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आपने कहा है // प्राची - जून 2018

आपने कहा है

पाखण्डवाद से मुक्ति कब?

आपके सौजन्य से मुझे प्राची का अप्रैल 2018 अंक प्राप्त हुआ। इसमें मेरी एक कहानी को आपने स्थान दिया। आभारी हूं। आपकी सम्पादकीय तो सदैव व्यंग्योक्ति से सराबोर, प्रेरणादायक एवं ज्ञानप्रद रहती है।

इस अंक की संपादकीय में आपने आज के मनुष्य के दोहरे चरित्र को लेकर अत्यंत विस्तार के साथ उसके प्रत्येक पहलू पर जो तीखी लेखनी चलाई है, वह अत्यंत मार्मिक एवं विचारणीय है। हम बाहर-भीतर एक समान कब हो जायेंगे? पाखंण्डवाद से भारतीय समान को कब मुक्ति मिलेगी? यह विचारणीय तथ्य है।

धरोहर स्वरूप स्मृतिशेष श्री विश्वम्भर नाथ कौशिक की कहानी पढ़ी। इस कहानी के दो तत्व हृदय को अत्यंत झकझोरते हैं। 1. निरपराधी को फांसी की सजा, 2. क्या अपराधी के
सुधार या अपराधों को रोकने के लिए एक मात्र मृत्युदण्ड ही विकल्प है। तीसरा एक संदेश और इसमें आता है कि वास्तविक नियति क्या है?

रेवाशंकर एवं डॉ. कामता प्रसाद ये इस कहानी के प्रमुख दो पात्र हैं। अपराधी रेवा शंकर हैं। किंतु कामता प्रसाद न्यायालय से उसका लाभ तक नहीं लेते हैं। स्वयं फांसी के फन्धे में झूल जाते हैं। यह बात अलग है कि रेवाशंकर भी अंत में पश्चाताप की आग में झुलसते हुये अपनी आत्महत्या कर लेते हैं। काश! यदि कामतानाथ की मौत के पूर्व ही अपने अपराध को स्वीकार कर लेते तो एक सच्चे व्यक्ति के प्राणों की रक्षा हो जाती। जो समाज के हित में था।

आदरणीय सोढ़ी जी एवं आदरणीय सिसोदिया जी की कहानियां पढ़ीं। अच्छी लगी। श्रीप्रभात दुबे की लघुकथा एवं डॉ. राम निवास मानव के दोहे की अच्छे लगे। डॉ. कुंवर प्रेमिल की बाल कहानी पढ़ी। कहानी अच्छी है। किंतु एक तथ्य की ओर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। आज के कानून के अनुसार किसी भी प्राणी की हत्या करना अपराध की श्रेणी में आता है। बाल कहानीकार छोटू सियार बिल में आग लगाकर अजगर की हत्या कर देता है। अजगर से सुरक्षा के अन्य उपाय भी सुझाये जा सकते तो अधिक अच्छा होता। अजगर की हत्या का बालमन पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। जबकि उनके काम में सभी जीवों के प्रति संवदेनायें पैदा करना ही साहित्य का लक्ष्य है। बधाई!

सनातन कुमार वाजपेयी, जबलपुर

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हम सबका सफर

अपने एक साहित्यिक मित्र भाई हर भजन मेहरोत्रा जी से ‘प्राची’ का परिचय हुआ। अंक की जितनी ही प्रशंसा की जाये, कम ही होगी। फरवरी के अंक में चेखव के साथ ही
धरोहर कहानी ‘उसकी मां’ अद्भुत कथा सुख प्रदान करती है। सुबोध सिंह ‘शिवगीत’ की ‘जगना दा’ एवं ‘देने का सुख’ उल्लेखनीय हैं। रतन वर्मा जी की आत्मकथा ‘अनचाहा सफर’ हम एक का सफर लग रही है।

साथ ही लेख, समीक्षायें व काव्य पक्ष की प्रगाढ़ता पत्रिका को संबल देती है। मासिक पत्रिका के शानदार संयोजन के लिये बधाई।

राजेश कदम, कानपुर (उ.प्र.)

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