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कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग - 4 // राजेश माहेश्वरी

कहानी संग्रह

तर्जनी से अनामिका तक

( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )

राजेश माहेश्वरी

कहानी संग्रह //  तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )  // राजेश माहेश्वरी

पिछले भाग 3 से जारी...

अंतिम दान

सेठ रामसजीवन नगर के प्रमुख व्यवसायी थे जो अपने पुत्र एवं पत्नी के साथ सुखी जीवन बिता रहे थे। एक दिन अचानक उन्हें खून की उल्टी हुयी और चिकित्सकों ने जाँच के उपरांत पाया कि वे कैंसर जैसे घातक रोग की अंतिम अवस्था में हैं एवं उनका जीवन बहुत कम बचा है। यह जानकर उन्होंने अपनी सारी संपत्ति अपनी पत्नी एवं बेटे के नाम कर दी। कुछ माह बाद उन्हें महसूस हुआ कि उनके हाथ से बागडोर जाते ही उनकी घर में उपेक्षा आरंभ हो गई है। यह जानकर उन्हें अत्यंत दुख हुआ कि उन पर होने वाला दवाइयों, देखभाल आदि का खर्च भी सभी को एक भार नजर आने लगा है। जीवन का यह कड़वा सत्य उनके सामने था और एक दिन वे आहत मन से किसी को बिना कुछ बताये ही घर छोड़कर एक रिक्शे में बैठकर विराट हास्पिटल की ओर रवाना हो गये। किसी का भी वक्त और भाग्य कब बदल जाता है, इंसान इससे अनभिज्ञ रहता है।

रास्ते में रिक्शे वाले ने उनसे कहा कि यह जगह तो कैंसर के मरीजों के उपचार के लिये है यहाँ पर गरीब रोगी रहते है जिन होने वाला खर्च उनके परिवारजन वहन करने में असमर्थ होते हैं आप तो वहाँ पर दान देने जा रहे होंगे। मैं एक गरीब रिक्शा चालक हूँ परंतु मेरी ओर से भी यह 50 रू वहाँ दे दीजियेगा। सेठ जी ने रूपये लिये और उनकी आँखें सजल हो गयी।

उन्होने विराट हॉस्पिस में पहुँचकर अपने आने का प्रयोजन बता दिया। वहाँ के अधीक्षक ने अस्पताल में भर्ती कर लिया। उस सेवा संस्थान में निशुल्क दवाईयों एवं भोजन की उपलब्धता के साथ साथ निस्वार्थ भाव से सेवा भी की जाती थी। एक रात सेठ रामसजीवन ने देखा कि एक मरीज बिस्तर पर बैठे बैठे रो रहा है वे उसके पास जाकर कंधे पर हाथ रखकर बोले हम सब कि नियति मृत्यु है जो कि हमें मालूम है तब फिर यह विलाप क्यों? वह बोला मैं मृत्यु के डर से नहीं रो रहा हूँ। अगले सप्ताह मेरी बेटी की शादी होने वाली है मेरे घर में मैं ही कमॉंऊ व्यक्ति था अब पता नहीं यह शादी कैसे संपन्न हो सकेगी। यह सुनकर सेठ जी बोले कि चिंता मत करो भगवान सब अच्छा करेंगे तुम निश्चिंत होकर अभी सो जाओ। दूसरे दिन प्रातः सेठ जी ने अधीक्षक महोदय को बुलाकर कहा मुझे मालूम है मेरा जीवन कुछ दिनों का ही बाकी बचा है। यह मेरी हीरे की अंगूठी की अब मुझे कोई आवश्यकता नहीं है। यह बहुत कीमती है इसे बेचकर जो रूपया प्राप्त हो उसे इस गरीब व्यक्ति की बेटी की शादी में दे दीजिये मैं समझूँगा कि मैंने अपनी ही बेटी का कन्यादान किया है और बाकी बचे हुये धन को आप अपने संस्थान के उपयोग में ले लें। इस प्रकार सेठ जी ने अपने पास बचे हुये अंतिम धन का भी सदुपयोग कर लिया। उस रात सेठ जी बहुत गहरी निद्रा में सोये। दूसरे दिन जब नर्स उन्हें उठाने के लिये पहुँची तो देखा कि वे परलोक सिधार चुके थे।

चापलूसी

सेठ पुरूषोत्तमदास शहर के प्रसिद्ध उद्योगपति थे। जिन्होने कड़ी मेहनत एवं परिश्रम से अपने उद्योग का निर्माण किया था। उनका एकमात्र पुत्र राकेश अमेरिका से पढ़कर वापिस आ गया था और उसके पिताजी ने सारी जवाबदारी उसे सौंप दी थी। राजेश होशियार एवं परिश्रमी था, परंतु चाटुकारिता को नहीं समझ पाता था। वह सहज ही सब पर विश्वास कर लेता था।

उसने उद्योग के संचालन में परिवर्तन लाने हेतू उस क्षेत्र के पढ़े लिखे डिग्रीधारियों की नियुक्ति की, उसके इस बदलाव से पुराने अनुभवी अधिकारीगण अपने को उपेक्षित महसूस करने लगे। नये अधिकारियों ने कारखाने में नये उत्पादन की योजना बनाई एवं राकेश को इससे होने वाले भारी मुनाफे को बताकर सहमति ले ली। इस नये उत्पादन में पुराने अनुभवी अधिकारियों को नजरअंदाज किया गया।

