कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग 2 // राजेश माहेश्वरी

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कहानी संग्रह तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) राजेश माहेश्वरी विश्वास मुम्बई की एक बहुमंजिला इमारत में मोहनलाल जी न...

कहानी संग्रह

तर्जनी से अनामिका तक

( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )

राजेश माहेश्वरी

कहानी संग्रह //  तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )  // राजेश माहेश्वरी

विश्वास

मुम्बई की एक बहुमंजिला इमारत में मोहनलाल जी नाम के एक बहुत ही सज्जन व दयालु स्वभाव के व्यक्ति रहते थे। उसी इमारत के पास एक महात्मा जी दिन भर ईश्वर की आराधना में व्यस्त रहते थे। मोहनलाल जी के यहाँ से उन्हें प्रतिदिन रात का भोजन प्रदान किया जाता था। यह परम्परा काफी समय से चल रही थी। एक दिन उन महात्मा जी ने भोजन लाने वाले को निर्देश दिया कि अपने मालिक से कहना कि मैंने उसे याद किया है। यह सुनकर मोहनलाल जी तत्काल ही उनके पास पहुँचे और उन्हें बुलाने का प्रायोजन जानना चाहा। महात्मा जी ने कहा कि मुझे आप पर आने वाली विपत्ति का संकेत प्रतीत हो रहा है। क्या आप कोई बहुत बड़ा निर्णय निकट भविष्य में लेने वाले हैं ? मोहनलाल जी ने बताया- मैं अपने दोनों पुत्रों के बीच अपनी संपत्ति का बंटवारा करना चाहता हूँ। मैं और मेरी पत्नी की आवश्यकताएं तो बहुत सीमित हैं जिसकी व्यवस्था वे खुशी-खुशी कर देंगे। महात्मा जी ने यह सुनकर कहा कि आप अपनी संपत्ति के दो नहीं तीन भाग कीजिये और एक भाग अपने लिये बचाकर रख लीजिये। इससे आप दोनों जीवन में किसी पर भी निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

मोहनलाल जी यह सुनकर बोले कि हम सभी आपस में बहुत प्रेम करते है। उन्होंने महात्मा जी की बात पर ध्यान न देते हुये बाद में जब संपत्ति का वितरण किया तो उसके दो ही हिस्से किए।

कुछ समय तक तो सब कुछ सामान्य रहा फिर उन्हें धीरे धीरे अनुभव होने लगा कि उनके बच्चे उद्योग-व्यापार और पारिवारिक मामलों में उनकी दखलन्दाजी पसन्द नहीं करते हैं। कुछ माह में उनकी उपेक्षा होना प्रारम्भ हो गयी और जब स्थिति मर्यादा को पार करने लगी तो एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी के साथ दुखी मन से अनजाने गन्तव्य की ओर प्रस्थान करने हेतु घर छोड़ दिया। वे जाने के पहले उन महात्मा जी के पास मिलने गए। उन्होंने पूछा आज बहुत समय बाद कैसे आना हुआ ? तो मोहनलाल जी ने उत्तर दिया कि मैं प्रकाश से अन्धकार की ओर चला गया था और अब वापिस प्रकाश लाने के लिये जा रहा हूँ। मैं अपना भविष्य नहीं जानता किन्तु प्रयासरत रहूँगा कि सम्मान की दो रोटी प्राप्त कर सकूं। महात्मा जी ने उनकी बात सुनी और मुस्कराकर कहा कि मैंने तो तुम्हें पहले ही आगाह किया था। तुम कड़ी मेहनत करके सूर्य की प्रकाश किरणों के समान प्रकाशवान होकर औरों को प्रकाशित करने का प्रयास करो।

मेरे पास बहुत लोग आते हैं जो मुझे काफी धन देकर जाते हैं जो मेरे लिये किसी काम का नहीं है। तुम इसका समुचित उपयोग करके जीवन में आगे बढ़ो और समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत करो। ऐसा कहकर उन महात्मा जी ने लाखों रूपये जो उनके पास जमा थे वह मोहनलाल जी को दे दिये।

मोहनलाल जी ने उन रूपयों से पुनः व्यापार प्रारम्भ किया। वे अनुभवी एवं बुद्धिमान तो थे ही, बाजार में उनकी साख भी थी। उन्होंने अपना व्यापार पुनः स्थापित कर लिया।

इस बीच उनके दोनों लड़कों की आपस में नहीं पटी और उन्होंने अपने व्यापार को चौपट कर लिया। इधर मोहनलाल जी पहले से भी अधिक समृद्ध हो चुके थे। व्यापार चौपट होने के कारण भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहे दोनो पुत्र उनके पास पहुँचे और सहायता मांगने लगे।

मोहनलाल जी ने स्पष्ट कहा कि इस धन पर उनका कोई अधिकार नहीं है। वे तो एक ट्रस्टी हैं जो इसे संभाल रहे हैं। जो कुछ भी है उन महात्मा जी का है। तुम लोग जो भी सहायता चाहते हो उसके लिये उन्हीं महात्मा जी के पास जाकर निवेदन करो। जब वे वहाँ पहुँचे तो महात्मा जी ने उनकी सहायता करने से इन्कार कर दिया और कहा कि जैसे कर्म तुमने किये हैं उनका परिणाम तो तुम्हें भोगना ही होगा।

