अन्धायुग का रचना-संसार // डॉ. लव कुमार // प्राची - जून 2018

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आलेख

अन्धायुग का रचना-संसार

डॉ. लव कुमार

मकालीन हिन्दी नाटक के सरोकारों को उद्घाटित करने का मुख्य कारण निरन्तर बदलते घटना-चक्रों, परिवर्तित जीवन-मूल्यों और जीवन-दृष्टियों के साथ-साथ बदलते सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों के बीच नाटक की बदलती भूमिका और संरचना को स्वीकार किया जा सकता है। इसकी शुरुआत माथुर, राकेश और लाल से होती है। इनके नाटकों में आत्म-संघर्ष की प्रमुखता है जो व्यक्ति, समाज और राजनीति की अन्दरूनी छायाचित्रों को दृश्यत्व देती है। यही कारण है कि समकाल और जीवन से गहरे जुड़ाव के कारण स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, पात्रों की आन्तरिक व्याकुलता, समकालीन राजनीति, समाज और अन्यान्य पारिवेशिक सन्दर्भ के रूप में यथार्थ दृश्य देखने को मिलता है। ऐतिहासिक और पौराणिक आख्यान पर आधारित इनके नाटक अपने समय के सभी ज्वलंत सवालों और समकालीन परिप्रेक्ष्यों से
सीधा मुठभेड़ करने वाले हैं।

हिन्दी में काव्य-नाटक का आरम्भ धर्मवीर भारती के ‘अन्धायुग’ से हुआ जिसमें महाभारत कालीन परिवेश एवं परिस्थिति, घटना, प्रसंग एवं पात्र-विधान के बावजूद युगीन जीवनधारा का निरूपण मुख्य है। वस्तुतः ‘अन्धायुग’ का चिन्तन नए मानव का चिन्तन है जो कम-से-कम प्रसाद के ‘सांस्कृतिक मानव’ का चिन्तन नहीं है। विश्वयुद्धोत्तर युगीन विसंगतियों और जीवन-संघर्ष को अभिव्यक्ति देनेवाले काव्य-नाटक ‘अन्धायुग’ में नाटककार भारती ने संकेत दिया है कि युद्ध केवल बाहर ही नहीं, बल्कि हमारे भीतर भी चलता है और बाहरी युद्ध वास्तव में उसी भीतरी युद्ध का प्रत्यक्ष रूप है। वही पात्र और घटनाएँ द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर आधुनिक युगबोध और संवेदना को व्यंजित करती हैं। कुंठित मानवता, धराशायी हुए आशा-विश्वास और मूल्य, विश्व स्तर पर मानवता का हनन, असुरक्षा का भाव, युद्ध की बर्बरताएँ ‘अन्धायुग’ में भी हैं। सत्य और धर्म के लिए अथवा असत्य और
धर्म के लिए लड़े जानेवाले युद्ध का परिणाम अन्ततः विनाश और विध्वंस ही होता है। समकालीन परिवेश में जी रहा आदमी अच्छी तरह समझ रहा है कि युद्ध का अर्थ मानवता और मूल्यों की बलि है और पशुता एवं हिंसा की विजय इसका परिणाम है। युद्ध की इसी बर्बरता और अनैतिक वृत्ति को देखकर अश्वत्थामा बर्बर और हिंसक हो उठा था। विक्षिप्तता, अनास्था, मूल्यहीनता, दिशा-दृष्टिहीनता, कुंठा, आतंक, हिंसा, अविश्वास और निराशा के बीच जीवन की निस्सारता या व्यर्थता का एहसास आज भी वैसा ही है जैसा महाभारत युद्ध के उपरांत था। ‘अन्धायुग’ का पात्र (मानव) अपनी आस्था में बार-बार छला गया है, आज भी छला जा रहा है और ऐसे में आस्थाहीन एवं दिग्भ्रमित होकर सबकुछ को असंगत मानने लगा है। नाटक का आरम्भ ज्योति की वन्दना से होता है और ज्योति की कथा कहने की घोषणा की जाती है, किन्तु अनेकानेक प्रश्नों और सन्दर्भों के साथ नाटक निरन्तर अन्धकार की ओर ही बढ़ता जाता है। अन्त में ज्योति का स्वरूप एब्सट्रैक्ट हो जाता है और बताया जाता है कि यह बीज रूप में हर मानव की आत्मा में निवास करती है। देश में स्वतंत्रता के सूर्योदय का उत्साह से स्वागत करने के बाद स्वयं को निरन्तर विडम्बना का शिकार होते हुए अनुभव करना अथवा आस्थाओं के टूटने की पीड़ा से आहत होने की स्थिति में ज्योति के बीज रूप में बने रहने की बात अर्थहीन लगती है। हाँ, एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि ‘अन्धायुग’ के
अधिकांश चरित्र प्रतीकात्मक हैं और आज के मानवीय जीवन के किसी-न-किसी पक्ष को स्पर्श करते हैं। स्वार्थ-लिप्सा और मर्यादा का उल्लंघन महाभारत का कारण था, आज भी इसी कारण युद्ध की सम्भावना बनी हुयी है। दुर्योधन का अहंकार, गांधारी की अन्धी ममता, अन्धे धृतराष्ट्र का विवेकहीन शासन-तंत्र, विवेकी-ज्ञानी एवं सत्पुरुषों की आधारहीन स्थिति और सत्य एवं शक्ति को जानते हुए भी विवशतावश असत्य एवं महाशक्ति का साथ देने की बाध्यता जैसी बातें आज भी हैं। क्रूरता, नृशंसता, प्रतिशोध और प्रतिहिंसा, बर्बरता जैसे विकारों से आहत अन्तर्मन वाला व्यक्ति आज भी स्वयं से और संसार से लड़ रहा है। करोड़ों अश्वत्थामा इन वृत्तियों के संवाहक हैं और इनसे लड़ भी रहे हैं। पश्चिमी नकारात्मक जीवन-दर्शन का प्रतीक चरित्र अश्वत्थामा में द्वितीय विश्वयुद्धोत्तरकालीन लगभग सारी विकृतियाँ आरोपित कर दी गयी हैं। नाटक में प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आनेवाले कृष्ण की सभी घटनाओं और चरित्रों पर बडा कठोर नियंत्रण है क्योंकि वे ईश्वर की सत्ता और मानवीय नियति के निर्धारक हैं। अपनी विलक्षणता के कारण युयुत्सु आज की भ्रान्त युवापीढ़ी और आत्मघाती संस्कृति से आक्रान्त सत्यपथ का अनुगामी होकर भी आत्महन्ता बनता है। ममता और निर्ममता के पाटों में हिचकोले खाती गांधारी को अन्त में अन्तर्ज्ञान होता है।

