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कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग - 9 // राजेश माहेश्वरी

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कहानी संग्रह तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) राजेश माहेश्वरी पिछले भाग से जारी... रहस्य मेरे बचपन की एक घटना मुझे...

कहानी संग्रह

तर्जनी से अनामिका तक

( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )

राजेश माहेश्वरी

कहानी संग्रह //  तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण )  // राजेश माहेश्वरी

पिछले भाग से जारी...

रहस्य

मेरे बचपन की एक घटना मुझे आज भी स्मृति में हैं। हमारे घर में एक बुजुर्ग पारिवारिक मित्र जिन्हें बादशाह नाम से बुलाया जाता था। वे प्रतिदिन शाम के समय आया करते थे और मनोरंजक एवं प्रेरणाप्रद कहानियाँ सुनाते थे। एक दिन उन्होंने हमारे ही परिवार की पुरानी धरोहर जिसे नया महल नाम से जाता है के विषय में यह कहानी सुनायी।

हमारे मुहल्ले में डॉ. खान रहते थे। एक दिन रात में 12 बजे के आसपास उनके दरवाजे पर दस्तक हुयी और दरवाजा खोलने पर एक सज्जन अंदर आकर बोले डॉ. साहब एक मरीज बहुत गंभीर अवस्था में है। आपको चलकर उसे देखना है यह एक अशर्फी आप अपने पास रखिये। आप के इलाज के उपरांत एक अशर्फी और बतौर फीस दे दी जाएगी। डॉ. खान अशर्फी का मूल्य समझते थे और वे तुरंत ही उसके साथ अपना बैग लेकर चल पडे़ जिसमें आपातकालीन दवाएँ थी।

वे सज्जन बिना कोई बातचीत किये चुपचाप चल रहे थे और उनके पीछे पीछे डॉ. साहब चल रहे थे। उन्हें यह देखकर आश्चर्य हो रहा था कि उस व्यक्ति के दोनों हाथ नहीं दिख रहे थे। उन्होंने इसको अपना दृष्टिभ्रम समझा और चुपचाप चलते रहे। वह व्यक्ति उन्हें उस महल में ले गया और सीढी ऊपर चढ़ने लगा यह देखकर डॉ. ठिठके और उन्होंने पूछा कि तुम मुझे कहाँ ले जा रहे हो ? यहाँ तो पहली मंजिल के बाद कोई भी नहीं रहता। उसी समय उन्हें आभास हुआ कि उनके पीछे एक आदमी और आ गया है और वे दोनों उन्हें इशारा करके ऊपर चढ़ने के लिये कह रहे हैं। वे उनकी बात मानकर चलते रहे और तीसरी मंजिल पर पहुँच गये।

वहाँ पर जीने से बाहर आकर बरामदे का दरवाजा खुलने पर अंदर का दृश्य देखकर वे हतप्रभ हो गये वहाँ दिन के उजाले के समान रोशनी जल रही थी, खूबसूरत झाड़ फानूस टंगे हुये थे कुछ लोग हाथ से पंखा चला रहे थे और वहाँ की आंतरिक साज सज्जा देखकर डॉ. साहब भौचक्के रह गये। हाल के बीचों बीच एक खूबसूरत औरत जिसके पैरों में घुंघरू बंधे हुये थे, लेटी हुयी थी और पेट दर्द के कारण कराह रही थी। डॉ. साहब ने उसे कुछ दवा दी जिससे आश्चर्यजनक रूप से वह आधे घंटे में ही काफी ठीक हो गयी। डॉ. साहब ने उसे अगले दो दिन की दवाई बनाकर दे दी। जो व्यक्ति उन्हें वहाँ पर लेकर आया था उसने अपने वादे के अनुसार एक अशर्फी उन्हें बतौर फीस देकर कहा इस घटना का जिक्र आप किसी से भी किसी भी परिस्थिति में कहीं पर भी नहीं करेंगें अन्यथा आप को इसका कड़ा दंड भोगना पड़ेगा। इतना कहकर उन्हें वापिस नीचे तक छोड़ने के लिये वह आया और डॉ. उससे विदा लेकर तेज कदमों से चलते हुये अपने घर पहुँच गये।

