कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग - 8 // राजेश माहेश्वरी

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कहानी संग्रह तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) राजेश माहेश्वरी पिछले भाग 7 से जारी... सुंदरता जबलपुर के एक प्रसिद्ध ...

कहानी संग्रह

तर्जनी से अनामिका तक

( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )

राजेश माहेश्वरी

कहानी संग्रह //  तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )  // राजेश माहेश्वरी

पिछले भाग 7 से जारी...


सुंदरता

जबलपुर के एक प्रसिद्ध महाविद्यालय में सहशिक्षा के माध्यम से बी.कॉम की पढ़ाई होती थी। इसके वार्षिक समारोह में प्रस्तुति देने हेतु छात्र छात्राएँ सज-धज कर आये हुए थे। उनके बीच में यह चर्चा चल निकली कि कौन सबसे आधुनिक, सुसंस्कृत एवं सुंदर कपड़े पहना हुआ है। उसी समय उनके नृत्य के शिक्षक तैयारियाँ देखने के लिए आये। उन्हें देखकर सभी छात्र छात्राओं ने उनसे अनुरोध किया कि आप इस बात का फैसला करें कि हम सब में कौन सा छात्र एवं कौन सी छात्रा का परिधान सबसे सुंदर है ?

उन्होंने सभी उपस्थिति जनों को विद्यालय के बाहर बैठे एक गरीब लड़के की ओर ध्यान देने का निवेदन करते हुए कहा कि देखो वह गरीब लड़का इस गर्मी में भी अकेला बैठकर प्यासे लोगों को पानी पिलाने हेतु प्याऊ खोलकर बैठा है। उसके साथ साथ जो अपाहिज और विकलांग लोग सड़क को पार करना चाहते हैं उनकी भी मदद करके उन्हें सड़क पार करा रहा है। वह कितना अच्छा काम कर रहा है उसके मन की भावनायें कितनी अच्छी है। तुम लोग आपस में बाहरी सुंदरता को देखकर प्रसन्न हो रहे हो, उस बालक की अंदरूनी सुंदरता को देखने का प्रयास करो। तन की सुंदरता तो अस्थायी होती है परंतु मन की सुंदरता में स्थायित्व होता है। यह सुनकर सभी छात्र छात्राओं ने भाव विभोर होकर निर्णय लिया कि वार्षिक समारोह में धन का अपव्यय रोककर उस बचत को वे सभी अपनी और महाविद्यालय की ओर से उसकी पढ़ाई और अन्य व्यवस्थाओं हेतु उसे देने का संकल्प लेते हैं।

दृष्टिकोण

एक दार्शनिक महोदय एक दिन छबिगृह में फिल्म देखने हेतु गये। उन्होंने एक सामान्य सी घटना को दार्शनिक स्वरूप में प्रस्तुत कर हमें सुनायी। वे बोले कि सिनेमाहॉल में फिल्म का प्रदर्शन शुरू हो चुका था तभी देर से दो व्यक्तियों ने प्रवेश किया उनमें से एक को गेटकीपर उसके लिए आवंटित सीट पर बैठाने के लिए ले गया, उसी सीट पर कोई दूसरा व्यक्ति पहले से ही बैठा था। गेटकीपर ने नंबर चेक करने के बाद उस व्यक्ति से निर्धारित सीट पर जाने के लिए कहा तो वह बोला कि दूसरे गेट कीपर ने उसे यही बैठने के लिए कहा है। गेटकीपर ने पुनः उससे विनम्रता से सीट बदलने के लिए अनुरोध किया, उनके बीच वार्तालाप हो ही रहा था कि जो व्यक्ति गेटकीपर के साथ आया था वह बोला कि आप लोग दर्शकों को सही स्थान पर क्यों नहीं बैठाते ? ऐसा ना करने से सभी को तकलीफ होती है। बड़ी अनुनय विनय के बाद वह व्यक्ति उठकर अपनी सीट पर स्थानांतरित हो गया और यह व्यक्ति भी खीझता हुआ अपनी सीट पर बैठ गया।

अब गेटकीपर दूसरे व्यक्ति को उसके सही स्थान पर बैठाने हेतु ले गया। वहाँ पर भी उसने देखा की कोई और पहले से ही वहाँ बैठा हुआ है। इसके पहले की गेटकीपर उस व्यक्ति से सीट खाली करने के लिए कहता। गेटकीपर के साथ आया हुआ दर्शक उससे बोला कि इन्हें उठने का कष्ट मत दो मुझे ही कोई दूसरी सीट दे दो। गेटकीपर ने उसे तुरंत दूसरी सीट पर बैठा दिया।

अब दार्शनिक महोदय बोले कि इस घटनाक्रम को देखकर मैं सोच रहा था कि पहला दर्शक अपने अधिकार के लिए सजग था और उसने अपने लिए आवंटित सीट पर बैठना अनिवार्यता समझी। दूसरा दर्शक प्रेमी व्यक्ति था उसने किसी दूसरे को तकलीफ ना हो सोचकर अपनी जगह बदल ली। यह बात अपने अपने दृष्टिकोण को दर्शाती है कि अधिकार और प्रेम के बीच कौन ज्यादा स्वीकार्य होना चाहिए ?

