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कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग - 6 // राजेश माहेश्वरी

कहानी संग्रह

तर्जनी से अनामिका तक

( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )

राजेश माहेश्वरी

कहानी संग्रह //  तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )  // राजेश माहेश्वरी

पिछले भाग 5 से जारी...

 

हिम्मत

मुंबई से हैदराबाद एयर इंडिया का हवाई जहाज जा रहा था। हैदराबाद के पास अचानक ही मौसम खराब हो जाने के कारण विमान हिचकोले खाने लगा। इससे सभी यात्रियों में दहशत होने लगी तभी सीट पर बैठे एक दस वर्षीय बालक ने अपने सहयात्री से पूछा कि अंकल इस हवाई जहाज में क्या हो रहा है ? वे मुस्कुराते हुए बोले बेटा कुछ नहीं जैसे तुम कभी कभी खेलते हो वैसे ही विमान की भी इच्छा खेलने की हो रही है और इसी कारण यह ऊपर नीचे होकर मनोरंजन कर रहा है। यह सुनकर वह लड़का हँसा और इस घटना का आनंद लेने लगा। दूसरी तरफ एक महिला यात्री जो कि विमान में यात्रा के दौरान राम नाम की माला जप रही थी, घबराकर उसके हाथ से माला छूट जाती है। वह एयर होस्टेस को बुलाकर पूछती है कि क्या हमारा विमान टकराने वाला है। वह एयर होस्टेस मुस्कुरा कर कहती है कि नहीं बिल्कुल नहीं आप भगवान के प्रति आस्थावान महिला है तब ऐसा कैसे हो सकता है। आप निश्चिंत रहे, कोई दुर्घटना नहीं होगी। तीसरा यात्री अपने सहयात्री को एक लिस्ट दिखाकर कहता है कि इतना रूपया मुझे लोगों से वसूलना है अगर यह विमान दुर्घटनाग्रस्त हे गया तो मेरा काफी नुकसान हो जायेगा। उसका सहयात्री उसको कहता है कि ऐसी स्थिति में तुमको रूपये याद आ रहे हैं, यहाँ तो हम सब की जान पर आ बनी है। भगवान से प्रार्थना करने की जगह तुम अपने नुकसान और उधार वसूली के बारे में सोच रहे हो। चौथे यात्री इस संभावित दुर्घटना से बचने के लिए भगवान से तरह तरह की मन्नतें माँगने लगा। हवाई जहाज के पायलट काफी अनुभवी थे और उन्होंने जोखिम का सामना करते हुए बिना किसी भय के अपने अनुभव से विमान को सुरक्षित हैदराबाद में उतार लिया। अब सबकी जान में जान आ गयी और चेहरे पर मुस्कुराहट दिखने लगी। किसी ने सच ही कहा है कि यदि परिस्थितियाँ विपरीत भी नजर आ रही हो तो भी हमें मन से डर निकाल देना चाहिए और संयम रखते हुए उस कठिन समय के समाप्त होने का इंतजार करना चाहिए या आत्मविश्वास के सहारे कठिन समय का सामना करना चाहिए।

नवजीवन

डॉ. अनुपम साहनी जो कि प्रसिद्ध न्यूरोफिजिशियन है, वे मुंबई में देश के सुविख्यात न्यूरोफिजिशियन डॉ.खादिलकर के मार्गदर्शन में कार्यरत थे। वे बताते हैं उनके गुरू की यह विशेषता थी कि वे प्रतिदिन जे.जे.अस्पताल मुंबई में गरीब एवं असहाय मरीजों की निशुल्क चिकित्सा करके आवश्यकता होने पर उनका दवाईयों का व्यय भी स्वयं ही वहन करते थे। डॉ. अनुपम साहनी अपने गृहनगर जबलपुर में माता पिता की सेवा एवं इस शहर में उच्चस्तरीय चिकित्सा सुविधाओं वाला एक अस्पताल खोलना चाहते थे ताकि यहाँ के मरीजों को चिकित्सा हेतु महानगर ना जाना पडे। उन्होंने जबलपुर आकर बेस्ट सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल के नाम से आधुनिक उपकरणों एवं सभी सुविधाओं से युक्त अस्पताल का निर्माण किया। इससे पहले वे शासकीय मेडिकल कॉलेज जबलपुर में भी सेवारत रहे।