डॉ. साहब को रात भर नींद नहीं आयी और वे इस घटना का विश्लेषण करते रहे। दूसरे दिन सुबह होते ही वे मेरे दादाजी के पास गये और इस अद्भुत घटना की जानकारी दी। यह सुनकर वे बोले डॉ. साहब आज सुबह सुबह कौन सा सपना देखा है मुझे तो आपने बता दिया किसी और से ऐसा मत कहियेगा अन्यथा लोग आपको पागल और सिरफिरा कहने लगेंगे। डॉ. खान ने तुरंत अपनी जेब से दोनों अशर्फियाँ निकालकर सामने रख दी और बोले ये इस बात का सबूत है कि मैं मनगढ़ंत बातें नहीं कह रहा हूँ।

मेरे दादाजी यह सुनकर चार पाँच अंगरक्षकों के साथ डॉ. साहब लेकर नये महल की उस मंजिल पर पहुँचे जिसे नाच महल कहा जाता था तो सभी ने देखा कि उस कमरे में ताला लटक रहा था। बड़ी मुश्किल से उसको तोड़कर दरवाजा खोला गया। उस कमरे के अंदर चमगादड़ लटक रहे थे धूल की परत जमी हुयी थी, दीवारों का चूना उखड रहा था और अजीब सी गंध फैली हुयी थी। डॉ. खान यह देखकर भौचक्के रह गये और उनसे कुछ भी कहते नहीं बन रहा था। सभी लोग वापिस आ गये मेरे दादाजी ने डॉ. साहब को घर जाकर आराम करने की सलाह दी। उन्होंने अपने मुनीम से अशर्फियों की जाँच करवायी तो वह असली पाई गयीं। जिसे उन्होंने डॉ. साहब को सौंपकर हँसते हुये कहा कि हम लोगों को भूत प्रेतों के दर्शन ही नहीं होते आपकी मुलाकात होकर बातचीत भी हुयी और आपने उनका इलाज करके अशर्फी भी प्राप्त कर ली।

जब परिजनों को इस घटना की जानकारी हुई तो सभी ने इस पर गंभीरता से चिंतन किया। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यह घटना प्रेतात्माओं से जुड़ी हुई है और यदि इसे गंभीरता से नहीं लिया गया तो डॉ. के जीवन पर संकट आ सकता है। नगर के विद्वान पंडितों से चर्चा के उपरांत यह तय हुआ कि अगले सप्ताह में ही भागवत कथा का पाठ किसी योग्य पंडित जी से करवाया जाए। अब बाहर से एक पंडित जी को बुलाया गया और भागवत कथा का पाठ प्रारंभ कर दिया गया। इस कथा के अंतिम दिन समाप्ति के पहले सभी को आवाज सुनायी दी कि हम मुक्त हुए, हम मुक्त हुए और इसके पश्चात वातावरण में अजीब सी शांति का अनुभव होने लगा। डॉ. साहब को भी ऐसा महसूस हुआ कि उनके सिर से जैसे वनज हट गया हो। इसके बाद कभी भी उस हवेली ऐसी कोई घटना घटित नहीं हुई।

समय की पहचान

हरि सिंह और राम सिंह दोनों आपस में अच्छे मित्र थे। रामसिंह का व्यापार बहुत अच्छा चल रहा था परंतु वह परिवार में अकेला था उसकी पत्नी का स्वर्गवास कई वर्ष पूर्व हो गया था एवं रामसिंह की कोई संतान भी नहीं थी। वह अपने भाई के बच्चों को ही अपना समझते हुए प्रेम करता था। हरिसिंह एक शिक्षक था और वह बहुत ही मिलनसार, नेकदिल और बुद्धिमान व्यक्ति था।

रामसिंह ने अधिक धन प्राप्ति की लालसा में अपने किसी मित्र की बातों में आकर सट्टे का काम करना शुरू कर दिया। प्रारंभ में तो उसे आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ परंतु बाद में घाटा इतना अधिक हो गया कि उसकी जमापूंजी भी समाप्त होकर उसका व्यापार चौपट हो गया। कुछ वर्ष पूर्व उसने पाँच लाख रू. अपने मित्र हरिसिंह को दिये थे। वह उन रूपयों को वापिस लेने के लिये हरिसिंह के पास जाता है। हरिसिंह उसका बहुत पुराना मित्र था और वह रामसिंह के विषय में सब कुछ जानता था कि उसका व्यापार किस वजह से चौपट हुआ है।

