साक्षात्कार // रामयतन यादव से सितारा की बातचीत // प्राची - जून 2018

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साक्षात्कार

श्रेष्ठ लघुकथा सत्य के साथ सुन्दर और शिव की साधना है : रामयतन

रामयतन यादव से सितारा की बातचीत

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विगत 25-30 वर्षों से अनवरत रचनाशील रामयतन यादव राष्ट्रीय पहचान के लघुकथा लेखक हैं। इन्होंने विषय वस्तु, भाषा, शिल्प, सोच और संवेदना के स्तर पर इस विधा को विस्तार प्रदान किया है। इनकी रचनाशीलता में परंपरा की बेहतर स्थिति के संपोषण का भाव तथा नये जीवन मूल्यों का प्रवाह देखने को मिलता है।

रामयतन यादव की दर्जनाधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें, ‘परिवेश का अतिक्रमण’, ‘हवा का रुख’ (दोनों लघुकथा संग्रह), ‘बांझ होते एहसास’ (कहानी संग्रह) ‘जिंदगी’ (कविता) प्रमुख हैं।

‘गुजरते लम्हों का दर्द’, ‘हिन्दी की जनवारी लघुकथाएं’, ‘हिन्दी की चर्चित लघुकथाएं’, ‘बदनाम लघुकथाएं’, ‘ठहरा हुआ पानी’, ‘डॉ. राजेंद्र साहिल की कहानियां’ तथा ‘अक्षर-अक्षर चीख’ (दोहा) आदि इनके संपादन में प्रकाशित पुस्तकें हैं।

1. सितारा : सबसे पहले तो मैं यह जानना चाहूंगी कि आप लघुकथा को किस रूप में स्वीकारते हैं?

रामयतन : मैं लघुकथा को एक विशिष्ट साहित्यिक विधा के रूप में स्वीकारता हूं। दो-चार वाक्यों में यह कह सकता हूं कि कम से कम शब्दों में जीवन और जगत की विराटता और विविधता को उसके वास्तविक परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्त करने की रचनात्मक चेतना का प्रतिफल है लघुकथा। इसमें जीवन की अनुभूतियों को लघुआकारीय सरंचना में कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। यहां लघुता में तीक्ष्णता और तेजस्विता समाहित है। दरअसल लघुकथा जीवन-प्रवाह के विशेष अर्पि-आवर्त का प्राणोष्म बिम्ब है जिसमें जीवन के गतिशील क्षण अपने वृत्त में अर्थ-विशेष प्रक्षेपन करते हैं। लघुकथा की सरंचना में ही कथा-चरित्र और घटनाएं समुच्चय में रूपायित होते हैं। जिस प्रकार गीत की सरंचना जटिल, गझिन और संश्लिष्ट होती है, उसी प्रकार लघुकथा की सरंचना भी।

2. सितारा : दरअसल जिसे भी लेखन का शौक होता है वो लघुकथा से ही शुरुआत करने लगता है। क्यों?

रामयतन : शौक अच्छी चीज है। लेकिन शौक के साथ लघुकथा की समझ और उसके प्रति निष्ठा जरूरी है। सिर्फ शुरुआत कर देने भर से या फिर इधर-उधर से जोड़-तोड़ कर कुछ भी लिख देने से कोई लघुकथाकार हो जाता तो आज श्रेष्ठ और स्थापित लघुकथाकार उंगलियों पर नहीं गिने जाते। तुम्हें जानना चाहिए कि हर विधा में असंख्य रचनाएं जन्म लेती हैं, परन्तु अनुप्राणित रचनाएं ही साहित्य का हिस्सा बनती हैं। बाकी पानी का बुलबुला होता है। वैसे एक बात यह भी है कि लेखन कला इंसान के भीतर का संस्कार है जिसे घनघोर परिश्रम से विकसित किया जाता है। यह काम हर कोई नहीं कर सकता।

3. सितारा : मतलब लघुकथा लेखक बनने का शॉर्टकट रास्ता नहीं है?

रामयतन : बिल्कुल नहीं है। अभी मैंने बताया न कि लघुकथा का सृजन अन्य विधाओं की अपेक्षा अधिक श्रमसाध्य रचना प्रक्रिया है। चूंकि इसकी लघुता में हमें प्रभुता का दर्शन होता है। जो लोग इसे शॉर्टकट रास्ता समझते हैं वे यहां शॉर्ट समय तक ही दिखते हैं।

4. सितारा : आपकी रचनाधर्मिता के केन्द्र में जीवन और समाज का कौन-सा ज्यादा गहरा है?

