व्यंग्य // एक डाकू की शोक सभा // वीरेन्द्र सरल

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व्यंग्य

एक डाकू की शोक सभा

वीरेन्द्र सरल

मुझे एक अजीब शोकपत्र मिला जिसमें लिखा था कि अत्यन्त हर्ष के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि हमारे क्षेत्र के लोकप्रिय और यशस्वी डाकू श्री सज्जन सिंह ब्रम्हलीन हो गये हैं जिसके उपलक्ष्य में हर्षोल्लास के साथ एक शोकसभा का आयोजन अमुक दिनांक और स्थान पर किया जा रहा है। जिसमें उपस्थित होना अनिवार्य है अन्यथा कठोर दंडात्मक कार्रवाही की जायेगी। नीचे टीप में लिखा था कि वैसे तो आमंत्रित सभी सज्जनों को शोकसभा तक लाने के लिए वाहन की व्यवस्था की गई है पर ध्यान रहे, आने से इंकार करने वालों को अपहरण करके लाने का भी पूरा इंतजाम किया गया है। बाकी आपकी मर्जी।

शोकपत्र पढ़कर मैं अजीब पशोपेश में पड़ गया। कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि यह पत्र शोकपत्र है या किसी मांगलिक कार्य का निमंत्रण। किसी कार्यालय का आदेश है या किसी आश्रम के द्वारा किसी भक्त को सूचना? मेरी जिज्ञासा किसी न्यूज चैनल की टी आर पी की तरह बढ़ गई थी पर मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा था। धमकी के साथ ऐसा निमंत्रण पत्र जीवन में पहली बार मिला था। पत्र पढ़कर तो ऐसा लग रहा था मानो शोकसभा को स्वयं मृतात्मा ही संबोधित करने वाली हो।

मैंने ऐसे अजीबोगरीब निमंत्रण पत्र की बात अपने पड़ोसी साहब को बतलाई। उन्होंने ठहाका लगाते हुए कहा-‘‘ अरे! इसमें इतना हैरान होने की क्या बात है भाई। चूंकि शोकसभा में सम्मलित होने के लिए अपने क्षेत्र के भैया जी आ रहें है। तो भीड़ की आवश्यकता पड़ेगी की नहीं? शोकसभा में सम्मिलित होने वालों की संख्या उन्हें लाखों में बताई गई है तभी तो उन्होंने निमंत्रण स्वीकार किया है। आजकल भैया जी बिना भीड़ और मीडिया के अपने बाप की मैय्यत में जाने को भी तैयार नहीं होते तो किसी डाकू की शोक सभा में कैसे जायेंगे? भीड़ का आकर्षण हो तो वे नरक में भी जाने के लिए तैयार बैठे रहते हैं समझे? तुमने बिलकुल ठीक समझा है कि मानों शोकसभा को स्वयं मृतात्मा ही संबोधित करने वाली हो। अपने भैया जी किसी मृतात्मा से कम थोड़े ही है। भई जिसकी आत्मा मर गई हो, वह मृतात्मा ही तो है। इसमें ज्यादा सोचने विचारने की क्या आवश्यकता है, तुम्हें निमंत्रण मिला है तो शोक सभा में शामिल होने के लिए चले जाओ। लगे हाथ भैया जी के दर्शन लाभ का भी पुण्य मिल जायेगा। आखिर पिछले चुनाव के बाद अब जब चुनाव सिर पर मंडराने लगा है तभी तो भैया जी दर्शन देने जा रहे हैं। मुझे तो अभी तक निमंत्रण-पत्र नहीं मिला है पर मिले तो मैं तो जरूर जाऊंगा।

मैं पड़ोसी साहब के ज्ञान के सामने नतमस्तक हो गया। और प्रार्थना करने लगा कि पड़ोसी साहब को भी जल्दी ही वह निमंत्रण पत्र मिल जाये।

दो दिन बाद पड़ोसी साहब ने मिलते ही गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए कहा-‘‘लो, तुम्हारी दुआ कबूल हो गई। मुझे भी वह निमंत्रण पत्र मिल गया जिसका जिक्र तुमने किया था। अब तो खुश हो। शोकसभा में सम्मिलित होने अब हम दोनों साथ ही जायेंगे, ठीक है?

