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कल्पना मिश्रा की लघुकथा - मुर्दाघर

लघुकथा

मुर्दाघर

कल्पना मिश्रा

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अब कल सुबह ही पोस्टमार्टम होगा ,तो देर रात एक एक करके मुर्दाघर में दो औरतों के शव रखकर पीउन चला गया।

"हाय,आह्ह.." तभी एक शव के मुँह से कराह निकली...

"क्या हुआ..तुम इतना ज़्यादा जली कैसे ..?"  बूढ़ी औरत के शव ने कहा।

"मेरे पति और सास ने जलाकर मार दिया। दहेज़ नहीं ला पाई थी..इसीलिए। जिस पति को सर्वस्व न्योछावर कर दिया, उसी ने....? आह..आग की जलन से ज़्यादा मन जल रहा है। और सास इतनी बुरी क्यों होती हैं? मैं भी तो किसी की बेटी थी, उन्हें तरस भी नही आया?"... कहते हुए उसका गला भर आया।

"और आप..?"

"दम घुटने से..."

"कैसे?"

"बहू बेटे ने तकिया मुँह के ऊपर रखकर दबा दिया था। प्रापर्टी पाने के लिये.." गहरी साँस लेते हुए उन्होंने आँखें बंद कर ली।

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कल्पना मिश्रा

15/74-75,सिविल लाइंस

कानपुर

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