‘अन्धायुग’ का कथ्य जितना सशक्त है, उतने ही आकर्षक और प्रभावशाली इसके चरित्र हैं (उठाए गए प्रश्न और सन्दर्भ भी)। सम्पूर्ण नाटक निरन्तर घोर नैराश्य की ओर बढ़ता गया है जो असंगत नाट्य का वैशिष्ट्य है। सबकुछ के निरर्थक होने की स्थिति में जो नैराश्य उपजता है, उसका कोई ओर-छोर दिखाई नहीं देता तथा व्यक्ति उस नियति से बँधा असहाय-सा मृत्यु की प्रतीक्षा में जीता रहता है। ‘अन्धायुग’ के प्रारम्भ में दो बूढ़े प्रहरी कौरव महल के सूने गलियारे में घूम-घूमकर पहरा दे रहे हैं तथापि यह पहरा निरर्थक कार्य मात्र है क्योंकि उस श्रीहीन, भाग्यहीन और विडम्बनाग्रस्त महल में पहरेदार की आवश्यकता ही नहीं रह गयी है। दोनों पहरेदारों ने अपना जीवन उस गलियारे की लम्बाई को नापते हुए काट दिया है। ऐसी हरकतें असंगति-बोध का मुख्य लक्षण है। इसके पौराणिक पात्र मानव स्वभाव एवं मानसिकताओं के प्रतिनिधि हैं, इसलिए वे प्रासंगिक भी है और युगीन चेतना के संवाहक भी। मिथकाख्यान होने पर भी ‘अन्धायुग’ के चरित्र इतने प्रतीकात्मक हैं कि उनकी समकालीन व्याख्याएँ सम्भव हैं। आधुनिक मानव को विभिन्न दिशाओं में खींचने वाली परिस्थितियाँ तथा अनेकानेक अर्द्ध-सत्य निरन्तर अव्यवस्थित रखे हुए हैं। प्रतिनिधि चरित्र भी अव्यवस्थित और अर्द्ध-सत्य से जूझते हैं और ग्लानि भार से स्वयं को थका हुआ-सा महसूस करते हैं। कृष्ण दैवी मूल्यों के और अश्वत्थामा एवं दुर्योधन आदि पशु-मूल्यों के प्रतीक हैं जबकि अन्य पात्र मानवीय मूल्यों के प्रतीक हैं। व्यक्तिगत राग-द्वेष से ऊपर उठकर महत्तर एवं व्यापक जीवन-मूल्यों के लिए लड़ने वाले पात्र अधिक प्रभावित करते हैं, जबकि कृष्ण को छोड़कर प्रायः सभी पात्र व्यक्तिगत राग-द्वेष से परिचालित दिखा देते हैं। परिणामतः शाश्वत मूल्यों की हत्या होती रही और पशु-मूल्यों का वर्चस्व बढ़ता गया। आज भी स्थिति बदली नहीं है जो इसका समसामयिक प्रासंगिकता से जुड़ा पक्ष है।