इस उत्पादन के संबंध में पुराने अधिकारियों ने राकेश को आगाह किया था कि इन मशीनों से उच्च गुणवत्ता वाले माल का उत्पादन करना संभव नहीं है। नये अधिकारियों ने अपनी लुभावनी एवं चापलूसी पूर्ण बातों से राकेश को अपनी बात का विश्वास दिला दिया। कंपनी की पुरानी साख के कारण बिना सेम्पल देखे ही करोंडो का आर्डर बाजार से प्राप्त हो गया। यह देख कर राकेश एवं नये अधिकारीगण संभावित मुनाफे को सोचकर फूले नहीं समा रहे थे।

जब कारखाने में इसका उत्पादन किया गया तो माल उस गुणवत्ता का नहीं बना जो बाजार में जा सके। सारे प्रयासों के बावजूद भी माल वैसा नहीं बन पा रहा था जैसी उम्मीद थी और नये अधिकारियों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिये थे। उनमें से कुछ ने तो यह परिणाम देखकर नौकरी छोड़ दी। राकेश अत्यंत दुविधापूर्ण स्थिति में था। यदि अपेक्षित माल नहीं बनाया गया तो कंपनी की साख पर कलंक लग जाएगा। अब उसे नये अधिकारियों की चापलूसी भरी बातें कचोट रही थी।

राकेश ने इस कठिन परिस्थिति में भी धैर्य बनाए रखा तथा अपने पुराने अधिकारियों की उपेक्षा के लिए माफी माँगते हुए, अब क्या किया जाए इस पर विचार किया। सभी अधिकारियों ने एकमत से कहा कि कंपनी की साख को बचाना हमारा पहला कर्तव्य है अतः इस माल के निर्माण एवं समय पर भेजने हेतु हमें उच्च स्तरीय मशीनरी की आवश्यकता है, अगर यह ऊँचे दामों पर भी मिले तो भी हमें तुरंत उसे खरीदना चाहिये। राकेश की सहमति के उपरांत विदेशों से सारी मशीनरी आयात की गई एवं दिनरात एक करके अधिकारियो एवं श्रमिकों ने माल उत्पादन करके नियत समय पर बाजार में पहुँचा दिया।

इस सारी कवायद से कंपनी को मुनाफा तो नहीं हुआ परंतु उसकी साख बच गई जो कि किसी भी उद्योग के लिये सबसे महत्वपूर्ण बात होती है। राकेश को भी यह बात समझ आ गई कि अनुभव बहुत बड़ा गुण है एवं चापलूसी की बातों में आकर अपने विवेक का उपयोग न करना बहुत बड़ा अवगुण है और हमें अपने पुराने अनुभवी व्यक्तियों को कभी भी नजर अंदाज नहीं करना चाहिये क्योंकि व्यवसाय का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं होता यदि व्यवसाय को भावना से जोड़ दिया जाये तो इसका प्रभाव और गहरा होता है।

आपातकाल मेरे जीवन का स्वर्णिम काल

श्री अजय विश्नोई जबलपुर ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश में भा.ज.पा. के वरिष्ठ एवं महत्वपूर्ण नेताओं में अपना विशिष्ट स्थान रखते है। वे अपनी स्पष्टवादिता, ईमानदार व्यक्तित्व एवं नीतिगत राजनीति के लिये जाने जाते है। उनसे चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि उनके जीवन का स्वर्णिम काल आपातकाल के दौरान विभिन्न जेलों में बिताए हुए दिन है। उनकी बात सुनकर आश्चर्यचकित होकर मैंने उनसे पूछा यह कैसे संभव है और इन स्वर्णिम दिनों में आपके अनुभव जो कि देश के युवाओं के लिए शिक्षाप्रद हो बताने की कृपा करें। उनके द्वारा बताई गई घटनायें उन्ही के शब्दों में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

वे बोले कि 25 जून 1975 की रात पुलिस ने मीटिंग के बहाने बुलाकर 26 जून की सुबह उन्हें जबलपुर जेल पहुँचा दिया। इसके बाद उन्हें टीकमगढ जेल ( बुंदेलखंड ) पुनः वापिस जबलपुर जेल, जावरा जेल ( रतलाम ) और वापिस जबलपुर जेल भेजकर अंततः 29 जनवरी 1977 को रिहाई के साथ 19 माह 4 दिन की जेल यात्रा का समापन हुआ। मुझे 23 वर्ष की उम्र में ही मिला यह अनुभव जिससे मेरी राजनैतिक पहचान भी बनी और वह मेरे अभिन्न व्यक्तित्व का आज भी हिस्सा है। लोकतंत्र के इस काले अध्याय के तमाम कष्टों एवं यातनाओं के बावजूद मेरे जीवन का वह स्वर्णिम काल था।

मेरा कॉलेज जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ था और स्नातक की डिग्री भी प्राप्त नहीं हुई थी। मध्यप्रदेश के एकमात्र कृषि विश्वविद्यालय का छात्र नेता और जय प्रकाश नारायण के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की पृष्ठभूमि के कारण जेल यात्रा प्रारंभ हो गई और 1 अगस्त 1975 को हम 8 लोगो को टीकमगढ जेल ( बुंदेलखंड ) भेज दिया गया।