उसने रामसिंह को कहा कि यह ठीक है कि मुझे तुम्हें पाँच लाख रूपये वापिस करने है परंतु मित्र अभी तुम्हारा समय ठीक नहीं चल रहा है। जब वक्त खराब होता है तो कोई साथ नहीं देता है। हम दुश्मन को मित्र और मित्र को दुश्मन समझने लगते हैं। इस खराब वक्त में तुम्हारा भाई भी तुमसे दूर हो गया है। मुझे मालूम है कि तुम उसके परिवार को बहुत चाहते थे परंतु उन्होंने भी तुम्हें किसी भी प्रकार की आर्थिक मदद देने से इंकार कर दिया है। मेरे पास जो तुम्हारे पाँच लाख है वही अब तुम्हारी जमा पूंजी बची है यदि यह भी मैं तुम्हें दे दूँगा तो विपरीत समय होने के कारण इसे भी तुम गँवा बैठोगे।

तुम अभी किसी भी प्रकार से जीवन यापन करने का प्रयास करो जब तुम्हारे दिन फिरेंगें और अच्छा समय वापिस आ जायेगा तो मैं स्वयं तुम्हारे पास आकर तुम्हारी यह पूंजी तुम्हें वापिस कर दूँगा ताकि तुम इसका सदुपयोग करके धनोपार्जन कर सको। मेरी एक बात को हमेशा याद रखना कि व्यक्ति का वक्त हमेशा एक सा नहीं होता है। समुद्र में जैस ज्वारभाटा आता है वैसे ही जीवन में अच्छे और बुरे दिन आते हैं। जब वक्त खराब होता है तो सोना भी मिट्टी बन जाता है और जब वक्त अच्छा रहता है तो मिट्टी भी सोना बन जाती है। यह कहकर उसने रामसिंह को उसके रूपये वापिस नहीं लौटाये और उसे खाली हाथ वापिस लौटना पड़ा। रामसिंह मन ही मन सोच रहा था कि उसके सबसे विश्वसनीय दोस्त ने भी उसका साथ छोड़ दिया और उसका धन वापिस ना करने के कारण उसे उसकी नीयत पर संदेह होने लगा था।

अब समय बीतता जा रहा था कुछ माह बाद रामसिंह ने एक दिन अचानक ही लॉटरी का टिकट खरीद लिया और प्रभु कृपा से उसे उसमें पचास हजार रू. का लाभ प्राप्त हुआ। एक दिन वह कौतुहलवश घुड़दौड़ देखने के लिये गया। उसे इसके विषय में कोई जानकारी नहीं थी। उसने वहाँ ऐसे ही किसी घोड़े के ऊपर सौ रू. का दाँव लगा दिया और उसकी किस्मत से वह घोड़ा जीत गया। इसमें उसे पंद्रह हजार रू. प्राप्त हुआ जिसे लेकर वह घर आ गया।

यह जानकारी जब हरिसिंह को मिली तो वह रामसिंह के घर पहुँचकर बोला कि मित्र तुम्हारे खराब दिन बीत चुके है। जीवन में अनायास ही धन की प्राप्ति यह बताती है कि तुम्हारा समय बदल रहा है। अब मैं तुम्हारे पाँच लाख रू. वापिस कर रहा हूँ जिसे बुद्धिमानी पूर्वक उपयोग करके अपने खोये हुये धन और प्रतिष्ठा को वापिस प्राप्त करो। उसके यह वचन सुनकर रामसिंह के मन में उसके प्रति दुर्भावना खत्म हो गयी और आँखें से खुशी के आंसू निकल पड़े।

आज उसे अपने जीवन की सबसे बड़ी सीख मिल गयी थी कि सच्चा मित्र ऐसा ही होता है जो सही वक्त पर सही सलाह देकर जीवनपथ में मार्गदर्शन देता है। रामसिंह ने बहुत सर्तकता के साथ इन पाँच लाख रूपयों को अपने व्यापार में लगा दिया और उसके भाग्य से वह दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करने लगा। इससे यह शिक्षा मिलती है कि हमें बुरे वक्त में अपनी गतिविधियों को सीमित रखते हुए समय को व्यतीत करना चाहिए और जब हमें अहसास हो कि वक्त अच्छा आ गया है तो वापिस अपनी सक्रियता बढाकर उसका लाभ प्राप्त करना चाहिए।

मानवीयता

एक दिन मैं अपने मित्रों के साथ सिविल लाइन्स में कार से जा रहा था। एक जगह काफी भीड़ देखकर हमने अपनी कार रोकी और कारण जानने का प्रयास किया तो पता चला कि अभी अभी एक मोटरसाइकिल सवार का एक्सीडेंट हो गया है एवं उसे काफी चोटें आई है। एम्बुलेंस बुलाने के लिए फोन कर दिया गया है और उसकी प्रतीक्षा कर रहे है।

