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बदलते परिवेश में रक्षा बंधन // श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता

बदलते परिवेश में रक्षा बंधन

  बदलते परिवेश में रक्षा बंधन // श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता                                 


श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता
(एम.ए. संस्कृत विशारद)
    
रक्षा बन्धन एक धर्म निरपेक्ष त्यौहार है। भारतीय समाज का हर वर्ग इस पर्व को बड़े उत्साह से मनाता है । भारत ही नहीं अपितु मारिशस, नेपाल, आदि देशों में यह पर्व मनाया जाता है। विदेशों में जहाँ भी भारतीय निवास करते हैं, वे अपने भाईयों-बहनों से संचार माध्यम से सम्पर्क कर इस  पवित्र त्यौहार का भरपूर आनन्द लेते हैं ।
राखी का पर्व कब से प्रारम्भ हुआ इस विषय में कहा जाता है कि जब देव तथा दानवों का युद्ध हुआ तो इन्द्र घबराकर देवगुरू बृहस्पति के पास पहुँचे। इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी ने जब यह समाचार सुना तो उन्होने रेशमी धागों को मंत्र-शक्ति से अभिमंत्रित कर लिया तथा उन्हें इन्द्र के हाथ पर बाँध दिया। कहा जाता है कि इसी के प्रभाव से इन्द्र युद्ध में विजयी हुए।


स्कन्धपुराण तथा पद्मपुराण के अनुसार राजा बलि ने 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य प्राप्त करने का प्रयत्न किया देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु के पास गये। विष्णु ने ब्राह्मण वेष धारण किया। वे राजा बलि के पास भिक्षा माँगने पहुँचे। शुक्राचार्य ने राजा बलि को तीन पग जमीन देने से मना कर दिया किन्तु बलि बचनबद्ध थे। उन्होंने तीन पग जमीन दे दी।  एक पग में आकाश, दूसरे में पताल तथा तीसरे में धरती का दान हो गया। राजा बलि को स्वयं रसातल में जाना पड़ा। बलि का अभिमान चूर हो गया किन्तु बलि  ने अपनी भक्ति की शक्ति से भगवान विष्णु से कहा कि आप हमेशा मेरे सम्मुख रहें। विष्णु वचनबद्ध हो गये। जब विष्णुजी वापस नहीं आये तो लक्ष्मीजी चिंतित हो उठी। वे राजा बलि के पास पहुँची। वहाँ उन्होंने श्री विष्णु को बलि के सम्मुख पाया। उन्होने बलि को अपना भाई बनाकर उसे रक्षा सूत्र बाँधा और भाई से अपने पति भगवान विष्णु को ले आई। उस दिन श्रावण पूर्णिमा का दिन था।  इसके बाद भगवान् विष्णु ने हयग्रीव का अवतार लिया। हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
द्वापर युग में भगवान् श्रीकृष्ण ने शिशुपाल के 100 अपराध पूर्ण होने पर उसका वध कर दिया। उन्होंने बाएँ हाथ की ऊँगली से सुदर्शन चक्र चलाकर शिशुपाल की गर्दन काट दी, किन्तु संयोगवश श्रीकृष्ण की ऊँगली से खून बहने लगा। जब द्रौपदी ने यह दृश्य देखा तो अपनी साड़ी से चिंदी फाड़कर श्रीकृष्ण की ऊँगली में बाँध दिया जिससे रक्त प्रवाह रूक गया। भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को अपनी बहिन मानकर हमेशा उसका साथ दिया और भरी सभा में जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था तब श्रीहरि द्वारा द्रौपदी की रक्षा की।


रक्षा बंधन के विषय में यह कथा भी प्रचलित है-
एक बार श्रीगणेश और ऋद्धि-सिद्धि से उनके पुत्र शुभ-लाभ ने अपने लिये एक बहन के लिये इच्छा व्यक्त की थी। श्रीगणेशजी तथा ऋद्धि-सिद्धि ने अपने तपोबल से       माँ संतोषीमाता को आहूत कर उन्हें अपने पुत्रों के लिये बहिन के रूप में आने के लिये कहा। उन्होंने इसे स्वीकार किया और अपने भाईयों को रक्षा सूत्र बाँधा।
सिकंदर और राजा पुरू के विषय में भी एक कथा प्रचलित है। भारतवर्ष पर आक्रमण करने के पश्चात्  राजा  पुरू की शक्ति से सिकन्दर घबरा गया। उनकी पत्नी भी बड़ी व्याकुल हो गई। उन्होंने पुरू के लिये एक रक्षा सूत्र भिजवाकर उसे अपना भाई स्वीकार किया जिससे युद्ध समाप्त हो गया।
 