भ्रातद्रोह

श्री राम विश्व के महानतम राजनीतिज्ञ, दार्शनिक एवं कुशल प्रबंधक थे। रावण के भ्राता विभीषण अपने अपमान को ना सहकर लंका छोड़कर जब श्री राम के पास अपनी व्यथा लेकर आये तो श्री राम ने बिना समय गंवाए विभीषण को अपने पास समुचित मान सम्मान देते हुए बैठाकर उन्हें उनका अधिकार दिलाने हेतु आश्वस्त कर दिया। यह देखकर उनके सभी प्रमुख सलाहकारगण यहाँ तक की हनुमान जी और लक्षमण जी भी भौंचक्के रह गये। उन्होंने श्री राम के इस व्यवहार के प्रति उन्हें आगाह किया परंतु श्री राम अपने निश्चय पर दृढ़ रहे। ऐसा कहा जाता है कि युद्ध समाप्त होने पर जब रावण मृत्युशैया पर था तो श्री राम के निर्देश पर लक्ष्मण जी उसकी विद्वता का ज्ञान प्राप्त करने हेतु रावण के पास गये थे। रावण ने उनको कहा मैंने अहंकारवश अपने भाई को भरी सभा में बेइज्जत कर दिया था। मुझे किंचिंत भी अनुमान नहीं था कि वह श्री राम के पास जाकर उनका शरणागत् हो जायेगा। जिसका सगा भाई उसके साथ ना हो उसे युद्ध में जीतना बहुत कठिन हो जाता है।

विभीषण ने मुझे वचन दिया था कि वह मेरी मृत्यु का राज कभी किसी को नहीं बतायेगा इसलिये मैंने उसे इससे अवगत करा दिया था। वह मेरा विश्वास तोड़कर आज मेरी मृत्यु का कारण बना है। वह कितना भी नीतिवान, धार्मिक, सदाचारी और राम के प्रति श्रद्धा रखने वाला हो परंतु देखना उसे जो मान सम्मान प्राप्त होना चाहिए, वह नहीं मिलेगा। आज के वर्तमान परिदृश्य में रावण का कथन शतप्रतिशत सही निकला है। युद्ध में जीतने के उपरांत श्री राम की सभी दिशाओं में वाहवाही और प्रशंसा हुई। उनके मंदिर बनकर उनकी पूजा अर्चना होती है जबकि उनकी जीत का कारण विभीषण द्वारा बताया गया रावण की मृत्यु का राज था परंतु विभीषण को घर का भेदी लंका ढाये के रूप में जाना जाता है। समय के साथ साथ विभीषण इतिहास के गर्त में कही खो गये। वे अपने आप को युद्ध में तबाह हुई लंका को पुर्नस्थापित करने में ही आजीवन व्यस्त रहे जबकि श्री राम इतिहास में युग पुरूष के नाम से जाने जाते हैं। इससे स्पष्ट है कि हमारा व्यक्तित्व कितना भी ऊँचा एवं चरित्रवान हो परंतु भ्रात द्रोह एवं राष्ट्रद्रोह के सम्मुख वह नगण्य रहता है।

अहंकार

मोहन और राकेश नामक दो मित्र आपस में अहंकार के विषय में चर्चा कर रहे थे। मोहन ने इसे समझाने के लिए एक उदाहरण दिया, जब भी आंधी, तूफान अपनी तीव्र गति से आता है तो धरती पर बहुत विनाश होता है और बड़े बड़े पेड़ पौधे, मजबूत मकान इत्यादि धराशायी हो जाते हैं परंतु दूबा ( एक प्रकार की घास ) एवं बेलपत्ती का पौधा ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी सुरक्षित रहते हैं। इसका कारण तेज हवा के झोंकों में इनका झुक जाना है और हवा के थपेड़े इनके ऊपर से निकल जाते हैं जबकि मजबूत तने के वृक्ष और आधुनिक तकनीक से बने सीमेंट, लोहा, ईटों से निर्मित मकान धराशायी हो जाते हैं। वे इस तूफान का अपनी मजबूती से मुकाबला करने की क्षमता की भूल करते हैं और अपना अस्तित्व समाप्त कर लेते हैं। हमें अपनी क्षमताओं का सही आकलन करना चाहिए और यदि परिस्थितियाँ विपरीत हो तो हमें झुक जाना चाहिए और सही वक्त का इंतजार करना चाहिए यदि हम अहंकारवश ऐसा नहीं करेंगे तो अपना ही नुकसान करके अपने ही अस्तित्व पर संकट बुला लेंगे।

सुख

रामसुखलाल नगर के एक प्रसिद्ध कपड़ों के व्यापारी थे। उनका व्यापार दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा था और उनकी गिनती शहर के धनाढ्य व्यक्तियों में होती थी। वे स्वभाव से बहुत कंजूस प्रवृत्ति के थे। वे दान, धर्म और किसी की भी आर्थिक मदद करने से दूर रहते थे। उनकी सोच यह थी कि व्यक्ति गरीब या अमीर अपने कर्मों की वजह से है। एक दिन उनके यहाँ एक साधु आये जिनका उन्होंने काफी आदर सत्कार किया और अपने मन की उलझन बताते हुए कहा कि उनके पास सबकुछ है परंतु मन में शांति का अभाव है। इस कारण सब कुछ होते हुए भी जीवन में खालीपन सा लगता है।