‘अन्धायुग’ के अति शक्तिशाली चरित्र कृष्ण अपने दिव्य रूप में ईश्वरीय शक्ति के प्रतिनिधि हैं तो मानवीय रूप में राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ, दार्शनिक और कर्मयोगी हैं। गांधारी की दृष्टि में वे वंचक हैं तो बलराम की दृष्टि में मर्यादाहीन एवं कुटिल बुद्धि हैं। विदुर उन्हें प्रभु मानते हैं जबकि युयुत्सु की कृष्ण के प्रति अटूट आस्था है। इसके बावजूद सामान्य मनुष्य की मृत्यु कृष्ण की मृत्यु नहीं है। वे मरते नहीं बल्कि उनका रूपान्तर होता है क्योंकि वे ज्योति हैं। फिर भी वे दिव्य पात्र के रूप में सामने आते हैं परन्तु मानवीय दुर्बलताएँ भी उनमें मौजूद दिखाई गयी हैं। युयुत्सु का व्यक्तित्व भी आस्था और अनास्था के बीच विखंडित है। कृष्ण के प्रति अपनी आस्था के पुरस्कार के रूप में उसे घृणा, अपमान और निराशा ही मिली, जिससे अन्ततः कृष्ण के ईश्वरत्व के प्रति उसकी आस्था टूट गयी। एक मानवीय पात्र के रूप में वह परिस्थितियों की कसौटी पर अपनी कमजोरियों और विश्वासों के संयोग से तैयार चरित्र है जिसके अपमानों की शृंखला वस्तुतः युद्धोत्तर परिणति रही। एक सच्चे इंसान के रूप में उसने सत्य के संवाहक पांडवों का पक्ष लिया, परन्तु जैसा अन्तर्द्वन्द्व, मानसिक तनाव और सन्ताप उसे झेलना पड़ा, वह ‘अन्धायुग’ का दूसरा पात्र नहीं झेलता। कृष्ण के प्रति अगाध निष्ठा और आस्था के कारण उसे सार्वजनिक घृणा और उपेक्षा सहनी पड़ी और वह सिद्धान्तवादी, आदर्शवादी और सत्याग्रही योद्धा के रूप में न जाना जाकर कृष्ण के बधिक के रूप में पहचाना गया। निश्चय ही युयुत्सु उन सीधे-सादे सच्चे युवकों का प्रतिनिधि चरित्र के रूप में सामने आता है जो अपनी पूरी आस्था और विश्वास के साथ जीवन में कदम रखते हैं किन्तु परिस्थितियों और विडम्बनाओं के चक्रव्यूह में घिरकर-टूटकर बिखर जाते हैं। जीवन की वास्तविकता के बीच से आनेवाला पात्र अश्वत्थामा काल्पनिक न होकर वास्तविक प्रतीत होता है। उसमें अकारण विकृतियाँ आ गयी हैं जो छलपूर्वक उसके पिता की हत्या के कारण है। उसमें क्रूरता, प्रतिहिंसा और प्रतिशोध की धधकती ज्वाला है परन्तु पिता की हत्या से पूर्व का अश्वत्थामा निश्चय ही एक शूरवीर, साहसी और नीतिपूर्ण युद्ध करने वाला योद्धा भी है। पात्र की चरित्र-सृष्टि के रूप में इस काव्य-नाटक में सूच्य संवादों में उत्तरा, कुन्ती एवं अन्य स्त्रियों का नाम तो आता है लेकिन प्रत्यक्ष रूप से मंच पर
गांधारी ही उपस्थित होती है। अपनी आँखों पर पट्टी बाँधकर पति के प्रति पत्नी के समर्पण भाव का उदाहरण प्रस्तुत करती हुयी गांधारी में अगाध ममता के साथ अहंकार और कृष्ण को शाप देने की विवेकहीनता भी है। दुर्योधन के प्रति अपनी अन्धी ममता के कारण वह उसके प्रत्येक अनुचित कर्म को समर्थन देकर मनोबल बढ़ाती रही, जिसका परिणाम महाभारत और कौरवों के नाश के रूप में सामने आता है। वहीं सत्य एवं धर्म का, आस्था एवं ईश्वरीय शक्ति का पक्ष लेने के कारण युयुत्सु के प्रति गांधारी की अपार घृणा ने उसे कुलघाती और भ्रातृद्रोही के रूप में विख्यात कर दिया। याचक के मुँह से दुर्योधन की जयकार सुनकर गांधारी को विजय का दृढ़ विश्वास होता है, जबकि उसकी पराजय की बात जानकर उसके क्षोभ, शोक एवं आघात की कोई सीमा नहीं रह जाती। वह प्रतिहिंसा से जल उठती है और अविवेकपूर्ण क्षणों में कृष्ण को शाप देती है पर बाद में अपने शाप के लिए प्रायश्चित भी करती है। गांधारी की ममता का ही दूसरा पक्ष उसकी निर्ममता के रूप में सामने आता है जब अश्वत्थामा द्वारा सोए हुए पांडव पुत्रों के संहार का वृतान्त जानकर उसे अपार तुष्टि मिलती है। मरणासन्न दुर्योधन के अन्तिम दर्शन का साहस उसमें नहीं है। अश्वत्थामा से उत्तरा के गर्भनाश की सूचना पाकर उसे सन्तुष्टि मिलती है और वज्र-दृष्टि से अश्वत्थामा के शरीर को वज्र बना देने के लिए वह अपनी उन्हीं आँखों को खोलने के लिए सहर्ष तत्पर हो उठती है जिनसे उसने दुर्योधन की मृत्यु नहीं देखी। अपनी कटुताओं, बौद्धिक संकीर्णताओं और अन्धी ममता की व्यर्थता उसे अन्त में महसूस होती है और कृष्ण के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करती हुयी संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठने की स्थिति को स्वीकार करती है। आशय यह कि गांधारी में स्त्रियोचित ममता का भाव है परन्तु उसकी ममता अन्धी अथवा एकपक्षीय है क्योंकि जब-जब उसके मातृत्व पर चोट पड़ती है तब-तब वह हिंसक, प्रतिशोध की ज्वाला में उद्धत, आक्रामक और कटु हो उठती है।

