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देवेन्द्र कुमार पाठक के बरसाती दोहे व नवगीत

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बादल, बिजुरी, बारिशें, काई, कीचड़, बाढ़.

चौमासे की त्रासदी लिखता है आषाढ़.

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बीज-जुताई, खाद का ऋण ही जुगत-जुगाड़.

खातों में फूलें-फलें क़र्ज़-ब्याज के झाड़.

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पर्वत रोक न पा रहे जल-मेघों की राह.

कटे पेड़-वन हो गयी धरती बहुत तबाह.

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आंधी में छानी ढही बारिश में दीवार.

ढंकी-मुंदी मरजाद अब आँगन खड़ी उँघार.

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धरती है प्यासी बहुत गिरे न बादल-बूँद.

सोया है आषाढ़ क्यों अब तक आँखें मूँद.

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कीच, कंस-कुश से रही बड़ी पुराणी प्रीत.

हल-हंसियों की ताल हम गाते श्रम-गीत.

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आँधी,बारिश,शीत,लू प्यास,पसीना,घाम.

सह-तप काया श्रमिक की बन जाती श्रम-धाम.

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श्रम की स्याही से लिखें खुद अपनी तक़दीर.

मिली हमें हक-भाग में हलकानी, दुःख, पीर.

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कविता (नवगीत)-

आत्मदाह कर मरे पोखरे

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हम सावन में न हरियाये

और न जेठ झुराये,

हाँ, रैली,घेराव,धरने में

खूब पुलिसिये डंडे खाये;

हम अपनी क्या कहें कहानी,

इसमें कोई न राजा-रानी!


कहो तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या?

कॉमरेड इस दौड़-होड़ में,

कूद-फाँद कर रहे बहुत तुम

खीँच-तान में,जोड़-तोड़ में;

आग लगाकर चिल्लाते हो

दौड़ो-दौड़ो कुँआ खोदने,

डालो पानी आग बुझाओ,

जली जा रही है राजधानी!


मर-खप गये पालकी ढोते

लेकिन कुंभ नहा न पाये,

उनके हाथ-अंगुलियाँ महकें

जिनके पुरखे थे घी खाये;

आत्मदाह कर मरे पोखरे,

हम नदियों की रेत निचोड़ें;

चढ़ी दुपहरी स्वेद नहाये

तप करते हम औघड़दानी!


रहे सींचते खेत खून से

लस्त-पस्त पांवों के छाले,

हाड़ जुड़ाती लम्बी रातें

काट रहे उम्मीदें पाले;

पाला पिटी ख्वाहिशों की

भरपाई सैकड़ा और दहाई;

अच्छे दिन के दावे करती

लचर दलीलें पीटें पानी!


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1315,साईं पुरम् कॉलोनी

,रोशननगर,पोस्ट साइंस कॉलेज डाकघर-कटनी,483501, म.प्र.

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