यह सुनकर महात्मा जी ने कहा जीवन में एक बात याद रखो कि बिना सेवा के वैभव बेस्वाद है। जब वैभव में सेवा की भावना जुड़ जाती है, तो वह महक उठता है। सेवा से अहंकार मिट जाता है, आसक्ति दूर हो जाती है एवं हमारे आत्मा की ज्योति प्रकाशित होकर हमारी अंदर की आँखों को खोल देती है। तुम ध्यान रखना कि धन से सब कुछ प्राप्त नहीं हो सकता। आप धन से दवाईयाँ खरीद सकते हैं परंतु स्वास्थ्य नहीं, आलीशान पलंग खरीदा जा सकता है, परंतु नींद़ नहीं। इसी प्रकार धन से सुविधायें प्राप्त की जा सकती है, परंतु शांति नही।

रामसुखलाल पर इन बातों का बडा प्रभाव पड़ा और उन्होंने शनैः शनैः अपने स्वभाव में परिवर्तन करके सेवा और त्याग को जीवन में उतारना प्रारंभ किया। इससे उन्हें अपने स्वभाव में काफी परिवर्तन महसूस होकर आत्मीय शांति एवं जीवन की सार्थकता का अनुभव होने लगा।

सुख की बंदरबाँट

प्रभु ने अपनी जन्मस्थली भारत के निवासियों को सुख प्रदान करने हेतु परिकल्पना की इसे भेजने हेतु उन्होंने नारद जी को अधिकृत किया। नारद जी सुख को लेकर भारत भूमि पर पहुँचे। वे यह देखकर हतप्रभ रह गये कि यहाँ पर लोग आपस में ही धर्म, जाति, संप्रदाय के संबंध में झगड़ रहे है। वे अपनी इन्हीं विध्वंसक गतिविधियों में इतने अधिक व्यस्त थे कि उनके पास नारद जी से सुख लेने का समय ही नह़ी था। अपनी अवहेलना देखकर नारद जी सुख लेकर वापिस प्रभु के पास चले गये और उन्हें इन्हीं बातों से अवगत् करा दिया।

अब प्रभु ने हनुमान जी को सुख बाँटने का दायित्व देकर भेजा। हनुमान जी ने बीच रास्ते से ही इसका संदेश धरती पर भिजवा दिया कि वे सुख लेकर आ रहे है, सभी लोग पंक्तिबद्ध होकर इसे प्राप्त करें। जब हनुमान जी भारत भूमि पर अवतरित हुए तो यह देखकर वे बहुत क्रोधित हो गये कि भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोर, अनैतिक गतिविधियों से धनोपार्जन करने वाले बड़े बड़े व्यापारी, सरकारी अधिकारी और उद्योगपति पंक्ति में आगे खड़े थे और गरीब, असहाय एवं जरूरतमंद पीछे की ओर चुपचाप खड़े थे। उन्होंने अपनी गदा पटककर कहा कि जो सुख के वास्तविक हकदार है, वे पहले आगे आकर सुख प्राप्त करे। उनकी गदा की आवाज और उसकी धमक से सभी लोग इतने घबरा गये कि सभी उपस्थित जन भाग गये। हनुमान जी की सुख को बिना बांटे वापिस लेकर चले गये।

प्रभु ने अब यमराज को बुलाकर उन्हें सुख बाँटने हेतु निर्देशित किया। यमराज सुख लेकर भारत भूमि पर पहुँचे और दो घंटे के अंदर ही भागकर वापिस प्रभु के दरबार में पहुँच गये। वे बोले कि हे प्रभु आपने मेरी किस गलती की यह सजा मुझे दी और मुझे सुख बाँटने के लिये भारत भूमि पर भेज दिया। वहाँ तो मेरे से भी बड़े यमराज नेता बने बैठे है। उनसे भी खतरनाक यक्ष अधिकारी बनकर प्रशासन कर रहे है। यदि मैं ऐसे लोगों को सुख दे देता तो सुख के वास्तविक हकदारों को मुश्किल से दस प्रतिशत सुख भी उन तक नहीं पहुँच पाता, सारा सुख यही लोग हड़प लेते। उन्होंने मेरे कपड़े फाड़कर, मेरे साथ मारपीट करके कहा कि यह कोई पागल है, जो कहता है कि मैं सुख लेकर यहाँ बाँटने के लिए परमात्मा के आदेश पर आया हूँ।

मैं भागकर अपनी जान बचाने के लिए यहाँ वापिस आ रहा था कि तभी धरती पर एक दीन हीन व्यक्ति दिखा। मैंने सोचा कि कुछ सुख इसे दे दूँ, तभी वह मुझसे बोला कि एक दारू की बोतल हो तो दे जा। सुख वुख की क्या बात करता है। मैं बड़ी मुश्किल से उससे पिंड छुड़ाकर भागकर यहाँ आ पाया हूँ। आप मेरी दुर्दशा और फटे हुये कपड़े देखकर मेरी दशा का अनुमान लगा सकते हैं। इस दृष्टांत के बाद प्रभु ने सुख को तिजोरी में बंद कर दिया।