गुमशुदा बचपन

एक धनाढ्य व्यक्ति अपने बच्चों के लिए ढ़ेर सारे खिलौने खरीदकर लाया करता था। कुछ समय बाद बच्चे के बड़े हो जाने के कारण वे सारे खिलौने उनके लिए अनुपयोगी हो गये थे। उस व्यक्ति ने सोचा कि क्यों ना इन्हें गरीब बच्चों में बाँट दिया जाए। जिससे वे भी इनसे खेलकर खुश हो जायेंगें। अपनी इस भावना को कार्यरूप देने के लिए वह पास ही की एक गरीब बस्ती की ओर निकल पड़ता है। रास्ते में उसे एक गरीब बच्चा मिलता है जिसे वह खिलौना देने की पेशकश करता है। वह बच्चा यह सुनकर बहुत खुश होता है एवं खिलौना ले भी लेता है परंतु अचानक ही कुछ सोचकर उसे मायूस होकर वापिस कर देता है। वह व्यक्ति इसका कारण पूछता है तो वह बच्चा कहता है कि मेरे माता पिता मुझसे भीख माँगने का काम करवाते है अगर वे यह खिलौना देख लेंगे तो समझेंगें की मैंने भीख से प्राप्त पूरे रूपये उन्हें ना देकर उसमें कुछ रूपये से यह खिलौने खरीदे हैं तो मुझे बहुत मार पडेगी। वह बच्चा यह कहकर चुपचाप चला जाता है। उस व्यक्ति को आगे जाकर एक दूसरा गरीब बच्चा मिलता है। वह उसे भी खिलौने देने की पेशकश करता है परंतु वह बच्चा मना करते हुए कहता है कि मैं तो दिनभर बिडी बनाने का काम करता हूँ, मेरे पास इन खिलौने से खेलने का वक्त ही नहीं है। यह कहकर वह बच्चा आगे बढ़ जाता है। कुछ और आगे जाने पर उस व्यक्ति को तीसरा बच्चा मिलता है जो कि सहर्ष ही सभी खिलौने लेकर उसे धन्यवाद देता हुआ चला जाता है। वह व्यक्ति मन में सोचता है चलो देखते है कि यह बच्चा इन खिलौनों के साथ क्या करता है। वह उस बच्चे का पीछा करता है और देखता है कि उसने एक दुकान पर जाकर उन खिलौनों को बेच दिया और उससे प्राप्त राशि से पास ही की एक दवा दुकान से दवा खरीदकर ले जाता है। वह भी चुपचाप उसके पीछे पीछे उसके घर तक पहुँच जाता है। वहाँ उस बच्चे को अपनी बीमार माँ को दवाई पिलाते हुए देखकर द्रवित हो जाता है और उसकी आँखें नम हो जाती है। वह मन ही मन सोचता है कि जिस देश का बचपन ऐसा हो उस देश की जवानी क्या होगी ?

कर्तव्य

एक गरीब महिला अपने बेटे के साथ नदी से लगी हुई रेल्वे लाइन के ब्रिज के पास झोपड़े में रहती थी। एक दिन रात में दो बजे के आसपास तेज आवाज हुई जिससे उसकी नींद खुल गई वह देखने के लिए उठ बैठी कि यह अजीब सी आवाज किस बात की है। उस समय वर्षा ऋतु का मौसम था और तेज बरसात हो रही थी। वह यह देखकर चौंक गई कि नदी पर बना रेल्वे का ब्रिज नदी के प्रवाह के कारण आधा झुककर टूट गया था। यह देखते ही उसकी नींद गायब हो गई और उसके होश उड़ गये क्योंकि आधा घंटे के बाद एक ट्रेन को वहाँ से गुजरना था। उसने तुरंत अपने बेटे को उठाया और इस घटना के बारे में बताया अब दोनो के मन में यह चिंता हो रही थी कि बीस पच्चीस मिनिट के बाद वहाँ से निकलने वाली गाड़ी को कैसे रोका जाए अन्यथा वह गंभीर हादसे की शिकार हो जायेगी और सैकडों लोगो को जान माल से हाथ धोना पड़ेगा।

ट्रेन को रोकने का एक ही उपाय था कि लाल रोशनी इस प्रकार से बताई जाए ताकि ड्राइवर सचेत होकर गाड़ी को रोक दे, परंतु यह कैसे हो वे मन ही मन सोच रहे थे। वृद्धा के मन में आया कि उनकी जो खटिया है उसको जलाकर उसकी जो लाल रंग की साड़ी है उसके हिला हिला कर दिखाया जाए उस रेल्वे लाइन के पास एक टीला था और वे दोनों बिना समय गंवाए अपनी खटिया को खींचकर टीले पर ले जाते है। उसमें आग लगाकर उसको ऊँचा करके उसकी रोशनी में एक डंडे में साडी लपेटकर इस प्रकार हिलाना शुरू किया कि ड्राइवर को वह नजर आ जाये और वह सावधान हो जाए।

रात के अंधेरे में गाडी अपनी दु्रत गति चल रही थी तभी ड्राइवर और उसका सह चालक दोनों ने यह दृश्य देखा और सह चालक ने ड्राइवर से कहा कि लगता है कोई डाकुओ का गिरोह यहाँ पर क्रियाशील है और रात्रि का लाभ उठाकर ट्रेन को रोकना चाहते है। ट्रेन का ड्राइवर उससे सहमत नहीं था उसने स्वविवेक से ट्रेन को रोकने का निर्णय लेकर इमरजेंसी ब्रेक लगाकर ट्रेन को रोक दिया। ट्रेन रूकते ही वह महिला और उसका बेटा खुशी से पागल होकर दौड़ते हुए जाकर ट्रेन के ड्राइवर को आगे होने वाली संभावित दुर्घटना से अवगत कराते है।