निर्धारित दिन और समय को हम डाकू की शोकसभा में सम्मिलित होने के लिए निर्धारित स्थल पर पहुँचे। वहाँ बिल्कुल किसी चुनावी रैली जैसा माहौल था। सुसज्जित मंच अतिथियों से भरा था और पंडाल के नीचे भारी भीड़ इकट्ठी थी। डाकू सज्जनसिंह की बड़ी सी तस्वीर को आकर्षक फ्रेम में मढ़वाकर मंच के किनारे पर रखा गया था। तस्वीर पर सुगंधित फूलों की माला डाली गई थी। नीचे अगरबत्ती जल रही थी।

अतिथि क्रमशः माइक पर आकर डाकू सज्जनसिंह पर संस्मरण सुनाते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे थे। जब भीड़ अपेक्षा से अधिक हो गई और आयोजकों को लगा अब इससे ज्यादा भीड़ इकट्ठी नहीं हो सकती तब मंच संचालक ने शोक सभा को संबोधित करने के लिए मुख्य अतिथि भैया दुर्जनसिंह को इन शब्दों में आमंत्रित किया। अब हमारे परम हितैषी, संरक्षक और कुलगौरव हमारे भैया जी सभा को सम्बोधित करते हुए डाकू सज्जनसिंह जी को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। जाहिर है डाकू की शोक सभा का मंच संचालन करने वाला भी एक कुशल डाकू ही रहा होगा। वैसे हमारी बहुत पुरानी और समृद्ध परम्परा है कि यदि मंच पर किसी महापापी को भी आमंत्रित करना हो तो संचालक उसे धर्मात्मा सम्बोधित करते हुए ही आमंत्रित करता है। किसानों के खून चूसने वाले को माटीपुत्र और निपट निकम्मा और कायर को महाप्रतापी तथा महापराक्रमी संबोधित करने से ही मंच की गरिमा बढ़ती है।

वैसे भैया जी भी समयानुकूल रंग बदलने में माहिर है। मंच के अनुरूप ऐसा स्वांग रचते हैं कि कुशल अभिनेता भी दांतों तले ऊँगलियां दबा ले। भैया जी जहां भी जाते हैं वहां जाने से पहले ही अपने पी ए से वहां की कला , संस्कृति, किसी महापुरूष या किसी विख्यात व्यक्तित्व के संबंध में पहले से ही टिप्स लिखवाकर रखते हैं ताकि भाषण के समय उसका सदुपयोग करते हुए जनता को उल्लू बनाया जा सके। इस बार भी उनकी तैयारी पूरी थी। इसलिए मंच पर आते ही सबसे पहले उन्होंने यही कहा-‘‘ सबसे पहले मैं डाकू सज्जनसिंह की जन्मभूमि और कर्मभूमि की पावन मिट्टी को प्रणाम करता हूँ। धन्य है यह धरती जिसने सज्जनसिंह जैसे कुख्यात डाकू को जन्म देने का गौरव प्राप्त की है। धन्य है वे लोग जिसके घर डाका डालने के लिए डाकू सज्जनसिंह के पावन चरणकमल पडे हैं। आज ऐसे व्यक्तित्व हमारे बीच नहीं रहे। यह हमारे लिए अपूरणीय क्षति है। पर वे हमें डाका डालने की जो कला विरासत में दे गये हैं। हम उसे न केवल सहेजकर रख रहें हैं बल्कि उसमें चार चांद भी लगा रहे हैं।