रामयतन : उपभोक्तावादी संस्कृति के विस्तार से सामाजिक सरंचना का संवेदनात्मक पक्ष जिस तेजी से क्षरित हुआ है, उसके प्रति एक सजग रचनाकार के भीतर की चिंता को तुम मेरी लघुकथाओं को पढ़कर महसूस कर सकती हो। वैसे उQपर से मेरी रचनाएं तुम्हें आक्रामक लग सकती हैं, लेकिन अंतर्धारा में सकारात्मक मूल्यों के सरंक्षण का भाव निहित होता है।

5. सितारा : अच्छा सर जी, आज का जीवन जितना जटिल है, क्या उसे लघुकथा मुकम्मल तौर पर व्यक्त करने की क्षमता रखती है?

रामयतन : बिल्कुल सक्षम है। लघुकथा में अपने समय की जटिलताओं और चुनौतियों को अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता निहित है। अगर ऐसा न होता तो इस विधा का इतना सघन विस्तार संभव नहीं था। देखने वाली बात यह है सामाजिक जीवन को प्रभावित करनेवाले कौन से ऐसे मुद्दे हैं, या स्थितियां हैं, जिन्हें लघुकथा के जरिए अभिव्यक्त नहीं किया जा रहा। एक बात और कहना चाहूंगा कि अपने समय को उसके वास्तविक परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्त करने की क्षमता किसी विधा की चुनौती नहीं होती, बल्कि यह चुनौती उस विधा के रचनाकार की होती है। तात्पर्य यह है कि रचनाकार की दृष्टि और समझ पर निर्भर है कि वह उस विधा में प्राण डालने की प्रक्रिया में कितना सक्षम है।

6. सितारा : रचना के अंत में अपनी ओर से कोई निष्कर्ष देना उचित है?

रामयतन : नहीं, रचना के अंत में अपनी ओर से कोई निष्कर्ष या निर्णय देना लेखक की अभिव्यक्ति क्षमता के प्रति हमें संदिग्ध करता है। अपनी ओर से निष्कर्ष देना रचना को कमजोर करना है। निष्कर्ष या संदेश तो एक श्रेष्ठ रचना के साथ इस तरह गूंथा होता है कि उन्हें अलग से स्पष्ट करने की जरूरत नहीं होती। जैसे कि हम जरूरत के हिसाब से थोड़ा-थोड़ा पानी डालकर आटा गूंथते जाते हैं और जब वह गूंथकर रोटी बनने लायक हो जाता है, तब उसमें पानी तो होता है लेकिन उसे हम देख नहीं पाते। वैसे ही रचना में संदेश घुला-मिला होना चाहिए।

7. सितारा : सामाजिक जीवन के बदलते स्वरूप के साथ पाठकीय संवेदना के गहरे तक जुड़े रहने हेतु लघुकथा में किस तरह के प्रयोग संभव हैं?

रामयतन : बदलते सामाजिक मूल्यों और मान्यताओं के दबाव में प्रत्येक साहित्यिक विधा के स्वरूप में कुछ न कुछ परिवर्तन होता रहता है। लघुकथा में भाषा, शिल्प, संवेदना, प्रस्तुति एवं विषय-वस्तु के स्तर पर निरंतर प्रयोग हो रहे हैं। किसी विधा की जीवंतता उसकी गतिशीलता पर निर्भर है।
इधर की लघुकथाओं की संरचना में कसावट आयी है। रचनाकार पूरी गंभीरता से अपने समय की शिनाख्त करने में लगे हैं। अब तो लघुकथा सृजनात्मक संभावनाओं के शीर्ष पर हैं। इस विधा का एक मानक स्वरूप निर्धारित हो चुका है।

8. सितारा : आधुनिक परिवेश में लघुकथा की सामाजिक उपादेयता क्या है?

रामयतन : जो अन्य साहित्यिक विधाओं की है। यानि सामाजिक जीवन की जड़ता को गति देना और मानवोत्थानिक मूल्यों विचारों को संरक्षण प्रदान करना। जीवन के प्रति आस्था और विश्वास पैदा करना, सामाजिक विसंगतियों को उजागर करना। वैसे भी विसंगतियों के विरुद्ध प्रतिरोध की संस्कृति विकसित करने में लघुकथा को कामयाबी हासिल हो रही है।

9. सितारा : लघुकथा की आलोचना का दायित्व लघुकथा लेखक ही पूरा कर रहे हैं। ऐसा क्यों? कोई बड़ा नाम सामने क्यों नहीं आ रहा?

