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कहानी // पागल बाबा // डॉ.वीरेंद्र कुमार भारद्वाज

कहानी

पागल बाबा

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डॉ.वीरेंद्र कुमार भारद्वाज


“पागल बाबा , पागल बाबा ,हमें टॉफी दो ,हमें टॉफी दो।” मध्यावकाश की घंटी बजी कि कुछ बच्चे उस बूढ़े के पास आकर चिल्लाने लगे।

“ पहले मुझे दो, पहले मैं आया हूँ।” एक बच्चा बोला।

“नहीं पागल बाबा, इसने मुझे पीछे कर दिया है। पहले मुझे दो।” दूसरे ने अपनी बात रखी।

“शांत रहो बच्चो, शांत रहो। अच्छे बच्चे लड़ा नहीं करते। मैं सबको टॉफियाँ दूँगा। यह तुम लो.., यह तुम लो..।” कहता हुआ उस बूढ़े ने अपने पास पहुँचे ग्यारहों बच्चों को टॉफियाँ बाँट दीं।

“थैंक्यू पागल बाबा, थैंक्यू..। ” अपने - अपने हिस्से की टॉफियाँ लेकर बच्चे बूढ़े को धन्यवाद देते हुए उछलते-कूदते स्कूल की तरफ भागने लगे।

“ पर बच्चो ! इस तरह से सड़क के इस पार न आना। मैं उस पार न रहूँ, तो आवाज देकर पुकार लेना।” भागते बच्चों को लगभग चिल्लाकर पागल बाबा ने हिदायत दी।

“ ठीक है बाबा , ठीक है । कल से तुम इसी तरफ रहना।” कुछ बच्चों ने सुना और यों जवाब देते भाग गए।

बूढ़े की आँखें आज फिर सायास भर आईं। उसके ओठ भी फड़फड़ाने लगे। फिर उसके पोता-पोती याद आने लगे। उसे याद हो आया कि वह बिस्तर पर चित लेटकर अपने पोते को खेला रहा है। उसने अपनी दाढ़ी-मूँछें उसके गाल में रगड़ दी हैं। पोता कुछ झुँझलाकर, कुछ हँसकर उसकी मूँछें कबाड़ने पर तुला है। फिर पोते के कोमल हाथों से अपनी मूँछें छुड़वा उसके हाथों को बारी-बारी से चूम लिया है।फिर उसके पेट, गले और काँखों में गुदगुदी बड़ा रहा है। और उतना ही हँस रहा है पोता।

अपार सुख से तृप्त है दादा। ‘दादा ! दादा ! मुझे भी, मुझे भी गुदगुदी बड़ाओ।’ छह वर्षीया पोती अपने भाई को पीछे करके अपने दादा की छाती पर बैठ गई है। उसका दो वर्षीय भाई पीछे से उसके बाल नोंचने लगा है। बहन ब्यूटी ने भी पलटकर वार किया। उसने अपने भाई की एक जटा को कसकर खींच दिया। अन्नु जोर से रो पड़ा। फिर वह ब्यूटी के नाक-मुँह नोंचने लगा। ब्यूटी ने भी अपनी ताकत का प्रयोग उसी प्रकार किया। दादा ब्यूटी को हल्का डाँटते-डाँटते जोर से डाँट पड़ा। दादा की डाँट से तिलमिला पोती रोती हुई उसकी छाती पर से उतरकर भागने लगी। लपककर पकड़ लिया दादा ने। फिर घोड़ा बनते बोले –‘मेरी प्यारी बिटिया घोड़े पर चढ़ेगी।’ ब्यूटी रोना भूल अपने बाबा की सवारी करने लगती है।