मित्र हो तो ऐसा

कुसनेर और मोहनियाँ एक दूसरे से लगे हुए जबलपुर के पास के दो गाँव हैं। कुसनेर के अभयसिंह और मोहनियाँ के मकसूद के बीच बचपन से ही घनिष्ठ मित्रता थी। वे बचपन से साथ साथ खेले-कूदे और पले-बढे थे। अभयसिंह की थोड़ी सी खेती थी जिससे उसके परिवार का गुजारा भली भाँति चल जाता था। मकसूद का साडियों और सूत का थोक का व्यापार था। उसके पास खेती की काफी जमीन थी। खुदा का दिया हुआ सब कुछ था। वह एक संतुष्टिपूर्ण जीवन जी रहा था।

अभयसिंह की एक पुत्री थी। पुत्री जब छोटी थी तभी उसकी पत्नी का निधन हो गया था। उसने अपनी पुत्री को माँ और पिता दोनों का स्नेह देकर पाला था, उसे अच्छी शिक्षा दी थी। वह एम.ए. कर चुकी थी। अब अभयसिंह का उसके विवाह की चिंता सता रही थी। अथक प्रयासों के बाद उसे एक ऐसा वर मिला जो उसकी पुत्री के सर्वथा अनुकूल था। अच्छा वर और अच्छा घर मिल जाने से अभयसिंह बहुत खुश था लेकिन अभयसिंह के पास इतना रूपया नहीं था कि वह उसका विवाह भली भाँति कर सके। उसे चिंता उसके विवाह के लिए धन की व्यवस्था की थी। जब विवाह के लिए वह पर्याप्त धन नहीं जुटा सका तो उसने सोचा- मेरा क्या है, मेरे पास जो कुछ है वह मेरी बेटी का ही तो है। ऐसा विचार कर उसने अपनी कुछ जमीन बेचने का निश्चय किया।

मकसूद का इकलौता पुत्र था सलीम। उसका विवाह हो चुका था। सलीम का एक छोटा चार साल का बच्चा भी था। पुत्री के विवाह के लिए जब अभयसिंह ने अपनी जमीन बेचने के लिए लोगों से चर्चा की तो बात सलीम के माध्यम से मकसूद तक भी पहुँची। मकसूद को जब यह पता लगा कि अभयसिंह बेटी के विवाह के लिए अपनी जमीन बेच रहा है तो यह बात उसे अच्छी नहीं लगी। एक दिन वह अभयसिंह के घर गया। उसने कहा “सुना है बिटिया का विवाह तय हो गया है।“ “हाँ। मंडला के पास का परिवार है। लड़के के पिता अच्छे और प्रतिष्ठित किसान है। लड़का पढा लिखा है, पिता के साथ खेती भी देखता है। एक इलेक्ट्रानिक की अच्छी दुकान भी मंडला में है जिसे पिता पुत्र मिलकर चलाते हैं। सुमन बिटिया के भाग्य खुल गए है। उस घर में जाएगी तो जीवन सँवर जाएगा और मैं भी चैन से आँख मूँद सकूँगा।“

“ शादी की तैयारियों के क्या हाल है ? “

“वैसे ते मैंने सभी तैयारियाँ अपने हिसाब से कर रखी थी लेकिन उन लोगों की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखकर कुछ और तैयारियों की आवश्यकता थी। मैंने सोचा कि मेरे बाद मेरा सभी कुछ सुमन का ही तो है। मेरे पास आठ एकड़ जमीन है अगर उसमें से चार एकड़ निकाल दूँगा तो इतनी रकम मिल जाएगी कि सभी काम आनंद से हो जाएँगे। बाकी बचेगी चार एकड़ तो मेरे अकेले के गुजारे के लिए वह काफी है।“

“ यह जमीन बेचकर तुम्हारे अनुमान से तुम्हें लगभग कितना रूपया मिल जाएगा ? “

“ एक से सवा लाख रूपये एकड़ के भाव से तो जाएगी ही लगभग चार पाँच लाख रूपया तो मिल ही जायेगा। इतने में सारी व्यवस्था हो जाएगी।“

“ तुमने मुझे इतना गैर समझ लिया कि ना तो तुमने मुझे यह बताया कि सुमन का विवाह तय हो गया है और ना ही तुमने मुझे यह बताया कि तुम अपनी जमीन बेच रहे हों। क्या तुम पर और सुमन पर मेरा कोई अधिकार नहीं है ? क्या वह मेरी भी बेटी नहीं है ?“

“ ऐसी तो कोई बात नहीं है। मैंने सोचा कि जब तुम्हारे पास आऊँगा तो सब कुछ बता दूँगा पर अभी बोनी आदि का समय होने के कारण मैं उस तरफ नहीं निकल पाया, वरना तुम्हें बिना बताए तो आज तक मैंने कोई काम किया ही नहीं है ?“

“ तब फिर जमीन बेचने का निश्चय तुमने मुझसे पूछे बिना कैसे कर लिया ? मेरे रहते तुम बेटी की शादी के लिए बेचो, यह मुझे कैसे स्वीकार होगा ? अब रही बात रूपयों की तो वे तुम्हें जब तुम चाहोगे तब मिल जाएँगे। जमीन बेचने का विचार मन से निकाल दो और बेटी की शादी की तैयारी करो।“ इतना कहकर मकसूद वहाँ से चला गया।

