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डॉ. रंजना जायसवाल की 6 लघुकथाएँ

डॉ. रंजना जायसवाल की 6 लघुकथाएँ

कीमत

वह हँस रही थी उसकी हँसी पर मुझे आश्चर्य हो रहा था। क्या कोई ऐसे हालात में भी हँस सकता है ?पर यह सच था कि वह हँस रही थी। उसके चेहरे पर कोई पश्चाताप नहीं था। उसने दूसरी लड़कियों की तरह अपने चेहरे को ढंका तक नहीं था। एक फार्महाउस से वह कुछ अन्य लड़कियों के साथ अमीरज़ादों से रंगरेलियाँ मनाते पकड़ी गयी थीं।

मैंने उससे पूछा –तुम यह गंदा धंधा क्यों करती हो ?

वह हँस पड़ी –धंधा तो धंधा है मैडम जी। आपकी तरह पढ़ी-लिखी नहीं हूँ कि कोई नौकरी करती। मेरे पास बस यह देह है ,इसलिए इसी को बेचती हूँ।

-तुम जानती नहीं देह बेचना गैर कानूनी है।

‘अजीब बात है। यह मेरी देह हैं बेचूँ या चाहें जो करूँ पर इस पर भी मनाही है। ’

-तुम्हें शरीफ लड़की की तरह अपने घर में रहना चाहिए और अपना घर -परिवार बसाना चाहिए ...।

‘और मुफ्त में लुटते रहना चाहिए ....। बचपन में मेरे सगे मामा ने मुझे लूटा ...किशोरावस्था में प्रेमी ने। फिर किसी न किसी नाम से लूटी ही जाती रही वह भी मुफ्त में। न पेट भरता था न देह की भूख ही मिटती थी, उस पर बदनाम भी हो गयी। एक दिन एक औरत ने यह रास्ता दिखाया। देह की कीमत समझाई उसको वसूलने का ढंग समझाया तो इधर आई पर पुलिस ने पकड़ लिया। यह भी खूब न्याय है।

मुफ्त में लुटती रहूँ तो ठीक ,पर कीमत वसूल करूँ तो बुरा।

मैं हतप्रभ थी।

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चालाक स्त्री

‘’वह भारत की पहली महिला नाई है,जो पुरूषों का सैलून चलाती है ...। ’’

--तब तो खूब भीड़ लगती होगी।

‘’हाँ,शुरू में तो लोग झिझकते थे पर अब भीड़ बढ़ गयी है। ’’

--जाहिर है ,पुरूषों की यह प्रवृति होती है कि कोई पहल करे फिर तो मजा ही मजा ...।

“’’क्या मतलब है आपका ...?उस सैलून में पुरूष मजे के लिए जा रहे हैं ?’’

--और क्या !स्त्री चेहरा पकड़कर दाढ़ी बनाए ,बाल काटे ,चंपी करे तो भला पुरूष .....।

‘’शर्म नहीं आती आपको ?वह स्त्री अपने पति की मृत्यु के बाद बच्चों की परवरिश के लिए पति का सैलून चला रही है और आप....। यह क्यों नहीं कहते –कितने साहस की बात है। ”

--साहस नहीं ...पैसा कमाने का नया तरीका ....। वह चालाक स्त्री है। पुरूषों की कमजोरी से वाकिफ है ...। दूसरे कामों में उसे इतना लाभ नहीं होता ...। मुझे लगता है लोग जरूरत न होने पर भी बार-बार दाढ़ी बनवाने जाते होंगे।

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ज़ोर का झटका

--तुम्हें देह बेचते शर्म नहीं आती –लड़के ने नाराजगी से पूछा।

-तुम्हें खरीदते आती है ? मेरे पास तो बेचने के लिए सिर्फ यह शरीर है ,इसलिए मजबूरी में इसे ही बेचना पड़ता है। पर तुम्हें तो ऐसी कोई मजबूरी नहीं। सब कुछ है तुम्हारे पास ...जैसा कि तुमने ही बताया है ,फिर क्यों रेड एरिया तुम्हें प्रिय है ?