यहाँ से मेरा स्वर्णिम काल प्रारंभ हुआ। हम 8 लोगों में tulaघ के कद्दावर नेता श्री बाबूराव परांजपे, एड. श्री निर्मलचंद जैन आदि शामिल थे। मैं उम्र में उन सबसे छोटा था। जनसंघ का इतिहास और राजनीति का पाठ पढने मुझे किताबों की आवश्यकता नहीं हुई क्योंकि चलता फिरता ज्वलंत इतिहास चौबीसों घंटे मेरे साथ था।

टीकमगढ जेल में हम 8 मीसा बंदियों को मिलने वाली सीमित सुविधाओं के कारण हमारा जीवन कष्टप्रद हो गया था। हमें ना ही सुबह की चाय समय पर मिलती थी और ना ही भर पेट भोजन की व्यवस्था थी। इन दोनो नेताअें की सहमति से जेल के बंदियों को मैंने प्रयास करके अपने साथ मिलाया और 15 अगस्त 1975 को बंदियो से जेलर का घेराव करा दिया। इसके उपरांत लगभग तीन घंटे के बाद जेलर को कैदियों की माँगें पूरी हो जाने के बाद उन्हें घेराव से मुक्त करा दिया गया था। इस आंदोलन से जेलर और जेल प्रशासन हमारी मुठ्ठी में आ गया था जिसके फलस्वरूप जेल से सभी सुविधायें हम मीसा बंदियों को मिलने लगी एवं जेल के खर्चे पर ही प्रति सप्ताह 100 रू की अपनी आवश्यकता की सामग्री बाजार से बुलाने की अनुमति भी मिल गयी।

मेरी अंग्रेजी बहुत कमजोर थी और एड. श्री निर्मलचंद जैन जो कि बाद में म.प्र. उच्च न्यायालय के महाधिवक्ता, सांसद एवं राजस्थान के राज्यपाल भी बने, वे अंग्रेजी के प्रकाण्ड विद्वान थे। टीकमगढ जेल के पुलिस अधीक्षक श्री आर्या के पास अंग्रेजी पुस्तकों का भंडार था। मुझे मानो गुरू और शिष्य दोनों मिल गये। मेरे पास समय ही समय था और मैंने इसका उपयोग अंग्रेजी भाषा को सीखने में व्यतीत किया । आज मैं जो कुछ भी अंग्रेजी जानता हूँ। वह इसी स्वर्णिम काल की देने है। मुझे जब वापिस जबलपुर जेल भेजा गया तो सेग्रीग्रेशन वार्ड के 100 मीसा बंदी साथियों के अंग्रेजी में लिखे स्वतंत्रता संग्राम से जुडे राजनैतिक पृष्ठभूमि की किताबों का अध्ययन कर हिंदी में अनुवाद कर भाषण देने लगा। इस प्रकार इतिहास को जानने, पढ़ने और बोलने का अभ्यास स्वतः ही हेता गया।

मैं ज्यादा दिन जबलपुर जेल में नहीं रूक पाया। मेरे पहुँचने के बाद मुझे मीसा बंदियों की दैनिक गतिविधियों का सूत्रधार और मुखिया मानकर पहले मुझे अलग करके कोढी बैरक में स्थानांतरित किया गया और अंततः नौ दिन के बाद जावरा जेल वापिस भेज दिया गया। इस यात्रा में जबलपुर के वर्तमान आधुनिक विजय नगर के विकासकर्ता, जबलपुर विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय विशाल पचौरी जी भी मेरे साथ थे।

जावरा जेल में मैं स्वतंत्र रहता था। मुझे ताले में बंद नहीं किया जाता था और इस दौरान वहाँ पर मुझे श्री लालचंद जी मित्तल ( महापौर, इंदौर ) एड. चितले, विष्णु शुक्ला उर्फ बड़े भैया का सान्निध्य मिला। इसके बाद हमें वापिस जबलपुर जेल भेज दिया गया। जहाँ हमने सिवनी, छिंदवाडा, नरसिंहपुर के मीसा बंदियों को वालीबॉल, कैरम, शतरंज जैसे खेल सिखाकर उनकी प्रतियोगितायें शुरू करा दी जिससे मनोरंजन के साथ साथ उनका समय भी अच्छा व्यतीत होने लगा। जेल में ही हमने समय समय पर धार्मिक आयोजनों का भी आयोजन कर हरे राम हरे कृष्ण का 21 दिनों का अखंड कीर्तन भी प्रारंभ करा कर जेल में एक अच्छे वातावरण के निर्माण की शुरूआत की । जेल से बाहर आते ही जनता पार्टी के चुनाव चिन्ह पर मैंने विधानसभा का चुनाव लडा और विजय हासिल की। इस दौरान मैंने राजनीति के मैदान में नेताओं के आर्शीवाद से अनेकों जवाबदारियों के निर्वहन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मेरा देश के युवाओं से अनुरोध है कि यदि वे राजनीति में आते है तो वे देश की उम्मीदों के द्वीपस्तंभ बनें।

धर्म और कर्म

एक दिन धर्म और कर्म में संवाद होने लगा कि उनमें से कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है। वे दोनों एक संत के पास पहुँचे और उनसे इस विषय पर मार्गदर्शन देने का अनुरोध करने लगे। संत जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि तुम दोनों एक दूसरे के पर्याय हो और एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है। यदि धर्म नहीं होगा तो कर्म सही दिशा में नहीं होगा वह दिग्भ्रमित हो जायेगा। यदि कर्म नहीं होगा तो धर्म की प्रधानता समाप्त हो जायेगी क्योंकि कोई भी कार्य धर्मपूर्वक होकर सही दिशा में ही हो इसका निर्धारण करना असंभव हो जायेगा।