उनकी मित्रता ऐसी थी कि अभयसिंह कुछ ना कह सका। वह तैयारियों में जुट गया। उसने जमीन बेचने का विचार यह सोचकर त्याग दिया कि बाद में जब भी जरूरत होगी तो वह या तो जमीन मकसूद को दे देगा या उसके रूपये धीरे धीरे लौटा देगा।

विवाह के कुछ दिन पहले मकसूद का संदेश अभय के पास आया कि मेरी तबीयत इन दिनों कुछ खराब चल रही है। तुम शीघ्र ही मुझसे आकर मिलो। उस दिन रात बहुत हो चुकी थी इसलिए अभय नहीं जा सका। मकसूद की बीमारी की खबर सुनकर वह विचलित हो गया था। दूसरे दिन सबेरे सबेरे ही वह घर से मकसूद के यहाँ जाने को निकल पड़ा। अभी वह पहुँचा भी नहीं था कि उस ओर से आ रहे एक गाँववासी ने उसे देखा तो बतलाया कि मकसूद का स्वास्थ्य रात को अधिक खराब हो गया था और उसे मेडिकल कॉलेज ले जाया गया है।

यह सुनकर अभय ने उस व्यक्ति से कहा कि गाँव में वह उसकी बेटी को बतला दे कि वह मेडिकल कॉलेज जा रहा है, मकसूद चाचा की तबीयत खराब है। अभयसिंह वहाँ से सीधा मेडिकल कॉलेज की ओर चल दिया। जब वह मेडिकल कॉलेज पहुँचा तो मकसूद इस दुनिया को छोड़कर जा चुका था।

अभय ने सलीम, सलीम की माँ और उसकी पत्नी को सांत्वना दी। वह उनके साथ गाँव वापस जाने की तैयारियाँ करने लगा। उसके ऊपर दुख का पहाड़ टूट पड़ा था। एक ओर उसका सगे भाई से भी बढ़कर मित्र बिछुड गया था और दूसरी ओर उसे बेटी के हाथ पीले करने थे।

मकसूद को सुपुर्दे-खाक करने के बाद अभय गाँव वापस आ गया। अगले दिन सबेरे सबेरे एक आदमी आया और उसने अभयसिंह से कहा कि उसे भाभीजान ने बुलाया है। अभय भारी मन से वहाँ गया। वहाँ जाकर वह सलीम के पास बैठा। सलीम बहुत दुखी था। अभयसिंह बड़े होने के नाते उसे सांत्वना देता रहा जबकि वह स्वयं भी बहुत दुखी था। कुछ देर बाद ही सलीम की माँ उदास चेहरे के साथ वहाँ आई। उनकी आँखें सूजी हुई थी। उन्हें देखकर अभयसिंह की आँखों से भी आँसू का झरना फूट पड़ा। कुछ देर बाद जब उनके आँसू थमे तो कुछ बात हुई। कुछ समय पश्चात सलीम की माँ ने एक लिफाफा अभय की ओर बढाया। वे बोली - “ तीन चार दिन से इनकी तबीयत खराब चल रही थी। परसों जब उन्हें कुछ अहसास हुआ तो उन्होंने यह लिफाफा मुझे दिया था और कहा था कि यह आपको देना है, अगर मैं भूल जाऊँ तो तुम उसे याद से दे देना।“

अभय ने उस बंद लिफाफे को उनके सामने ही खोला। उसमें पाँच लाख रूपये और एक पत्र था। अभय उस पत्र को पढने लगा। पत्र पढते पढते उसकी आँखों से टप टप आँसू टपकने लगे। उसकी हिचकियाँ बँध गई और गला रूँध गया। सलीम ने वह पत्र अभय के हाथ से ले लिया और हल्की आवाज में पढ़ने लगा-

“ प्रिय अभय, तुम्हारे जमीन बेचने के निर्णय से मैं बहुत दुखी हुआ था लेकिन मेरे प्रस्ताव को जब तुमने बिना किसी हील हुज्जत के मान लिया तो मेरा सारा दुख चला गया। हम दोनों मिलकर सुमन को विदा करें, यह मेरी बहुत पुरानी अभिलाषा थी। मुझे पता है कि भाभीजान के ना होने के कारण तुम कन्यादान नहीं ले सकते हो इसलिये मैंने निश्चय किया था कि सुमन का कन्यादान मैं और तुम्हारी भाभी लेंगे। लेकिन कल से मेरी तबीयत बहुत तेजी से खराब हो रही है और ना जाने क्यों मुझे लग रहा है कि मैं सुमन की शादी नहीं देख पाऊँगा। पाँच लाख रूपये रखे जा रहा हूँ। उसका विवाह धूम धाम से करना। तुम्हारा मकसूद।“

पत्र समाप्त होते होते वहाँ सभी की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने भाभीजान से कहा- “ भाभीजान आज मकसूद भाई होते तो इन रूपयों को लेने में मुझे कोई गुरेज नहीं था लेकिन आज जब वे नहीं रहे तो इन रूपयों को लेना मुझे उचित नहीं लग रहा है। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि ये रूपये आप वापस रख लीजिए।“

