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अनुपम सक्सेना की कविताएँ

अनुपम सक्सेना की कविताएँ

1-    आस-पास ही है नरक

अगर कोई पूछे
नरक कैसा होता है
तो हमारा क्या जवाब होगा ?
हम कहेंगे कि नरक में
एक अंतहीन  प्रतीक्षा होती है
कुछ दर्द होते हैं जो लम्बे होते चले जाते हैं
सामाजिक यातनायें होती हैं

नरक में बारीक धागे –से नाजुक रिश्ते होते हैं
जो मामूली झोंके से टूट जाते हैं

नरक में सब अपने –अपने दायरे में कैद होते हैं
विश्वास का सर्वथा अभाव होता है

नरक में सैकडों तरह की
दीवारें बनाई जाती हैं
जो सिर्फ दूरियां बढाती और बांटती हैं
ध्यान से देखने पर महसूस होगा
अपने आस-पास ही है नरक


2-    हर चमकदार शहर के गर्भ में

हर चमकदार सतह के नीचे
बहुत से दाग धब्बे छिपे रहते हैं
वैसे ही हर चमकदार शहर के गर्भ में
होते हैं बहुत से भिखारी
जो बसों और रेलवे स्टेशनों पर भीख मांगते हैं

सैकडों बाल मज़दूर होते हैं
जो पढने की उम्र में कल कारखानों में काम करते हैं
ढाबों में कप प्लेट धोते हैं
गाली खाते हैं, मार खाते हैं

कई अनाथालय होते हैं
जहां पहुंचने वाली सहायता
व्यवस्थापक हडप जाते हैं
और अनाथ भूखे पेट ही सोने को विवश होते हैं
कई व्यवस्थापक तो अनाथों से कुकर्म तक करते हैं

झुग्गियों का विस्तृत जाल होता है
वहां की स्त्रियां मज़दूरी करती हैं
उनके आदमी दिन भर दारू पीते हैं
बच्चे बच्चियां पन्नियां बीनते हैं

रेड लाईट एरिया होता है
जहां भगाई गई मासूम लडकियों को
जबरन जिस्मफरोशी के धंधे में धकेला जाता है
भागने की कोशिश करने पर गर्म सलाखों से दागा जाता है

कई शराब की दुकानें होती हैं
जो कई परिवारों की उम्मीदें बुझा देती हैं

बहुत बडा बेरोज़गारों का समूह होता है
जो अंतिम उम्मीद खो देने के बाद
अपराध की तरफ प्रवृत्त होता है
या बहुत थोडे में अपनी मेहनत बेचता है

राम वृक्ष यादव जैसे बाहुबली होते हैं
जो समानांतर सरकार चलाते हैं
और ऐसा शासन की सहायता बगैर संभव नहीं है

जब तक चमकदार शहरों के गर्भ में दाग धब्बे हैं
तरक्की की बातें बईमानी हैं.


3-    खुशियां हमारे अंदर नहीं हैं

खुशियां हमारे अंदर नहीं हैं
लेकिन सब खुशियों की तलाश में हैं
कितना अच्छा होता अगर खुशियों का स्रोत
हमारे अंदर ही कहीं होता
जब चाहते, खुश हो लेते

दूर कहीं बाह्य वस्तुओं में खुशियां हैं
कहीं स्वदिष्ट भोजन में
कहीं धन में
कहीं उच्च ओहदे में
कहीं मान-सम्मान में

कभी आसानी से नहीं मिलती हैं ये खुशियां
इन्हें पाने पहाडों की चोटी पर जाना होता है
समुद्र की तलहटी में उतरना होता है
गर्म रेगिस्तान में भटकना पड़ता है

हो सकता है इस गर्म मौसम में
कुछ अमीरों की खुशियां स्विट्जरर्लैंड की बर्फीली वादियों में हों
स्त्रियों की खुशियां सोने की खदानों में हो सकती हैं
कुछ लोग अपनी खुशियां लोक सभा या राज्य सभा में खोजते हैं

लेकिन कई हैं
जिनकी खुशियां रोटियों में है
गेहूं के दानों में है
पानी की बूंदों में है
मासिक पेंशन में है

बाह्य जगत के संसाधनों से मिलती हैं भीतर की खुशियां
खुशियां हमारे अंदर नहीं हैं .


