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लघु कथा - मैं और जागृति // डा0 रजनी रंजन

लघु कथा -

मैं और जागृति

डा0 रजनी रंजन

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रात के तीसरे पहर में भी उसकी आँखों में नींद नहीं थी। चाँदनी रात अमावस सी थी। सास की सोच पर तरस आ रही थी तो पति पर क्रोध ।
फिर  बेटी .........! फिर वही करना होगा । कल बहु को डॉक्टर के पास ले जाना...। सासू माँ  की बात कान से अधिक  मन को बेध रही थी। बिन बोले आँखों से आँसू लुढ़क रहे थे ।पोछने का भी जी न हो रहा था।जीते जी मर रही थी।अम्मा ने कहा था - सास माँ की दूसरी रूप होती है ।सम्मान देना। सब बात मानना ।


वही तो किया था मैंने ।बात ही तो मानी थी। एकबार, दोबार, तीनबार ,अब चौथी बार भी.........?
पति  आज कमरे में भी न आया। बाहर बरामदे में ही खटिया पर पसर गया और खर्राटे भरने लगा ।
निशा अपनी जिन्दगी से ऊब चुकी थी । कॉलेज में धाकड़ नाम से जानी जाने वाली भीगी बिल्ली बन गई थी। पढाई और रसोई दोनों में अव्वल थी। माँ की सीख को बनाये रखने के लिए ।
न.......? .अब नहीं .....? नहीं  करना सम्मान!  नहीं मानना दूसरी माँ!


अचानक से  उठी और आँसू पोछे तथा  पति के सामने जा खड़ी हुई। उसे झकझोर कर उठाया और  जोर से  चिल्ला पड़ी- नामर्द ! तू पढा लिखा है न! विज्ञान पढा है न! अपनी माँ को क्यों नहीं  बताता कि तू ही बेटा या बेटी  पैदा कर सकता है और ....और अगर नहीं बोल सकता तो मुझे छोड़ दो.....। माफ कर ! अब नहीं  रह सकती तेरे साथ ।  शोर सुन कर सास ससुर भी बाहर आ गये पर निशा को कुछ भी नहीं सूझ रह था। वह भूखी शेरनी की तरह पति पर बिफर रही थी।
पुत्र की दशा देखकर सास आगे बढ ही रही थी कि ससुर जी ने उनका हाथ पकड़ लिया। रूक जा तू.....। ये उनका मामला है। बहू सही कह रही है। बेटा या बेटी का वाहक पति ही होता है। बहू के  साथ  अब और  अन्याय मत करो ।
उन्होंने अपने बेटे से कहा-  सच कह रही है बहू। उठ माफी मांग ...। कल डाँक्टर से सलाह लेकर बहू के सेहत के अनुकूल इलाज करा। बेटी भी बुरी नहीं होती और सब सुनो....। उसे बहू की तरह ही मजबूत इरादों वाली बनाना होगा  ताकि  सामाजिक बुराइयों से वह लड़ सके।


फिर निशा के सिर पर हाथ रखकर कहा-  आज तुमने हमारी आँखें खोल दी। हम जानकर भी अनजान हो गये थे। पुत्र लालसा में अंधे हो गये थे। निशा फफक कर रोने लगी ।बस इतना ही बोली- मैं  अपने बच्चे को गोद में खिलाने को तरस रही हूँ । मेरा ह्रदय फटा जा रहा है।
मेरी सहनशक्ति अब क्षीण हो गयी है।


उसी समय सास ने आकर गले लगा लिया। सब रो रहे थे पर अब उन आँसुओं में  मन का मैल धुल चुका था।
सवेरे का सूर्य अपनी नई रोशनी के साथ  उदित हो गया था ।

डा0 रजनी रंजन 

एल0 आई0सी0 कालोनी

काशिदा, घाटशिला

झारखंड-  832303

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