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हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - 19 : तीन तलाक // असग़र वजाहत

कहानी संग्रह

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

असग़र वजाहत

लेखक

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

सम्पादक

भाग 1  ||  भाग 2  || भाग 3 || भाग 4 || भाग 5 || भाग 6 || भाग 7 || भाग 8 || भाग 9 || भाग 10 || भाग 11 || भाग 12 || भाग 13 || भाग 14 || भाग 15 || भाग 16 || भाग 17 || भाग 18 ||

-- पिछले अंक से जारी

भाग 19


तीन तलाक

- मैं तीन तलाक और बुर्के का विरोधी हूँ।

- मैं भी हूँ। पर आप तीन तलाक और बुर्के के क्यों विरोधी है?

- इसलिए विरोधी हूँ की मैं मुस्लिम महिलाओं का भला चाहता हूँ। तीन तलाक और पर्दा मुस्लिम महिलाओं का शोषण है। उनके लिए अमानवीय है ।

- आप मुस्लिम महिलाओं के प्रति बहुत संवेदनशील हैं।

- हाँ हूँ। इसमें क्या बुराई है।

- बड़ी अच्छी बात है। यह बताइए आदिवासी और दलित महिलाओं के प्रति भी आपके मन में संवेदना है, सहानुभूति है ?

- हाँ है।

- तो आप उनके लिए क्या करते हैं?

- जब तक वे बुर्का नहीं पहनने लगेंगी और उनके समाज में तीन तलाक नहीं होने लगेगी तब तक मैं क्या कर सकता हूँ ?

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आवाज़ का जादू

कुछ पुरानी बात है मंदिर और मस्जिद में एक अजीब तरह का कॉम्पिटीशन शुरु हो गया था। यह लाउड स्पीकर की आवाज़ के बारे में था। मंदिर वाले और मस्जिद वाले एक-से-एक बड़़ा लाउड स्पीकर लगा रहे थे। और यह चाहते थे कि उनके लाउड स्पीकर की आवाज़ दूसरे के लाउड स्पीकर की आवाज़ से तेज हो जाए और ज्यादा दूर तक जाए, ज्यादा लोग सुनें। कॉम्पिटीशन बढ़़ता चला गया। मंदिर वालों ने अमेरिका से इंजीनियर बुलाए और मंदिर पर एक बहुत बड़ा लाउड स्पीकर लगवाया। मस्जिद वाले रूस से इंजीनियर लाए और मंदिर पर लगे लाउड स्पीकर से बड़ा लाउड स्पीकर बनवाया। यह होता रहा। लाउड स्पीकरों की आवाजे़ं बढती रही। और इतनी बढ़ गई की मंदिर और मस्जिद में जब एक साथ लाउड स्पीकर पर भजन गाए गए और अजान दी गई तो आवाज़ इतनी तेज थी कि सब सुनने वाले के कान फट गए। भजन गाने वालों और अजान देने वालों के कान भी फट गए।

फिर यह हुआ कि मंदिर और मस्जिद से आने वाली आवाजें किसी को न सुनाई देती थी क्योंकि सब के कान फट चुके थे।

पर भजन होते रहे। अजानें होती रहीं...

यह आज तक जारी है।

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क्रमशः अगले अंकों में जारी....

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