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हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - 6 : हिजाब : पर्दे के पीछे क्या है? // असग़र वजाहत

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

असग़र वजाहत

लेखक

हिन्दू पानी - मुस्लिम पानी : साम्प्रदायिक सद्भाव की कहानियाँ - लेखक : असग़र वजाहत, संपादक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

सम्पादक

भाग 1  ||  भाग 2  || भाग 3 || भाग 4 || भाग 5 ||

-- पिछले अंक से जारी

भाग 6

हिजाब : पर्दे के पीछे क्या है?

ब्रिटेन के पूर्व विदेश मंत्री जैक स्ट्रा ने यह कह कर कि मुसलमान महिलाएं अपना बुर्का उतार दें, कोई नयी बात नहीं; पर एक ज़रूरी बात ज़रूर कही है। मुस्लिम समाज पिछले सौ साल से पर्दे की धार्मिकता, सार्थकता, नैतिकता और आवश्यकता पर तरह-तरह से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहा है। सबसे पहला और बड़ा सवाल यह है कि क्या पर्दा इस्लाम धर्म में आवश्यक माना गया है? क्या पर्दा धर्म का एक आवश्यक हिस्सा है? यदि हाँ तो कैसा पर्दा धर्म का अनिवार्य हिस्सा है और न उसकी कोई परिभाषा दी गयी है। इस्लाम धर्म के विद्वान यह कहते हैं कि महिलाओं की निर्लज्जता को इस्लाम बुरा समझता है तथा शालीन ढंग से कपड़े पहनने की सलाह देता है। इसलिए पर्दा करने या न करने से इस्लाम धर्म ख़तरे में पड़ जायेगा; ऐसा नहीं है। यदि ऐसा होता तो सारे संसार में फैले मुसलमान देशों की महिलाएं एक तरह से एक प्रकार का पर्दा कर रही होती। लेकिन ऐसा नहीं है। मुसलमान औरतों को उनके मर्द अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरीके से पर्दा कराते हैं या उसकी परम्पराएं डाल रखी हैं।

भारत में मुसलमान ऐसा बुर्का पहनती हैं जिसमें सिर से पैर तक औरत ढ़क जाती है और आँखों के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई देता। यह पर्दा या बुर्का भारत के भारत ईरान या अरब देशों में नहीं चलता। वहाँ सिर पर कपड़ा बाँधा जाता है और ऐसे कपड़े पहने जाते हैं कि शरीर ढ़का रहे। लेकिन चेहरा पूरी तरह खुला रहता है। भारतीय मुसलमान इस पर्दे को पर्दे नहीं समझते जिसमें चेहरा पूरी तरह नज़र आता हो।

पाकिस्तान और भारत में ही नहीं संसार के दूसरे देशों में भी मुसलमान समाज तेज़ी से पर्दा छोड़ रहा है। अफसोस है कि ऐसा कोई अध्ययन या आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन पिछले पचास साल में कम-से-कम बड़े शहरों में मुस्लिम महिलाओं ने बुर्के से पीछा छुड़ा लिया है, पर वे फिर भी मुसलमान है क्योंकि कुरान की हिदायत के अनुसार निर्लज्जता नहीं करतीं; बांग्लादेश की मुसलमान स्त्री साड़ी को इस तरह पहनती है कि निर्लज्जता नहीं हो पाती। पंजाब की औरत सलवार- कुर्ता इस प्रकार पहनती हैं और ईरान की औरत जीन्स, कोट और स्कार्फ बाँधती हैं कि कुरान के हुक्म की पाबंदी हो जाती है। इसलिए यह मानना कि पर्दे का कोई एक ही स्वरूप है और उसे मानने या न मानने से इस्लाम खतरे में पड़ जायेगा, ग़लत है।

योरोप में मुस्लिम महिलाएँ या कहना चाहिए कुछ मुस्लिम महिलाएं ‘हिजाब’ करती है। ‘हिजाब’ का शब्दिक अर्थ शर्म या लज्जा है। व्यवहार में इसकी परिणति इस तरह होती है कि एक बड़ा और चौकोर रूमाल सिर पर इस तरह बाँधा जाता है कि सिर ढ़क जाये तथा उसका एक हिस्सा छाती पर पड़ा रहे। यह कपड़ा प्रायः काले रंग का होता है। निश्चित रूप से हिजाब बाँधें लड़कियाँ या औरतें योरोपीय परिवेश में सवालिया निशान लगती हैं। मुख्य प्रश्न यह है कि योरोप में जन्मी लिखी-पढ़ी लड़कियाँ हिजाब क्यों करती हैं? शायद ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि उनके माता-पिता उन पर ज़ोर डालते हैं। यह भी नहीं कहा जा सकता कि वे हिजाब को धर्म का अभिन्न अंश मानती हैं। क्योंकि कोई भी पढ़ी-लिखी लड़की अच्छी तरह जानती है कि पर्दा इस्लाम के तीन बुनियादी सिद्धांतों में नहीं आता। यह भी कुछ विचित्र और रोचक तथ्य है कि ‘हिजाब’ को महिलाओं की पुरानी पीढ़ी से अधिक नयी पीढ़ी अपना रही है जो अधिक आधुनिक, पढ़ी-लिखी और ‘योरोपीय’ है।