रामयतन : सबसे पहली बात तो तुम यह जानो कि जब कोई विधा विकास की प्रक्रिया में होती है तो उस विधा के रचनाकार को ही उस विधा विशेष के बारे में बताना होता है। ऐसा नई कहानी और नई कविता के साथ भी हुआ है। यह एक स्वस्थ परंपरा है। इसलिए लघुकथा लेखक यदि लघुकथा की आलोचना का दायित्व उठा रहे हैं तो हर्ज क्या है। इन्हीं में से कुछ बड़े नाम सामने आयेंगे। आ भी रहे हैं। प्रो. आचार्य निशांतकेतु, डॉ. कमल किशोर गोयनका, डॉ. शिवनारायण आदि विद्वानों ने इसे गंभीरता से लिया है। सृजन के साथ लघुकथा की समीक्षा का दायित्व तो बहुत सारे लोग उठा रहे हैं। अच्छा परिणाम भी सामने आ रहा है कि आज लघुकथा का फलक विस्तृत एवं व्यापक हुआ है। लघुकथा अपने अन्तर्गठन से ही समीक्षा का प्रतिमान गढ़ेगी और गढ़ भी रही है। इस संबंध में एक बात यह भी है कि किसी विधा की तरह लघुकथा भी, निरपेक्ष स्वतंत्र नहीं है, वह विधागत सापेक्षता से संबंधित है। इन्हीं सापेक्ष रचना-स्थितियों से लघुकथा विश्लेषण की पद्धति और प्रतिमान उभरकर सामने आयेंगे।

10. सितारा : अच्छा सर, लघुकथा के लिए विषय वस्तु के चयन की प्रक्रिया क्या है?

रामयतन : लघुकथाकार अपने समाज और जीवन से किसी घटना-विशेष का चयन करते हैं या फिर कल्पना के बल पर उन्हें गढ़ते हैं, लेकिन कथा-विन्यास एक बात है और उसकी संश्लिष्ट सम्पूर्णता में होती है। इकहरी, एकांगी और सपाट प्रस्तुति कला नहीं है जबतक उसमें द्वैत का तनाव न हो। रूपाकार में लघु होते हुए भी लघुकथा ऐसी मार्मिक स्थिति और शिल्पिक क्षण का सृजन करती है कि वह अपनी पूरी अर्थवत्ता में उद्भासित हो जाती है।

11. सितारा : लघुकथा को प्राचीन कथा परंपरा से जोड़कर देखना चाहिए या आधुनिक युग की विधा के रूप में?

रामयतन : लघुकथा निश्चित रूप से आधुनिक युग की विधा है जिसका नामकरण बुद्धिनाथ झा ‘कैरव’ ने अपनी पुस्तक ‘साहित्य साधना’ की पृष्ठभूमि में सन 1954 में किया था। हां, इतना अवश्य है कि लघुकथा के बीज प्राचीन संस्कृत साहित्य में भिन्न नाम से मौजूद था जिसका पल्लवन लघुकथा के रूप में हुआ। मनुष्य के सामूहिक श्रम परिहार के निमित्त उच्चरित अस्फूट ध्वनियों में जो लय-संहति थी उससे गीत की उत्पत्ति मानी जाती है उसी तरह भाषा के विकास के साथ ही कथा को संयुक्त किया जा सकता है। अग्निपुराण से कथा की पहचान शुरू होती है और इसकी परम्परा जातक कथाओं और सिहांसन बत्तीसी तक जुड़ती है। जी.वी. गिलक्राइस्ट के हिन्दी स्टोरी टेलर में भी कई छोटी-छोटी कथाएं हैं। जिनमें लघुकथा के बीज विद्यमान हैं। पश्चिम के ओ हेनरी, मोपांसा और तुर्गनेव की छोटी कहानियों से कई विद्वान लघुकथा की शुरूआत मानते हैं।

12. सितारा : खलील जिब्रान भी तो....।

रामयतन : हां खलील जिब्रान को भी लघुकथा रचना का श्रेय दिया जाता है। रवीन्द्र नाथ टैगोर की कणिका और क्षणिमा में भी लघुकथा के रूप ढूंढ़े जा सकते हैं।

13. सितारा : हिन्दी में पहली लघुकथा होने का श्रेय किसे हासिल है?