अब चालक दल यह सुनकर ट्रेन से उतरकर नीचे आता है, और दस फीट आगे जाने के बाद ही टूटे हुये पुल को देखता है तो उनके होशोहवास गायब हो जाते है और वो महिला और उसके बेटे के प्रति उनके चरणों में प्रणाम करते हुए आभार व्यक्त करते है। ट्रेन में सवार यात्रियों को जब यह पता चलता है कि इन दो लोगों के कारण आज उनकी जान बच गई तो उन्हें अकल्पनीय खुशी होती है और वे सच्चे दिल से माँ बेटे के प्रति आभार व्यक्त करते हुए अपनी दुआएँ देते है। जब इस घटना की खबर रेलमंत्री को मिलती है ते वे अभिभूत होकर उन दोनों का सम्मान करते हुए लड़के को रेल्वे में नौकरी प्रदान कर देते है।

कर्म करे मालिक बनें

म.प्र. की संस्कारधानी जबलपुर शहर में सरल, सौम्य एवं समर्पित महिला श्रीमती पुष्पा बेरी ने अपने दृढ़ संकल्प एवं अपने अथक प्रयासों से जरूरतमंद महिलाओं के हित में जो कार्य किया है वह प्रशंसनीय एवं वंदनीय है। उन्होंने सहकारिता के क्षेत्र में लिज्जत पापड़ का उत्पादन करके आज लगभग 3500 महिलाओं को रोजगार उपलब्ध करवाकर उन्हें स्वावलंबी एवं आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में गति प्रदान की है। देश में सहकारिता के क्षेत्र में गुजरात के अमूल उद्योग के समान ही लिज्जत पापड़ के निर्माण ने भी अपनी अलग पहचान बनाई है। इतनी अधिक संख्या में महिलाओं से कार्य करवाना और उनका लेखा जोखा रखना अपने आप में चुनौती है। संस्था को प्राप्त शुद्ध लाभ में से शतप्रतिशत राशि इन महिलाओं को उनके कार्य के अनुसार बांट दी जाती है। अभी तक संस्था के द्वारा 80 करोड़ से भी अधिक राशि बोनस के रूप में संस्था में कार्यरत महिलाओं को दी जा चुकी है। संस्था बेवजह के फिजूलखर्ची को नियंत्रित करके कहीं पर भी अपना विज्ञापन नहीं देती है।

श्रीमती बेरी का सिद्धांत है कि जो काम करे वही मालिक, जितनी मेहनत करो उतने लाभ के हकदार बनो। आज बेरोजगारी को हटाना और मानव शक्ति का समुचित उपयोग करना हमारे देश की वर्तमान आवश्यकता है। मशीनों से आधुनिकीकरण उतना ही करना चाहिए जिससे उत्पादन में गति एवं गुणवत्ता आ सके। जीवन में सफलता तभी प्राप्त होती है जब आत्मविश्वास, कडी मेहनत एवं ईमानदारी का साथ हो। आज युवा पीढी को किसी भी उद्योग के प्रारंभ करने से पहले उसकी गहराई तक उसे स्वयं पहुँचना होगा। यदि आप पानी के किनारे बैठकर तैरना चाहेंगे तो यह संभव नहीं है, आपको कूदना ही पड़ता है। वे युवा पीढी को अपना संदेश देती है कि हमारा उद्देश्य देश और समाज के हित में काम करना होना चाहिए। देश में करोडों जरूरतमंद लोग है जिनके सुख के लिए हम चुनौतियों को स्वीकार करते है और इसी से हमें मन की शांति प्राप्त होती है। यदि हमारे पास धन है किंतु शांति नहीं है तो वह धन हमारे किसी काम का नहीं हैं। उनका कथन है कि आपको आपके दो हाथ ही मंजिल तक ले जा सकते है। कभी भी दूसरों से यह अपेक्षा मत करो कि वे तुम्हें मंजिल तक ले जायेंगे। लिज्जत पापड़ गृह उद्योग स्वरोजगार के माध्यम से आगे बढ़ने के इच्छुक लोगों की मदद करने हेतु सदैव तैयार है और इसके लिए संस्था अपना तकनीकी सहयोग निशुल्क देने के लिए सदैव तत्पर है।

वन्य जीव संरक्षण

रामसिंह नाम के एक जमींदार को शिकार का बहुत शौक था। वह प्रायः वनों में वन्य जीवों की खोज में घूमा करता था। एक दिन वह जंगल में शिकार हेतु गया और अचानक उसे एक हिरनी नजर आयी और उसने बंदूक उठाकर उसकी ओर निशाना साधा परंतु वह हिरनी खतरा भांपकर भी वहाँ पर खडी थी। यह देखकर रामसिंह को काफी अचरज हुआ और उसने आगे बढकर देखना चाहा तो वह दृश्य देखकर हतप्रभ रह गया। वह अपने बच्चे को वह दुग्धपान करा रही थी और उसका बच्चा भूखा ना रह जाये इस चिंता में उसे अपनी जान की भी परवाह नहीं थी।

यह दृश्य देखकर रामसिंह को अपने बचपन की याद आ गयी जब वह अपनी माँ की गोद में बैठकर वात्सल्य सुख लेता था। उसकी गलतियों को भी माँ नजर अंदाज कर देती थी और वह एक पल भी अपनी माँ की आँखों से दूर हो जाता था तो वह विचलित होकर पूरे घर को सिर पर उठा लेती थी। उसको अपनी माँ के प्रति प्रेम और श्रद्धा का मन में स्मरण हो आया और उसकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। वह अपनी माँ की याद में इतना भाव विह्वल हो गया कि उसे यह भी याद नहीं रहा कि कब उसके हाथ से बंदूक छूटकर जमीन पर गिर गयी और उसने उस हिरनी के शिकार का इरादा त्याग दिया। वह उन दोनों को जाते हुए तब तक देखता रहा जब तक कि वे आँखों से ओझल नहीं हो गये।