इस समस्या को समझने के लिए पिछले तीस-चालीस साल में आयें योरोप तथा मुस्लिम देशों के संबंधों तथा उससे जुड़ी राजनीति को समझना पड़ेगा। जिसने मुसलमान समाज पर अपना गहरा प्रभाव डाला है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिम तथा अमेरीका द्वारा अरब क्षेत्र में इज़राइल की स्थापना तथा इज़राइल द्वारा क्षेत्र पर प्रभुत्व जमा लेने में पश्चिम का योगदान, अरबों का शोषण और विस्थापन एक ऐसा मुद्दा रहा है जिसने अंतर्राष्ट्रीय मुस्लिम समाज को बहुत गहराई से आहत किया है। ईरान की लोकतांत्रिक सरकार का सी.आई.ए. द्वारा तख़्ता पलटा जाना और राष्ट्रीय नेता की हत्या, सउदी अरब पर अमेरिका का
आधिपत्य, तेल की सम्पदा पर अमेरिकी कम्पनियों का कब्ज़ा, अफगानिस्तान में कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं को पश्चिम का समर्थन और बाद में विश्वासघात जैसी स्थिति पैदा कर देना, इराक पर अमेरिकी और योरोपीय आक्रमण, ईरान के अणु ऊर्जा कार्यक्रम पर पश्चिम का नकारात्मक रूख़, सोवियत यूनियन के पतन के बाद एक ध्रुवीय राजनीति में अमेरीका का प्रभुत्व और मध्य एशिया के देशों में सेनाएं उतार देना तथा अड्डे बना देना आदि राजनैतिक घटनाओं से योरोप के मुसलमान की मानसिकता को जोड़कर देखने की आवश्यकता है। पश्चिम ने मुसलमानों के लिए राजनैतिक विरोध के रास्ते बंद कर दिये हैं और जब राजनैतिक विरोध के रास्ते बंद हो जाते हैं तो सांस्कृतिक प्रतिरोध का रास्ता ही बचता है। बड़ी सीमा तक सांस्कृतिक प्रतिरोध आत्मघाती होता है, इसमें भी कोई संदेह नहीं। योरोप में ‘हिजाब’ क्या सांस्कृतिक प्रतिरोध जैसा नहीं है?

जैक स्ट्रा जैसे लोग योरोपीय मुसलमानों के व्यवहार को एक स्वस्थ समाज में स्वस्थ नागरिक के व्यवहार जैसा चाहते हैं लेकिन समस्या तो उससे अधिक गहरी है और सूचना क्रांति के युग में यह और भावनात्मक बन जाती है। पश्चिमी देश इस संबंध में विचार कर सकते हैं कि एक स्तर पर धार्मिक कट्टरता से लाभ उठा कर दूसरे स्तर पर धार्मिक कट्टरता का विरोध नहीं किया जा सकता। जब पश्चिम को सोवियत यूनियन के विरुद्ध धर्मांध मुसलमानों का समर्थन चाहिए था तो बड़े स्तर पर योरोप और अमेरिका में कट्टर धर्मांध मुस्लिम नेताओं को वीज़ा तथा ‘रेज़ीडेन्सी परमिट’ दिये गये थे। बीस साल पहले बोया गया बबूल का पेड़ आम नहीं दे सकता।

इस्लाम का इतिहास साक्षी है कि समय-समय पर ऐसी प्रबुद्ध मुस्लिम महिलाएं सामने आती रही हैं जिन्होंने पुरुषों के सामान ही महत्त्वपूर्ण कार्य किये हैं। न केवल हम व्यापार करने वाली मुस्लिम महिलाओं को देखते हैं बल्कि ज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में भी हमें मुस्लिम महिलाएं दिखायी पड़ती हैं। निश्चित रूप से ये महिलाएं अपने कारोबार और काम के सिलसिले में पुरुषों से मिलती होंगी और इनका हिजाब या पर्दा उनके काम में बाधा नहीं बनता होगा। इस कारण हिजाब के समर्थकों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हिजाब महिलाओं के विकास में बाधा न बने। भारत में मुस्लिम महिलाओं के लिए पर्दे का जो प्रावधान किया गया है वह निश्चित रूप से उनके विकास और काम में ही नहीं बल्कि स्वस्थ विकास में भी बाधा बनता है। कहा जाता है कि भारत के सामंतवाद और जातिवाद के प्रभाव के कारण पर्दे का एक ऐसा स्वरूप बन गया है जिसे इस्लामी मानदण्डों के आधार पर भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस संबंध में कई मुस्लिम विचारकों ने अपने मत व्यक्त किये हैं।

पर्दे या हिजाब की समस्या पर बहुत सहानुभूतिपूर्वक ढंग से विचार करने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं लगाना चाहिए कि पर्दा प्रथा के बारे में कुछ ऐसा कहा जा रहा है वह इस्लाम के सिद्धांतों के विरूद्ध है।

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क्रमशः अगले अंकों में जारी....

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