उन्होंने एक घटना बताते हुए बताया कि जब वे जबलपुर मेडिकल कॉलेज में अस्सिटेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे तभी एक दिन एक गरीब व्यक्ति जो कि मायसथिमिया ग्रेविस नाम की बीमारी से पीड़ित था अपने इलाज हेतु उनके पास आया। यह न्यूरोमस्कुलर ऑटोइम्यून बीमारी थी जिसमें व्यक्ति के शरीर की मांसपेशियाँ कमजोर होकर आँखे, चेहरा आदि अंगों में काम करने की क्षमता कम हो जाती है और धीरे धीरे व्यक्ति लकवाग्रस्त हो जाता है। उसकी खतरनाक एवं गंभीर अवस्था को देखते हुए उसे वेंटीलेटर पर रख दिया गया था। इस बीमारी का एकमात्र इलाज आइवीआइजी इंजेक्शन या प्लाज्मा फैलेसिसि नाम की दवाई ही होती है जो कि बहुत महँगी दवा है। वह एक गरीब परिस्थिति का व्यक्ति था और उसके परिवार के लिए इतना खर्च वहन करना संभव नहीं था। यह दवाईयाँ शासकीय मेडिकल कॉलेज में भी उपलब्ध नहीं थी। शासकीय अस्पतालों में वेंटीलेटर की उपलब्धता भी सीमित होती है और इस कारण प्रायः प्रतिदिन दूसरे विभागों मे वेंटीलेटर की आवश्यकता के कारण विवाद की स्थिति बन जाती थी।

वे उस व्यक्ति की जीवन रक्षा हेतु बहुत परेशान थे कि वेंटीलेटर से हटाने के बाद इसकी जीवन रक्षा कैसे की जा सकेगी। उन्होंने उस मरीज को विभिन्न प्रकार के स्टेरॉयड देने का निर्णय लिया। ईश्वर की कृपा से यह स्टेरॉयड उस पर काफी असरकारी सिद्ध हुआ और वह दो महीने में ही काफी ठीक हो गया। उस मरीज को दो माह तक वेंटीलेटर पर रखा गया और इतने लंबे समय तक वेंटीलेटर पर रहने के बाद भी उसका ठीक हो जाना प्रभु कृपा ही थी मैं तो केवल निमित्त भाव से उसकी सेवा करके अपने कर्तव्य की पूर्ति कर रहा था। आज वह खुशी खुशी अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। वह व्यक्ति डॉ. साहनी के प्रति इतना सम्मान और आदर रखता है कि वह किसी भी बीमार व्यक्ति को सीधे उनके पास इस विश्वास के साथ ले आता है कि वे उसके रोग का निदान कर देंगें। डॉ. साहनी को बहुत खुशी होती है कि म.प्र. का वह पहला मरीज था जिस पर इस चिकित्सा प्रणाली का प्रयोग किया गया था और वह सफल रही। इस कार्य से उन्हें बहुत आत्मसंतोष एवं आत्मविश्वास प्राप्त हुआ।

हुनर

बनारस में दो मित्र महेश और राकेश रहते जिन्हें मिठाईयाँ एवं चाट बनाने में महारत हासिल थी। उनके बनाये हुए व्यंजन बनारस में काफी प्रसिद्ध थे। एक दिन इन दोनों के मन में विदेश घूमने की इच्छा जागृत हुई। उन्होंने सोच विचार करके इसके लिए चीन जाने का निश्चिय किया। इस हेतु वे दिन रात कड़ी मेहनत करके रूपया इकट्ठा करने लगे। इस दौरान उन्होंने अपना पासपोर्ट बनवाकर अन्य सभी औपचारिकताएँ पूरी करके अपने संचित धन से टिकिट लेकर चीन के गंजाऊ शहर पहुँच गये।

उन्हें वहाँ पर होने वाले खर्चों का कोई अनुभव नहीं था। इस कारण उनके पास जो धन था वह तीन चार दिन में ही समाप्त हो गया। इनके वापिस आने की टिकिट पंद्रह दिन बाद की थी। इस बीच में कोई भी सीट उपलब्ध नहीं होने के कारण निर्धारित तिथि से वापिस आना संभव नहीं था। अब वे बहुत घबराये हुए थे अब वे कहाँ रहेंगें और क्या खायेंगें। वे अपनी नासमझी पर बहुत दुखी हो रहे थे। एक दो दिन किसी तरह माँग कर गुजारा करने के पश्चात एक दिन उन्हें अचानक ही एक पंडित जी मिल गये। वे दोनों उन्हें रोककर अपना हाल बताते हैं और उनसे मदद माँगते हैं।

पंडित जी का स्वयं का एक भारतीय रेस्टारेंट उस शहर में था। पंडित जी उन दोनों को अपने रेस्टारेंट में ले जाते हैं और भोजन कराते हैं। उनसे बातचीत के दौरान पंडित जी को यह पता होता है वे देनो मित्र मिठाई और चाट बनाने में माहिर है तो वे उन दोनों से अपने रेस्टारेंट में कार्य करने के लिए कहते हैं। यह सुनकर वे दोनों अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं और पूरी मेहनत के साथ कार्य करने लगते हैं। कुछ दिनों बाद ही उनके द्वारा बनाये गये व्यंजन लोगों अत्यंत पसंद आते हैं इस प्रकार पंडित जी रेस्टारेंट की प्रसिद्धि भी बढ़ने लग जाती है।

