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लघु कहानी - एकता का बल - देवेन्द्र सोनी , इटारसी ।

लघु कहानी - एकता का बल


         रमानाथ कई सालों से सपत्नीक धार्मिक यात्रा पर जाने की सोच रहे थे पर हर बार कारोबार की व्यस्तता या कोई न कोई अड़चन उन्हें जाने से रोक देती । पत्नी राधा बेचारी मन मसोस कर रह जाती ।
          उम्र के इस अंतिम पहर में वह अपने पति के साथ धर्म यात्रा करना चाहती थी । कारोबार उनके दोनों बेटों ने संभाल लिया था पर फिर भी रमानाथ का नेतृत्व और आदेश ही सर्वोपरि होता था । उनके घर और कारोबार को उनका निर्देशन ही एकता के सूत्र में बांधे हुए था ।


       यही कारण था कि वे कहीं बाहर निकल ही नहीं पाते थे पर इस बार उन्होंने चार माह की यात्रा का पूरा इंतजाम कर लिया और अपने दोनों बेटों को कारोबार की बारीकियां समझाते हुए अपने वित्तीय अधिकार बड़े बेटे को सौंप दिए और ख़ुशी - ख़ुशी अपनी यात्रा पर निकल गए । यहीं अनुभवी रमानाथ से चूक हो गई ।


    ....पर राधा बहुत खुश थी । उसकी वर्षों की चाहत पूरी हो रही थी मगर वह भी नहीं जानती थी यह चार माह की धर्म -यात्रा , एकता के उस धागे को तोड़ देगी जो उनके घर और कारोबार की नींव को हिला कर रख देगा ।
       रमानाथ के जाने के बाद घर और कारोबार में एक माह तो ठीक ठाक निकला पर फिर धीरे - धीरे भाइयों के मन में वित्तीय लेन - देन को लेकर खींचतान होने लगी । फलतः दोनों के आपसी स्नेह में मन मुटाव पनपने लगा । यही मनःस्थिति उनके घर " स्नेह सदन " को भी प्रभावित करने लगी । एकता का जो बल था अब वह दरकते हुए सामने आने लगा था । इसे छोटी बहू ने भांप लिया था ।
        वह समझ गई थी कि उनकी एकता के सूत्र को पिताजी का यह वित्तीय अधिकार का सामान्य सा निर्णय बिखेर कर रख देगा । तब उसने पिताजी को फोन पर सारी बातें बताते हुए उनसे स्थिति को संभालने का आग्रह किया ।
         पहले तो रमानाथ ने इसे हल्के में लेते हुए अपनी बहू से कह दिया - चिन्ता मत कर बेटा ! ऐसा कुछ नहीं होगा मगर वे खुद चिंतित हो गए । अब उनका मन धर्म - यात्रा में नहीं लग रहा था । उन्हें चिंतित देख जब राधा ने उनसे कारण जानना चाहा तो रमानाथ ने सारी स्थिति बता दी ।


        समझदार राधा ने यह सुन उनसे कहा - अनजाने में ही सही पर आपका निर्णय गलत हो गया । पैसा और अधिकार ही सब संकट का कारण होता है । अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है । चलो वापस घर चलते हैं । धर्म यात्रा से ज्यादा जरूरी कर्म यात्रा है । जितने दर्शन करना भाग्य में लिखा था उतने कर लिए । अब शेष रही बाकी यात्रा अपनी कर्म यात्रा से पूरी करेंगे।
       आप ही घर और कारोबार को एकता के सूत्र में पिरोकर रख सकते हैं ।


      यह हमारी इस यात्रा का ही प्रतिफल है कि हमें समय रहते समझ आ गया - अभी हमारे दोनों बच्चे परिपक्व नही हुए हैं । उन्हें अनुभव की कमी है और एकता का महत्व भी नहीं मालूम । अब वापस चलकर उन्हें एकता से रहने का पाठ भी पढ़ाना होगा । एकता का यही बल उनकी शक्ति है। हम उन्हें बिखरने नहीं देंगे। चलो वापस चलते हैं - अपने स्नेह सदन , जहां हमारा स्नेह ही उन्हें एकता का सबक देगा।
       राधा की समझदारी भरी बातों ने रमानाथ का मन हल्का कर दिया ।


.......उधर मंदिर में बांके बिहारी अपनी मुरली थामे मंद - मंद मुस्कुरा रहे थे। मानो कह रहे हों धर्म से पहले अपना कर्म तो पूरा कर लो ।
       मैं तो हूँ ही । यहां भी और तुम्हारे मन में भी ।


           -  देवेन्द्र सोनी , इटारसी ।

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