चित्तौड़ पर बहादुरशाह ने आक्रमण किया। वहाँ की रानी कर्णावती थी ,वह विधवा थी । आक्रमण से वह घबरा गई। उसने हुमायुँ को राखी बाँधी थी। एैसे संकट के समय हुमायुँ ने अपनी बहिन कर्णावती की रक्षा की तथा युद्ध में सहायता की।
रवीन्द्रनाथ टैगोर अपने विश्वविद्यालय शांति निकेतन में विश्वबन्धुत्व की भावना को उजागर कर इस पर्व को मनाते थे।

 
भारत में आज भी अनेक विद्यालयों में छोटी-छोटी कन्याएं भैयाओं को राखी बाँधती है और अपने इस पावन सम्बन्ध को आजीवन निभाने के लिए बचनबद्ध रहती हैं। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए भारत के शासकीय तथा अशासकीय कार्यालयों में महिला कर्मचारी पुरूष कर्मचारियों की कलाई पर राखी बाँधे तो इससे हमारी भारतीय संस्कृति की रक्षा होगी और नैतिकता के स्तर में सुधार होगा।
सेना में कार्यरत देश के रक्षक जवान जो इस पवित्र पर्व पर भी अपने गृह नगर नहीं आ सकते हैं उनको समीपवर्ती इलाके की बहिनें रक्षा सूत्र बाँधकर सफल तथा दीर्घायु होने की कामना करना चाहिए। यह महापर्व हम सबके लिये गौरव और स्वाभिमान का प्रतीक है।
इस त्योहार का आध्यात्मिक मूल्य भी है इसमें कहीं न कहीं एक दूसरे की रक्षा के वचन के साथ ही नैतिक तथा सांस्कृतिक मूल्य भी दृष्टिगोचर होता है।
         भाभी भी अपने भ्रातृ तुल्य देवर को राखी बाँधती है। यह रक्षा सूत्र उनमे सम्बन्धों की विशालता की परिचायक है। छोटे भाई की पत्नी भी अपने पति के बड़े भाई (जेठजी) को राखी बाँधकर इस संबंध को प्रगाढ़ बना सकती है।


रक्षा बंधन पर संस्कृत दिवस भारत में ही नहीं अपितु विश्व के कई संस्कृत संस्थानों में मनाया जाता है। इस दिन पंण्डित क्षमाराव का जन्म दिवस भी रहता है। गुरू पूर्णिमा से श्रावणी पूर्णिमा (रक्षा-बंधन) तक अमरनाथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। शासन की ओर से पूर्ण सुरक्षा का प्रबन्ध किया जाता है। लंगर का आयोजन होता है। मेला भी लगता है अमरनाथ गुफा में शिवलिंग के दर्शन कर भक्त अपने जन्म को सफल मानते हैं। यह शिवलिंग बर्फ का होता है, यह इसी समय निर्मित होता है ।
महाराष्ट्र में इस दिन को नारियल पूर्णिमा या श्रावणी पूर्णिमा कहते हैं। पवित्र नदी या समुद्र किनारे जाकर यज्ञोपवीत बदलकर नवीन यज्ञोपवीत धारण करते है। वेदपाठी ब्राह्मण द्वारा ही यह कार्य सम्पन्न कराया जाता है । फलस्वरूप उन्हें उचित दक्षिणा दी जाती है।
राजस्थान में इसे राम राखी कहा जाता है। भाभियों को चूड़ाराखी बाँधी जाती है। जोधपुर में राखी के दिन गणपति, दुर्गा तथा अरून्धती का पूजन किया जाता है। तर्पण कर पितृऋण से मुक्त होते है राखी का पूजन कच्चे दूध से करते है।


केरल, उडिसा, तमिलनाडू तथा दक्षिण भारत में नदी किनारे यज्ञोपवीत बदलते हैं इस दिन वेद अध्ययन प्रारम्भ किया जाता है। ब्रज में हरियाली तीज से श्रावणी पूर्णिमा तक ठाकुर जी को झूले में बिठाया जाता है और उनका प्रतिदिन श्रृंगार किया जाता है ।
उत्तर प्रदेश में आज के दिन बहिन भाई की कलाई पर मंगल कामना करते हुए राखी बांधती है ।
बुन्देलखण्ड में पूर्णिमा से पूर्व नवमी को गेहूँ जौं को सकोरे में बोया जाता है। उनकी संध्याकाल में आरती पूजन किया जाता है इसे कजरी कहते है ।
मालवा प्रान्त में इसे एक धार्मिक स्वरूप प्राप्त है। प्रातःकाल नदी किनारे जाकर पण्डित के मार्गदर्शन में यज्ञोपवीत को धारण किया जाता है । गौमूत्र, गाय का गोबर, घी शहद आदि का उपयोग किया जाता है । रक्षा बन्धन के पूर्व भाई अपनी बहिनों को सम्मान निमंत्रित करता है कई घरों में बहिन को बीरपस (औपचारिक निमंत्रण) दिया जाता है जिसका अर्थ राखी का निमंत्रण ही है। जिस वर्ष भाई के परिवार में आकस्मिक किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो बिना निमत्रण के बहिन राखी बांधने जाती है। कई घरों में दीवार पर या कागज पर श्रवण कुमार का चित्र गेरू से बनाकर उसका पूजन किया जाता है फिर राखी बाँधी जाती है । देवगुरू बृहस्पति ने इन्द्र को यह मंत्र दिया था जिसे राखी बाँधते समय बोला जाता है -               
                येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रः महासुरः ।
                तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षो मा चल मा चल ।।