यह कार्य करते हुए पंद्रह दिन कब बीत जाते हैं उन्हें पता ही नहीं चलता है और उनके जाने की तिथि आ जाती है और वे जाने से एक दिन पहले पंडित जी को बताते हैं कि कल उन्हें वापिस जाना है। यह सुनकर पंडित जी उन्हें सुझाव देते हैं कि वहाँ से ज्यादा रूपया तो तुम यहाँ कमा रहे हो, मैं भी यहाँ अकेला हूँ। मेरी इच्छा है कि आप लोग यही रूक जाये। पंडित जी के आग्रह को देखते वे बोले कि हमारी भी यही इच्छा है परंतु हम अपने लंबित कार्यों को निपटाने के बाद ही ऐसा कर सकेंगे अतः आप हमें कुछ समय दीजिए हम पुनः वापिस आकर आपके साथ कार्यरत रहेंगे।

इस प्रकार वे दोनों वापिस अपने गृहनगर आ जाते हैं और लगभग एक माह में अपने सारे लंबित कार्य समाप्त करके पुनः पंडित जी के पास गंजाऊ लौट जाते हैं। वहाँ लौट कर वे पूरी लगन और समर्पित भावना से अपने कार्य में जुट जाते हैं। उनकी लगन और कड़ी मेहनत से पंडित जी का रेस्टारेंट एक फूड चेन में बदल जाता है जिसकी कई शाखाएँ चीन के विभिन्न शहरों में खुल जाती है। अपनी मेहनत के कारण वे दोनों मित्र रसोइए से पंडित जी के भागीदार बन जाते हैं। इस प्रकार व्यक्ति अपनी मेहनत और लगन से तरक्की करके जमीन से उठकर उन्नति के शिखर पर पहुँच सकता है।

कर्तव्यपरायणता

एक बार बचपन में मुझे अपने पितामह स्व. गोविंददास जी के साथ जो कि तत्कालीन लोकसभा के सदस्य भी थे, सड़क मार्ग द्वारा भोपाल जाने का अवसर प्राप्त हुआ। रास्ते में एक स्थान पर रेल्वे फाटक बंद होने के कारण हमें वहाँ रूकना पड़ा। लगभग आधा घंटा व्यतीत हो गया और गाड़ी नहीं आने से फाटक नहीं खुला तो वे गाड़ी से उतरकर फाटक पर तैनात कर्मचारी के पास गये और उससे पूछा कि इतनी देर पहले से फाटक क्यों बंद कर दिया गया है। इससे लोगों को तकलीफ होने के साथ साथ समय भी बेवजह नष्ट हो रहा है। जब रेलगाड़ी आने में विलंब है तो इसे जनसुविधा के लिए खोल क्यों नहीं देते।

वह कर्मचारी उन्हें जानता था। उसने हाथ जोड़कर बहुत ही विनम्र वाणी में कहा कि सेठ जी आप तो स्वयं ही लोकसभा के सदस्य है और आप लोगों के माध्यम से ही यह नियम बनाया गया है कि रेलगाड़ी आने के आधे घंटे पहले से फाटक बंद कर दिया जाए। रेल्वे के नियमों के अनुसार जब तक गाड़ी निकल नहीं जाती, मैं फाटक खोलने में असमर्थ हूँ। मैं एक शासकीय कर्मचारी हूँ और नियमों को पालन करना मेरा कर्तव्य है। मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ कि आपका समय व्यर्थ नष्ट हो रहा है परंतु मैं कुछ भी कर पाने में असमर्थ हूँ। यह सुनकर पितामह को मन ही मन रेल्वे के ऐसे नियमों के प्रति काफी खीज हो रही थी और साथ ही उस रेल्वे कर्मचारी की कर्तव्य परायणता देखकर चेहरे पर मुस्कुराहट भी आ रही थी।

कुछ समय पश्चात उन्होंने इस संबंध में रेल मंत्रालय के उच्चाधिकारियों से संपर्क किया और इस समस्या का निवारण करवाकर फाटक बंद होने के समय को कम करवा दिया। इसके साथ ही साथ उस कर्तव्य परायण कर्मचारी को भी सम्मानित किया गया।

