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लघुकथा // फिजूलखर्ची का दुष्परिणाम // राजेश महेश्वरी

लघुकथा

फिजूलखर्ची का दुष्परिणाम

राजेश महेश्वरी

मारे देश के प्रसिद्ध धार्मिक एवं पर्यटन स्थल वाराणसी शहर मे एक संभ्रांत, सुशिक्षित एवं संपन्न परिवार में एक बालक ने जन्म लिया था। वह जब वयस्क हुआ तब उसका रहन-सहन राजा-महाराजाओं के समान खर्चीला था। अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत उसने हिंदी में लेखन प्रारंभ किया और वह एक प्रखर लेखक एवं कवि के रूप में प्रसिद्ध हो गया। उसने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अपने रचनात्मक सृजन से बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की थी। वह एक विद्वान व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे।

वे अपनी काव्य साधना एवं पारिवारिक विरासत से प्राप्त धन से वैभव एवं विलासिता का जीवन जिया करते थे। उनके अपने खर्च उनकी आय से कहीं अधिक होते जा रहे थे और वे धीरे-धीरे आर्थिक कंगाली की ओर बढ़ रहे थे। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं थी। उनके हितैषियों द्वारा आगाह करने पर भी कि जितनी चादर हो उतना ही पैर पसारना चाहिए। इसे नजरअंदाज करते हुए वह अपनी मौज मस्ती का जीवन ही व्यतीत करते रहे। यदि इस प्रकार धन का व्यर्थ दुरुपयोग हो तो बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं का भी खजाना खाली हो जाता है। उनकी इस गलती का परिणाम यह हुआ कि उन्हें आर्थिक तंगी के कारण अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों से कर्ज लेकर अपना जीवन यापन करना पड़ा और इसी मानसिक तनाव में वे चौंतीस वर्ष की अल्पायु में ही परलोक सिधार गये।

उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले अपने मित्र को पत्र लिखकर अपनी व्यथा एवं मन की भावनाओं को व्यक्त करते हुए लिखा था कि किसी भी व्यक्ति के पास असीम धन और असीमित साधन भी हो जाएं तो उसको उसका उपयोग बहुत सोच-समझकर सावधानीपूर्वक अपने भविष्य की दूर दृष्टि रखते हुए खर्च करना चाहिए। मुझे यदि यह समझ पहले आ गई होती और मैं सचेत हो गया होता तो ऐसी दुर्दशा एवं मानसिक वेदना मुझे कभी नहीं होती।

वह व्यक्तित्व कोई और नहीं हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र थे।

संपर्क : 106, नया रामपुर,

जबलपुर (म.प्र)

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