---मैं तो मर्द हूँ मुझे क्या ?पर तुम स्त्री हो और स्त्री को अपनी देह को पवित्र रखना जरूरी है। तुम तो देह का व्यापार करती हो और यह पाप है। तुम घोर नर्क में गिरोगी।

-तो क्या मर्द की देह अपवित्र नहीं होती ?क्या उसे देह खरीदने से पाप नहीं लगता ?वह नर्क में नहीं गिरता ?किस किताब में ऐसा लिखा है ?हाँ, मर्दों की लिखी किताबों में ऐसी दोहरी नीति हो सकती है ,तो जला दो ऐसी किताबों को ,जो स्त्री और पुरूष के लिए अलग नियम बनाती हैं। ऐसे किसी धर्म और शास्त्र की हमें जरूरत नहीं है।

--दो टके की वेश्या होकर भी तुम हमारे ग्रन्थों पर अंगुली उठाती हो ...मर्दों से बराबरी की बात करती हो .....तुम्हारी खैर नहीं।

कहते हुए वह उसे मारने को लपका।

वह पीछे हट गयी और गुर्राकर बोली –अपनी बीबी मत समझ मुझे .....चल निकल यहाँ से ...जाकर देख कहीं तेरी बीबी पर्दे की आड़ में वही न कर रही हो ,जो तू यहाँ करने आता है। तुम लोग तो अपना देह खाली करने के लिए इधर-उधर घूमते हो और देह की भरी तुम्हारी औरतें भूख-प्यास से बिलबिलाती रहती हैं और पर्दे में ज़र्दा लगा बैठती हैं। तुम लोगों को पता भी नहीं चल पाता कि ......।

पत्नी के नाम लेने पर उसे बहुत गुस्सा आ रहा था पर वह खून का घूंट पीकर रह गया। सोचा इस बदजात के मुंह क्या लगना ?इसकी तो कोई इज्जत है नहीं। पर कहीं बात बढ़ी और मैं इस एरिया में पकड़ा गया तो बनी-बनाई इज्जत खाक में मिल जाएगी। वह तेजी से वहाँ से निकला और अपने घर की तरफ चला। वेश्या की बातें उसके दिमाग को खराब किए जा रही थीं। हमेशा पूजा-पाठ में डूबी रहने वाली अपनी पतिव्रता स्त्री का उसे बार-बार ख्याल आ रहा था। कोई तुलना है दोनों में ?वह पवित्र गंगा और यह गदला नाला !वह भी कहाँ प्यास बुझाने चला आता है। अब वह ऐसा नहीं करेगा।

आज वह घर जल्दी पहुँचकर पत्नी को चौंका देगा। कितनी खुश हो जाएगी वह। उसे याद भी नहीं है कि कितने महीने पहले उसने उसे छुआ था। कुछ भी हो मुँहफट वेश्या ने उसे पत्नी की जरूरत और उसके पूरे न होने पर आगत खतरे का एहसास करा दिया था।

पत्नी को सरप्राइज़ देने के उद्देश्य से वह घर के पिछवाड़े से अपने कमरे तक आया। कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था और अंदर से उसकी बीबी की खिलखिलाहट बाहर आ रही थी। उसने ध्यान से सुना उसकी हंसी में उसके जवान भाई का स्वर भी मिला हुआ था।

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अच्छे पापा

दिन भर दफ्तर में खटकर मैं जल्दी-जल्दी घर लौट रहा था। बार-बार बेटे का चेहरा आँखों के सामने डोल जाता। आठ साल का गोलू-मोलू सा बेटा पप्पू ...इधर नाराज होना सीख गया है। जब से पड़ोस में एक इंजीनियर साहब रहने को आए हैं ,मैं परेशान हो गया हूँ। पप्पू की उम्र का उनका एक बेटा है गोल्डी।

इंजीनियर साहब के पास सुख-साधनों का अंबार है। पप्पू का मन उधर खिंचता है। मैं अदना सा क्लर्क प्यार से उसकी कमी पूरी करने में लगा रहता हूँ।

घर पहुँचते ही मैंने आवाज लगाई –पप्पू बेटा कहाँ हो ?इधर आओ। पर पप्पू नहीं आया। मुझे आश्चर्य हुआ। पत्नी ने बताया –‘आज फिर रूठा हुआ है। ’ मैं उसके पास गया तो मुझे देखकर उसने अपना मुंह घुमा लिया।

-क्या बात है ?मैंने उसे गोद में उठाने की कोशिश की ,पर वह दूर छिटक गया। ज़ोर से बोला—मुझे मत छुइए....आप गंदे पापा हैं।

‘क्यों ?क्या किया है मैंने ?’