फिर एक नया ख्याल आता है - चाँदनी रात है। वह अपने पोते को एक राजा का किस्सा सुना रहा है। तभी उसकी बहू अपने बेटे अन्नु को उसके पास रख जाती है। साथ में दूध-रोटी मथा एक कटोरा। अन्नु न खाने की जिद पकड़ अपने दादा के पास जाना चाहता है। दादा उसे गोद में उठा लेता है और चाँद दिखाते गाता है –‘ चंदा मामा दूर के, पुए पकाए गुड़ के। अपने खाए थाली में , मुन्ने को दिया प्याली में। प्याली गई फूट, मुन्ना गया रूठ। नई प्याली लाएँगे , मुन्ना को मनाएँगे। मुन्ना के मुँह में घुटुक।’ इतना गाकर अन्नु के मुँह में दूध- रोटी का एक कौर डाल देता है। इसी तरह से कई तरह की बातें बना-बनाकर वह सारा खाना उसे खिला देता है। इधर मुन्नी अपना निरादर समझ रोने लगती है। अब वह उसे भी अपनी दूसरी गोद में उठा लेता है। फिर क्रमश: दोनों को अपने दोनों कंधों पर बिठाता है और छत पर टहलते हुए गाता है – ‘जय कन्हैया लाल की / मदना गोपाल की/ लइकवन के हाथी-घोड़ा/ बुढ़वन के पालकी/’ बच्चे खूब मस्ती और खुशी में हैं। फिर दोनों को उतार किस्सा सुनाता है। बच्चे बीच किस्सा ही सो जाते हैं।

‘झनाक!’ तभी किसी ने दो का सिक्का उसके कटोरे में डाल दिया। बूढ़े की विचार-तंद्रा टूट गई। वह नीचे मुँह पर फूट-फूट कर रोने लगा। फिर अपने को काबू में कर अपना कटोरा उठाए एक होटल की तरफ चल पड़ता है।

“दो रोटियाँ दे दो बाबू ?” उस छोटे-से होटल के पास पहुँचकर एक आदमी के आगे दो रुपये बढ़ाता है। आदमी बिना पैसे लिए उसके कटोरे में रोटियाँ और प्याज के कुछ टुकड़े डाल देता है। “भला हो बेटा।” आशीर्वाद देता हुआ बूढ़ा बढ़ पड़ता है। फिर एक चापाकल के पास बैठ रोटियाँ खाता है और कटोरे से ही पानी पी उस फुटपाथी चबूतरे की ओर चल पड़ता है, जो उसका विश्राम-स्थल था।

वह आज बहुत ही उदास नजर आ रहा था। उसे जैसे-जैसे अपना घर-परिवार याद आता, वैसे-वैसे ही वह उदास होता, रोता और रुष्ट होता था। इतने में हवा का एक झोंका आया और उसे सोने का जी हुआ। वह सोने के लिए उस नंगे चबूतरे पर लेट पड़ा। उसकी आँखें झपकने लगीं। इतने में एक रेलगाड़ी पास से गुजरी। उसकी आँखें खुलीं और पुन: झपक पड़ीं। फिर वह सपने देखने लगा - उसका पोता अब जवान हो चुका है। वह अपने पिता से झगड़ रहा है। पूछ रहा है कि उसके बाबा कहाँ गए ? आपने मेरे बाबा को मार डाला है। आप झूठ बोलते हैं कि आपने बाबा को खोजा है। वह ट्रेन से उतरकर कहीं खो नहीं गए हैं। आपने या तो उन्हें ट्रेन से धकेल दिया है, या उस जगह पर उतार दिया है। आप उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहते थे। पिता उसे बहाना बनाता हुआ समझाता है कि उन्हें किसी ने छोड़ा नहीं है। उस रात उन्हें शौच की हाजत महसूस हुई थी। ट्रेन में एक बूँद पानी न था। आगे लाइन क्लियर न होने के कारण गाड़ी बीच में खड़ी थी। करीब घंटे भर रुकने की खबर थी। उन्हें नीचे उतारकर एक जगह बैठा दिया गया था, जहाँ पानी था। दुर्योग से गाड़ी बढ़ चली और इस तरह वे छूट गए। अगर मैं उनके लिए उतरता तो भारी दुर्घटना हो सकती थी । और नहीं तो तुम सब अकेले हो संकट में पड़ जाते। फिर तुम लोगों को डेरे पर पहुँचाकर उसी दिन उन्हें खोजने निकल पड़ा था। उस जगह पर कई बार इधर-उधर खोजा, पर उनका कोई पता नहीं चला। और भी बहुत कुछ सपनाया वह बूढ़ा। फिर नींद टूटी और फिर वह खूब रोने लगा।