रामसिंह घर वापिस आता है तब तक उसका हृदय परिवर्तन हो चुका था। उसने निरीह एवं मासूम वन्य प्राणियों को मारने की प्रवृत्ति का मन से त्याग कर दिया अब उसने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि वह वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कार्य करेगा और एक शिकारी से वन्य जीव संरक्षक बनकर जीवन यापन करने लगा।

महानता

एक बार पश्चिम बंगाल के कई जिलों में वर्षा ना होने के कारण सूखा एवं अकाल पड़ गया था। एक समाजसेवी व्यक्ति गरीबों की मदद के लिए आगे आया और वह अपने स्वयं के धन से यथासंभव भूखे लोगों को भोजन कराता था। एक दिन इसी दौरान एक बालक उसके पास आया और बोला कि सेठ जी मुझे कृपा करके आठ आने दान में दे दीजिये। सेठ जी के पूछने पर उसने बताया कि चार आने का वह स्वयं भोजन करेगा और बाकी के चार आने अपनी माँ को जाकर दे देगा। सेठ जी यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गये और उन्होंने खुश होकर उसे दस रूपये दे दिये और कहा कि अब तुम्हें दो तीन माह तक भीख माँगने की जरूरत नहीं होगी और तुम अपने परिवार के लिए रोटी का प्रबंध आराम से कर लोगे। वह रूपये पाकर बहुत खुश हुआ और सेठ जी को धन्यवाद देकर उनके पांव छूकर उनके प्रति अपना आदर व्यक्त करते हुए चला गया।

अब लगभग दो वर्ष के बाद वे सज्जन पश्चिम बंगाल के उस शहर मिदनापुर में वापिस आये और उसी स्थान जहाँ उन्होंने उस बच्चे को रूपये दिये अकस्मात पहुँच गये। वहाँ पर उसी समय एक बालक ने आकर उनके पांव पकड़कर उनसे निवेदन किया कि आप मेरी अनाज बेचने की दुकान पर पधारकर मेरे परिवार को आशीर्वाद देने की कृपा करे। उस व्यक्ति ने आश्चर्य से पूछा कि तुम कौन हो भाई और मुझसे तुम्हारी यह अपेक्षा क्यों है ? उस लड़के ने बताया कि महोदय मैं वही लड़का हूँ जिसने आपसे आठ आने माँगे थे, और आपने उसकी एवज में दस रूपये दे दिये थें। मेरे परिवार ने उसमें से एक रूपये भोजन में खर्च किया और बाकी बचे नौ रूपये से अनाज के व्यापार का काम शुरू कर दिया था। प्रभु की कृपा और आपके आशीर्वाद से हमारा काम दिन दूनी और रात चौगुनी प्रगति करने लगा। हमने यह दुकान भी खरीद ली है, आपके चरण कमल पडेंगें तो हम और भी अधिक मेहनत करके जीवन में सफल होंगे। वह व्यक्ति उसका अनुरोध स्वीकार करके उसके साथ उसकी दुकान पर गया, जहाँ उसका पूरा परिवार उनके प्रति कृतज्ञ था। वह व्यक्ति और कोई नहीं सुप्रसिद्ध समाज सेवी ईश्वरचंद विद्यासागर थे।

समानता का अधिकार

एक वृक्ष जो उम्रदराज हो चुका था और कभी भी जमीन पर धराशायी होने की स्थिति में था। वह अपनी जवानी के दिनों को याद कर रहा था जब उसकी चारों दिशाओं में फैली हुई शाखाओं के नीचे पथिक आराम करते थे और बच्चे फलों का आनंद लेते थे। एक वृद्ध व्यक्ति उसके तने का सहारा लेकर विश्राम करने लगा। वह मन ही मन सोच रहा था कि उसका एक पुत्र और पुत्री दो बच्चे है। उसने अपने पुत्र पर पुत्री की अपेक्षा अधिक ध्यान दिया, उसे उच्च शिक्षा दिलायी और एक कुलीन परिवार में विवाह भी कराया। उसे अपने पुत्र से काफी आशायें थी परंतु वह इतना निकम्मा और चालाक निकला कि पिता की सब संपत्ति हड़प कर उन्हें ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया कि वे स्वयं घर छोड़कर कही अन्यत्र अपना बसेरा की तलाश कर ले। ऐसे कठिन समय में उनकी बेटी व दामाद उन्हें सम्मानपूर्वक अपने घर ले आये और सेवा सुश्रुषा सब करते हुए उनसे पुराने बातों को भूल जाने का आग्रह करते थे। उन्हें जानकारी मिली की उनका बेटा व बहू नौकरी के सिलसिले में अमेरिका चले गये है। अब दिन ढलने का समय हो गया था और वह वृद्ध व्यक्ति वापिस अपनी बेटी के घर चला गया।

उस रात अचानक ही उसकी तबीयत खराब हुई और अथक प्रयासों के बाद भी उसकी प्राणरक्षा संभव नहीं हो सकी और रात में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसकी बेटे को इसकी सूचना दी गई तो उसने अपनी नौकरी से छुट्टी ना मिलने की बात कहकर वापिस आने से मना कर दिया। दूसरे दिन उसका अंतिम संस्कार एवं समस्त परंपरायें उसकी बेटी के द्वारा संपन्न की गई। श्मशान घाट में अग्निदाह देने के उपरांत सभी लोग चले गये केवल उसकी लड़की दुखी मन से अपने पिता के साथ बिताये हुये दिनों की याद करते हुए उनकी जलती हुई चिता को एकटक देख रही थी। जब काफी समय व्यतीत हो गया तो उसका पति ने उसके कंधे पर हाथ रखकर धीरे से समझाते हुए कहा कि जो चला गया वह अब वापिस नहीं आयेगा, आओ अब हम वापिस चले। वह इतना कहकर उसे सांत्वना देते हुए अपने सीने से लगाकर उसकी अश्रुपूर्ण आंखें से आंसुओं को पोंछते हुए वे देने वापिस अपने घर की ओर चले जा रहे थे। इससे यह जनसंदेश मिलता है कि आज के वर्तमान युग में पुत्री किसी भी रूप में पुत्र से कम नहीं होती और दोनों में भेद करना समाप्त होना चाहिए।