नेता जी

एक दिन शहर के एक धार्मिक स्थल पर रात में किसी शरारती तत्व द्वारा गंदगी फेंक दी गई और अवांछनीय पोस्टर भी धर्मस्थल पर चिपका दिये गये। दूसरे दिन सुबह जब धर्मावलंबियों ने यह देखा तो वे आगबबूला हो गये और क्रुद्ध हो गये एवं दूसरे धर्म के धर्मावलंबियो पर यह निंदनीय कृत्य करने का आरोप लगाने लगे। दोनों धर्मावलंबियों के बीच देखते ही देखते वाद विवाद बढ़ने लगा और आपस में मारपीट की स्थिति निर्मित होने लगी। उसी समय क्षेत्र के एक नेताजी दौड़े-दौड़े वहाँ पर आये और पूरा माजरा जानने के बाद दोनों पक्षों को समझाइश देने लगे एवं आपसी सद्भाव और एकता पर लंबा चौड़ा उद्बोधन दे दिया। इससे प्रभावित होकर दोनों पक्षों ने गंभीरतापूर्वक मनन किया की यह किसी शरारती तत्व द्वारा किया गया निंदनीय कृत्य है जिसका उद्देश्य दोनों समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाना था। अब नेताजी ने वहाँ साफ सफाई कराकर दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाकर वहाँ से चले गए। वहाँ पर उपस्थित सभी लोग नेताजी की सक्रियता से बहुत प्रभावित थे।

रात के अंधेरे में एक व्यक्ति चुपचाप अकेले नेताजी के घर आकर उन्हें बधाई देते हुए बोला कि आपका काम हो गया है। अब आपकी चुनाव में जीत सुनिश्चित है। नेताजी ने भी मुस्कुराकर उसे नोटों की गड्डी दी और अगले सप्ताह दूसरे मोहल्ले में ऐसा ही कृत्य करने का निर्देश दे दिया।

यम्मा

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त डॉ. मदन कटारिया द्वारा स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता हेतु देश एवं विदेश के कई प्रमुख शहरों में लाफ्टर क्लब की स्थापना की गई है। उनके जीवन का प्रेरणास्पद संस्मरण पूछने पर वे कहते हैं कि मानव को मानव से ही प्रेरणा प्राप्त हो यह जीवन में आवश्यक नहीं है। हमें जानवरों से भी जीवन जीने की प्रेरणा प्राप्त हो सकती है।

ऐसा ही एक उदाहरण उन्होंने बताया कि लगभग दस वर्ष पूर्व उनके पडोस में एक वृद्ध दंपति रहते थे, उनके पास भूरे बालों वाला एक सुंदर सा यम्मा नाम का कुत्ता था। वह दंपति कुत्तों के प्रति बहुत प्रेमभाव रखते थे और सड़क पर आवारा घूमने वाले कुत्तों के लिए भी भोजन का प्रबंध कर देते थे इतना ही नहीं बल्कि वे सभी कुत्तों को समय समय पर पशु चिकित्सालय ले जाकर उनका इलाज भी करवाते थे।

डॉ. कटारिया एक दिन प्रातः काल अपने लाफ्टर क्लब जाने के लिए निकल रहे थे तो उन्होंने देखा कि यम्मा जो कि बहुत सुंदर दिख रहा था परंतु उसका एक पांव खराब होने के कारण वे उसकी ओर सहानुभूतिपूर्वक देखते हुए अपने आप को उसके पास जाने से नहीं रोक सके। उन्हें जब पता हुआ कि उसकी यह दशा एक दुर्घटना के कारण हुई है तो उन्हें बहुत दुख हुआ। वे यह देखकर आश्चर्यचकित थे कि वह तीन पांव के बल पर भी अन्य सामान्य कुत्तों की तरह दौड़ लेता था और उसके चेहरे पर दुख या चिंता का कोई भाव नहीं था। उसकी आँखों से प्यार व स्नेह झलक रहा था। उनके मन में विचार आया कि मानव को यदि ऐसा कष्ट हो जाये तो उसका आत्मविश्वास टूट जाता है और वह निराश होकर अपने जीवन को बोझ समझने लगता है तथा उसके साथ साथ उसका पूरा परिवार भी हताश हो जाता है।

वह कुत्ता एक जानवर होकर भी अपना जीवन यापन अपने मालिक के प्रति समर्पित रहते हुए खुशी खुशी व्यतीत कर रहा था। इस दृश्य ने उनके मन में विचार जाग्रत किया कि यम्मा कितना साहसी कि इस अपंगता को भी सामान्य रूप लेकर अपना व्यतीत कर रहा है। उन्होंने इसे उदाहरण के रूप में अपने क्लब के सभी सदस्यों को अवगत कराया। एक दिन उन्हें पता हुआ कि किसी कार चालक की लापरवाही के कारण यम्मा की मृत्यु हो गई है। यह जानकर वे बहुत दुखी हुये परंतु आज भी उन्हें उसका आत्मविश्वास प्रेरणा देता है।

भिखारी की सीख

एक भिखारी ने, एक अमीर व्यक्ति से भीख माँगते हुए कुछ देने का अनुरोध किया। उस अमीर व्यक्ति ने कहा कि तुम तो अच्छे खासे, हट्टे कट्टे नौजवान हो, मेहनत करके धन क्यों नहीं कमाते ? यह भीख माँगने की आदत का त्याग करो और अपनी मेहनत की कमाई से जीवन यापन करो। वह भिखारी बोला कि वह दिनभर मेहनत मजदूरी करता है परंतु उसे मात्र दो सौ रूपये ही प्राप्त होते हैं। वह शाम को दो तीन घंटे भीख माँगकर उससे कही ज्यादा रकम प्राप्त कर लेता है इसलिये उसने भीख माँगना अपना व्यवसाय बना लिया है।