इस बूढ़े की कहानी यह है कि यह एक अच्छे घर का आदमी था। एक बेटा और एक-एक पोता- पोती। पत्नी का देहांत हो चुका था। बेटा दिल्ली में एक मध्यम श्रेणी का अधिकारी था। पत्नी और बाल-बच्चों को लेकर उसका बेटा दिल्ली में ही रहता था। पत्नी के मरने के बाद वह एकदम से टूटा-टूटा,सूना-सूना-सा रहने लगा था। उसे पोता-पोती के साथ रहने और बतियाने का काफी मन करता था। इसी संवेदना को लेकर वह अपने बेटे को उसकी नौकरी पर साथ रहने की साग्रह बात करता था। पर बेटा कुछ-कुछ कहकर बहाना बना टाल-टाल देता था। वह मूल रूप से कहता था , “बाबूजी ! आप दिल्ली जैसे कोलाहल भरे शहर में जाकर क्या करेंगे ? कहीं कोई बोलने- बतियाने वाला भी मिलेगा ? खुले में साँस लेने की दो बीत्ते जगह न मिलेगी। यहाँ हर तरफ खुली जगह है। खेत हैं, खलिहान हैं, बाग हैं, बगीचे हैं। बोलने-बतियाने के लिए पूरा गाँव जहाँ-तहाँ पड़ा है। वहाँ सारे लोग अपरिचित और काफी व्यस्त मिलेंगे। उतनी जगह में पड़े-पड़े घुटकर मर जाएँगे।” “सो तो है बेटा , फिर भी ब्यूटी और अन्नु....।” बाप ने अपने पोते-पोती के प्रति अपनी घोर आसक्ति दिखाई। पर बेटे को और चिढ़ हो आई। आज वह बोला, “ वे क्या आपके पास पड़े रहेंगे ? दिन भर स्कूल में रहेंगे, फिर आने के बाद होमवर्क भी तो बनाना पड़ता है। न ही आप उनके होमवर्क में मदद करेंगे, न ही अंग्रेजी में बतिया सकते हैं। आपके साथ रहकर तो उनकी अंग्रेजी कबाड़ बन जाएगी।”

बाप को इस बात ने चोट पहुँचाई, फिर भी सह गया। आगे निवेदन किया, “ मैं किसी को कोई दिक्कत नहीं पहुँचाऊँगा बेटा। उन्हें मेरे किस्से-कहानियाँ खूब अच्छी लगती हैं। मैं भी उन्हें एक नजर देखकर ही। आखिर यहाँ मेरा कौन है ?” बाप रो पड़ा था। पर द्रवित होने की बजाय बेटा और गुस्सा ही हुआ, “आपको क्या हो गया है बाबूजी ? क्या और खर्च चाहिए ? एक और नौकर रख दूँ ? कहिए न दिल खोलकर ?”