रामयतन : हिन्दी की पहली लघुकथा होने का श्रेय माधव राव सप्रे की रचना ‘टोकरी भर मिट्टी’ को जाता है। इसे कमलेश्वर जी ने हिन्दी की पहली कहानी में शामिल किया है। हालांकि यह रचना आज कि लघुकथा के बहुत करीब है।

14. सितारा : एक बेहतरीन लघुकथा कैसी होनी चाहिए?

रामयतन : लघुकथा समय के ‘क्षण-विशेष’ के साथ जीवन के क्षण विशेष की कथा- संदर्भिता शिल्पन और व्यंजना की द्वन्द्वात्मकता में संपूर्ण जीवन-दर्शन को प्रतीकित कर देती है। एक बेहतरीन लघुकथा जीवन और समाज की व्याख्या नहीं, व्यंजना है। वस्तुतः यह उसकी संक्षिप्तता, क्षिप्रता और वैधता है जो घनीभूत तमस के बीच से तीव्रता से निकल जाती है। श्रेष्ठ लघुकथा अपनी संक्षिप्त और संश्लिष्टि में मंत्र-शक्ति की तरह होती है। संसार के सारे अभिलाक्षणिक जीवन-तत्व यदि लघुकथा में समाहित हो जाए तो बेहतर रचना होती है। बेहतरीन लघुकथा विपुल घटना-प्रवाह में से चयन की कला विधा है। श्रेष्ठ लघुकथा सत्य के साथ सुन्दर और शिव की साधना है। यह अपनी संवेदनात्मक प्रभान्विति से मनुष्य के थके मानस को आलोकित करती है। श्रेष्ठ लघुकथा में संकेतों के बावजूद गहराई में यथार्थ व्यंजित होता है।

15. सितारा : लघुकथा का भविष्य क्या है?

रामयतन : बेहतर है। मैं इस बात के लिए आश्वस्त हूं कि लघुकथा वर्तमान की ही नहीं, भविष्य की भी रचना विधा है। कारण कि यह अपनी लघुता में भी यथार्थ जीवन के गतिशील क्षणों को व्यक्त करने में सामर्थ्य से युक्त है। समकालीन युग अत्यंत व्यस्त और तेजी से भागता हुआ समय है जिसमें सामाजिक क्रियाकलापों के सम्बंधों में बिखराव आया है। इस यंत्र-युग में साहित्य के आस्वादन का अवसर प्रदान कराने में लघुकथा सबसे आगे है। पाठक इसे बचे हुए समय में नहीं बल्कि समय बचाकर पढ़ेंगे।

16. सितारा : आप अपनी उन लघुकथाओं के बारे में बताएं जिन्हें पढ़कर पाठक भुलाये नहीं भूलता?

रामयतन : कलात्मक विन्यास और पूरी अर्थवत्ता के साथ हमने अपने आंतरिक संघर्ष एवं सामाजिक सरोकारों को अपनी लघुकथाओं के जरिये रेखांकित करने का प्रयास किया है। सचेतन लघुकथाओं का सृजन मेरा उद्देश्य रहा है। लघुकथा के कलात्मक विन्यास को निरंतर विकसित करने की कोशिश करता रहता हूं। मेरी कतिपय लघुकथाएं यथा चोरी, जिंदगी, डर, चिंता, एक जहरीला सवाल, अतिथि कक्ष, भूख की औलाद, जिंदगी के लिए मौन, विधवा, बाजार होती औरत, बाबूजी घर चलिए, मंत्री का कुत्ता इत्यादि। इन लघुकथाओं को व्यवस्थित वर्ण्य-विषय और सशक्त शिल्प-संरचना के कारण पाठकों ने खूब पसंद किया है। दरअसल इनमें जीवन की ऊर्जा का उल्लास है।

17. सितारा : सर अंतिम सवाल यह कि आप नये लघुकथा लेखकों को किस तरह की सावधानी बरतने की सलाह देंगे?

रामयतन : लघुकथा पर केन्द्रित जितनी सारी बातें अभी हम दोनों कि हैं उनमें इस सवाल का जवाब है। फिर भी तनिक और स्पष्ट करते हुए कहना चाहूंगा कि जीवन का नग्न चित्रण, घटनाओं की समाचारी विवरणी, बड़ी कथा का सार संक्षेप, चटपटी और चुटकुला की सतही प्रवृत्ति, व्यक्तिवादी चेतना, एक ही कथ्य की पुनरावृत्ति आदि से बचना चाहिए। समकालीन तनावों की सही पहचान करते हुए दृश्यों और कथ्यों के चयन में सतर्कता बरतने की बेहद जरूरत है।

संपर्क : गोविन्दपुर, पो. फतुहा (पटना)

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