आप बुरा ना माने तो एक बात कहूँ, अमीर व्यक्ति बोला हाँ कहो। भिखारी ने कहा कि आप भी प्रतिदिन सुबह प्रभु से प्रार्थना करते समय मन ही मन यह माँगते हैं कि आज का दिन अच्छा व्यतीत हो और कामकाज में अच्छी कमाई हो। यदि इसे गंभीरता से सोचे तो आप दोनों हाथ जोड़कर भगवान से भीख ही माँग रहे होते हैं। मैं दोनों हाथ फैलाकर भगवान के नाम पर आपके निमित्त मानते हुए धन प्राप्ति की आशा करता हूँ, आप कुछ दे देंगें तो प्रभु से आपकी खुशी की दुआ माँगते हुए चला जाऊँगा।

उस अमीर व्यक्ति ने सोचा कि इसे भीख में कुछ ज्यादा धन दे दिया जाए तो यह खुश होकर मेरे लिए ज्यादा दुआ माँगेगा। यह सोचकर उन्होंने उसे पाँच सौ रूपये दे दिये। वह भिखारी मुस्कुराता हुआ यह कहकर कि काश आपने बिना किसी लालच के भिक्षा दी होती तो दुआएँ आपके लिए बहुत प्रभावी होती। किसी आशा एवं अपेक्षा में दिए गए किसी भी प्रकार के दान से पुण्य प्राप्ति की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया।

ईमानदारी

पिछले वर्ष दिसंबर के अंतिम सप्ताह में मुझे अपने कारोबार के संबंध में दुबई जाना था। उस दिन रविवार था और मैं दिल्ली एयरपोर्ट पर शाम 7 बजे की फ्लाइट का इंतजार कर रहा था। मैं अपना समय व्यतीत करने के लिए एयरपोर्ट के एक रेस्टारेंट में कॉफी पीने बैठ गया। मैंने बिल चुकाने के लिए जेब हाथ डाला तो मेरा पर्स नहीं मिला यह देखकर मेरे होश उड़ गये क्योंकि उसमें मेरा अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट कार्ड और दो लाख रू. मूल्य के अमेरिकन डॉलर थे। मैंने खूब ढूँढने की कोशिश की परंतु पर्स नहीं मिला। मैंने रेस्टारेंट के मैंनेजर से अपनी स्थिति बताते हुए प्रार्थना की, कि मैं दुबई वापिस आने पर आपका रूपया दे दूँगा। मैंनेजर बहुत ही सहृदय व्यक्ति था उसने मेरी बात मानली और अपने पास से भी मुझे कुछ डॉलर आवश्यक खर्च हेतु दे दिये। मैं बहुत निराश था एवं सबसे ज्यादा चिंता मुझे अंतर्राष्ट्रीय क्रेडिट कार्ड की थी।

मैं निराश कदमों से बोर्डिंग काऊंटर की ओर बढ़ रहा था तभी दरवाजे पर जब सिक्योरिटी को मैंने अपना बोर्डिंग कार्ड दिखाया तभी उसकी बगल में खड़े एक सफाई कर्मचारी ने मुझसे पूछा कि क्या आपका ही पर्स गुम गया था। मैंने कहा हाँ। वह कर्मचारी मेरा पर्स मुझे वापिस करते हुए बोला सर आपका पर्स मुझे वेटिंग हाल के पास पड़ा हुआ मिला था इसमें आपके विजिटिंग कार्ड से आपका नाम जानकर मैंने जानकारी ली तो मुझे मालूम हुआ की आप शाम 7 बजे की फ्लाइट से दुबई जा रहे है। इसलिये मैं इस काऊंटर पर आकर खड़ा हो गया ताकि आपको पहचान कर पर्स दे सकूँ आप इसमें रखे हुए रूपये अन्य एवं सामग्री जाँच ले। मैंने उसे धन्यवाद दिया और इनाम स्वरूप 5000 रूपये देने का प्रयास किया परंतु उसने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। मैं भी जल्दी में था इसलिये मैंने उसका पता एवं फोन नंबर अपने कार्ड पर लिख लिया और कहा मैं तुमसे जल्दी ही संपर्क करूँगा। इतना कहकर मैं अपनी फ्लाइट की ओर रवाना हो गया।