शिक्षा ही स्वर्णिम भविष्य का आधार

श्रीमती डॉ. शशिबाला श्रीवास्तव जो कि एक शिक्षाविद् एवं मो.ह.गृहविज्ञान महाविद्यालय जबलपुर की प्राचार्या भी है, उनका कथन है कि शिक्षा ही सफलता का मूलमंत्र है। उनके अनुसार शिक्षा का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। यह विशेष रूप से भारतीय नारियों के लिये बहुत आवश्यक हैं।

मेरे मन में बचपन से ही नारी जगत के लिये क्रांतिकारी विचार रहे है। मैं अपने बाल्यकाल में भी सदा ही लड़कियों को लडकों के समकक्ष मानती थी। मुझे ऐसा लगता था कि लड़कियों में लड़कों से अधिक सहनशीलता, क्षमता, योग्यता एवं रचनात्मकता होती है। नारी अपने आप में परिपूर्ण होती है और उसमें पुरूष वर्ग को जीवन के हर क्षण में अपनी सलाह एवं सहारा देने की योग्यता रहती है। मेरे विचार से इस क्षमता के पीछे उसका आत्मविश्वास होता है जो कि उसके शिक्षित होने पर और भी सुदृढ़ हो जाता है।

मेरे जीवन में भी शिक्षा को लेकर एक बार बहुत विघ्न आया था। मैं एम.एस.सी. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के पश्चात पी.एच.डी. करना चाहती थी और मुझे दाखिला भी मिल रहा था किंतु मेरे ही घर के एवं आस पडोस के लोगों से मुझे हतात्साहित करते हुये अपनी सलाह दी कि पी.एच.डी. करने से तुम्हें क्या लाभ प्राप्त होगा ? यह तो समय की बर्बादी ही होगी। हमारे घर में पिता के ना रहने एवं आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने के कारण मेरी माँ के रिश्तेदारों ने सलाह दी कि इसकी शादी कर दो क्योंकि यह ज्यादा पढेगी तो लड़के ढूँढने में परेशानी होगी, दहेज की माँग भी ज्यादा होगी तो उसका इंतजाम कैसे करेंगें।

मेरी माँ ने इसका जो उत्तर दिया, वह मुझे आज भी याद है। उन्होंने कहा था कि मेरी बेटी पढ़ना चाहती है तो मैं उसे पढाऊँगी जीवन में कितनी भी कठिनाईयाँ आ जाये यह मेरी अंतिम फैसला है। उनके इस एक वाक्य के कथन ने मुझे जो हिम्मत, सहारा और मार्गदर्शन दिया वह मैं शब्दों में नहीं बता सकती हूँ। मुझे यू.जी.सी. की स्कॉलरशिप मिली जिससे मेरी पढाई आसान हो गई। मैंने चार साल में थीसिस जमा की एवं मुझे एक शासकीय महाविद्यालय में अस्सिटेंट प्रोफेसर की नौकरी मिल गई।

आज मैं प्राचार्य के पद पर कार्य कर रही हूँ और जब मैं चिंतन करती हूँ तो मुझे महसूस होता है कि यदि उस समय मेरी माँ ने मेरा साथ ना दिया होता तो मैं आज जिस मुकाम तक पहुँची हूँ, यहाँ तक नहीं पहुँच पाती। मेरा युवा छात्र छात्राओं से अनुरोध है कि वे शिक्षा के महत्व को समझे क्योंकि आपके स्वर्णिम भविष्य निर्माण और निर्धारण इसी पर निर्भर है।

सब दिन होत ना एक समाना

हरीशचंद नगर के एक सफल व्यवसायी माने जाते थे, जिनका व्यापार दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति कर रहा था। उनकी धर्मपत्नी एक बहुत ही विदुषी एवं जागरूक महिला थी। वे अक्सर अपने पति को कहती थी कि ईश्वर कृपा से अभी अपना समय बहुत अच्छा चल रहा है तुम्हारी आमदनी को देखते हुए मैं तुम्हें सुझाव देना चाहती हूँ कि तुम अपनी आय का एक बडा हिस्सा सुरक्षित रखो। जीवन में वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता और ना जाने कब व्यापार में उतार-चढ़ाव आ जाये तब वह संचित धन तुम्हारे बहुत काम आयेगा। हरीशचंद यह सुनकर हंसकर कह देता था कि अभी क्या जल्दी है। हम कुछ दिनों के बाद तुम्हारे सुझाव को मानकर रूपये इकट्ठा करना शुरू कर देंगे। तुम चिंता मत करो तुम तो अभी केवल खाओ, पियो और मौज करो। अपने आप को खुश रखो और मुझे भी शांति से रहने दो। इस तरह समय बीतता गया और हरीशचंद ने अपनी पत्नी की बातों को नजर अंदाज कर दिया।