भाभीजान की रूलाई रूक गई। वे बोली-“ भाई साहब, अब हमारे पास बचा ही क्या है। उनके जाने के बाद अगर हम उनकी एक मुराद भी पूरी ना कर सके तो वे हमें कभी माफ नहीं करेंगें। खुदा भी हमें माफ नहीं करेगा।“

तभी सलीम बोला-“ चाचाजान आप नाहक सोच विचार में पडे है। दुनिया का नियम है आना और जाना। हम सब मिलकर सुमन का विवाह करेंगे। वह मेरी भी तो छोटी बहन है। मैं उसके लिए बड़े भाई के भी सारे फर्ज पूरे करूँगा और अब्बा की ख्वाहिश भी पूरी करूँगा। आप ये रूपये रख लीजिए अगर और भी आवश्यकता होगी तो हम वह भी पूरी करेंगे।“

सुमन का विवाह नीयत समय पर हुआ। सलीम ने उसके भाई की सारी रस्में भी पूरी की और अपनी पत्नी के साथ उसका कन्यादान भी किया। आज भी लोग उस विवाह को याद कर उनकी मित्रता की मिसाल देते हैं।

समाधान

स्वामी प्रशांतानंद जी से उनके एक शिष्य ने पूछा कि मेरे तीन प्रश्न है जिनका समाधान मैं चाहता हूँ। यह इस प्रकार हैं 1. जीवन में तनाव व चिंता कैसे समाप्त हो ? स्वामी जी बोले इस प्रश्न का उत्तर बहुत सरल है। तुम अपने जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ ही ना आने दो जो कि तनाव और चिंता को जन्म दे। यदि किसी कारण से तनाव मन से नहीं निकल रहा हो तो उसका भी उपाय है। यह याद रखो कि prevention is better then cure. एक उद्योगपति जिसका व्यापार कई शहरों में फैला हुआ था। वे अपने कार्यालय में दिनभर की दिनचर्या समाप्त करने के बाद जब बाहर आते थे तो उनके चेहरे पर मुस्कान और खुशी महसूस होती थी। उससे जब पूछा गया कि इसका क्या राज है? तो उन्होंने कहा कि मैं कार्यालय की झंझटें घर पर नहीं सोचता उसे वही पर छोड़कर आ जाता हूँ और इसके बाद कितना भी महत्वपूर्ण विषय हो उस बारे में मन में चिंतन नहीं करता हूँ। ऐसा करने से मैं प्रतिदिन प्रसन्नचित्त रहकर अपनी पूर्ण क्षमता एवं बुद्धिमत्ता का उपयोग किसी भी समस्या के समाधान हेतु करता हूँ।

उस विद्यार्थी ने दूसरा प्रश्न किया कि हम शांति और सौहार्द्र का जीवन जीना चाहते हैं परंतु आतंक वाद बहुमुखी प्रयास के बाद भी समाप्त नहीं हो पा रहा। हमें इस दिशा में क्या करना चाहिए ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए स्वामी जी ने कहा कि जब तक मानव में मानवीयता का गुण उसके मन, हृदय एवं आत्मा में आत्मसात नहीं होगा तब तक आतंकवाद या इसके समकक्ष बुराइयाँ खत्म नहीं होंगी। प्रभु की सबसे अच्छी संरचना मानव है परंतु हमने अपने आप को जाति, धर्म, संप्रदाय राष्ट्र की सीमाओं में बांट दिया है। हम अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एवं संस्कारें को भूलकर इस सदी की सबसे बड़ी भूल कर रहे है। समय अपने आप परिवर्तन करने की क्षमता रखता हैं और आतंकवाद की यह प्रवृत्ति भी समय एवं परिस्थिति के अनुसार एक दिन समाप्त हो जायेगी। वह दिन कब आयेगा, कैसे आयेगा, कौन लायेगा इन प्रश्नों का समाधान स्वयंमेव ही हो जायेगा।

वह तीसरा प्रश्न पूछता है कि जीवन में मानसिक संतुष्टि एवं सर्वांगीण विकास का आधार क्या है। स्वामी जी कहते हैं कि विकास और संतुष्टि दो अलग अलग विषय है। संतुष्टि लक्ष्य के प्राप्त हो जाने से मिल जाती हैं। लक्ष्य के प्रकार कई हो सकते हैं। सर्वागीण विकास का लक्ष्य एक ही होता है और वह हे सकारात्मक सृजन। इसका मूलभूत आधार है हमारी सभ्यता, संस्कृति और संस्कार, इनको प्राथमिकता देते हुए इन्हें आधारस्तंभ मानकर कड़ी मेहनत एवं लगन से जो कार्य संपन्न होगा तो वह सर्वांगीण विकास का आधार होता है।

ज्ञान

रामसिंह ने अपने परिश्रम और लगन से अपने उद्योग की तरक्की करके उद्योग जगत में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया था और उसे अपनी उपलब्धि के लिए आज उद्योग श्री की उपाधि से सम्मानित किया गया था। इस अवसर पर जब पत्रकारों ने उससे सफलता का राज जानना चाहा तो उसने विनम्रता पूर्वक बताया कि मेरी इस प्रगति का राज यह है कि पहला तो मैंने जीवन में मित्रता करते समय इस बात का ध्यान रखा कि वह जीवन में विपरीत समय में मुझे प्रेरणा स्रोत बनकर सही राह व दिशा का मार्गदर्शन देने की योग्यता रखता हो ना कि मेरे हर कथन पर मेरी हाँ में हाँ करके चापलूसी करके मुझसे मित्रता का अनुचित फायदा उठाने प्रयास करे। जीवन में सही वक्त पर सही सलाह देकर आपका मित्र आपको आने वाली कठिन परिस्थितियों से बचा सकता है।

