिंता में रहता हूँ,

सब सहता हूँ चुप रहता हूँ।

सलिल की एक बूंद की खातिर,

नित मेघों को निहारता रहता हूँ।

समझ बिछौना वसुंधरा को,

अम्बर के नीचे रहता हूँ।

रज की खुशबू धर ललाट,

मैं चन्दन तिलक समझता हूँ।

धरती का सीना चीर मैं उसमें फ़सल उगाता हूँ,

अपने स्वेद से सींच उसे मैं जीवंत बनाता हूँ,

यूँ ही नहीं मैं धरापुत्र, क्षेत्रपाल कहलाता हूँ।।


ये चाँद तू बता

ये चाँद तू बता इतनी दूर क्यों बसता है,

तू तो सबके दिलों की धड़कनों में रहता है।

कोई तुझे देखे बिना ईद न मना पाये,

कोई तेरे दीदार बिना व्रत न पूर्ण कर पाये।

सब तुझसे अमन शांति की कामना करते हैं,

सब तुझ सा प्यारा साथी पाने को आह भरते हैं।

प्रेमी अपनी प्रेयसी में तेरा दीदार करते हैं,

कवि तुझ पर अपना काव्य रचते हैं।

तू तो सितारों बीच आसमान में बसता है,

तुझको धरती से ये "अभिषेक" नमन करता है।

तुझको पाने को कन्हैया का भी मन मचलता है।

ये चाँद तू बता तू इतनी दूर क्यों बसता है।


*अभिषेक शुक्ला "सीतापुर"

शिक्षक व सहित्य साधक

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1 टिप्पणी "अभिषेक शुक्ला "सीतापुर" की कविताएँ"

  1. Aapki sewa me rachnaye prastut hai.padhe aur comment karke bataye ki kaisa laga aapko mera kavya sangrah.

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