कुछ वर्षों के बाद आर्थिक मंदी के कारण बाजार में व्यापार ठप्प पडने लगा। इसका असर हरीशचंद के व्यापार पर भी हुआ और उसकी बिक्री कम होने के साथ-साथ उसके द्वारा बाजार में अन्य व्यापारियों को दिया हुआ उधार भी समय पर वापिस ना आ पाया, उसके द्वारा अपने मित्रों को दिया गया धन भी उसके वापिस माँगने पर उसे नहीं मिला। इस प्रकार इन सब परिस्थितियों के कारण हरीशचंद को व्यापार में घाटा होने लगा क्योंकि वह अपने व्यापार में आवश्यक पूंजी का विनिवेश नहीं कर पा रहा था। वह बहुत चिंतित और परेशान था और उसे अब अपनी पत्नी के द्वारा दिये गये सुझाव को ना मानने के कारण पछतावा हो रहा था। इन्हीं चिंताओं के कारण उसका स्वास्थ्य भी गिरता जा रहा था और एक दिन उसकी पत्नी के पूछने पर उसने अपनी व्यथा से उसे अवगत करा दिया। उसने बडे प्रेम से अपने पति से पूछा कि तुम्हें अपने व्यापार को संभालने एवं सुचारू रूप से चलाने के लिए कितने धन की आवश्यकता है। हरीशचंद मायूस होकर बोला कि मुझे 20 लाख रू की तुरंत आवश्यकता है। यदि कही से इसका इंतजाम हे जाये तो मैं विपरीत परिस्थितियों में भी अपने व्यापार को घाटे से उबार लूँगा। उसकी पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा कि बस इतनी सी बात के लिए तुम इतने चिंतित हो मैंने तुम्हारे द्वारा दिये गये घरखर्च में से रकम बचाकर इकट्ठी की हुई है वह मैं तुम्हें दे रही हूँ। यह देखकर हरीशचंद को पुनः अपनी गलती का अहसास हुआ कि उसे सही समय पर धन संचित करके रखना चाहिए था आज उसकी पत्नी की बुद्धिमानी एवं दूरदर्शिता ने ना केवल उसकी साख बचा ली बल्कि उसके व्यापार को भी सहारा दे दिया।

सकारात्मक सोच

सेठ मनोहरलाल श्रीनगर के एक प्रसिद्ध व्यवसायी थे जिनका कालीन बनाने का बहुत बडा कारखाना था। उनका विदेशों में भी निर्यात होता था। एक बार संयोग से उन्हें विदेश में कालीन निर्यात करने का बहुत बडा सौदा प्राप्त हुआ और वे इसी के निर्माण में व्यस्त थे।

एक दिन अचानक ही नदी में बाढ़ आ जाने के कारण पूरा श्रीनगर जलप्लावन से घिर गया। इस प्राकृतिक आपदा में सैकडों लोग मारे गए एवं बहुत आर्थिक क्षति हुयी। इस प्राकृतिक आपदा के कारण सेठ मनोहरलाल का कारखाना भी नष्ट हो गया एवं उसमें काम करने वाले कुशल कर्मचारी भी मारे गए। गोदामों में पानी भर जाने के कारण सेठ जी द्वारा बनाया गया सारा माल भी खराब हो चुका था। इस समय वे भयंकर आर्थिक तंगी में आ गये थे और इस आपदा में उनका घर भी गिरकर तहस नहस हो चुका था। ऐसी विकट परिस्थितयों में एक दिन राहत शिविर में जब सेठ मनोहरलाल भोजन कर रहे थे तो उनके एक परिचित व्यापारी मित्र ने पूछा कि भाई साहब ऐसी विकट परिस्थिति में जबकि आपका सबकुछ नष्ट हो चुका है परंतु आपके चेहरे पर चिंता एवं दुख की कोई लकीर भी नजर नहीं आ रही है। इसका क्या कारण है ?

सेठ जी ने जवाब दिया कि जो कुछ होता है सब प्रभु इच्छा से होता है और हमें उसे स्वीकार करना ही होता है। प्रभु की कृपा से ही मैंने धन कमाने की कला सीखी है। इस प्राकृतिक आपदा में भले ही मेरा अत्यधिक आर्थिक नुकसान हो गया है परंतु जिस कला से मैंने इतना धन कमाया था वह कला नष्ट नहीं हुई है और अभी भी मेरे दिल और दिमाग में बसी हुई है। मैं पुनः इसके माध्यम से अपने व्यवसाय को आरंभ करूँगा और एक दिन अपने को पुर्नस्थापित करके बता दूँगा। सेठ मनोहरलाल की यह बात सुनकर उनके मित्र को इस दुखद घडी में बहुत सांत्वना मिली और ऐसी सकारात्मक सोच से उसके मन में भी अपने व्यवसाय को पुनः स्थापित करने की हिम्मत पैदा हो गयी।

आत्मसम्मान

” मैंने चोरी नहीं की है, मुझे आपकी चूड़ियों के विषय में कोई जानकारी नहीं है। मुझे पुलिस के हवाले मत कीजिए, वे लोग मुझे बहुत मारेंगे, मैं चोर नहीं हूँ, गरीबी की परिस्थितियों के कारण आप के यहाँ नौकरी कर रहा हूँ। ऐसा अन्याय, माँ जी मेरे साथ मत कीजिए। मेरे माता-पिता को पता होगा तो वे बहुत दुखी होंगे। “ मानिक नाम का पंद्रह वर्षीय बालक रो-रो कर, एक माँ जी को अपनी सफाई दे रहा था। वह घर का सबसे वफादार एवं विश्वसनीय नौकर था।

माँ जी की सोने की चूड़ियाँ नहीं मिल रही थी। घर के नौकरों से पूछताछ के बाद भी जब कोई समाधान नहीं निकला तो पुलिस को सूचना देकर बुलाया गया। पुलिस सभी नौकरों को पूछताछ के लिए थाने ले गई। उन्हें सबसे ज्यादा शक मानिक पर ही था क्योंकि वही सारे घर में बेरोकटोक आ जा सकता था। पुलिस ने बगैर पूछताछ के अपने अंदाज में उसकी पिटाई चालू कर दी। वह पीड़ा से चीखता चिल्लाता रहा परंतु उसकी सुनने वाला कोई नहीं था। इसी दौरान अचानक ही बिस्तर के कोने में दबी हुई चूड़ियाँ दिख गई, उनके प्राप्त होते ही पुलिस को सूचना देकर सभी को वापिस घर बुला लिया गया।