नाटक का कथानक महाभारत से लिया गया है जिसमें द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की भयावह स्थितियों को केन्द्र में रखा गया है। महायुद्ध की समाप्ति के बाद शीतयुद्ध की स्थिति भी ठीक उसी प्रकार उत्पन्न हुयी जैसी महाभारत के पश्चात शान्तिकाल में हुयी थी। कौरव-पांडव युद्ध के अन्तिम दिवस में भयानक विनाश भरे अतीत और घोर अनिश्चयपूर्ण भविष्य से प्रारम्भ हुआ ‘अन्धायुग’ आतंक एवं अनिश्चय की मानसिकता को अभिव्यक्ति देनेवाला नया नाटक है। नाटक का आरम्भ इसी बिन्दु से होता है तथा ज्योति के प्रतीक कृष्ण की मृत्यु पर समाप्त होता है। इस पुराख्यान की बाहरी रूपरेखाओं के बीच महायुद्धोत्तर विश्व की तथा स्वातंत्रयोत्तर भारत की विचलित मानसिकताओं के विभिन्न रंग इस तरह भर दिए गए हैं कि कथानक का दुहरापन और नाट्य-शिल्प का विविधरंगी रूप भी उभर गया है। दृश्यता के आन्तरिक गुण से सम्पन्न यह काव्य-नाटक कथानक और शिल्प में एकसाथ दुहरापन लिए हुए है। कथानक के बीच-बीच में अत्यन्त मार्मिक प्रसंग अंकित होने के बावजूद ‘अन्धायुग’ की पद्धति मुख्यतः चिन्तक की है। युद्धों की भयंकर विनाशलीला में आक्रान्त तथा भविष्य के प्रति आशंकित मानव जाति और विनाश से बचे हुए भाग्यहीन मानव के चिन्तन और भावात्मक चित्रण का मूल उत्स भी एक ही है। अनादि काल से चली आ रही मानव जाति की त्रासदपूर्ण जीवन कथा को संक्षेप में दिखाने के लिए नाटककार ने एक अनुकूल पौराणिक आख्यान तथा प्रतीकात्मक पात्रों का सहारा लिया है, जिसमें कथानक अत्यल्प होने के बावजूद कथ्य अत्यन्त विराट है और जिसके दायरे में आदिकाल से अद्यतन इतिहास की व्याख्या संयोजित है। आसन्न पराजय तथा भारी जन-धन हानि के नैराश्य और तज्जन्य विषाद की गहरी छाया सबके हृदय पर छायी हुयी है। भारी विनाश के शिकार दोनों पक्ष हुए हैं_ मर्यादाएँ दोनों पक्षों ने तोड़ी हैं और अर्द्ध-सत्य के शिकार भी दोनों पक्ष के लोग हुए हैं। कौरव पक्ष की पूर्ण पराजय के बाद भी युद्ध समाप्त नहीं हुआ है। निशस्त्र द्रोण की अधर्मपूर्वक हत्या से अश्वत्थामा क्रुद्ध हो उठता है और वह भी छल-नीति का सहारा लेकर पांडवों का भारी नुकसान करता है। अन्त में अश्वत्थामा की पराजय होती है, पांडव निरंकुश शासक बनते हैं जिनके उद्धत आचरणों से स्वयं कृष्ण भी विक्षुब्ध हैं। युधिष्ठिर अपने भाइयों को अनुशासित रखने में अक्षम हैं तथा एक निर्णयहीन अयोग्य शासक सिद्ध होते हैं। युयुत्सु भी अपमानित होकर आत्महत्या कर लेता है। अन्त में चिन्ताग्रस्त एकाकी बैठे कृष्ण की मृत्यु एक व्याध के तीर लगने से होती है। अन्तिम समय में कृष्ण द्वारा दिया गया सन्देश सुनने वाला भी कोई नहीं है किन्तु उनका सन्देश तर्कातीत, अकाट्य तथा अमिट है। कौरव तो युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे किन्तु शोचनीय यह है कि ज्योति के प्रतीक परात्पर ब्रह्म पशुओं के समान क्यों मारे जाते हैं! स्वतंत्रता, नूतन सर्जन तथा साहस में ज्योति के निवास करने और ऐसे आचरण द्वारा इसे पुनजीवित करने का सन्देश देता हुआ नाटक समाप्त होता है जो इस भीषण त्रासदी के बीच प्रामाणिक नहीं बन पाया है।