मेरा साथी डॉक्टर था। वह तुरन्त कार से उतरा और उस पीड़ित व्यक्ति के पास पहुँचा। उसके बच्चे और पत्नी रो रहे थे और सहायता की अपेक्षा से एम्बुलेंस की प्रतीक्षा कर रहे थे। मेरे मित्र ने तत्काल ही दूसरों की सहायता से उसे मेरी कार में लिटाया, उसकी पत्नी और बच्चों को साथ लेकर मुझे तुरन्त निकट के अस्पताल में चलने को कहा। अस्पताल में पहुँचकर उसका तुरन्त उपचार चालू हुआ एवं उसे खून देने की व्यवस्था की गई। वहाँ के वरिष्ठ चिकित्सकों ने बताया कि यदि इसको यहाँ लाने में थोड़ी देर और हो जाती तो इसका बचना मुश्किल था।

मेरे मित्र की तत्परता और सेवा भावना से एक व्यक्ति के प्राणों की रक्षा हो गई थी और एक परिवार बिखरने से बच गया था। हम लोगों को लग रहा था कि प्रभु ने ही उसकी रक्षा के लिए हम लोगों को निमित्त बनाया था। इसका बहुत संतोष था।

खंडहर की दास्तान

नर्मदा के तट पर एक भवन का खंडहर देखकर एक पर्यटक ने उसके निकट एक झोपड़े में धूनी रमाए बैठे हुए एक संत से पूछा कि यह खंडहर ऐसा क्यों पड़ा है ?

वे बोले कि बहुत समय पहले की बात है, यहाँ पर मोहनसिंह नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह गरीब था किंतु ईमानदार, कठोर परिश्रम करने वाला, बुद्धिमान एवं सहृदय था।

वह जो भी अर्जित करता था उसमें से सामने रहनेवाले एक अपंग और गरीब व्यक्ति को प्रतिदिन भोजन कराता था। वह स्वयं जाकर उस अपंग को भोजन दिया करता था। वह प्रायः संध्या के समय मेरे पास आकर दिन भर की दिनचर्या बतलाता था और मुझसे सलाह ही लेता रहता था। प्रभु की कृपा से उसकी मेहनत रंग लाई। धीरे धीरे उस पर लक्ष्मी जी की कृपा होने लगी। उसके पास धन आने लगां उसकी आर्थिक स्थिति सुधरने लगी। उसके जीवन में सुख के साधन जुटने लगे। उसने इस सुंदर भवन का निर्माण कराया और इसे अपना निवास बनाया। वह नर्मदा जी का भक्त था। अपने दिन का प्रारम्भ वह नर्मदा जी की स्तुति के साथ करता था। अपनी उन्नति के लिए नर्मदा माँ का आशीर्वाद माँगता था।

उसका एक पुत्र था, उसका स्वभाव अपने पिता से विपरीत था। एक दिन अचानक मोहनसिंह की निधन हो गया। मोहनसिंह के निधन के बाद उसके पुत्र ने उस अपंग व्यक्ति को भोजन देने के लिए अपने नौकर को भेजा। जब वह नौकर उस अपंग के पास भोजन लेकर गया तो उसने भोजन लेने से मना कर दिया और कहा कि इस घर से इतने दिन का ही दानापानी उसके भाग्य में था। मोहनसिंह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र उसका कामकाज नहीं संभाल सका और धीरे धीरे जमीन, जायदाद सभी कुछ बिक गया। वह गरीबी की हालत में पहुँच गया।

उसकी मित्र मंडली गलत आदतों का शिकार थी। उनके साथ रहकर उसमें भी जुआ, सट्टा, शराब आदि के सभी व्यसन आ गए। एक दिन वह अधिक शराब के नशे में लड़खडाता हुआ घर तक पहुँचा किंतु घर के भीतर ना जा सका और दरवाजे पर ही उसकी मृत्यु हो गई।

अब उसका कोई वारिस ना होने के कारण यह भवन आज खंडहर में तब्दील हो चुका है। यह खंडहर इस बात का प्रतीक है कि जहाँ सद्कर्म होते हैं वहाँ सृजन होता है और वहाँ लक्ष्मी व सरस्वती का वास होता है, किंतु जहाँ दुष्कर्म होते हैं वहाँ ना तो सरस्वती रहती है और ना ही लक्ष्मी ठहरती है, वहाँ विनाश हो जाता है।

