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व्यंग्य // छाप तिलक सब छीनी // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

छाप तिलक सब छीनी

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डा. सुरेन्द्र वर्मा


खडी बोली (हिन्दवी) के प्रथम कवि, अमीर खुसरो का का एक लोकप्रिय गीत है –

छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना लगाइके

प्रेम वटी का मदवा पिलाइके, मतवारी कर लीन्हीं

रे मोसे नैना मिलाइके...!

मनुष्य की पहचान उसके तिलक की छाप है। ऐसा बहुत कम होता है कि मनुष्य अपनी पहचान ही खो दे। लेकिन कभी कभी, जैसे प्रेम में, मनुष्य अपनी पहचान सचमुच खो बैठता है – छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके !

पंडित जी बता रहे थे हिन्दुओं में, और केवल हिन्दुओं में ही, तिलक या टीका लगाने की पृथा है, और यह सदियों पुरानी है। यहाँ स्त्रियाँ अपने माथे पर टीका लगाती हैं। कहीं विदेश में जाएं तो कुमकुम का टीका उनके भारतीय और हिन्दू होने की चुगली कर बैठता है। इसके सम्बन्ध में उत्सुकता जगाता है। यह क्या है ? क्यों है ? किस लिए और किस पदार्थ से लगाया गया है, इत्यादि। हिन्दू पुरुष भी तिलक लगाते हैं। वे अधिकतर चन्दन का तिलक लगाते हैं। भगवान का वंदन करते समय, हवन करते समय, जप कर्म, दान कर्म, तीर्थ स्नान के बाद, पूजा के बाद- तिलक लगाने का विधान आज भी बहुत कुछ कायम है। इसके पीछे कुछ आध्यात्मिक परिकल्पनाएं हैं। तिलक दोनों भोंहों के बीच में लगाया जाता है। यहीं पर ‘आज्ञा-चक्र’ स्थित है। उसी को क्रियाशील करने के लिए तिलक लगाते हैं। पंडित जी ने और भी कई बातें बताईं। उन्होंने बताया कि हिन्दुओं में हर वर्ण के लिए अलग अलग प्रकार के तिलक निर्धारित हैं। ब्राह्मण नासा-मूल से ललाट तक का तिलक लगाते हैं जिसे ‘ऊर्धवपुन्ड्र’ कहते हैं। क्षत्रिय त्रिपुंड धारण करते हैं; वैश्य अर्धचन्द्र तिलक लगाते हैं। वर्तुलाकार क्षूद्रों के लिए निर्धारित है। इसी प्रकार हर राशि के लिए भी यह निर्धारित है कि वह किस पदार्थ का तिलक लगाएं ? किसी के लिए कुमकुम तो किसी अन्य राशि के लिए सफ़ेद या लाल चन्दन का तिलक निर्धारित है; किसी के लिए हल्दी तो किसी के लिए दही का तिलक लगाने का विधान है। किसी के लिए सिन्दूर तो किसी के लिए अष्टगंध बताया गया है। पंडित जी यह सब बता तो गए पर इसे बताते हुए पंडित जी अत्यंत दुखी थे। बोले आज के नए ज़माने में ये सब बातें निरर्थक सी हो गईं हैं। कोई अब इन पर ध्यान नहीं देता।

मुझे लगा, अमीर खुसरो तो सिर्फ प्रेम का हवाला देकर, ‘छाप तिलक सब छीनी रे मोसे’ ही कह कर चुप हो गए थे; लेकिन आज तो आधुनिकता ने बड़े आराम से, बिना कोई कारण बताए ही हर किसी की ‘छाप तिलक सब छीन” ही डाली है।

लेकिन शायद ऐसा भी नहीं है। कुछ लोग तो अभी भी बड़े चाव से तिलक लगाते हैं। तिलकधारी मेरे एक मित्र बता रहे थे, मैं तो हमेशा चन्दन का टीका लगाता हूँ, और इसका कोई आध्यात्मिक कारण-वारण नहीं है, बस ये ठंडा ठंडा- कूल कूल होता है। भावनात्मक उत्तेजना को यह काबू में रखता है। मुझसे रहा नहीं गया, मैंने कहा अगर ऐसा है तो इसका प्रचार किसी अमिताभ बच्चन से करवाना चाहिए ताकि चंदन की बिक्री बढे और साथ ही साथ कुछ ठंडा ठंडा –कूल कूल भी हो जाए।

उस रोज़ मेरा एक दफ्तर में जाना हुआ। उस दफ्तर के हेड-साहेब दरवाज़े में घुसते ही सामने बैठे थे। माथे पर त्रिपुंड धारण किए थे। कंधे पर एक अंगोछा डाले थे। मैंने उन्हें अपना काम बताया। उन्होंने किन्हीं पण्डे जी को आवाज़ दी। पाण्डे जी आए। उनसे बोले, देखो तो ज़रा भाई, सर का काम कहाँ अटका पडा है? जी, बेहतर – कहकर पांडे जी चले गए। ग्यारह बज चुका था। दफ्तर में कर्मचारी अभी तक आ ही रहे थे। जो भी आता हमारे तिलकधारी हेड-साहब के चरण स्पर्श करता। यह उनके तिलक धारण का ही प्रताप था; और चुपके से अपनी सीट पर चला जाता। एक सज्जन आए। वे भी तिलक धारी ही थे। उन्होंने अपने छाप-तिलक-बॉस को पहले सादर प्रणाम किया और उनकी खिदमत में तीन-चार बीड़े पान उनके समक्ष प्रस्तुत किए। दोनों थोड़े मुस्कराए और नवागंतुक सज्जन वहीं एक कुर्सी पर बैठ गए। मैंने याद दिलाया, पांडे जी अभी आए नहीं ? पांडे जी को फिर हांक लगाई गई। पर पांडे जी नहीं आए। मैं काफी देर तक वहां बैठा रहा। अंतत: मैं निराश बाहर आगया। मेरे साथ वह नवागंतुक भी उठा। बाहर आकर मुझसे पूछा, क्या काम है ? मैंने काम बताया। मेरी आँखों में आँखें डाल कर (नैना मिलाइके) वह बोला, आप हमारे बॉस के तिलक की कुछ तो इज्ज़त कीजिए। कल आइएगा. काम हो जाएगा।

अब क्या बताऊँ, छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके !

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--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी, १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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  1. यह हमारा देश सच में बड़ा ही अनोखा है । यहां सामाजिक, धार्मिक व राजकीय कार्यो में तिलक अनिवार्य है! राजकीय कार्यो में तिलक को हम जैसे नादान लोग ही रिश्वत कहने की गुस्ताखी करते हैं ।😃

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