काव्य-नाटक का शिल्प भिन्न हुआ करता है और ‘अन्धायुग’ में नाट्य-तत्व की उपस्थिति तथा नए शिल्प की गढ़न का आभास है। रंग निर्देशों के स्वरूप को एक निर्देश से समझा जा सकता है- ‘कथागायक दो रहने चाहिए_ एक स्त्री और एक पुरुष। कथागायन में जहाँ छंद बदला है वहाँ गायक को गायन सूत्र ग्रहण कर लेना चाहिए.....कथागायन के साथ अधिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।’ यह नाटक न्यूनतम मंच-सज्जा के साथ अभिनीत हो सकता है जिसमें पारम्परिक अभिजात तथा लोकनाट्य शैली का समन्वय हुआ है। मंगलाचरण, सूत्रधार और भरत वाक्य के साथ चरित्रों के मनोविश्लेषणात्मक अनुशीलन में सहायक प्रसंग भी हैं। टूटते हुए सपनों और बिखरते हुए आदर्शों को निरूपित करने वाला यह नाटक विरोधाभासों से आवृत्त है पर स्वाभाविक भी। ‘अन्धायुग’ में प्रतीकों और बिम्बों की बहुलता होने के साथ-साथ पात्रों और उनके चरित्रों, मनःस्थितियों, वस्तुओं और वातावरण में भी प्रतीकत्व की सम्भावनाएँ हैं। ज्योति, पहिया आदि भी अपने प्रतीकार्थ में बड़े गम्भीर हैं पर इन दोनों से उलझन भरी स्थिति ज़्यादा बनती है। ‘अन्धायुग’ में भारती ने कथ्यानुभूति की शाब्दिक अभिव्यक्ति के लिए कथागायन का सहारा लिया है जिसके संयोजन से वे विश्रृंखल कथावस्तु और घटनाक्रमों को जोड़ते हैं और यथासमय टिप्पणियाँ भी देते हैं। पंख, पहिए और पट्टियाँ जैसे अन्तराल दृश्य भी रंगशिल्पगत प्रयोगों के उदाहरण हैं जिसमें वृद्ध याचक की प्रेतात्मा के स्वगत या एकालाप के बाद मुख्य पात्रों का क्रमशः एक-एक कर आना और स्वगत के रूप में सम्मोहन की अवस्था में अपनी-अपनी बातें कहना वस्तु-विधान के अन्तराल को मरने की गम्भीर रंगयुक्ति है। मंच पर घटित होते दृश्य के भीतर एक अन्तर्दृश्य रचने का कौशल भी भारती की नाट्यकला है। ‘अन्धायुग’ के दूसरे अंक के अन्त में अश्वत्थामा क्रोध में अन्धा होकर याचक की हत्या कर देने के बाद, कृतवर्मा और कृपाचार्य द्वारा समझाने के पश्चात जब अपने इन दोनों गुरुओं की पहरेदारी कर रहा होता है तो नाटककार एक अन्तराल दृश्य के रूप में अन्धकार में घटने वाले कौवे और उल्लू के अन्तर्दृश्य की योजना करता है जिससे अश्वत्थामा को प्रेरणा मिलती है कि वह पांडवों से अपना प्रतिशोध किस प्रकार ले सकता है। इसी तरह दोनों प्रहरियों के बीच के संवादों में अभिनेय क्षणों की सम्भावना न होने के बावजूद कथागायन की तरह क्षेपक का काम पूरा होता है, क्योंकि इनके संवादों के माध्यम से नाट्यकार ने कही जानेवाली बातें कह दी हैं जो कहीं-कहीं वार्तालाप की अपेक्षा स्वगत जैसे हो गए हैं।