सीख

एक वृद्ध व्यक्ति शहर की प्रतिष्ठित फलों की दुकान में कार्यरत था उसकी दुकान से प्रतिदिन एक ग्राहक आकर फल खरीदता था और जाने के पहले कुछ फल किसी ना किसी बहाने से छोड़ जाता था। यह बात दुकान का मालिक कई दिनों से भांप रहा था। एक दिन उसने उस वृद्ध कर्मचारी से पूछा कि यह व्यक्ति ऐसा क्यों करता है? इसका क्या कारण है, और तुम चुपचाप क्यों रहते हो ? उस वृद्ध कर्मचारी ने बताया कि मेरी इस अवस्था को देखते हुए यह जानकर की कि मैं इतने महँगे फलों को खरीदने की क्षमता नहीं रखता हूँ, वह जानबूझकर कुछ फल मेरे लिए छोड़ जाता है। मेरा एक लड़का है जो कि एक कारखाने में अच्छे पद पर कार्यरत है। मुझे बहुत दुख है कि मेरी इस अवस्था में सेवा करने के स्थान पर उसने संचित धन को भी हथिया लिया और मुझे घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया, इतना कहते कहते उसकी आँखों में आँसू छलक आये। दुकान का मालिक यह सुनकर किंकर्तव्यविमूढ हो गया और सोचने लगा कि एक अनजान ग्राहक कितनी सेवा का कार्य प्रतिदिन करके चला जाता है और में दुकान का मालिक होकर भी इसकी मदद के विषय में कुछ भी नहीं सोच सका। मैं भी अपनी जो कमाई करता हूँ वह पूरी की पूरी अपने बेटे को दे देता हूँ, इसका हश्र देखकर मैं चिंतित हो रहा हूँ कि भविष्य में कभी मैं काम करने के योग्य नहीं रह सका और धनोपार्जन में असमर्थ हो गया तब बेटे का व्यवहार मेरे साथ कैसा रहेगा।

उसने उस वृद्ध व्यक्ति को कहा कि कल से तुम उसके फल लेना बंद कर दो मैं तुम्हारे लिए इतने फल खुद प्रदान करूँगा। तुम्हारी दशा से मुझे यह शिक्षा भी प्राप्त हुई है कि मुझे अपनी कमाई का कुछ अंश भविष्य के लिए संचित रखना चाहिए ताकि हमें किसी के ऊपर निर्भर ना रहना पड़े।

राष्ट्र का विकास

हमारे देश में शहरों के विकास के लिए प्रायः जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों के प्रतिनिधि मंडल को विकसित देशों के शहरों के अध्ययन हेतु भेजा जाता है। उनसे यह अपेक्षा रहती है कि वे वहाँ के विकास का अध्ययन करते हुए यहाँ पर भी शहरों के विकास की ऐसी योजनाएँ बनाएँ जिसका लाभ लंबे समय तक नगरवासियों को मिलता रहे।

इसी संबंध मेंएक प्रतिनिधि मंडल लंदन गया था। वहाँ पर उन्हें पूरा शहर घुमाया गया एवं सभी आवश्यक व्यवस्थाओं से अवगत कराया गया। यह सब देखकर और इसके तकनीकी पक्ष से अवगत होकर प्रतिनिधि मंडल के सदस्य बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने वहाँ के अधिकारियों से उनके शहर एवं देश की बहुत तारीफ की और कहा कि विश्व में इसकी मिसाल मिलना बहुत कठिन है। वे सभी सोच रहे थे कि यह सुनकर वहाँ के अधिकारीगण बहुत प्रसन्न होंगें परंतु उनके उच्च अधिकारी ने बहुत शालीनतापूर्वक ऐसा जवाब दिया कि भारतीय प्रतिनिधि मंडल के सभी सदस्य सन्न रह गये।

