लघुकथा // पिंजरा // सुमनजीत कौर

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"पिंजरा"

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"सुनो मुझे नौकरी करने दो ना"

"क्यों करनी है तुम्हें नौकरी आखिर किस चीज की कमी है हमारे पास"

अदिति सोच में पड़ गई क्या कहे कैसे समझाए जय को क्या स्त्री का आत्मविश्वास आत्मसम्मान या  उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती । क्या विलासिता की वस्तुएं एकत्र कर लेने मात्र से उसका जीवन पूर्ण हो जाता है । क्या स्त्री का घर की चारदीवारी वाले पिंजरे में कैद रहना ही उसकी अस्मिता की कसौटी है क्या बस इतना ही उसका वजूद है ।

कुछ सोचकर जय ने कहा "अच्छा ठीक है कर लो नौकरी मगर घर के आसपास ही कहीं करना समय पर वापस आ जाना किसी भी सदस्य की कोई शिकायत नहीं होना चाहिए । सब तुम्हें ही मैनेज करना पड़ेगा । मेरे से किसी प्रकार की अपेक्षा मत रखना ।"

अदिति सोचने लगी क्या वह सचमुच पिंजरे से आजाद हुई थी या बस पिंजरे का थोड़ा आकार बड़ा हो गया था।

@ सुमनजीत कौर

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