जो आज तक नहीं हुआ था सबसे पहले हमने वही काम किया है। डाकू कल्याण आयोग की स्थापना की है और उनके संरक्षण के लिए उचित कदम उठाया है और उन्हें प्रशिक्षित करने का बीड़ा उठाया है। डाकू सज्जनसिंह पुराने ढंग से डाका डालते थे और कभी-कभी पकड़े भी जाते थे फिर हमारे पूर्वजों की कृपा से ही बाहर निकल पाते थे। हमने सहानुभूतिपूर्वक विचार करने पर पाया कि डाकुओं को बार-बार पकड़ में आ जाने की झंझट से मुक्ति मिलनी चाहिए। इसके लिए जरूरी था सबसे पहले उनका पहनावा ठीक करना ताकि जहां भी आप डाका डालने जायें तो लोग आपको अपना हितैषी समझे, दुश्मन नहीं। जीवन में वेशभूषा का बड़ा ही महत्व है साथियों। हमेशा अप-टू-डेट रहने से लोग डाकू को भी संत समझते हैं। चरित्र पर चाहे जितना भी दाग लग जाये, दिल चाहे जितना भी काला हो पर कपड़े पर दाग नहीं लगना चाहिए।

मेरा मानना है कि चाहे भ्रष्टाचार के हथियार से मनचाहे नरसंहार करो। चाहे अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए जनता की पीठ पर छुरा भौंक दो। चाहे अपना उल्लू सीधा करने के लिए सबको धर्म, जाति , भाषा और मजहब के नाम पर आपस में लड़ाकर दंगों की आग में झोंक दो और संकट की स्थिति में दुम दबाकर किसी खोह में छिप जाओ। चाहे देश की सारी सम्पत्ति पिछले दरवाजे से बेच खाओ पर आम जनता से मीठा बोलो। क्योंकि मधुर वचन है औषधि कटुक वचन है तीर। बोलो, सबसे मीठा बोलना चाहिए कि नहीं? मीठा बोलना चाहिए कि नहीं?

हमारे अग्रज कह गये हैं कि मारे तो हाथी और लूटे तो भंडारा। किसी मुर्गी पर नीयत खराब करके मुर्गीचोर कहलाने से क्या फायदा? डाका डालना ही है तो जरा ढंग से डालो ताकि इतिहास में सुनहरे अक्षरों में नाम लिखा जाय। इसलिए आजकल के प्रशिक्षित और सफेदपोश डाकू सीधे बैंकों को अपना निशाना बनाते हैं। बैंकों से अरबों-खरबों का कर्ज लेकर चम्पत होने की कला में दक्ष डाकुओं पर ही तो यह देश गर्व करता है। है दुनिया के किसी और देश में इतने प्रशिक्षित और योग्य डाकू? नहीं न? ललित ने लालित्यपूर्ण डाका डाला और विजयी होकर माला पहनकर माल्या हो गये। ये तो बस कुछ नमूने हैं। अभी तो हमारे प्रशिक्षण केन्द्र में एक से बढ़कर एक हीरे हैं जो देश की अर्थव्यवस्था को चूना लगाने के लिए तैयार बैठे हैं। वैसे हमें देश के अर्थ व्यवस्था कि बिल्कुल भी चिन्ता नहीं करना चाहिए क्योंकि यहां की क्षमाशील और दयावान जनता टैक्स का भारी बोझ लादकर जीने की अभ्यस्त हो गई है। उस पर चाहे टैक्स का जितना भी बोझ लाद दो वह चूँ तक नहीं करती। इसके लिए मैं जनता का आभारी हूँ।

मैं डाकुओं की प्रशंसा में तो बहुत कुछ कहना चाहता हूँ। पर समय की अपनी मर्यादा है। शेष बातें आपसे फिर कभी कहूंगा। यहां से मुझे तुरन्त हत्यारा महासंघ के महा अधिवेशन में जाकर उन्हें भी संबोधित करना है। इसलिए मैं डाकू सज्जनसिंह को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ। नमस्कार---।

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वीरेन्द्र ‘सरल‘

बोड़रा (मगरलोड़)

जिला-धमतरी ( छत्तीसगढ़)

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