इसलिये कहा जाता हैं कि धर्मपूर्वक कर्म करने से सृजन सही दिशा में होता है जिसका लाभ व्यक्ति, समाज और सबको प्राप्त होता है। अब तुम दोनों स्वयं निर्णय लो कि एक के बिना दूसरे का क्या अस्तित्व रहेगा। इसलिये कहा जाता है कि कलयुग में कर्म आगे और धर्म उसके पीछे और सतयुग में धर्म आगे और कर्म उसके पीछे रहता है। उन दोनों की स्थिति उस रेलगाडी के समान है जिसमें एक इंजिन और एक गार्ड रहता है और दोनों की सहमति के बिना रेलगाडी प्रस्थान नहीं कर सकती। उसी प्रकार मानव जीवन धर्मपूर्वक कर्म के बिना अपूर्ण है। संत जी की बात उनकी समझ में आ गयी और उनके मन से अभिमान समाप्त हो गया तथा वे पहले की तरह एक दूसरे के प्रति समर्पित हो गये।

सेवाभाव

राकेश नाम का एक व्यक्ति कान्हा नेशनल पार्क की एक होटल में कार्यरत् था। एक रात बहुत तेज बारिश हो रही थी और ऐसे खराब मौसम में रात के 11 बजे के आसपास एक कार आकर रूकी जिसमें से दो वृद्ध व्यक्ति निकल उसके होटल के काऊंटर पर आये जहाँ वह रिसेप्शन पर बैठा हुआ था। उन्होंने दो कमरे देने का अनुरोध किया। उसकी होटल में कोई भी कमरा खाली नहीं था। वह उन ग्राहकों को वापिस भी नहीं भेजना चाहता था। उसने उन्हें कहा कि भाई साहब होटल के सभी रूम बुक है। मैं आपको अपना बेडरूम उपयोग करने हेतु दे सकता हूँ। वह पूर्णतया व्यवस्थित एवं सर्वसुविधायुक्त है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके लिए वह कमरा आरामदायक रहेगा। उनमें से एक व्यक्ति ने पूछा कि तब आप कहाँ रहेंगें। उसने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया कि यह मेरा कर्तव्य है कि होटल में आये ग्राहक को कोई असुविधा ना हो और उसका ख्याल रखना हमारा नैतिक दायित्व है। उन दोनों आगंतुकों ने कमरे को देखकर सहर्ष ही वहाँ रहना स्वीकार कर लिया। राकेश रात भर रिसेप्शन पर ही किसी प्रकार विश्राम करता रहा परंतु उसने अपने मेहमान ग्राहकों को किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होने दी। दूसरे दिन सुबह उसे धन्यवाद देते हुए उन ग्राहकों ने उससे कमरे के भुगतान के लिए बिल माँगा। राकेश ने विनम्रतापूर्वक उनको कहा कि मैंने अपना व्यक्तिगत कमरा आपको उपयोग के लिए दिया था इसलिये बिल चुकाने का कोई प्रश्न ही नहीं है। उन ग्राहकों ने आश्चर्यचकित होकर पूछा कि फिर आपने यह कमरा हमें क्यों दिया ? राकेश बोला कि इतनी रात में आपको कही भटकना ना पडे और आपको कोई तकलीफ ना हो इसलिये मैंने अपना कमरा, आपको दे दिया था। मुझे आशा है कि अगली बार जब भी आप कान्हा आयेंगें तो हमारी होटल में रूककर हमें सेवा का अवसर अवश्य देंगे। वे दोनों सज्जन यह सुनकर उसे धन्यवाद देते हुए चले गये।

इसके पाँच वर्ष पश्चात गोवा की एक फाइव स्टार होटल में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति हेतु एक विज्ञापन प्रमुख समाचार पत्रों में छपा था। राकेश ने भी यह विज्ञापन देखा और उस पद के लिए अपना आवेदन भिजवा दिया। उसकी आशा के विपरीत उसे वहाँ से साक्षात्कार हेतु बुलाया गया। जब वह साक्षात्कार के लिए वहाँ पहुँचा तो कक्ष में प्रवेश करते ही अपने सामने बैठे दे सज्जनों को देखकर वह अपनी स्मृति पर जोर देने लगा कि उन्हें कहीं देखा हुआ है। वह सोच ही रहा था तभी उनमें से एक ने कहा कि राकेश जी आपकी नियुक्ति इस पद पर कर दी गई है। आपको इंटरव्यू देने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह नियुक्ति पत्र आप स्वीकार करें। यह सुनकर राकेश आश्चर्यचकित हो गया और पूछने लगा कि सर ऐसा क्यों किया जा रहा है ? वे बोले तुम्हारा इंटरव्यू तो उसी रात हो गया था जब तुमने हम लोगों को परेशानी में देखकर रात बिताने के लिए अपना कमरा निःशुल्क दे दिया था। हमें ऐसे ही योग्य एवं प्रतिभावान व्यक्ति की इस महत्वपूर्ण पद पर आवश्यकता थी जो कि पूरी हो गई है। अब राकेश को याद आया और वह कृतज्ञता व्यक्त करते हुए मन से ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए इस नये पद पर सेवारत हो गया।