-आप मुझे वीडियो गेम लाकर नहीं देते। नयी साइकिल भी नहीं खरीद रहे ...आप गंदे हैं ....।

‘लेकिन हम प्यार भी तो करते हैं आपसे ...आपके साथ खेलते भी हैं। ’

-हमें नहीं चाहिए झूठ-मूठ का प्यार ...। गोल्डी के पापा कितने अच्छे पापा हैं ,उसे हमेशा नयी चीजें दिलाते रहते हैं। आप गंदे पापा हैं ....।

मैं हतप्रभ था।

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इज्जत


शाम के धुंधलके में एक स्त्री तेजी से सुनसान गली को पार कर रही थी कि अचानक एक उचक्का चाकू लिए उसके सामने आ गया। बोला -'जो कुछ पास में है ,चुपचाप निकाल दो। 'कहते हुए उसने स्त्री की देह पर नजर डाली। उसकी देह पर उतारने लायक कुछ ना था। हाँ,एक छोटे से बटुए को वह अपने ब्लाउज के अंदर छिपाए हुए थी।
'बटुआ निकालो -वह गरजा।
स्त्री ने कस कर अपने ब्लाउज को पकड़ लिया और गिड़गिड़ाई -इसे मैं नहीं दे सकती। कभी ,किसी हालत में नहीं। उचक्के ने सारे दाँव-पेंच आजमा डाले। जान ले लेने से लेकर तेज़ाब से चेहरा बिगाड़ देने की धमकी दी ,पर स्त्री टस से मस नहीं हुई। तब उसने सोचा -स्त्री को अपनी इज्जत से सबसे ज्यादा प्यार होता है,इसे खोकर वह जीना भी नहीं चाहती।
वह चेहरे पर क्रूर भाव लाकर हँसा-दे दो बटुआ ,वरना तुम्हारी इज्जत लूट लूँगा।
स्त्री नहीं डरी। उदासीन भाव से बोली -'लूट लो भैया। लूटी हुई इज्जत एक बार और लूट जाएगी,तो क्या फर्क पड़ेगा ?मैं तो वैसे भी मरी हुई हूँ। पर यह बटुआ नहीं दूंगी। इसमें जो रूपए हैं, वह मेरे बीमार बच्चे के इलाज के लिए हैं और इसे अपनी इज्जत बेच के लाई हूँ। 'कहते हुए वह फफक पड़ी,उचक्के के हाथ से चाकू छूटकर गिर पड़ी।

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काठ की हांडी

घर में एक साथ ही दोनों मौतें हुई थी। चाची की और जीजा जी की। दीदी की शादी को मात्र दो ही वर्ष हुए थे वे अभी अठारह साल की ही थीं। चाची पैंतीस साल की दो किशोर बच्चों की माँ। घर में कुहराम मचा हुआ था। समय के साथ शोक कुछ कम हुआ तो चाचा के विवाह के लिए रिश्ते आने लगे। दादी बहुत खुश थीं बस उनकी शर्त थी कि लड़की विधवा या परित्यक्ता न हो खैर एक गरीब लड़की मिल गयी। चाचा जी का घर फिर से बस गया।

दो वर्ष बाद दीदी की शादी के लिए एक प्रस्ताव आया। लड़के ने स्वयं आग्रह किया था। वह दीदी के साथ ही पढ़ता था। घर में कुहराम मच गया। दादी ने रो-रोकर आसमान सिर पर उठा लिया। माँ ने बेटी की पूरी जिंदगी का वास्ता देकर कुछ कहना चाहा तो दादी ने उन्हें डपट दिया।

मैंने उन्हें इक्कीसवीं सदी और विधवा विवाह के लिए बने क़ानूनों के बारे में बताया तो कहने लगीं---‘केतनों कानून बन जाए ...कौनों सदी आ जाए ...काठ के हांडी दो बार चूल्हे पर नहीं चढ़ती है। ’

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व्यक्तिगत परिचय

जन्म – ०३ अगस्त को पूर्वी उत्तर-प्रदेश के पड़रौना जिले में।

आरम्भिक शिक्षा –पड़रौना में।

उच्च-शिक्षा –गोरखपुर विश्वविद्यालय से “’प्रेमचन्द का साहित्य और नारी-जागरण”’ विषय पर पी-एच.डी।

प्रकाशन –आलोचना, हंस, वाक्, नया ज्ञानोदय, समकालीन भारतीय साहित्य, वसुधा, वागर्थ, संवेद सहित राष्ट्रीय-स्तर की सभी पत्रिकाओं तथा जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान इत्यादि पत्रों के राष्ट्रीय, साहित्यिक परिशिष्ठों पर ससम्मान कविता, कहानी, लेख व समीक्षाएँ प्रकाशित।

अन्य गतिविधियाँ-साहित्य के अलावा स्त्री-मुक्ति आंदोलनों तथा जन-आंदोलनों में सक्रिय भागेदारी।२००० से साहित्यिक संस्था ‘सृजन’के माध्यम से निरंतर साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन। साथ में अध्यापन भी।

