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हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - 5 : लोकतंत्र में धर्म और जाति // असग़र वजाहत

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

असग़र वजाहत

लेखक

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

सम्पादक

भाग 1  ||  भाग 2  || भाग 3 || भाग 4 ||

-- पिछले अंक से जारी

भाग 5

लोकतंत्र में धर्म और जाति

विसंगतियों, विरोधाभासों और असमानताओं से भरे हमारे देश में आज देश की दिशा और दशा ने जो रुख इख़्तियार कर लिया है वह घोर चिंता का कारण बन गया है। आजादी के बाद शायद देशवासी इतने स्तरों पर इतने अधिक बटे हुए नहीं थे, जितने आज हैं।

हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिकता ने जो उग्र रूप धारण कर लिया है वह एक विस्फोटक भविष्य का सूचक है। लगातार होने वाले बम धमाकों के सामने आम देशवासी अपने आपको चाहे जितना असहाय महसूस करता हो लेकिन यह तय
है देश के अंदर अविश्वास की आग तेजी से भड़क रही है। बम धमाकों के
अपराधी दिखाई नहीं देते लेकिन उनकी पहचान ऐसे समूहों के रूप में तो हो ही जाती है जो एक धर्म विशेष से संबंध रखते हैं।

धर्म विशेष के लोग लाख कहते रहे हैं कि हम धमाकों की निन्दा करते हैं और यह अधार्मिक काम है लेकिन देश में एक माहौल-एक घृणा और प्रतिहिंसा का माहौल तो बनता ही है। धर्म के नाम पर धमाके करने वालों का उद्देश्य भी यही है और वह पूरा हो रहा है। सरकारी तंत्र की निष्क्रियता और अकर्मंयता आग में घी का काम करती है। जनता हर तरफ से निराश होने के बाद उत्तेजना और उकसावे के चरम क्षणों में ऐसे निर्णय लेती है जो लोकतंत्र की बुनियादें हिला देते हैं और प्रतिहिंसा को और मज़बूत बनाते हैं। यही पिछले पंद्रह-बीस साल से हो रहा है और हम केवल दर्शक बने देख रहे हैं।

सांप्रदायिकता के बाद हमारे समाज में जातीय तनाव और संघर्ष का माहौल भी उग्र रूप धारण कर चुका है। राजनीतिक, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति तो जातीय समीकरणों में बुरी तरह फंसी दिखाई देती है।

अब सवाल नीतियों पर नहीं पूछे जाते, राजनैतिक दल अपना ‘मेनोफेस्टो’ नहीं बनाते, अपनी प्राथमिकताएँ और योजनाएँ नहीं घोषित करते; अब बात होती है केवल जातीय समीकरणों पर। समीकरण बनते हैं परंतु जातियों के बीच घृणा और द्वेष की दीवारें ऊँची होती रहती हैं।

आज देश में जातीय हिंसा का जो स्वरूप नज़र आता है। वह पहले नहीं था। अभी हाल में ही गुजर समाज के आंदोलन ने यह सिद्ध कर दिया है कि जातियाँ अपनी माँगें मनवाने और प्रमुख स्थान स्थापित करने के लिए किस तरह कानून तथा प्रशासन से खिलवाड़ करेंगी और उन पर किसी तरह का कोई शिकंजा नहीं कसा जा सकेगा। बल्कि वोटों की राजनीति उनकी पीठ थपथपाएगी और अपने हित में इस्तेमाल करने की चालें सोचेगी।

जाति आधारित संगठन बड़ी तेजी से सामने आ रहे हैं। प्रदेशों तथा जिलों में जाति विशेष के सम्मेलन और सभाएं यह सिद्ध करते हैं कि आज हमारे समाज की आस्था देश के कानून, व्यवस्था और शासन पर नहीं बल्कि अपनी जाति पर केन्द्रित है। जातिवादी राजनीति के मज़बूत होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि आजादी की आधी शताब्दी बीत जाने के बाद भी लोगों को देश के प्रशासन, कानून व्यवस्था, न्याय व्यवस्था के प्रति आस्था नहीं है।

आज एक आम आदमी यह समझता है कि केवल उसकी जाति ही उसे संरक्षण दे सकती है। जिस समाज में धर्म या जाति सत्ता प्राप्त करने का आधार बनता हो उस समाज में योग्यता, कार्य-कुशलता, कार्यक्षमता आदि का क्या अर्थ बचेगा? यही नहीं अब हमारे समाज में तो यह मान लिया गया है कि योग्यता आदि की बातें किताबी हैं और उनका कोई महत्त्व नहीं है या वे प्रसांगिक नहीं रह गयी हैं।

देश का सबसे ऊँचा न्यायाधीश भी भ्रष्टाचार में लिप्त बताये जाते हैं। निचले-न्यायालयों का क्या हाल होगा इसकी कल्पना की जा सकती है। सरकारी मशीनरी पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का भ्रष्टाचार रोज़मर्रा की बात बन गया है। विकास योजनाएं भ्रष्टाचार की सूली पर चढ़ा दी गयी हैं। छोटे जिलों में तबादले की राजनीति ने प्रशासन को ठप्प करके रख दिया है। केवल वही काम होते हैं जिनसे किसी को व्यक्तिगत लाभ होता है। प्रशासन और राजनीति के गठजोड़ ने विकास को विनाश के कगार तक पहुँचा दिया है। मजे़ की बात यह है कि देश की इस स्थिति की जानकारी सबको है और कोई कुछ नहीं कर सकता।

राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्रा तक जानते हैं कि देशवासियों को न्याय नहीं मिल रहा, भ्रष्टाचार के कारण विकास योजनाएं रुकी पड़ी हैं, सार्वजनिक क्षेत्र के बेस्तर उपक्रम खरबों का घाटा दे रहे हैं लेकिन कोई कुछ नहीं कर सकता। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए हमने जो संस्थाएं बनायीं थीं वे स्वयं भ्रष्ट हो गयी हैं। अब सोचने की बात यह है कि एक भ्रष्ट समाज आतंकवाद से कैसे लड़ सकता है? भ्रष्टाचारी पैसा लेकर सब दरवाजे़ खोल देता है, उसे इससे क्या मतलब कि कौन आ रहा है, कौन जा रहा है?

कानून और व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठ गया है। यही कारण है कि अपराध बेहद तेजी से बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर अपराधियों को राजनेताओं से
सीधा संरक्षण मिलता है या अपराधी ही राजनेता बन गये हैं। वे पुलिस और प्रशासन के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं। जिसके कारण कानून व्यवस्था पर से लोगों का विश्वास समाप्त हो गया है। इसलिए लोग विवाद का निपटारा सड़कों पर करने लगे हैं, ‘रोड रेज’ और सड़क पर होने वाले अपराधों में वृद्धि होती जा रही है।

कानून व्यवस्था के दीवालिएपन के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक संबंधों में जो बदलाव आया है वह समाज और राजनीति में आये पतन की प्रतिछाया है। सिद्धांतविहीन और दंड विधान से ‘मुक्त’ समाज में मानवीय
संबंध कैसे होंगे। इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है। दहेज के लिए हत्याएँ, बच्चों के साथ बलात्कार और हत्याएँ, वृद्धों की हत्याएँ आदि के पीछे यही मानसिकता काम करती है कि ‘सज़ा नहीं होगी’ तथा ‘सबसे बड़ी चीज़ धन है’ जिसे प्राप्त करने के लिए कुछ भी किया जा सकता है।

अब यह लगने लगा है कि दरअसल देश को यथास्थितिवाद की ताकष्ते चला रही हैं। कुछ शक्तिशाली गुट अपने एजेंडे और कार्यक्रम के अनुसार देश को जिस दिशा में ले जा रहे हैं उस दिशा में देश जा रहा है नहीं तो इसका कोई कारण नहीं है कि आधी शताब्दी के लोकतंत्र में देश सामाजिक, नैतिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ने के बजाय पीछे जा रहा है।

विसंगतियाँ बढ़ रही हैं जो किसी भी समाज और देश के लिए घातक हैं। एक ओर करोड़पतियों की संख्या बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर बेरोज़गारी और भूखमरी बढ़ रही है। किसान आत्म-हत्याएँ कर रहे हैं और विदेशों से होने वाला निवेश खरबों का आंकड़ा पार गया है। एक ओर ‘साइबर सिटी’ बनाये जा रहे हैं दूसरी ओर आदिवासी उजड़ रहे हैं। देश में बड़े पैमाने पर मजदूरों का पलायन और तस्करी हो रही है। जन-संगठन ठप्प पड़ गये हैं।

इन परिस्थितियों में सबसे ज्यादा खतरनाक यह है कि लोग लोकतंत्र पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। संसद में जिस तरह सांसदों की खरीद होती दिखाई देती है वह लोकतंत्र पर बड़ा आघात है। लोकतंत्र से विश्वास डिगने के कारण देश में हिंसा बढ़ेगी, धर्मों, जातियों, क्षेत्रों और प्रदेशों के आधार पर लोग बंटेंगे और लोकतंत्र का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। ऐसे हालात में हम अपने नेताओं की ओर देखते हैं।

आशा करते हैं कि वे हमें इस गंभीर संकट से उबार लेंगे। लेकिन हमारे नेता हैं कौन? क्या वे हमारे नेता हैं जो धर्म और जाति के नाम पर पहले से ही देश को दरका चुके हैं? या देश के नेता वे हैं जो यथा स्थितिवाद के पोषक हैं? कौन है देश का नेता? क्या वे हैं जो छोटी-छोटी क्षेत्राय पार्टियाँ बना कर अपनी गद्दियाँ बचाने में लगे हैं?

दरअसल एक बड़ा संकट यह भी है कि आज हमारे पास ‘विज़नरी’ नेतृत्व का नितांत अभाव है। यही नहीं हमारा आज का नेतृत्व देश को वर्तमान संकट से निकाल पाने का रास्ता नहीं खोज पाया है और न उसके पास भविष्य का कोई ‘रोड मैप’ है। शायद देशों के इतिहास में यह समय भी आता है, पर सदा नहीं रहता।

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क्रमशः अगले अंकों में जारी....

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