मानिक मन में संताप लिये हुए, आँखों में आँसू, चेहरे पर मलिनता के साथ दुखी मन से घर पहुँचा और तुरंत ही अपना सामान लेकर नौकरी छोड़ने की इच्छा व्यक्त करते हुए सबकी ओर देखकर यह कहता हुआ कि उसके साथ आप लोगों ने अच्छा व्यवहार नहीं किया, उसके मान सम्मान को ठेस पहुँचाकर एक गरीब को बेवजह लज्जित किया है। मुझे लग रहा था कि मानिक की आँखें मुझसे पूछ रही हों कि क्या गरीब की इज्जत नहीं होती ? क्या उसे सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार नहीं है ? उसकी सच बातों को भी झूठा समझकर उसे क्यों अपमानित किया गया ? यह जानकर परिवार के सभी सदस्यों ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए उसे नौकरी नहीं छोड़ने का निवेदन किया। वह यह देखकर कि उसके मालिक के द्वारा स्वयं माफी माँगी जा रही है। वह हतप्रभ एवं द्रवित होकर नौकरी छोड़ने का विचार छेड़ देता है।

दिशा बोध

जबलपुर के प्रसिद्ध उद्यमी, व्यवसायी एवं गांधीवाद के अनुयायी स्वर्गीय मुलायमचंद जी जैन के पुत्र श्री अरूण जैन भी उद्योगपति के साथ साथ समाजसेवा में भी सदैव अग्रणी रहते है। वे महाकौशल चेंबर ऑफ कामर्स के आधार स्तंभ रहे है। वे एक मिलनसार, धैर्यवान एवं स्पष्टवादी व्यक्तित्व के धनी है। उनसे चर्चा होने पर उन्होंने बताया कि उनके जीवन में प्रेरणास्त्रोत उनके पिताजी रहे है, जिनके अनुभवों एवं विचारों की स्पष्ट छाप उनके व्यक्तित्व में झलकती है। अरूण जी का मानना है कि दूसरों के लिये जीना और उनके हित के लिये समर्पित रहना ही जीवन है। वे जब महाकौशल चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष थे तब जबलपुर के औद्योगिकीकरण के लिये विशेष रूप से प्रयासरत रहते थे। आज भी उद्योग से संबंधित जो भी अतिथि नगर में आते है, उनसे आत्मीयता से मिलकर विचार विमर्श कर नगर के औद्योगिकीकरण के विकास पर चर्चा करना उनके जीवन का एक अभिन्न्न अंग है। वे अतिथि देवो भवः की भावना का हमेशा पालन करते है। वे बताते है कि :-

“मैंने अपनी कल्पना के छोटे से फलक पर सागर की विभिन्न छवियों को अंकित करने का प्रयास किया है। प्रातः के धुंधलके में, दोपहर की खिली धूप में, ढलती शाम और चढ़ती रात के गहरे अंधेरे में, मैंने सागर के हर रंग को और उसकी हर तरंग को देखा है। सागर विश्वास-धैर्य-सहनशीलता का है, और सचमुच सागर है। वह जरा भी कम नहीं है। मैंने सागर को गागर में भरने का एक प्रयास किया है।“

उनके जीवन में सर्वधर्म समभाव एवं गांधीवादी विचारधारा के अद्भुत संगम का प्रभाव गहराई से विद्यमान है। एक ओर जहाँ वे पूज्य स्वामी स्वरूपानंद जी के अनुयायी है, वहीं दूसरी ओर मानस मर्मज्ञ पंडित रामकिशन जी महाराज के प्रवचनों का कार्यक्रम शहर में आयोजित करने में अपना पूर्ण सहयोग देते रहे है। वे जब भी हताशा, निराशा या हीनता की भावना से ग्रसित होते है तो वे अपने स्वर्गीय पिता के अनुभवों से प्रेरित हेकर इन कठिनाईयों से उबरने का प्रयास करते है। उनके मित्र सदा उन्हें मार्गदर्शन के साथ ही उचित दिशा बोध भी देते रहते है। इससे उन्हें धैर्य, संयम और सहनशीलता का बल मिलता है जो कि विषम परिस्थितियों में भी कार्य को संपादित करने की प्रेरणा देता है। वे मानते है कि यह उनके जीवन की बहुत बडी उपलब्धि है और वे सदैव सद्गुणों को अपने जीवन में उतारने और उनको आचरण में लाने हेतु प्रयासरत रहते है।

वे युवा वर्ग के लिये संदेश देते है कि आज के समय में ऐसे बिरले व्यक्ति ही होते है जो अपने पराये के सुख दुख में आत्मीय बन जाते है। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे कई अड़चनों के बीच महत्वपूर्ण सामाजिक, व्यवसायिक कार्य सफलतापूर्वक कैसे किये जा सकते हैं, यह प्रेरित करने वाली सीख मिली। यदि किसी पर विश्वास किया है तो पूरा भरोसा रखो, विश्वास डगमगाये, धैर्य टूटे नहीं ऐसा अपने व्यक्तित्व का विकास करो कि आप कर्म करो, फल की चिंता मत करो।

विद्यादान

परिधि एक संभ्रांत परिवार की पुत्रवधू थी। वह प्रतिदिन अपने आस-पास के गरीब बच्चों को निशुल्क पढ़ाती थी। उसकी कक्षा में तीन चार दिन पहले ही एक बालक बब्लू आया था। बब्लू की माँ का देहांत हो चुका था और पिता मजदूरी करके किसी प्रकार अपने परिवार का पालन पोषण करते थे। वह प्रारंभिक शिक्षा हेतु आया था। बब्लू शिक्षा के प्रति काफी गंभीर था। वह मन लगाकर पढ़ना चाहता था।