अनुभूति

जबलपुर शहर के समीप पनेहरा गांव में दो मालगुजार हिम्मत सिंह और अवतार रहते थे। उन दोनों का स्वभाव बिल्कुल विपरीत था। हिम्मत सिंह सीधा सादा, मिलनसार एवं धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करने में विश्वास रखता था, जबकि अवतार सिंह अपनी अहंकार प्रदर्शन एवं विलासितापूर्ण जीवन में व्यस्त रहता था। वह मन ही मन हिम्मत सिंह की प्रसिद्धि एवं उसके मान सम्मान से जलता था और अप्रिय स्थिति निर्मित करने के लिए कभी कभी उसके खेत में मवेशियों को चराने के लिए भेज देता था। हिम्मत सिंह इन परिस्थितियों में भी संयम बरतते हुए चुपचाप अपना नुकसान सह लेता था। वह किसी प्रकार के अप्रिय विवाद में नहीं उलझना चाहता था।

एक दिन वर्षा ऋतु में तेज बारिश हो रही थी। अवतार सिंह को किसी जरूरी काम से शहर जाना था और वह तेजी से अपनी मोटर साइकिल चलाता हुआ जा रहा था। गांव के समीप ही एक रपटा था जिस पर पानी चढ़ने के बाद उतर चुका था परंतु पानी में काई के कारण वह अत्यंत फिसलन भरा हो गया था। अवतार सिंह ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और तेज रफ्तार के कारण रपटे पर उसकी मोटरसाइकिल बहक गई जिसे वह संभाल नहीं पाया और गिरकर बमुश्किल रपटे के किनारे लगी रेलिंग को पकड़कर नदी में गिरने से अपने को बचा रहा था। उसे अपनी मृत्यु साक्षात दिख रही थी तभी उसने देखा कि हिम्मत सिंह भी मोटरसाइकिल पर उस ओर आ रहा था। हिम्मत सिंह ने जब अवतार सिंह को रेलिंग पकडे संघर्ष करते हुए देखा तो उसने अपनी मोटरसाइकिल को रोका और उतरकर बड़ी कठिनाई से किसी प्रकार खींच कर बाहर सुरक्षित निकाल लिया। अवतार सिंह मोटरसाइकिल से गिरने के कारण बुरी तरह से घायल हो चुका था। हिम्मत सिंह उसे तुरंत नजदीकी चिकित्सा केंद्र में जाकर भर्ती कराया और उसके परिवार को इसकी सूचना दी।

अब अवतार सिंह चार पाँच दिन के बाद जब अस्पताल से जब गांव वापिस आया तो सबसे पहले हिम्मत सिंह के घर जाकर उसने उसके इस उपकार के लिये उसे धन्यवाद देते हुए उसके पैर पकड़ लिए। हिम्मत सिंह ने उसे तुरंत उठाकर कहा कि मैंने कोई उपकार नहीं किया। यह तो मेरा कर्तव्य था और मुझे इस बात की खुशी है कि मैं ऐसी विकट परिस्थितियों में किसी के काम आ सका। अवतार सिंह का हृदय हिम्मत सिंह के प्रति बदल चुका था और उसने अपनी पुरानी गलतियों की माफी माँगते हुए उसके प्रति बहुत आदर व सम्मान गांव वालों के सम्मुख प्रकट किया। अब वे दोनो अच्छे मित्र हो गये थे। इसलिये कहा जाता है कि बुराई को भलाई से खत्म किया जा सकता है। बुराई से बुराई का जवाब देने से वैमनस्यता बढ जाती है।

एक दिन अवतार सिंह ने हिम्मत सिंह को कहा कि मैंने मृत्यु को साक्षात उस दिन देखा था। एक दिन हम दोनो इस दुनिया से चले जायेंगे और हमें कोई भी कुछ दिनों के बाद याद नहीं रखेगा। हम देनो के ही पास अपार धन संपदा है। यदि हम इसका कुछ भाग अपने गांव के निवासियों की तरक्की व उत्थान के लिये खर्च करे तो हमारे इन कर्मों को सदैव याद रखा जाएगा। हिम्मत सिंह ने अवतार सिंह की विचारधारा से प्रभावित होते हुए अपनी सहमति दे दी एवं उससे कार्ययोजना के बारे में भी पूछा। अब अवतार सिंह ने उत्साहित होकर बताया कि हम गांव में उन्नत कृषि के लिए शासकीय अधिकारियों को लाकर उनके विचारों एवं योजनाओं को क्रियान्वित करके छोटे किसानों का मुनाफा बढा सकते हैं। अब इन दोनों ने शासकीय सहायता एवं स्वयं के धन का दान करते हुए गांव में हाई स्कूल, सड़कें, शौचालय, सामुदायिक भवन आदि बनवाकर प्रतिदिन शाम को गांव की चौपाल की व्यवस्था करवाई जिसमें किसी भी प्रकार के विवादों का निराकरण एवं गांव की प्रगति के लिए दिये गये सुझावों पर विचार विमर्श किया जाता था। इन सब के होने से गांव का नक्शा ही बदल गया और वह गांव एक आदर्श गांव के रूप में प्रसिद्धि पाकर दूसरे गांवों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन गया।