उस अधिकारी ने बताया कि वह दस वर्ष तक भारत में रह चुका हूँ और गांव से लेकर देश के सभी प्रमुख स्थानों पर भ्रमण कर चुका हूँ, उसकी व्यक्तिगत दृष्टि में भारत की सभ्यता, संस्कृति और संस्कार विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। आपका देश विश्व में अन्य देशों की तुलना में प्रगति इसलिए नहीं कर पाता क्योंकि आपके यहाँ जनसंख्या का विस्तार और भ्रष्टाचार पर कोई नियंत्रण नहीं है। आपके देश में प्राकृतिक संपदा व सुंदरता भरपूर है, जैसे ताजमहल, प्राचीन किले एवं अन्य पुरातात्विक धरोहरें, कश्मीर और बद्रीनाथ जैसे स्थल जो कि स्विट्जरलैंड से भी ज्यादा सुंदर है। आप ऐसे पर्यटन स्थलों का विकास करके बहुमूल्य विदेशी मुद्रा प्राप्त कर सकते हैं। आपके देश में प्राकृतिक संपदा एवं संसाधन भरपूर है। हमें आश्चर्य होता है कि आपके देश के खनिजों को खुदाई करके विदेशों में क्यों निर्यात किया जाता है ? वे इन खनिजों से लोहा, एल्युमिनियम आदि का उत्पादन करते हैं। आपका देश स्वयं ही इनका उत्पादन कर सकता है जिससे आपको और विदेशी मुद्रा प्राप्त हो सकती है। किसी भी राष्ट्र के विकास में वहाँ के नागरिकों की सोच एवं भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। मैं आपको एक उदाहरण बता रहा हूँ जो कि हम सभी के लिए प्रेरणादायक है।

अमेरिका की एक कंपनी ने जापान के टोक्यों शहर में अपना बहुत बड़ा कार्यालय प्रारंभ किया। इसमें उच्च पदों पर अमेरिका के अधिकारियों के नियुक्त किया गया। उन वरिष्ठ अधिकारियों की सोच यह थी कि हमें अमेरिका के समान सप्ताह में पाँच दिन कार्य करना चाहिए एवं दे दिन शनिवार और रविवार को अवकाश रखना चाहिए। ऐसा करने से कर्मचारियों में उत्साह एवं पाँच दिन पूर्ण क्षमता के साथ अच्छा काम करने की उर्जा बनी रहेगी। उन्होंने जब अपनी इस सोच को कार्यरूप में परिणित किया तो वे हैरान रहे गये कि वहाँ के कर्मचारियों में इसका विरोध करते हुए हड़ताल कर दी। उनका कथन था कि हमें दे दिन की जगह सिर्फ एक दिन रविवार को ही अवकाश दिया जाए अन्यथा हम आलसी और अकर्मण्य हो जायेंगे। यदि शनिवार को भी अवकाश रहा तो हम बाजार में बेवजह फिजूल खर्ची करके अपने धन का दुरूपयोग करने लगेंगे।

अमेरिका से आये अधिकारीगण यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गये और उन्हें शनिवार का अवकाश समाप्त करना पड़ा। यह उदाहरण बताता है कि जापान के लोगों में कार्यरत रहने की कितनी प्रबल अभिलाषा है और यही कारण है कि जापान आज विश्व में तरक्की के उच्च शिखर पर है।

ब्रिटेन के अधिकारियों के यह सब तर्क सुनकर भारतीय प्रतिनिधि मंडल यह सोचता हुआ स्वदेश वापस आ गया कि अपने देश में भी विकास की ऐसी भावना यदि आ जाए तो हम प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँच सकते हैं।

शिक्षा

यदि मन में सच्ची लगन दूर दृष्टि और पक्का इरादा हो तो हम अवरोधों से संघर्ष करते हुए भी सफलता पा सकते हैं। एक गरीब परिवार में एक बालक रहता था जिसके पिताजी की आय इतनी कम थी कि उसे बमुश्किल दो वक्त का भोजन ही उपलब्ध हो पाता था। उस बालक के मन में अध्ययन करने हेतु शाला जाने की प्रबल इच्छा थी, परंतु उसके पिता अपनी गरीबी के कारण उसका दाखिला कराने में असमर्थ थे। वह बालक इन परिस्थितियों को समझकर चुप रहता था परंतु उसके मन में उत्साह कम नहीं हुआ था। वह अपने मित्र छात्रों की किताब को पढ़कर ज्ञान प्राप्त करने लगा।

एक दिन वह अपने पिता के साथ बाजार जा रहा था। उसी समय एक व्यक्ति ने अंग्रेजी में किसी रास्ते के विषय में जानकारी हेतु उसके पिताजी से पूछा। वे तो अंग्रेजी भाषा से अनभिज्ञ थे, तभी उस बालक ने अंग्रेजी में उन सज्जन को बताया कि टर्न राइट, गो स्ट्रेट एंड फ्राम क्रासिंग गो लेफ्ट। यह सुनकर वह व्यक्ति थैंक्स कहता हुआ उसके बताए रास्ते पर आगे बढ़ गया। उसकी अंग्रेजी भाषा सुनकर उसके पिताजी हतप्रभ रह गये और उन्होंने निश्चय कर लिया कि चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ झेलना पड़े परंतु अपने इस पुत्र को शाला में दाखिला दिलाऊँगा और उन्होंने इसे कार्यरूप में परिणित कर दिया।