एक दिन अचानक ही उसका पिता नाराज होता हुआ आया और बच्चे को कक्षा से ले गया। वह बड़बडा रहा था, कि मेडम आपके पढ़ाने का क्या औचित्य है, मैं गरीब आदमी हूँ और स्कूल की पढ़ाई का पैसा मेरे पास नहीं है। इसे बड़ा होने पर मेरे समान ही मजदूरी का काम करना है। यह थोडा बहुत पढ़ लेगा तो अपने आप को पता नहीं क्या समझने लगेगा। हमारे पड़ोसी रामू के लड़के को देखिए बारहवीं पास करके दो साल से घर में बैठा है। उसे बाबू की नौकरी मिलती नहीं और चपरासी की नौकरी करना नहीं चाहता क्योंकि पढ़ा लिखा है। आज अच्छी अच्छी डिग्री वाले बेरोजगार है जबकि बिना पढ़े लिखे, छोटा मोटा काम करके अपना पेट पालने के लायक धन कमा लेते हैं। आप तो इन बच्चों को इकट्ठा करके बडे-बडे अखबारों में अपनी फोटो छपवाकर समाजसेविका कहलाएँगी परंतु मुझे इससे क्या लाभ? इतना कहते हुए वह परिधि की समझाइश के बाद भी बच्चे को लेकर चला गया।

एक माह के उपरांत एक दिन वह बच्चे को वापिस लेकर आया और अपने पूर्व कृत्य की माफी माँगते हुए बच्चे को वापिस पढ़ाने हेतु प्रार्थना करने लगा। परिधि ने उससे पूछा कि ऐसा क्या हो गया है कि आपको वापिस यहाँ आना पड़ा? मैं इससे बहुत खुश हूँ कि आप इसे पढ़ाना चाहते हैं, पर आखिर ऐसा क्या हुआ?

बब्लू के पिता ने बताया कि एक दिन उसने लाटरी का एक टिकट खरीद लिया था, जो एक सप्ताह बाद ही खुलने वाला था। इसकी नियत तिथि पर सभी अखबारों में इनामी नंबर की सूची प्रकाशित हुयी थी। उसने एक राहगीर को समाचार पत्र दिखाते हुए अपनी टिकट उसे देकर पूछा कि भईया जरा देख लो ये नंबर भी लगा है क्या? मैं तो पढ़ा लिखा हूँ नहीं, आप ही मेरी मदद कर दीजिए। उसने नंबर को मिलाते हुए मुझे बधाई दी कि तुम्हें पाँच हजार रूपए का इनाम मिलेगा परंतु इसके लिए तुम्हें कार्यालय के कई चक्कर काटने पडेंगे तब तुम्हें रकम प्राप्त होगी। यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हें पाँच हजार रूपए देकर यह टिकट ले लेता हूँ और आगे की कार्यवाही करने में स्वयं सक्षम हूँ। यह सुनकर मैंने पाँच हजार रूपए लेकर खुशी खुशी वह टिकट उसको दे दी और अपने घर वापस आ गया।

उसी दिन शाम को मेरा एक निकट संबंधी मिठाई फटाके वगैरह लेकर घर आया। उसने मेरी टिकट का नंबर नोट कर लिया था। मुझे बधाई देते हुए उसने कहा कि तुम बहुत भाग्यवान हो, तुम्हारी तो पाँच लाख की लाटरी निकली है। मैं यह सुनकर अवाक रह गया। जब मैंने उसे पूरी आप बीती बताई तो वह बोला कि अब हाथ मलने से क्या फायदा यदि तुम कुछ पढ़े लिखे होते तो इस तरह मूर्ख नहीं बनते इसलिए कहा जाता है कि जहाँ सरस्वती जी का वास होता है वहाँ लक्ष्मी जी का निवास रहता है। यह कहकर वह दुखी मन से वापस चला गया।

“ मैं रात भर सो न सका और अपने आप को कचोटता हुआ सोचता रहा कि बब्लू को शिक्षा से वंचित रखकर मैं उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहा हूँ। मैंने सुबह होते होते निश्चय कर लिया था कि इसको तुरंत आप के पास लाकर अपने पूर्व कृत्य की माफी माँगकर आपसे अनुरोध करूँगा कि आप जितना इसे पढ़ा सके पढ़ा दे उसके आगे भी मैं किसी भी प्रकार से जहाँ तक संभव होगा वहाँ तक पढ़ाऊँगा।“ परिधि ने उसे वापिस अपनी कक्षा में ले लिया और वह मन लगाकर पढ़ाई करने लगा।

बीस वर्ष उपरांत एक दिन परिधि ट्रेन से मुंबई जा रही थी। रास्ते में टिकट निरीक्षक आया तो उसे देखते ही उसके चरण स्पर्श करके बोला, माँ आप कैसी है ? परिधि हतप्रभ थी कि ये कौन है और ऐसा क्यों पूछ रहा है? तभी उसने कहा कि आप मुझे भूल रही है, मैं वही बब्लू हूँ जिसे आपने प्रारंभिक शिक्षा दी थी। जिससे उत्साहित होकर पिताजी से अथक प्रयासों से उच्च शिक्षा प्राप्त करके आज रेल्वे में टिकट निरीक्षक के रूप में कार्यरत हूँ। परिधि ने उसे आशीर्वाद दिया एवं मुस्कुरा कर देखती रही। उसके चेहरे पर विद्यादान के सुखद परिणाम के भाव आत्मसंतुष्टि के रूप में झलक रहे थे।

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

नाम

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मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग 2 // राजेश माहेश्वरी
कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग 2 // राजेश माहेश्वरी
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