वापिस लौटने पर मैंने इस बात की चर्चा अपनी कंपनी के मैंनेजर से की तो उसका कहना था कि सर ऐसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ लोगों की तो हमें जरूरत है क्यों ना हम उसे अपनी कंपनी में नौकरी दें ? मैंनेजर का सुझाव मुझे भी बहुत पसंद आया और मैंने उस व्यक्ति से संपर्क करके उसे नौकरी देने का प्रस्ताव दिया। वह भी इस प्रस्ताव से अत्यंत प्रसन्न हुआ और कुछ दिनो बाद हमारी कंपनी में नौकरी करने लगा। अपनी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के कारण वह एक वर्ष में ही कंपनी में उच्च पद पर कार्य करने लगा।

उपकार

कोलकाता महानगर में मदिरा की एक दुकान के सामने एक व्यक्ति अधिक मदिरा के सेवन के कारण सड़क पर पड़ा अर्धविक्षिप्त अवस्था में लोट रहा था। उसके आसपास आने जाने वाले उसे देखकर हंसकर उसका मजाक उड़ाते हुए चले जाते थे, परंतु कोई भी उसकी मदद करने के लिए आगे नहीं आ रहा था। उसी समय एक लड़का वहाँ से गुजरा यह दृश्य देखकर द्रवित होकर उसने उस व्यक्ति को उठाकर किसी तरह पास ही के अस्पताल में ले गया। वहाँ उसे चिकित्सा कक्ष में ले जाकर चिकित्सक ने उसका इलाज शुरू कर दिया। चिकित्सक ने उस लड़के को बताया कि यदि थोडी देर और हो जाती तो इसकी जान बचाना मुश्किल था। तुमने बहुत परोपकारी कार्य किया है। तुम्हारे इस प्रशंसनीय कार्य को देखते हुए मैं तुम्हें कुछ रूपये इनाम में देना चाहता हूँ। इतना कहते हुए चिकित्सक ने अपना पर्स निकाला और उसमें से कुछ रूपये निकालकर उसे देना चाहा तभी वह बोला कि मैंने अपना फर्ज निभाया है, इसलिये मुझे किसी भी प्रकार की धनराशि लेने की आवश्यकता नहीं है। उसकी बात सुनकर वह चिकित्सक बहुत प्रभावित हुआ और उससे उन्होंने पूछा कि मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ। उस लड़के ने विनम्रतापूर्वक कहा कि मुझे नौकरी की नितांत आवश्यकता है मेरे घर में एक बूढ़ी माँ और मेरी बहन है एवं हम आर्थिक कठिनाईयों में रह रहे है। यह सुनकर डॉक्टर ने उसे अपने यहाँ नौकरी दे दी और धीरे धीरे उसे शिक्षा दिलाते हुए कंपाऊंडर की डिग्री दिला दी। उसे अपने ही चिकित्सालय में कंपाऊंडर की नौकरी देकर उसे स्वावलंबी बना दिया। वह भी आजीवन उनके यहाँ ही नौकरी करता रहा। इसलिये कहते हैं कि परोपकार का कार्य करने से कही ना कही ईश्वर की कृपा व्यक्ति पर हो जाती है।

नियति

डॉ. मोहन चोपड़ा दिल्ली के एक प्रसिद्ध चिकित्सक है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा जबलपुर में प्राप्त की है एवं ग्वालियर मेडिकल कॉलेज से एम.बी.बी.एस की उपाधि प्राप्त कर टाइम्स ऑफ इंडिया समूह में अपनी सेवाएँ प्रदान की है। वे अपने जीवन में घटी एक घटना के संबंध में बताते हैं कि एम.बी.बी.एस में दाखिले हेतु आयोजित प्रवेश परीक्षा में सफल होने के पश्चात वे प्रतिदिन मेडिकल कॉलेज जाते थे।

उनका एक घनिष्ठ मित्र जो कि दुर्भाग्यवश उस परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सका वह उन्हें प्रतिदिन अध्ययन हेतु जाते हुये देखकर बहुत दुखी हो जाता था। इस कारण वह हीनता की भावना से ग्रस्त होकर अवसाद की स्थिति में आ गया और अपनी जीवनलीला समाप्त करने की सोचने लगा। ऐसी विषम परिस्थितियों में डॉ. चोपड़ा एवं उनके उस मित्र के अभिभावकों ने उसे बहुत समझाया जिससे प्रेरित होकर उसने स्नातक की डिग्री लेकर आई.ए.एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की एवं शासकीय सेवा में कार्यरत हो गया।

वे बताते हैं कि आज वह जिस पद पर कार्यरत है, अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है एवं डॉ. चोपरा को धन्यवाद देता है कि उसके खराब दिनों में भी उसका साथ ना छोड़ते हुये उसे संबल प्रदान किया। आज समाज में उसकी काफी मान प्रतिष्ठा है। जिसे देखकर मैं बहुत प्रसन्नता का अनुभव करता हूँ।