डस बालक ने अपनी कुशाग्र बुद्धि से 19 वर्ष की आयु में ही अध्ययन में निपुणता प्राप्त कर सबको प्रभावित कर दिया। अब उसके जीवन में बहुत बदलाव आ गया था और उसे अच्छे पद पर आकर्षक वेतन के साथ नियुक्ति प्राप्त हो गयी थी। वह बालक और कोई नहीं हमारे देश के श्रद्धा के पात्र पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे।

फिजूलखर्ची का दुष्परिणाम

हमारे देश के प्रसिद्ध धार्मिक एवं पर्यटन स्थल वाराणसी शहर में एक संभ्रांत, सुशिक्षित एवं संपन्न परिवार में एक बालक ने जन्म लिया था। वह जब वयस्क हुआ तब उसका रहन सहन राजा महाराजाओं के समान खर्चीला था। अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत उसने हिंदी में लेखन प्रारंभ किया और वह एक प्रखर लेखक एवं कवि के रूप में प्रसिद्ध हो गया। उसने हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अपने रचनात्मक सृजन से बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की थी। वह एक विद्वान व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे।

वे अपनी काव्य साधना एवं पारिवारिक विरासत से प्राप्त धन से वैभव एवं विलासिता का जीवन जिया करते थे। उनके अपने खर्च उनकी आय से कही अधिक होते जा रहे थे और वे धीरे धीरे आर्थिक कंगाली की ओर बढ़ रहे थे। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं थी। उनके हितैषियों द्वारा आगाह करने पर भी कि जितनी चादर हो उतना ही पैर पसारना चाहिए उन्होंने इसे नजरअंदाज करते हुए अपनी मौज मस्ती का जीवन ही व्यतीत करते रहे। यदि इस प्रकार धन का व्यर्थ दुरूपयोग हो तो बड़े बड़े राजा महाराजाओं का भी खजाना खाली हो जाता है। उनकी इस गलती का परिणाम यह हुआ कि उन्हें आर्थिक तंगी के कारण अपने रिश्तेदारों एवं मित्रों से कर्ज लेकर अपना जीवन यापन करना पड़ा और इसी मानसिक तनाव में वे चौतीस वर्ष की अल्पायु में ही परलोक सिधार गये।

उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले अपने मित्र को पत्र लिखकर अपनी व्यथा एवं मन की भावनाओं को व्यक्त करते हुए लिखा था कि किसी भी व्यक्ति के पास असीम धन और असीमित साधन भी हो जाए तो उसको उसका उपयोग बहुत सोच समझकर सावधानीपूर्वक अपने भविष्य की दूर दृष्टि रखते हुए खर्च करना चाहिए। मुझे यदि यह समझ पहले आ गई होती और मैं सचेत हो गया होता तो ऐसी दुर्दशा एवं मानसिक वेदना मुझे कभी नहीं होती। यह व्यक्तित्व कोई और नहीं हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक भारतेंदु बाबू हरिशचंद्र थे।

सच्चा जीवन

शहर के एक बहुत संपन्न एवं उद्योगपति परिवार से संबंध रखने वाली एक महिला अपने खर्चीले स्वभाव एवं रईसी ठाट बाट से रहने के लिए प्रसिद्ध थी। वह उद्योगपति हरिकिशन की धर्मपत्नी रागिनी थी जो कि प्रायः प्रति सप्ताह किसी ना किसी बहाने से अपने निवास स्थान पर शानदार दावतें दिया करती थी, जिसके कारण वह नगर की सबसे खर्चीली महिला के नाम से प्रसिद्ध थी। उसके इस स्वभाव के कारण उसकी झूठी प्रशंसा करने वालों का एक वर्ग हमेशा उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधता रहता था। उसका पति बहुत परिश्रमी, अपने कार्य के प्रति समर्पित एवं एक सफल व्यवसायी था। उसने अपना कारोबार अपने कठिन परिश्रम, ईमानदारी एवं नैतिकता से स्थापित किया था और वह अपनी पत्नी के बेलगाम खर्चों से बहुत परेशान था।

