नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

डॉ. वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज की लघुकथाएँ

लघुकथा

डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज

ढोंगी पंडित

“पंडित जी ! भात बनवाएँ या पूरी....?”

“हरि ऊँ - हरि ओम ! हम यजमानों के यहाँ कच्ची नहीं खाते ।” पंडित जी ने यजमान को दूसरी जाति का जान ऐसा जवाब दिया ।

“ सब्जी में लहसुन - प्याज .....? ” यजमान ने पंडित जी को आगे टटोला ।

“घोर अनर्थ , घोर अनर्थ ;विशुद्ध वैष्णवी भोजन यजमान ।” पंडित जी एकदम से पिनक गए थे ।

यजमान मन-ही-मन मुस्काया और क्षुब्ध हुआ – ‘ढोंगी पंडित , उस दिन होटल में मांस- भात खा रहे थे, सो क्या था ?’ यजमान ने अगला पासा फेंका, “ जी ठीक है ; आपको रात में लघुशंका वगैरह जाने में दिक्कत हो , तो क्या नौकरानी जग्गू मोची की बेटी ओसारे में सो सकती है ?”

पंडित जी तन-मन से गुदगुदा गए । बोले, “ धरती पवित्र होती है । चाहे तो मेरी चतुष्पादिका के पास नीचे भी सो सकती है ।” अब यजमान से अनजाने में जोर का ठहाका लग गया । पंडित जी झेंप गए थे ।


---


असली निबंध

" शाबाश बच्चो!" मानव और मानव का धर्म विषय पर जो बतलाया, समझ कर सभी ने अच्छा लिखा।" सभी छात्र खुशी से गद्गद हो गए ।तभी एक लड़का अपनी जगह पर खड़ा हो गया ।

‌मास्टर ने यह देख पूछा," प्रफुल्ल ,तुम खड़े क्यों हो?"

‌ लगभग रोता बोला प्रफुल्ल जी मैंने निबंध नहीं लिखा ।"

‌ " क्यों ,क्यों नहीं लिखा? “झल्ला पड़े मास्टर।

“ जी समय नहीं मिला |”

“झूठ,बिल्कुल झूठ।“

मास्टरजी,पूरी ईमानदारी से कहता हूँ। आधी रात तक दादा जी के साथ जागते रहा था ।वे दर्द से कराह रहे थे। माँ- बाबूजी कुछ ही देर तक उनके पास रहे फिर अपने कमरे में सोने चले। “

“फिर...,?”

“ फिर मैं दादाजी के पास जाकर उनके हाथ -पैर दबाने लगा ।जब तलवे रगड़ने लगा तो उन्हें नींद आ गई। तभी कहीं मैं सो पाया हूँगा।“

“ जब तुम्हारे माता-पिता ही सो गए थे तो तुम्हें क्या जरूरत थी जगने की?” मास्टर की इस बात पर लगभग सभी छात्र एक दबी हँसी हँस पड़े थे । मास्टर ने उनकी तरफ एक छोटी नजर तरेड़ी।

“जी, कल ही तो आपने यह सब बतलाया था। ऐसा करना मैंने अपना धर्म समझा।“

मास्टर आपादमस्तक झंकृत हो उठे । आँखें फटी -फटी जाती थीं उनकी। आत्मविभोर हो वहीँ से बाँहें फैलाए प्रफुल्ल की ओर बढ़ चले ,”शाबाश बेटा ,शाबाश ! इतना तो मैंने भी नहीं सोचा था ।अरे यही तो सच्चा और असली निबंध है।“

--

. डॉ. वीरेंद्र कुमार भारद्वाज

.. शेखपुरा, खजूरी, नौबतपुर ,पटना – 801109

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.