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2 लघु कथाएँ - डॉ. आर. बी. भण्डारकर।

2 लघु कथाएँ

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           * जो सुख सूर अमर मुनि दुर्लभ।*

        साढ़े तीन वर्षीय पोती-दादी जी एक कहानी सुनाएं?

सुनाओ।

एक छोटा बच्चा था। उसका नाम था "ग्रीन कलर का पीहू।" उसे स्ट्रॉन्ग बनना था। उसने मिल्क पिया और स्ट्रॉन्ग बन गया।

दादी जी पसंद लगा मेरा आइडिया ?

एकदम पसंद लगा। हा हा हा हा........।

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* रोटी *

        

       चाचा और भतीजा;दोनों ग्वाल पेशे से। चाचा के माता-पिता नहीं रहे,आश्रित है भैया भाभी पर अर्थात भतीजे जी की माँ पर।घर में बड़ी कड़की के दिन हैं। भाभी ने सबके भोजन की मात्रा निश्चित कर दी है। पहला क्रम भैया का कमाते जो हैं; हाड़ तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। फिर क्रम भतीजे का बढताऊ उम्र है न; अभी से कमजोर रहेगा तो युवावस्था में तो कितना ही खाये पिये आँग-देव (शारीरिक अंग) ही नहीं लगेगा।

      चाचा-भतीजा पशु चराते हैं। कलेऊ (दोपहर का भोजन) के लिए दोनों को समान मात्रा में रोटियों मिलती हैं। चाचा बड़ा तो भूख भी ज्यादा, भतीजे की तुलना में। भतीजा छोटा,उसके हिस्से की पूरी रोटियां कुछ अधिक ही पड़ती उसे। अलिखित समझौता चचा-भतीजे में; चचा चौंपे बार बार और अधिक हाँकेगा बदले में भतीजा अपने हिस्से में से एक रोटी देगा चचा को। दोनों खुश।

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