एक दिन अकस्मात् ही श्रीमती रागिनी के स्वभाव में जबरदस्त परिवर्तन आ गया अब उन्होंने महँगी-महँगी पार्टियॉं करना, महँगे कपडों पर खर्च करना और अनचाही बातों पर धन का अपव्यय करना बंद कर दिया। वे समाज सेवा के माध्यम से गरीबों एवं बेसहारा व्यक्तियों की मदद करने में अपना समय व्यतीत करने लगी। एक दिन उनसे उनके परिचितों ने उनके स्वभाव में आये इस अकल्पनीय परिवर्तन का कारण पूछा। उन्होंने बताया कि एक दिन वे अपने पति के साथ एक पार्टी में गई थी। वहाँ पर उनका परिचय उनके पति ने आई टी उद्योग के देश में एक विशिष्ट स्थान रखने वाले उद्योगपति से कराया। रागिनी उनकी सादगी, आचार विचार एवं उनके चिंतन से बहुत प्रभावित हुयी, उसे जानकर आश्चर्य हुआ कि वे सज्जन अपने घर का सभी काम खुद करते हैं एवं नौकरों के ऊपर निर्भर नहीं रहते हैं। वे चाहे तो देश की महँगी से महँगी कारें खरीद सकते हैं परंतु आज भी वे अपनी आवश्यकता के अनुरूप छोटी कार का ही उपयोग करते हैं। वे कभी विदेशी वस्तुओं को ना खुद खरीदते हैं और न ही दूसरों को प्रोत्साहित करते हे। उन्हें अपने देश के उत्पादनों की गुणवत्ता पर पूरा विश्वास है। उनके सादे कपडों और

उच्च विचारों में रागिनी के मन में एक परिवर्तन ला दिया और उसने धन का अपव्यय करना बंद कर दिया। वे सज्जन जिनसे रागिनी प्रभावित हुई वे इंफोसिस कंपनी के चेयरमेन श्री नारायण मूर्ति थे। उसने अपने दूसरे मित्रों को भी सलाह दी कि व्यक्ति अपने अच्छे कर्मों से समाज में मान सम्मान पाकर याद रखा जाता है। जीवन में झूठे आडंबर से अपने को ही नुकसान होता है, इसलिये हमें अपना जीवन समाज की सेवा में समर्पित करना चाहिए।

करूणामयी व्यक्तित्व

एक दिन कड़ी धूप में एक व्यक्ति कराहता हुआ रास्ते में लेटा हुआ था। उसके फटे पुराने कपड़े, उसकी गरीबी की स्थिति को दर्शा रहे थे। वह बोलने में असमर्थ था और कातर निगाहों से मदद की आशा में आसपास से आने जाने वालों को देख रहा था। लोग उसे देखकर उससे बचते हुए दूर से निकले जा रहे थे। किसी के मन में भी उसके प्रति दयालुता या मदद का भाव नहीं था। एक व्यक्ति के मन में उसे देखकर करूणा जागृत हुई और वह उसके पास पहुँच कर उसकी तकलीफ के विषय में उससे पूछने लगा। वह बीमार व्यक्ति कुछ भी बोल कर बता पाने में असमर्थ था। उसने इशारे से किसी अस्पताल पहुँचाने की प्रार्थना की। वह राहगीर अपना फर्ज समझकर किसी तरह उसे उठाकर रिक्शे में बैठाकर आसपास गिरे हुये उसके सामान को समेटकर उसे निकट के सरकारी अस्पताल में ले गया। अस्पताल में चिकित्सकों ने उसे तुरंत भर्ती कर लिया और बताया कि इसे हैजा हुआ है और यदि इसका तुरंत इलाज नहीं किया गया तो इसका जीवन खतरे में आ सकता है। वह राहगीर दिनभर अस्पताल में रहकर उसकी मदद के लिए अपना हाथ बँटाता रहा और जब उसकी समुचित चिकित्सा प्रारंभ हो गई, तब वह उसे छोड़कर अपने घर की ओर चला गया। वह राहगीर जिसने अपना फर्ज समझकर उस बीमार की सहायता की वह व्यक्ति ईश्वरचंद्र विद्यासागर थे।

(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

टिप्पणियाँ

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 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3865,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,337,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2812,कहानी,2137,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,865,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,24,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1932,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,660,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,703,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,61,साहित्यम्,2,साहित्यिक गतिविधियाँ,186,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,69,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग - 9 // राजेश माहेश्वरी
कहानी संग्रह // तर्जनी से अनामिका तक ( प्रेरणादायक कहानियाँ एवं संस्मरण ) - भाग - 9 // राजेश माहेश्वरी
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