आगे बाप को बोलने की हिम्मत नहीं हुई। वह अकेले में अपने को फिर समझाने लगा – ‘सच में यहाँ मेरा खेत-खलिहान है। खाने से ज्यादा अन्न उपजता है। देख-रेख को नौकर हैं। समय से चाय-पानी-नाश्ता-भोजन भी मिल जाता है। दस जनों के साथ सुख-दुख बतियाते हैं। हाथ पर हमेशा पैसे रहते हैं। सब ठीक-ठाक है , पर उनके बिना (पोते-पोती) मन नहीं लगता। सुमन (बेटा) भी कुछ गलत नहीं कहता है। यहाँ रहने पर उनकी पढ़ाई ठीक से नहीं हो पाएगी और यहाँ रहेंगे, तो उनके साथ उनकी माँ का रहना जरूरी होगा । और, बहू के बिना सुमन को बड़ी तकलीफ होगी। शहर में इसीलिए जाना चाहता हूँ। पर यह बात न सुमन समझता है , न मेरा मन। कौन- सा मैं वहाँ पहाड़ खा जाऊँगा ?’ इस बार भी सुमन ड्यूटी से छुट्टी पर गाँव आया , तो खासकर अपने पिता के लिए अपने बेटे-बेटी को उनकी माँ के साथ लेता आया , जबकि उसकी पत्नी ऐसा नहीं चाहती थी। दादा का सूखा दिल पोते-पोती के दर्शन से हरा हो गया। पर जाते वक्त उसका वही पुराना प्रलाप ..। सुमन सोचता है कि एकदम से सुन्न हो गए हैं बाबूजी। एकदम बच्चे-सा मचलते हैं। अगर इन्हें खुश करता हूँ तो घर में महाभारत हो जाएगी। पत्नी तो इन्हें तनिक भी शहर में रखने को तैयार न होगी। कहती है- सबसे बड़ी फजीहत तो कि थूक-खखार से महकाए रहते हैं। खैनी तो छूटेगी नहीं। दिन भर ठाएँ-ठाएँ, खोंएँ-खोंएँ करते रहेंगे।’ बात भी ठीक ही कहती हैं ,नहीं तो उनके यहाँ रहने पर हमारा खर्चा तो और कम हो जाएगा। घर का सब तो बच ही जाएगा , पर ये बूढ़े कि तनिक भी कोई कमी कि फुसफुसाते चलेंगे। नहीं, इनसे हमारी सोसाइटी में बदनामी होगी।’ इस बार बाप एकदम से जैसे जिद कर बैठा। पत्नी ने पति से एकदम से खीझकर कहा, “ ले चलिए , उधर ही रेल से धकेल देंगे ।” हालाँकि पति ने डाँटा। अंत में मजबूरन बेटे को बाप को ले ही चलना पड़ा। और, बीच रास्ते वही हुआ , जो उस बूढ़े ने उस रात सपनाया था कि उसका पोता अपने पिता से अपने दादा का हिसाब माँग रहा है कि आपने मेरे दादा को कहीं छोड़ दिया है।

आज छठा दिन था। सुमन उस रात वाली जगह को याद कर-करके अपने पिता को खोज रहा था। उसने लगभग जान लिया था कि अब वे इस दुनिया में नहीं होंगे। अपने स्वाभिमान की रक्षा हेतु ..। आज दूसरे दिन उस बूढ़े को छोटे- छोटे लड़कों से घिरा देखा, जिससे लोग “पागल बाबा, पागल बाबा ”कहकर टॉफियाँ माँग रहे थे। ध्यान से देखा , खूब ध्यान से- गाल पर वह बड़ा-सा चकत्ता दिखा। कुछ और उसी तरह का ....। ध्यान से देखते-देख बूढ़े ने लगभग एक ही बार में सुमन को पहचान लिया , पर स्वाभिमान ने रोका। “बाबूजी आप ? ” और अब यह वह न सोचकर सीधे बूढ़े के पैर पर सुमन गिरा माफी माँगते हुए रो रहा था । बाप का हृदय पिघल गया। “बेटा..” कहकर सीने से लगा लिया। लोगबाग रो पड़े - अरे ! इसे इसका बेटा मिल गया।’

और बेटा बाप को एक गाड़ी में बैठाकर वहाँ से चल पड़ा। पहले वह अपने गाँव जाएगा, फिर अपने पिता से घोर मंत्रणा और सुझाव लेगा। ड्राइवर गाड़ी बढ़ाए जा रहा था। बेटा बाप से लगातार माफी माँग रहा था कि उसने जो किया, उसे उसकी सजा मिल रही है। उसका बेटा अन्नु उसके साथ उससे भी बुरा बर्ताव कर रहा है । कह रहा है- आपने भी अपने पिता को सताया है। सच में बाबूजी मुझे अधर्म का फल मिल रहा है। अब मेरी आँखें खुली हैं। सच में बच्चे हमसे ही सीखते हैं। बाप मुस्कुराता हुआ बेटे के माथे पर हाथ फेरता है। समझाता है कि घबराओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा। बेटे को अपने अनुभवी और बूढ़े बाप पर विश्वास होता है। उसकी निराशा उतरती है। खुशी में एक बार और पाँव छूता है। गाड़ी गाँव के पास खड़ी होती है। ड्राइवर के साथ बाप-बेटे अपने घर की तरफ चल पड़ते हैं।

डा वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज

शेखपुरा, खजूरी, नौबतपुर, पटना-801109

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