मेरा युवाओं को यही संदेश है कि जीवन में किसी भी क्षेत्र में असफल हो जाने का मतलब जीवन से विरक्ति नहीं होनी चाहिये। हमें अन्य क्षेत्रों में अपना ध्यान देते हुये मेहनत, लगन और परिश्रम एवं समर्पण से उस दिशा में ईश्वर पर विश्वास रखते हुये कड़ी मेहनत करके सफलता प्राप्त करनी चाहिये। यही जीवन की नियति है।

एक नया सवेरा

हिम्मत सिंह नाम का एक व्यापारी था जो अपनी एक मात्र संतान के लिए अच्छी व सुयोग्य वधु की तलाश कर रहा था। एक दिन वह अपने व्यापार के सिलसिले में एक शहर की ओर जा रहा था तभी शाम का वक्त हो गया और अंधेरा घिर आया। वह निकट के गांव में पहुँचा और पता करने पर उसे मालूम हुआ कि वहाँ पर रूकने के लिए कोई धर्मशाला या सराय नहीं है। वह इलाका काफी खतरनाक माना जाता था और अक्सर डाकू वहाँ से आया जाया करते थे। वह विकट परिस्थिति में उलझ गया था। उसे आगे और पीछे आने जाने में खतरा था जिससे गांव वालों ने आगाह कर दिया था। उसके इस वार्तालाप और चिंता को एक लड़की भांप गयी और उसने आकर उससे निवेदन किया कि आप आज रात हमारी झोपडी मे विश्राम कर ले। हिम्मत सिंह ने ऐसा ही किया और उस लड़की एवं उसके परिवार के प्रति आभार व्यक्त करता हुआ रात्रि विश्राम के बाद सुबह अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गया।

हिम्मत सिंह को एक माह के बाद अचानक ही याद आया कि वह मोहरों की एक थैली उसी झोपड़े में जल्दबाजी में भूलकर आ गया है। यह ध्यान आते ही वह वापिस उस स्थान पर पहुँचता है और झोपडी में अंदर आते ही लड़की की माँ ने उसे पहचानते हुए कहा कि भईया बहुत अच्छा हुआ कि आप आ गये। आपकी मोहरों की थैली यही रह गयी थी। हमारे पास आपका कोई पता ठिकाना नहीं होने के कारण हम इसे आप तक भिजवाने में असमर्थ थे आपकी वह धरोहर मेरी बेटी कल्पना के पास सुरक्षित रखी है। उसकी बेटी ने आकर वह थैली वैसी की वैसी हिम्मत सिंह को सौंप दी। इस ईमानदारी से हिम्मत सिंह बहुत प्रभावित हुआ और उसने लड़की की सुंदरता, गुणों एवं उसके व्यवहार को देखते हुए अपने पुत्र का विवाह उससे करके उसे अपने घर की पुत्रवधू बना लिया।

शहादत और समाज

रणभूमि में हमारी रणसेना रण के लिए किसी भी चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार खडी है। युद्ध का बिगुल बज गया और शांत घाटी में गोलियों, तोप के गोलों और मानवीय ललकार की गूंज गूंजने लगी। भारतीय सेना ने यह प्रण करके कि हम दुश्मन की भूमि में घुसकर उन्हीं के अस्त्र शस्त्रों को कब्जे में लेकर उनको पराजित कर देंगे। उन्होंने शंखनाद करते हुए उनके हमले का प्रत्युत्तर दिया और उन्हें परास्त करके उस चौकी पर अपना कब्जा कर लिया। हमारी सेना को इस बात की खुशी थी कि दुश्मन सिर पर पांव रखकर भाग गया पर उन्हें इस बात का दुख भी था कि हमारे कुछ सैनिक युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हो गये।

उनके शव यथोचित सम्मान के साथ उनके घरों पर पहुँचाये गये। तब आसपास के पूरे कस्बे के लोग उनके नाम की जय जयकार करते हुए उनकी शहादत अमर रहे के नारों के साथ भारी भीड उन वीर सैनिकों के अंतिम संस्कार में शामिल हुयी। उन्हीं वीर सैनिकों में से एक सैनिक रवि की पत्नी एक ओर जहाँ गमगीन थी वहीं दूसरी ओर मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने पति के शहीद हो जाने पर गर्व का अनुभव भी कर रही थी। उसके माता पिता ने अपना बेटा, पत्नी ने अपना पति खो दिया और उसकी एकमात्र दो साल की बच्ची आज अनाथ हो गई। शवयात्रा में शामिल सभी लोग उनके परिवारजनों सांत्वना देते हुए अपने अपने घर चले गये। उन्हें कुछ समय के बाद केंद्रीय शासन एवं राज्य शासन के द्वारा अनुदान राशि प्राप्त हो गई। जिसका उपयोग उन्होंने अपने परिवार के लालन पालन एवं बच्ची की शिक्षा हेतु कर लिया।