अर्थात जिस रक्षा सूत्र से महा बलशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी) तुम अडिंग रहना अपने संकल्प से कभी विचलित न होना।
बाजार में विभिन्न आकार - प्रकार डिजाईन के रंग-बिरंगे रक्षा सूत्र उपलब्ध है।  वर्तमान में चाईनीज राखियों की भरमार है । ये राखियाँ स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है। मेरे विचार से बहिनों को चाहिये कि वे बाजार से राखी बनाने की सामग्री लाकर स्वयं के हाथों से बनी आकर्षक, सुन्दर राखी बनाकर अपने परिवार में उनका प्रयोग करें। इससे उनकी रचनात्मकता को उजागर होने का अवसर प्राप्त होगा और परिवार के बालक भी तथा अन्य सदस्य भी कुछ नया सीखने का प्रयत्न करेंगे। ये मनोयोग से बनाई गई राखियाँ हमारी सांस्कृतिक  धरोहर को सहेजते हुए भाभी-भाईयों की कलाईयों की श्रीवृद्धि करेगी।
ऐसे पुनीत पर्व पर हमारे शहर के वृद्धाश्रम के वृद्धजन, कारागृह के कारावासियों, दिव्यांगों, अनाथालयों, के बालकों विभिन्न चिकित्सालयों में भर्ती रोगियों को जाकर रक्षाबन्धन मनाना चाहिये। नारी निकेतन की बालिकाओं के प्रति अपनी सद्भावना रखनी चाहिये तथा रक्षा बन्धन के इस पर्व पर उनके प्रति उदार दृष्टिकोण रखते हुऐ शुभकामना प्रगट करना हम देशवासियों का परम कर्तव्य है।
बालिकाओं को चाहिये कि इस दिन सर्वप्रथम भगवान गोपाल कृष्ण को राखी बांधे। श्रीहनुमान्जी को राखी बाँधे फिर घर के सदस्यों को राखी बाँधे। घर, कलम, दवात, वाहन, आदि को भी राखी बाँधे। यह पर्व श्रवण पूर्णिमा से जन्माष्टमी तक मनाया जाता है कई घरों में ऋषि पचंमी के दिन भी राखी बाँधते है ।
आधुनिक काल में परिवार का आकार सीमित हो गया है । परिवारजनों की मानसिकता संकुचित हो गई है। परिवार का अर्थ माता-पिता और उनके एक या दो बच्चों तक ही सीमित रह गया है काका, ताऊ, मामा, बुआ, मौसी, आदि के सम्बन्धों में दूरियाँ बढ़ती जा रही है। जहाँ दो बहने एक दूसरे की रक्षा का वचन ले सकती हैं दो भाई भी आपस में राखी बाँधकर संकट की घड़ी में साथ निभा सकतें हैं ।
प्रकृति का सानिध्य भी हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। इनकी रक्षा भी हमारी भावी पीढ़ी के लिये अति आवश्यक है। वर्तमान को सहेजकर ही हम भविष्य को सुनहरा बना सकते हैं। वृक्ष हमारे जीवनदाता है उनकी रक्षा करना हमार कर्तव्य है। प्रत्येक बालक-बालिका को चाहिये कि रक्षा बन्धन के दिन एक पौंधे को राखी बांधे और अपने इस रक्षा बन्धन को पौधे के पूर्ण विकसित होने तक, उसके पेड़ बनने तक निभाये। यह प्रकृति के प्रति एक बड़ी कर्तव्य निष्ठा होगी।


‘‘तरूवर फल नहीं खात है सरवर पियत न पान ’’ पेड़ स्वयं फल नहीं खाता है वह सब को  देता ही है तालाब स्वयं पानी पीता नहीं है सबकी प्यास बुझाता है अर्थात देने में जो सुख है वह लेने में नहीं है ।
यह रक्षा बन्धन है। दोनो हाथों से दूसरों को दो और एक हाथ से लो। यही जीवन का श्रेष्ठतम ध्येय होना चाहिये। 

                                                                                            
                                                      श्रीमती शारदा नरेन्द्र मेहता
                                                     एम.ए. संस्कृत विशारद
.103ए व्यास नगर, ऋषिनगर विस्तार
                                               उज्जैन (म.प्र.)456010


Email:drnarendrakmehta@gmail.com

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