लक्ष्य एक रास्ते अनेक

एक गांव में हरिसिंह और रामसिंह नाम के दो किसान रहते थे। वहाँ स्थित एक मंदिर में एक संत जी भी निवास करते थे। आसपास के कस्बे के लोग उनसे सलाह मशवरा लेते रहते थे। एक दिन रामसिंह उनके पास गया और बोला कि महाराज खेती करने में बड़ी कठिनाई आती है। हमें मेहनत करने के बाद भी प्राकृतिक परिस्थितियों पर बहुत अधिक निर्भर रहना होता है। आकाश से पानी की बरसात एवं ओलों का प्रकोप असमय हो जाने पर खड़ी हुई फसल बर्बाद होकर हमारी सारी मेहनत और परिश्रम बेकार हो जाता है। मैं सोचता हूँ कि जमीन के दाम बाजार में इतने अधिक हो गये है कि इसे बेचकर इस रकम को बैंक में रख दूँ तो ब्याज में ही मुझे खेती करने से अधिक कमाई होने लगेगी। स्वामी जी ने कहा कि तुम्हारी सोच सही है तुम चाहो तो ऐसा करके परिश्रम एवं चिंताओं से मुक्त हो सकते हो।

इसके बाद हरिसिंह स्वामी जी के पास आकर अपने मन की बात बताकर उनकी सलाह माँगता है। वह कहता है कि मेरी खेती की जमीन में परिश्रम तो मुझे करना पड़ता है परंतु यदि आधुनिक तकनीक अपनाकर फसलों को बदलकर लगाया जाए तो काफी मुनाफा हो सकता है। इसे कार्यरूप देने के लिए पूँजी का निवेश करना पडेगा परंतु उससे लाभ इतना अधिक बढ़ सकता है कि सभी आर्थिक कठिनाईयाँ समाप्त हो जायेंगी। हरिसिंह स्वामी जी से पूछता है कि क्या मुझे ऐसा करना चाहिए ? क्योंकि हमारे निकट के दूसरे गांव के किसान इसका प्रयास किया था परंतु उसे सफलता नहीं मिली और उसे वापिस अपनी पारंपरिक खेती पर ही आना पड़ा।

अब स्वामी जी बोले तुम्हें आधुनिक नई पद्धति अपनाकर खेती में परिवर्तन करके अधिक लाभ कमाने का प्रयास अवश्य करना चाहिए। एक बात का जरूर ध्यान रखना कि तुम्हें इस विषय पर जो भी सुझाव दे रहे हो वे वास्तव में उस विधा के पूरे जानकार है या नहीं इस विषय में पूरी जानकारी जरूर प्राप्त कर लेना। यह सुनकर हरिसिंह संतुष्ट होकर चला जाता है।

संत जी का एक शिष्य उनके द्वारा दोनों किसानों को दिये गये सुझाव जो कि एक दूसरे से विपरीत थे सुनकर पूछने लगा कि आपने ऐसा क्यों किया ? रामसिंह को तो आपने जमीन बेचने का सुझाव दे दिया और हरिसिंह को खेती करने के लिए प्रोत्साहित कर दिया ऐसा क्यों ? स्वामी जी ने कहा कि रामसिंह की बातों से स्पष्ट था कि वह खेती में मेहनत से थक चुका था। यदि मैं उसे खेती में बदलाव करने का सुझाव देता तो उसे वह स्वीकार नहीं होता इसलिये मैंने उसे जमीन बेचकर घर बैठे खेती से प्राप्त होने वाले मुनाफे से कहीं ज्यादा ब्याज में प्राप्त होना सही समझा। हरिसिंह की बातों से स्पष्ट था कि वह खेती करने के लिए प्रतिबद्ध था और उसी में अधिक मुनाफा कमाने के लिए प्रयासरत था। मैंने जिसकी जैसी मनोवृत्ति देखी वैसी ही मैंने उसे प्रेरणा दी। दोनों ही किसानों की मंजिल एक ही है कि अधिक से अधिक धनोपार्जन करना पर उसे प्राप्त करने के रास्ते अलग अलग है। जीवन में उद्देश्य महत्वपूर्ण होता है। हमें उसे हर परिस्थिति में प्राप्त करना चाहिए।

वट वृक्ष

श्री विनय सक्सेना एक ओजस्वी व्यक्तित्व के धनी, प्रखर वक्ता एवं नीतिगत राजनीति में विश्वास रखने वाले कांग्रेस पार्टी के प्रति समर्पित एवं वरिष्ठ नेता है। वे वर्तमान में जबलपुर नगर निगम में वरिष्ठ पार्षद है एवं पूर्व नेताप्रतिपक्ष भी रह चुके है। उनसे वार्तालाप होने पर उन्होंने बताया कि उनकी शिक्षा पूर्ण होने उपरांत वे युवावस्था से ही समाज सेवा और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाने लगे थे। उनके संयुक्त परिवार में माता पिता से मिली नैतिक शिक्षा एवं संस्कार आज भी उनका मार्गदर्शन करते है। वे वर्तमान परिस्थितियों में राजनीति में नैतिक मूल्यों के हृास से काफी चिंतित है। वे कहते हैं कि आज जीवन के हर क्षेत्र में धन की महिमा और चमक ने अपने दुष्प्रभाव से आदर्श जीवन को झकझोर दिया है। वे अपने जीवन की एक पुरानी घटना याद करते हुये बताते है।

