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व्यंग्य // खुशी की कक्षाएं // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

खुशी की कक्षाएं

डा. सुरेन्द्र वर्मा

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अच्छे अच्छे दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक सर पटक कर रह गए लेकिन न तो वे खुशी को आज तक परिभाषित कर सके न ही उसे ढूँढ़ पाए हैं। खुशी शायद चीज़ ही ऐसी है। कितना ही प्रयत्न करें, वह हाथ नहीं आती। कोशिश निरर्थक ही रहती है। और मज़ा यह है कि हर आदमी के जीवन में खुशी और नाखुशी के दौर बारी बारी से आते ही रहते हैं। पर आदमी है कि सिर्फ खुशी को ढूँढ़ने में अपनी सारी उम्र तमाम कर देता है।

खुशी के रहस्य को ढूँढ़ने के लिए, और यह बताने के लिए की खुशी क्या है और इससे क्या उम्मीदें की जा सकती हैं, दिल्ली सरकार ने अपने स्कूलों में ४५ मिनट का एक ‘हैपीनेस पीरियड’ सुनिश्चित किया है जो पांच मिनट के ध्यान के साथ शुरू होगा। किसी भी काम को शुरू करने और उसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए, भारतीय परम्परा और सरकार के अनुसार ध्यान-योग बहुत ज़रूरी है। ‘हैपीनेस पीरियड’ के लिए नर्सरी से लेकर आठवीं कक्षा तक खुशी का एक पाठ्यक्रम रखा जाएगा। मुख्यमंत्री अरविन्द केसरीवाल ने छात्रों के लिए यह पाठ्यक्रम पेश करते हुए कहा कि पाठ्यक्रम में दिल्ली सरकार के सभी स्कूल सम्मिलित होंगे। यह पाठ्यक्रम ४० शिक्षकों की एक टीम ने ६ महीने में तैयार किया है। इस कवायत में आरंभिक उम्मीद के हिसाब से १० लाख छात्र और करीब ५० हज़ार शिक्षक शामिल होंगे। सरकार का मानना है कि खुशी की इन कक्षाओं द्वारा आतंकवाद, भ्रष्टाचार और प्रदूषण जैसी आज के समय की समस्याओं का चुटकी बजाते हल किया जा सकता है। ये समस्याएँ नाखुशी पैदा करती हैं और ज़ाहिर है खुशी के पीरियड द्वारा यह नाखुशी दूर की जा सकती है और प्रसन्नता और आनंद का एक माहौल पैदा किया जा सकता है।

इस पाठ्यक्रम को तिब्बती आध्यात्मिक गुरु, दलाई लामा, का बेशकीमती आशीर्वाद प्राप्त है। उनका कहना है कि केवल भारत ही आधुनिक और प्राचीन ज्ञान को एकजुट कर दुनिया का नेतृत्व कर सकता है। तथा मानवता को नकारात्मक भावनाओं से उबारने में मदद कर सकता है। योग प्राचीन ज्ञान है और जैसा की हम जानते ही हैं समस्याएँ आधुनिक हैं। इन दोनों का (सं)योग अद्भुत परिणाम दे सकता है ! खुशी की कक्षाएं मानसिक कल्याण के लिए भी मार्ग प्रशस्त करेंगीं। गुस्सा, नफ़रत और ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाओं के चलते पैदा होने वाले संकट हल हो जाएंगे। और तो और खुशी की कक्षाओं में भारत के ‘प्राचीन ज्ञान’ को पुन: प्राप्त कराया जा सकता है ताकि भारत ‘आधुनिक समय’ का गुरु बन सके।

ऐसा लगता है कि सरकारें आजकल बड़ी नाखुश हैं। वे अपने अधीन लोगों को खुशी नहीं दे पा रहीं हैं। अभी हाल ही में खबर आई थी कि मध्य-प्रदेश शासन ने एक पूरा आनंद विभाग ही खोल दिया है जिसमे “आनंदिक’ बनने के लिए लोग अपना रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं उनको आनंदित किया जाएगा और आनंद कैसे हासिल किया जाए इसकी शिक्षा दी जाएगी। अब दिल्ली भी इसी राह चल पडी है।

अपना अपना सोच है। कोई खुशी को एक अनुभूति के रूप में देखता है तो कोई उसे एक वस्तु के रूप में पाना चाहता है। सरकारों ने हमेशा खुशी को मनचाही वस्तुओं को लोगो को प्राप्त कराने में देखा और वह उन्हें बावजूद अपनी शुभाकांक्षाओं के कभी प्राप्त न करा पाई। सामान्य आदमी भी मनचाही वस्तुओं की प्राप्ति को ही खुशी मानता है। और खुशी शायद इसीलिए दोनों को ही ठेंगा दिखा देती है। ढूँढ़ते रहिए, ढूँढ़ते रहिए। तलाश कभी ख़त्म होने वाली नहीं है। खुशी को पाठ्यक्रम में पढ़ाने से भला कौन खुश हो पाएगा ? विद्यार्थी तो ज़रूर उसे, जैसे और विषय पढ़ते हैं, खुशी को भी अपनी कक्षाओं में बेमन से ही पढेंगे।

कई राष्ट्र आजकल अपनी ‘सकल राष्ट्रीय खुशी” का फ़ॉर्मूला विकसित करने में लगे हैं। उनका मानना है कि पैसा सब कुछ खरीद सकता है पर खुशी नहीं। सही बात है। फिर खुशी का सूत्र क्या है ? नेपाल ने खुशी का मैजिक फ़ॉर्मूला आखिर ढूँढ़ ही लिया। यह “८ गुणित ३” सूत्र है। ८ घंटे काम- ८ घंटे फुर्सत– ८ घंटे सोना। स्कूलों में २ मिनट का चिंतन और ध्यान- ताकि शान्ति बहाल हो सके। पर नेपाल आज भी अशांत है। खुशी उसे ढूँढे नहीं मिल रही है।

खुशी पढ़िए मत, ढूँढिए नहीं, क्या पता वह आपको कभी अपने सिरहाने खड़ी मिल जाए।

*डा. सुरेन्द्र वर्मा )

१० एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

हास्य-व्यंग्य 4169786054849912481

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  1. हमने बा खुशी आपका लेख पढ़ा छात्रों को खुशी मिलें न मिलें पर हमें तो खुशी मिली। मांगे मिले न खुशी, आपने सही फ़रमाया खुश रहने से खुशी मिल सकती है।वर्गखंड में नहीं, भीतर से आती है खुशी, वाह क्या झूमना खुशी है, हो सकती है, पर नशे वाला झूमना नहीं, झूम झूम के नाचो आज, गाओ खुशी के गीत।

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  2. यहाँ मध्यप्रदेश में भी आनंद मंत्रालय है जिसके तहत लोग, जैसे भी हो, आनंद मंगल में ही जिएँ-मरें इस हेतु नियम-कायदा-क़ानून बनाया जाता है. कहना न होगा कि यह मंत्रालय अभी अभी ही सृजित हुआ है :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. ख़ुशी की कक्षाए चल रहीं हैं दिल्ली में आयोजक हैं केजरीवाल, विधायकों की एक्स्ट्रा इनकम है न ये कमाल !
    लगता है आपने स्वयं भी ये दिल्ली सरकार का हंसी गुब्बारे वाली क्लास ज्वाइन की हैं ! ऐसे ही कमाल का है
    आपका ब्यंग है डाक्टर सुरेंद्र जी ! साधुवाद ! हरेंद्र

    उत्तर देंहटाएं

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