दूसरी बात यह है कि किसी भी उद्योग के संचालन में अच्छे एवं बुरे दिन दोनों ही आते जाते रहते हैं। हम अच्छे दिनों में सुखी होकर बहुत प्रसन्नचित्त रहते हैं परंतु बुरे दिन आने पर हड़बडाकर इसे अपना दुर्भाग्य मान लेते हैं। मैंने ऐसे अवसरों पर इसे नियति का विधान मानकर अपनी अंतर्चेतना को जागृत करके, परिस्थितियों से डटकर सामना करने की शक्ति प्राप्त की और मनन चिंतन से सही दिशा का ज्ञान प्राप्त कर सब कठिनाईयों को दूर करके पुनः अच्छे दिन में परिवर्तित कर लिया। हमें ऐसे समय विचलित और दिग्भ्रमित नहीं होकर संघर्ष करने की क्षमता और ऊर्जा प्राप्त करना चाहिए। इसलिये कहा जाता है कि सुख और दुख देनो परिस्थितयों में हमारा व्यवहार संतुलित रहना चाहिए। तुम दुख को अपना दुश्मन मत समझो इसे अपना मित्र समझो जो कि तुम्हें आत्मसंयम एवं आत्मविश्वास को बढाकर जीवन जीने की कला सिखाता है। इतनी बात बताकर रामसिंह वहाँ से प्रस्थान कर लेता है।

मार्गदर्शन

मेरा एक मित्र रमेश बहुत परेशान रहता था। पिछले कुछ समय से उसे बहुत आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। वह प्रायः कहता था कि समय और भाग्य साथ नहीं देते हैं। ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे उसके धर्म और कर्म में कोई कमी रह गई है। एक दिन वह मेरे पास आया और उसने मुझे सारी परिस्थितियों से अवगत कराया। मैंने उसे समझाया- कि जीवन में वक्त व भाग्य कभी खराब नहीं होते हैं एवं वे कभी हमारा अहित नहीं करते हैं। हमें यदि अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं तो उसके लिये हम स्वयं उत्तरदायी हैं।

रमेश अपना आत्मविश्वास खो चुका था और वह मायूसी और अनिर्णय की स्थिति में आ गया था। मैंने उसे सुझाव दिया कि तुम्हारा बेटा बी.काम की पढ़ाई पूर्ण करके एम.बी.ए. कर रहा है। तुम उसे अपने कारखाने के प्रबंधन की जवाबदारी धीरे धीरे देना प्रारंभ करो। मुझे विश्वास है कि वह सुचारू रूप से कारखाने को संचालित कर पायेगा। रमेश मेरी बात से सहमत था और उसने मुझसे विनम्रतापूर्वक आग्रह किया कि मैं अपने अधीनस्थ कारखाने को लेकर मेरे बेटे राहुल को प्रशिक्षण देकर इस योग्य बना दूँ, कि वह कारखाने को अपने बलबूते पर संभालने के योग्य हो जाये। हम दोनों की मित्रता बहुत पुरानी थी और रमेश के करोड़ों रूपये उसके कारखाने में उलझे हुये थे। मैंने उसका निवेदन सहर्ष स्वीकार कर लिया और राहुल को उसी दिन से मैंने प्रशिक्षण देना प्रारंभ किया।

मैंने उसे बुलाकर समझाया कि हमें हमारा चिन्तन, मनन एवं मन्थन सही दिशा का मार्गदर्शन दे तभी हमें सफलता प्राप्त होती है। हम सही राह एवं दिशा से भटक रहे हैं इस कारण हम असफल होते हैं और हमें हानि उठाना पड़ती है। ऐसी स्थिति में हम अपने भाग्य व समय को दोष देने लगते हैं। हमें अपनी गलतियों को खोजकर सुधारना चाहिए। जीवन में सफलता के लिये भाग्य और वक्त पर विश्वास रखो और चिन्ता मत करो। नैतिकता आस्था और विश्वास जीवन की प्रगति के आधार स्तम्भ हैं। इनके अभाव में जीवन उस वृक्ष के समान होता है जिसके पत्ते झड़ चुके होते हैं और अब उसमें न तो शीतलता देने वाली छाया है और न ही वह प्राण वायु का उत्सर्जन करता है।

मानव इस सृष्टि में ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है जिसके कंधों पर सृजन का भार है। उद्योग इस सृजनशीलता का एक रुप है। यह समाज की सक्रियता और राष्ट्र की गतिशीलता का दर्पण है। इसमें समय के साथ परिवर्तन, परिमार्जन एवं परिष्करण होता रहता है।