आज से लगभग दो दशक पहले एक बहुत बड़ी त्रासदी के रूप में भूकंप आया था जिससे जबलपुर शहर भी अछूता नहीं बचा था। शहर में जानमाल का भारी नुकसान हुआ था और ऐसी कोई इमारत नहीं बची थी जिसमें इस भूकंप के कारण दरार ना आ गई हो। म.प्र.शासन ने भी इस विभीषिका को देखते हुये मुआवजे के रूप में आर्थिक मदद भूकंप पीडितों को देना प्रारंभ कर दिया था। वे क्षेत्रीय पार्षद होने के कारण इस आर्थिक सहायता से पीडित लोगों की मदद करने का प्रयास कर रहे थे। जब मुआवजे का वितरण किया जा रहा था उसी समय क्षेत्र के एक संभ्रांत एवं आर्थिक रूप से संपन्न सज्जन उनके पास आये और बोले कि जब तुम मुआवजे की रकम बाँटोगे तो मेरे घर पर चार अलग अलग जगह मुआवजा देकर जाना क्योंकि हमारे यहाँ बँटवारा हो चुका है और हम सब के चौके चूल्हे एक ना होकर चार हो चुके है। वे उस परिवार को बहुत अच्छे से जानते थे और उनकी संपन्नता से भी भली भाँति परिचित थे। बचपन में उन्होंने उन सब को एकसाथ एक ही थाली में खाना खाते हुए, खेलते हुए, और सारे सुख दुख आपस में बाँटते हुए देखा था। आज जब इस भयंकर त्रासदी के समय सारा शहर अपना धर्म, संप्रदाय, अमीर गरीब का भेदभाव भूलकर एक दूसरे की पीडा में सहयोगी बन रहा है ऐसे कठिन समय में वह परिवार संपन्न होते हुए भी मदद करने के स्थान पर चार गुना मुआवजा प्राप्त करने के लिए निवेदन कर रहा था।

वे उस रात ठीक से सो नहीं पाये और सोचते रहे कि जब तक वह परिवार एक था कितना संपन्न और सुखी था, अब बँटवारा हो जाने पर वह वटवृक्ष कई हिस्सों में बँटकर अपनी संपन्नता खो चुका है एवं मुआवजे की छोटी सी राशि भी ज्यादा प्राप्त करने के लिये लालायित है। एक वटवृक्ष तो सभी को छांव देता है और उसकी शाखायें जितनी फैलती है उतना ही मजबूत होता है एवं फैलकर हमें छांव रूपी सुख देता है, उसी प्रकार हमारा परिवार रूपी वटवृक्ष भी यदि एक होकर रहेगा तो सदैव मजबूत रहेगा कभी मजबूर नहीं होगा। संयुक्त परिवार की प्रासंगिकता आज भी अपना महत्व रखती है।

सब का दाता है भगवान

जबलपुर शहर में एक धनाढ्य व्यापारी पोपटमल रहता था। वह कर्म प्रधान व्यक्तित्व का धनी था और गरीबों को दान धर्म, जरूरतमंदों को आर्थिक सहयोग, बच्चों को शिक्षा प्रदान करने हेतु उनकी फीस, किताबें इत्यादि के लिए आर्थिक मदद देता रहता था। उसके घर पर प्रतिदिन दोपहर के समय दो भिखारी भीख माँगने आते थे। जिन्हें उसके द्वारा प्रतिदिन भोजन प्रदान किया जाता था। उसमें से एक भिखारी भगवान के प्रति आभार व्यक्त करता और दूसरा भिखारी उस व्यापारी का गुणगान करता हुआ चला जाता था।

पोपटमल को ईश्वर के ऊपर कोई विश्वास नहीं था और वह मंदिर जाकर पूजा पाठ या भक्ति सेवा में किसी प्रकार का विश्वास नहीं रखता था। इस प्रकार कई वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन उसने सोचा कि जो भिखारी उसका गुणगान करता है। उसे आर्थिक समस्याओं से निजात दिलाने के लिए कुछ करना चाहिए। यह सोचकर वह अपनी मँहगी अँगूठी उसे भीख में दे देता है और कहता है कि इसकी बिक्री से तुम्हें इतना धन मिल जाएगा कि तुम अपना बाकी का जीवन बिना भीख माँगे काट सको। वह भिखारी उस अँगूठी को लेकर एक सुनार के पास जाता है। वह उसका आकलन करता है और असली होने पर भी उसे नकली बताकर कहता है कि इसकी कीमत पाँच सौ रूपये से ज्यादा नहीं है।

यह सुनकर भिखारी अवाक् रह जाता है तभी उसे दूसरा भिखारी जो व्यापारी के यहाँ प्रतिदिन आता था, उसके निकट आता दिखाई देता है। वह गुस्से और क्षोभ से वह अँगूठी सुनार से लेकर उस भिखारी को दे देता है और खुद पैर पटकता हुआ व्यापारी को मन ही मन में कोसता हुआ वहाँ से चला जाता है। वह सुनार अब दूसरे भिखारी जिसके पास अँगूठी रहती है उसको पाँच सौ रूपये देकर अँगूठी देने का निवेदन करता है। उसकी बात सुनकर भिखारी का माथा ठनकता है और वह उसे अँगूठी ना देकर गहनों की एक दूसरी दुकान में जाकर अँगूठी का मूल्यांकन करवाता है। यह जानकर वह भौचक्का रह जाता है कि उसका मूल्य दस लाख से ऊपर है।

दूसरे दिन वह अपने नियत समय पर पोपटमल के यहाँ भीख माँगने जाता है और उन्हें अँगूठी दिखाकर कहता है कि सबका दाता है भगवान और उसे वापस पोपटमल को देते हुए कहता है कि देखिए यह आपने दी किसी और को थी परंतु भगवान की कृपा से यह मेरे पास आ गयी। मेरा कहना सच है ना कि सबका दाता है भगवान। पोपटमल यह सुनकर हतप्रभ होकर चिंतन करने लगता है कि यह भिखारी होने के बाद भी मन से कितना ईमानदार है कि अँगूठी वापस करने आ गया। इसकी भक्ति और साधना में कितना समर्पण है और ईश्वर के प्रति कितना विश्वास है। यह सच प्रतीत होता है कि सबका दाता भगवान ही होता है।