बीस वर्ष के उपरांत जब वह बच्ची बडी हो गयी तो उसके विवाह के लिये उपयुक्त वर खोजना प्रारंभ हुआ और उनके परिवार को यह जानकर बहुत दुख क्षोभ और आश्चर्य हुआ कि समय में इतना परिवर्तन हो चुका था कि अब उस बच्ची के पिता की शहादत लेग भूलकर, दहेज के लोभी हो चुके थे। जहाँ भी उसके रिश्ते की बात होती वहाँ पर उसकी उच्च शिक्षा, व परिवार को शासन द्वारा प्रदत्त मेडल की परवाह ना कर दहेज की माँग पहले रख दी जाती। उनका परिवार अपनी बच्ची की शादी किसी भी दहेज लोभी के साथ करने के लिए तैयार नहीं था। उनके मन में अपनी बच्ची की सुंदरता और गुण देखकर बच्ची की शादी किसी उच्च कुलीन घराने में करने की प्रबल अभिलाषा थी परंतु अंत में यह संभव ना होकर एक कम पढ़े लिखे मध्यमवर्गीय परिवार के लड़के के साथ जिसकी दहेज की कोई माँग नहीं थी के साथ संपन्न करना पड़ा।

दहेज की यह कुप्रथा आज भी समाज को मानसिक गुलामी में जकड़े हुये है जिससे समाज के प्रतिभावान बच्चे धन के अभाव में अपेक्षित वर को न पाकर समझौतावादी दृष्टिकोण को अपनाकर मन को संतुष्ट कर लेते हैं।

जागरूकता

यह बात लगभग तीस वर्ष पुरानी है जब कोलकाता में हिंदुस्तान मोटर्स का एंबेस्डर कार बनाने का कारखाना हुआ करता था। उस कारखाने के मालिक बिड़ला जी एक बार दमदम एयरपोर्ट पर अपने विमान के निर्धारित समय से पहले आ जाने के कारण अपनी गाड़ी आने का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने मन में सोचा कि समय क्यों बेकार नष्ट किया जाए। आज टैक्सी लेकर ऑफिस चले जाते हैं और उन्होंने ऐसा ही किया और वे टैक्सी में रवाना हो गया।

रास्ते में बिड़ला जी ने समय व्यतीत करने के लिए टैक्सी ड्राइवर से बातचीत शुरू की, बातचीत के दौरान पता हुआ कि वह टैक्सी वाला उच्च शिक्षित व्यक्ति था जो कि नौकरी ना करके अपने स्वयं के व्यवसाय में रूचि के कारण यह कार्य कर रहा था। उन्होंने चर्चा के दौरान महसूस किया कि गाड़ी अत्यधिक आवाज कर रही थी एवं बैठने पर कंपन भी महसूस हो रहा था। उन्होंने ड्राइवर से कहा कि क्या तुम गाड़ी की उचित देखभाल नहीं करते हो जिस कारण इतनी आवाज कर रही है। तब वह टैक्सी ड्राइवर बोला कि यह गाड़ी अभी पिछले हफ्ते ही मैंने नई खरीदी है। उसके यह कहने पर कि उसका अनुभव है कि इस कार में हार्न के अलावा और सब कुछ आवाज करता है। इसमें ऐसी कोई विशेषता नहीं है, जिसके लिए इसकी तारीफ की जा सके। यह तो मजबूरी है कि और कोई कार उपलब्ध ना होने के कारण हमें यही खरीदना पड़ती है। यह सुनकर बिड़ला जी को मन ही मन बहुत दुख हुआ।

इस वार्तालाप के दौरान ही उनका ऑफिस आ गया और वे उतर गये। उन्होंने अपने निजी सचिव को बुलाकर निर्देश दिया कि उनके निजी उपयोग के लिए जो गाड़ी कंपनी से आज ही भेजी गयी है उसकी चाबी इस व्यक्ति को दे दी जाए एवं गाड़ी का रजिस्ट्रेशन भी इस व्यक्ति के नाम करवाकर यह गाड़ी इसे सौंप दी जाए। इतना कहकर वे तेजी से अपने ऑॅफिस की ओर चले गए। वह टैक्सी ड्राइवर यह सब देखकर आश्चर्यचकित हो गया और उसने उस कर्मचारी से पूछा कि यह साहब जो मेरी टैक्सी से उतरे हैं वे कौन है ? जब उसे पता हुआ कि वे इस कंपनी के मालिक है तो उसकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। कुछ समय बाद वह उनके प्रति धन्यवाद व्यक्त करता हुआ और उनके स्वभाव की प्रशंसा करता हुआ चला गया।

इस घटना के बाद बिडला जी ने कंपनी सारे अधिकारियों की मीटिंग ली और उन्हें अपने अनुभव से अवगत कराया और उत्पादन की गुणवत्ता के सुधार हेतु कड़ी हिदायत दी जिससे कंपनी की कार्यप्रणाली में जागरूकता आकर कार्य की गुणवत्ता में काफी सुधार हो गया।


(क्रमशः अगले भाग 6 में जारी...)

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