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असहिष्णुता और लोकतंत्र // दीपक दीक्षित

असहिष्णुता और लोकतंत्र

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दीपक दीक्षित


जब भी मुझे ‘भीड़भाड़ वाले और घिचपिच गली मोहल्लों से गुजरते घुमावदार रास्ते’ और ‘खुले हुए , चौड़ी सड़क वाले सीधे रास्ते’ में से किसी एक का चुनाव करना हो तो में दूसरा विकल्प ही चुनूंगा चाहे इसके लिए मुझे ज्यादा दूरी ही क्यूँ न चलाना पड़े. मुझे लगता है कि इस तरह से मैं उच्च गियर पर गाडी चला  सकूँगा और  मार्ग में कम अवरोधों के कारण मुझे कम ब्रेक लगाने पड़ेंगे. इस तरह मैं न सिर्फ समय की बल्कि पेट्रोल की भी बचत कर सकूंगा.

पर यह एक व्यक्तिगत चुनाव है. मेरी पत्नी का दिमाग ठीक इससे उलट चलता है. उसे अगर पता चले कि भीड़ भाड़ वाला रास्ता एक मीटर भी कम है तो वह उसे शौर्ट-कट मानते हुए उसे ही चुनेगी. बाकी सब बारीकियों को वह नजरअंदाज कर देगी (उसके पास ऑटोमोबाइल इन्जीरिंग की समझ और डिग्री नहीं है).

पर उस पर तुर्रा ये कि वह भी यही सोचती है कि वह शौर्ट-कट लेकर समय और पेट्रोल की बचत कर रही है.

देखा जाय तो अपने अपने दृष्टिकोण से हम दोनों ही सही हैं. व्यवहारिक दुनिया में यह कभी ठीक ठीक कहा नहीं जा सकता कि कौन सो दृष्टिकोण हमेशा मानने से वास्तव में बचत होगी और कितनी.

हालाँकि दोनों दृष्टिकोण एक दूसरे के ठीक उलट जान पड़ते हैं पर किसी एक को सही साबित करने के लिए दूसरे को गलत ठहराना जरूरी नहीं है.

हम दोनों एक दूसरे से लड़ने की बजाय आपसी तालमेल और समझदारी से कभी एक और कभी दूसरा विकल्प चुन सकते है और हंसी खुशी सफ़र तय कर सकते हैं.

ये सिर्फ (मेरे) परिवार की कहानी नहीं है. ध्यान से देखें तो हर समाज में हार काल में इस तरह की दो विरोधी सी लगाने वाली सोच रखने वाले लोग मिल जाते हैं.

एक तो वो जिनको अक्सर रुढ़िवादी कहा जाता है. ये लोग किसी बात को लेकर अधिक सोच-विचार और गणना करने के बजाय भूतकाल में सफल रही पुरानी विचारधारा के पक्षधर होते हैं और कुछ भी नया सोचने से कतराते हैं.

दूसरी तरफ उदारवादी सोच रखने वाले लोगों की भी कमी नहीं है जो हर बार नए नए प्रयोग करते नहीं थकते. जोखिम उठाने में इन्हें जैसे मज़ा आता है.

आजकल देश में असहिष्णुता के नाम पर जो वातावरण बना हुआ है वह इसी तरह की अलग अलग सोच रखने वाली विचारधाराओं का टकराव है.

यहाँ प्रश्न ये नहीं होना चाहिए कि , ‘देखें कौन जीतता है?’ बल्कि हमारी कोशिश यह रहनी चाहिए कि बिना एक दूसरे को नीचा दिखाए या गलत साबित करे दोनों विचारधारा के लोग एक दूसरे के साथ सम्मान के साथ जी सकें.

हमारा दायाँ पैर अगर ये कहने लगे कि शरीर का सारा वजन वह ही उठाता है और बाएँ पैर का इसमें कई योगदान नहीं है ,तो क्या हम उसकी बात सुनकर अपने बाएँ पैर को ही काट डालेंगे ?

या फिर हमारे फेफड़े ये कहने लग जायें कि साँस बाहर छोड़ना एक हानिकारक काम है जिससे कोई फायदा नहीं होता इसलिए इसे बाँट कर देना चाहिए , तो क्या हम सिर्फ सांस अन्दर खींचना जारी रख कर फेंफडों को फाड़ डालेंगे?

दो विरोधी विचारधाराएं लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है.

क्या हम इस बुनियादी जरूरत को पूरा करने में सफल होंगे ?

दीपक दीक्षित


परिचय


रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की ) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया.

पढने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी . बचपन में कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी थीं.

भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो, योगी बनो' नामक पुस्तक प्रकाशित हुयी है. कादम्बिनी एवं न्यू लक्ष्य पुस्तक उत्सव 2016 में हिंदी भवन , भोपाल में सम्मानित किया गया.

वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी , कविता का प्रकाशन. कुछ रचनाएँ प्रसिद्ध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति मध्यप्रदेश लेखक संघ, Authors guild of India और कादम्बिनी क्लब ,हैदराबाद के आजीवन सदस्य हैं.

अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं.

वर्ष 2017 से सिकंदराबाद (तेलंगाना) मैं निवास करते हैं.

संपर्क​

coldeepakdixit@gmail.com

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