प्रकाशित कृतियाँ –

कविता-संग्रह –

मछलियाँ देखती हैं सपने [२००२]लोकायत प्रकाशन, वाराणसी

दुःख-पतंग [२००७], अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद

जिंदगी के कागज पर [२००९], शिल्पायन, दिल्ली

माया नहीं मनुष्य [२००९], संवेद फाउंडेशन

जब मैं स्त्री हूँ [२००९], नयी किताब, नयी दिल्ली

सिर्फ कागज पर नहीं[२०१२], वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली

क्रांति है प्रेम [2015]वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली

स्त्री है प्रकृति [2018]बोधि प्रकाशन, जयपुर

कहानी-संग्रह –

तुम्हें कुछ कहना है भर्तृहरि [२०१०]शिल्पायन, दिल्ली

औरत के लिए [२०१३]बोधि प्रकाशन, जयपुर

लेख-संग्रह –

स्त्री और सेंसेक्स [२०११]सामयिक प्रकाशन, नयी दिल्ली,

तुम करो तो पुण्य हम करें तो पाप [2018]नयी किताब, दिल्ली।

उपन्यास –

....और मेघ बरसते रहे ..[२०१३], सामयिक प्रकाशन नयी दिल्ली

त्रिखंडिता [2017]वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली।

संकलनों में रचनाएँ

कई महत्वपूर्ण संकलनों में कविताएं शामिल।

1-स्त्री सशक्तिकरण और भारतीय साहित्य –डा0 राजकुमारी गड़कर, आलेख प्रकाशन 2010

आलेख -स्त्री सशक्तिकरण और हिन्दी साहित्य, पृष्ठ 211-214

2-स्त्री सृजनात्मकता का स्त्री पाठ -डा0संदीप रणभिरकर, कल्पना प्रकाशन, 2016

आलेख-स्त्री कविता की दुश्वारियां, 293-299

3-यथास्थिति से टकराते हुए [दलित जीवन से जुड़ी कविताएं], लोकमित्र प्रकाशन, 2013—अनीता भारती, बजरंग बिहारी तिवारी

कविताएं, 236-240 --चलो होरी, जन-जागरण, वल्दियत, ललमुनिया, चींटियाँ

4-सामाजिक विमर्श के आईने में चाक –विजय बहादुर सिंह, राजकमल प्रकाशन, 2014

आलेख-स्त्री के जनतंत्र की संकल्पना –‘चाक’, 94-106

5-स्त्री होकर सवाल करती है [काव्य-संकलन ], डा0लक्ष्मी शर्मा बोधि प्रकाशन, 2012

कविताएं-273-277-माँ का प्रश्न, इंसान, स्त्री

6-समकालीन हिन्दी कविता, आलोक गुप्त, हिन्दी साहित्य अकादमी, 2011

स्त्री कविता, मैं औरत हूँ, गुठली आम की, 144-146

7-यथास्थिति से टकराते हुए [दलित –स्त्री –जीवन से जुड़ी कहानियाँ, अनीता भारती, बजरंग बिहारी तिवारी, लोकमीटर प्रकाशन, 2012

कहानी –सिलसिला जारी है, 199-204

अन्य उपलब्धियां

तमिल-टेलगू, मराठी, अङ्ग्रेज़ी आदि कई भाषाओं में कविताओं का अनुवाद

आउट लुक द्वारा राष्ट्रीय स्टार पर कराए गए सर्वे में 4 महत्वपूर्ण महिला कवियों में शामिल। देश के कई विश्व-विद्यालयों में कविताओं पर शोध कार्य|

सम्मान

अ .भा .अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कार[मध्य-प्रदेश]पुस्तक –मछलियाँ देखती हैं सपने|

भारतीय दलित –साहित्य अकादमी पुरस्कार [गोंडा ]

स्पेनिन साहित्य गौरव सम्मान [रांची, झारखंड]|पुस्तक-मछलियाँ देखती हैं सपने।

विजय देव नारायण साही कविता सम्मान [लखनऊ, हिंदी संस्थान ]पुस्तक –सिर्फ कागज पर नहीं।

भिखारी ठाकुर सम्मान [सीवान, बिहार ]

संपर्क –सृजन-ई.डब्ल्यू.एस-२१०, राप्ती-नगर-चतुर्थ-चरण, चरगाँवा, गोरखपुर, पिन-२७३013।

| ईमेल-dr.ranjana.jaiswal@gmail.com

1 टिप्पणियाँ

  1. रजना जी मैंने आपकी सारी लघु कथाएं पढ़ी हैं, समाज के कायदा क़ानूनों पर एक करारा थप्पड़ है !
    अच्छी शिक्षाप्रद कहानियां लिखती हैं आप ! साधुवाद !

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