इस घटना का पोपटमल के मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पडता है और वह नास्तिक से आस्तिक हो जाता है। वह उस भिखारी को कहता है कि इस अँगूठी पर मेरा कोई अधिकार नहीं है। वह भिखारी उनसे अनुरोध करता है कि इसको बेचकर प्राप्त होने वाली धनराशि का सदुपयोग करना चाहिए। पोपटमल उस अँगूठी को बेचकर नर्मदा किनारे एक आश्रम का निर्माण करा देता है जिसमें नर्मदा परिक्रमा करने वालों के लिए विश्राम एवं भोजन की निःशुल्क व्यवस्था होती है और वह उस भिखारी के मार्गदर्शन में उस आश्रम को सौंप देता है।

आपदा प्रबंधन

गोकुलदास नाम का एक नवयुवक नये साल की पूर्व संध्या का आनंद उठाने के लिए दुबई गया था। वहाँ वह सायंकाल के समय विश्व प्रसिद्ध बुर्ज खलीफा होटल के पास एक रेस्टारेंट में बैठकर वहाँ का मनोहारी दृश्य देख रहा था। वहाँ पर चारों ओर दर्शकों का सैलाब था। सभी रास्ते सिर्फ पैदल चलने वालों के लिए ही खुले थे। शाम से ही मनोरंजक कार्यक्रमों का शुभारंभ हो गया था और रात्रि में साढे दस बजे तक नववर्ष के आगमन का जश्न पूरे शबाब पर पहुँच चुका था।

उसी समय अचानक ही सामने की ओर स्थित बहुमंजिला होटल एम्प्रेस में अचानक ही आग लग गई और देखते देखते ही वह दस मिनिट में विषम रूप से फैल गई और कई मंजिल उसकी चपेट में आ गई। इस दुर्घटना से चारों ओर अफरा तफरी मच गई तभी फायर बिग्रेड की गाडियाँ, पुलिस एवं अन्य उच्चाधिकारियों की गाड़ियों के सायरन की आवाजें जश्न के स्थान पर गूँजने लगी।

यह दृश्य देखकर गोकुलदास को अपने बचपन की याद आ गयी जब वह पाँच वर्ष का था और उसके मकान में आग लग गयी थी। यह देखकर मोहल्ले के सभी रहवासी अपनी अपनी क्षमता के अनुसार आग बुझाने का प्रयत्न कर रहे थे। यह देखकर वह भी अपनी पानी की बॉटल में पानी भरकर बुझाने का प्रयास करने लगा। यह देखकर वहाँ पर खड़ा मूकदर्शक के रूप में खड़ा एक लड़का उससे बोला कि इतने कम पानी में क्या आग बुझ जायेगी ? वह बोला जब सब लोग कुछ ना कुछ प्रयास कर रहे है तो मैं भी जो कुछ कर सकता हूँ वही कर रहा हूँ। जब इस बात की समीक्षा होगी तो मेरा नाम भी सहयोग करने वालों में होगा। मोहल्ले में यदि कभी कोई दुर्घटना हो तो सभी को एक जुट होकर उसका सामना करना चाहिए।

उसी समय तेजी से जोर की आवाज के साथ धमाका हुआ जो संभवतः गैस की टंकी के फटने के कारण हुआ था, उसकी आवाज से अपने बचपन की यादों में खोये हुए गोकुलदास का ध्यान भंग हुआ। उसने सोचा कि उसे भी ऐसे हालात में सहयोग करना चाहिए वह मदद के लिए आगे बढा परंतु पुलिस ने उसे रोक दिया। वह चुपचाप अग्निकांड का वीभत्स रूप देखता रहा और मन ही मन चिंतित होता रहा कि ना जाने इसमें कितनी जनहानि होगी।

वह यह देखकर आश्चर्यचकित था कि फायर बिग्रेड उस बिल्डिंग को बचाने का कोई प्रयास नहीं कर रही थी उनका पूरा ध्यान उस बिल्डिंग के समीप स्थित दूसरी बिल्डिंग में आग ना फैले इस पर था। कुछ समय पश्चात उसे रेडियो प्रसारण से जानकारी मिली कि एक हजार से भी ज्यादा होटल में ठहरे पर्यटकों को इस दुर्घटना के कुछ ही देर के भीतर पूर्ण रूप से सुरक्षित निकाल लिया गया। इस काम को संपन्न करने के लिए वहाँ के प्रशासनिक अधिकारियों के निर्देश पर फायर बिग्रेड के सभी कर्मचारी गण बिल्डिंग की आग को बुझाने का प्रयास छोडकर केवल लोगों को बचाने में लगे हुए थे। इतनी भीषण आग के बाद भी विद्युत प्रवाह बंद नहीं किया गया था, वहाँ के प्रशासन का मत था कि बिल्डिंग में चाहे जो नुकसान हो जाए परंतु वहाँ पर ठहरे एक भी पर्यटक की जनहानि नहीं होना चाहिए। आर्थिक हानि की पूर्ति तो हो सकती है परंतु जिंदगी को वापिस नहीं लाया जा सकता।

(क्रमशः अगले भाग 5 में जारी...)

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