किसी भी उद्योग में कर्ज और पूंजी में समन्वय होना चाहिए, हमें कर्ज के प्रति सावधानी बरतना चाहिए, चाहे वह बैंक से, शासकीय संस्थानों से या निजी व्यक्तियों से लिया गया हो। पूंजीगत निवेश को कार्यकारी पूंजी से हमेशा अलग रखना चाहिए इससे उद्योग को अर्थाभाव का सामना नहीं करना पड़ेगा। अधिकांश उद्योगों की असफलताओं के पीछे यही एक कारण होता है। उद्योग का संचालन गणित का खेल है। यदि आप इसमें पारंगत हैं तो आप उद्योग को सफलता पूर्वक चला सकेंगे। किसी भी उद्योग के लिये आवश्यक है कि समय पर उत्पादन हो एवं बिक्री होकर समय पर भुगतान प्राप्त हो। हमें उद्योग के निर्माण में आधुनिक तकनीक का प्रयोग करना चाहिए। उत्पादन की गुणवत्ता बनाये रखने और न्यूनतम उत्पादन लागत पर उत्पादन हो इसका भी हमें ध्यान रखना चाहिए है।

मैंने महसूस किया कि राहुल में वे सभी क्षमताएं हैं जो कि किसी उद्योगपति को सफलता देकर समाज में अपना विशिष्ट स्थान बनाने में समर्थ बनाती हैं। मैंने उसे यह भी समझाया कि ईश्वर की महिमा अपरम्पार हैं। उनकी कृपा से ही जीवन में सफलता एवं लक्ष्य की प्राप्ति होती है। हमारी कल्पना में भविष्य की रुपरेखा होनी चाहिए एवं वह वास्तविकता पर आधारित होना चाहिए। उसका स्वभाव हर काम समय पर करने वाला होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसका स्वभाव मृदु और वाणी में विनम्रता होना चाहिए। हमें काम, क्रोध, लोभ, माया और मोह को नियन्त्रित करके सुखी जीवन के लिये संघर्षरत रहना चाहिए।

मैं उनका कारखाना जो कि लगभग बंद हो चुका था उसका गंभीरता पूर्वक अध्ययन करने के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि यदि इसे वापिस प्रारंभ करना है तो इसमें मजदूरें की छटनी करना, उनके वेतन में परिवर्तन करना, उत्पादन में वृद्धि के उपाय खोजना, अधिकारियों एवं कर्मचारियों के बीच अनुशासन लाकर उनमें सामंजस्य स्थापित करना, माल की बिक्री के लिए विक्रय विभाग को पूर्ण रूप से नया स्वरूप देना, उत्पादन की लागत कम करने हेतु बिचौलियों को हटाकर स्वयं कच्चा माल खरीदना, पुरानी मशीनों को धीरे धीरे हटाकर नयी मशीनें लेकर बिजली की खपत कम करके उत्पादन की लागत घटाना, माल की बिक्री सीधे उपभोक्ता को करने का प्रयास करना ताकि वितरकों पर होने वाले कमीशन की राशि का खर्च बच सके आदि महत्वपूर्ण परिवर्तन करने पडेंगें तभी यह कारखाना एक नया स्वरूप लेकर अपने पैरों पर खड़ा होकर मजबूत स्थिति में आकर लंबे समय तक चल सकेगा। मैंने यह सभी बातें अपने मित्र रमेश और उसके पुत्र राहुल के सामने रख दी तथा इस पर होने वाले आर्थिक व्यय की समस्त जानकारी भी बता दी। वे मेरी बातों से सहमत हुए और उस पर कार्य शुरू कर दिया।

हमने समयबद्ध कार्यक्रम में कंपनी की मशीनों का आधुनिकीकरण करके कर्मचारियों की छंटनी के उपरांत उनमें कड़ा अनुशासन लाकर उत्पादकता को बढ़ाते हुए माल की बिक्री हेतु कमीशन बढ़ाकर माल की गुणवत्ता में सुधार करके कारखाने को एक नयी दिशा दे दी। मैंने राहुल को समझाया कि जीवन में हमेशा चार सिद्धांतों को याद रखना चाहिए पहला अपनी कार्यप्रणाली से किसी को दुख एवं पीड़ा ना पहुँचे। दूसरा धन का उपार्जन नीतिपूर्ण एवं सच्चाई पर आधारित हो। तीसरा जीवन में जो भी कर्म करो उसे ईश्वर को साक्षी मानकर सम्पन्न करो तथा चौथा अपनी मौलिकता को कभी खोने मत दो। इन्हीं सिद्धांतों में जीवन की सच्चाई छुपी है। मैं उसे हमेशा कहा करता था कि हम अकेले कुछ नहीं कर सकते, हमारे अधिकारियों और कर्मचारियों का सामूहिक प्रयास ही हमें सफलता देता है। हमें उनमें लगातार ऊर्जा का संचार करते हुए उत्साह बनाए रखना चाहिए। मैंने एक वर्ष तक इसके संचालन में अपना सहयोग एवं सुझाव दिया इसके उपरांत वह कारखाना राहुल के मार्गदर्शन में सुचारू रूप से आज भी अच्छे आर्थिक लाभ में चल रहा है।



(क्रमशः अगले भाग - 9  में जारी...)

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग - 8 // राजेश माहेश्वरी
कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग - 8 // राजेश माहेश्वरी
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