अभिनेय क्षणों की स्वाभाविकता की रक्षा के लिए दिए गए रंग निर्देश एकदम सटीक और सम्भावनापूर्ण हैं। नाट्य-शिल्प के लचीलेपन के कारण निर्देशक सुविधानुसार प्रयोग कर सकते हैं और अल्काजी के निर्देशन में प्रस्तुति के विषय में कहा गया है कि ‘अन्धायुग’ के अभिशप्त पात्रों और उनकी जर्जरता, पराजय, निराशा और टूटन से ग्रस्त, ध्वस्त पृष्ठभूमि में व्याप्त काली आँधी की छायाओं को मूर्त रूप देने के लिए कोटला के खंडहरों के बीच एक बुर्ज, टूटे दरवाजे, सीढ़ियों और रथ-चक्र वाले मुक्ताकाशी मंच का आश्रय लिया गया। स्पष्ट है कि यह परिवेश और मंच-सज्जा अपने-आप में नाटक की विषय-वस्तु की भयावहता को प्रतिबिम्बित करने में पूर्ण समर्थ था। ध्वस्त खंडहर की पृष्ठभूमि में मृत्यु के प्रतीक गिद्ध समूह, सत्य की पराजय का प्रतीक टूटे हुए रथ का पहिया, बुझे हुए मन की तरह प्रकाशहीन मार्ग, कोने-कोने में छिपा बैठा अन्धेरे का अहेरी आखेटक, भूतों की परछाई की तरह घूमते कौरव कुल गौरव- इन सबको प्रभावी रूप से दिखाना किसी प्रेक्षागृह की सीमाओं में सम्भव नहीं और न उपयुक्त ही।

सम्पर्क : गढ़बनैली, पूर्णिया,

बिहार, पिन-854325

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