4-    अच्छे दिनों की आस में

लोग जी रहे हैं एक आस में कि अच्छे दिन आयेंगे
लेकिन कब आयेंगे अच्छे दिन , कोई निश्चित नहीं है

एक आम आदमी सोचता है
कल जब बच्चे बडे होकर अपने पैरों पर खडे होंगे
तब आयेंगे अच्छे दिन
मां सोचती है जब सुशील बहू घर आयेगी
तब आयेंगे अच्छे दिन
किसान सोचता  है अच्छी बारिश होगी
तब आयेंगे अच्छे दिन
एक लेखक सोचता है जब पुरस्कार मिलेगा
तब आयेंगे अच्छे दिन

लेकिन कोई जरूरी नहीं है
कि कल अच्छे दिन ही आयेंगे
बच्चे नालायक निकल सकते हैं
नकचढी तेज तर्रार बहू मिल सकती है
फसल खराब हो सकती है
कोई दुर्घटना हो सकती है
बहुत सम्भव है कि लेखक को कोई पुरस्कार ही न मिले

दरअसल अच्छे दिन कभी आते नहीं हैं
उनकी उड़ती –उड़ती खबरें आती हैं
तमाम संभावनायें मौजूद हैं
कुछ भी हो सकता है

हमें सोचना यह है कि असफलता हाथ लगने पर
अच्छे दिन न आने पर , हम क्या करेंगे.


5-    समय कुछ ऐसा है

समय कुछ ऐसा है
कि एक बंदूक होना जरूरी है
अगर बंदूक न हो तो एक तलवार तो हो
तलवार भी न हो तो , एक लाठी होना निहायत जरूरी है

समय कुछ ऐसा है
कि लोगों को पता चलना चाहिये कि आप शस्त्रधारी हैं
सोने में सुहागा है यदि साथ में एक खतरनाक –सा दिखने वाला कुत्ता हो
जो लोगों को फाड़ खाने को हरदम तैयार हो

समय कुछ ऐसा है
कि चेहरे से गुंडे जैसा लगना चाहिये
आंखों से वहशीपन झलकना चाहिये
अगर ऐसा नहीं भी है तो
गुंडे मवालियों का दोस्त होना भी काम आ सकता है

समय कुछ ऐसा है
कि किसी न किसी गुट में होना जरूरी है
या फिर जरूरी है किसी राजनैतिक दल से प्रतिबद्धता

समय कुछ ऐसा है
कि वाचाल होना जरूरी है
और सबसे ज्यादा जरूरी है
गालियों का चौपाइयों की तरह याद होना

ऐसे समय में जानवर जैसे व्यवहार से ही
इंसान की जमात में शामिल हुआ जा सकता है.


6-    ईश्वर

कैसे लिखेंगे तुम्हें कागज पर
जबकि तुम्हारा कोई रंग रूप नहीं है
कोई निश्चित पता ठिकाना नहीं है
तुम्हारे बारे में लिखी हैं बहुत सी बातें किताबों में
तुम निर्गुण निराकार अनंत अविनाशी हो
सदियों से तुम्हारी खोज में भटक रहे हैं लाखों साधु संत
तुम्हारा मोबाईल नम्बर भी दुनिया को पता नहीं है
कैसे तुमसे सम्पर्क किया जा सकता है ?
तुम मंत्र में हो या मंदिर में ?
योग में हो या भोग में ? 
कला में हो या कुरूपता में ?
न्याय में हो या उत्पीड़न में ?
संज्ञा में हो या सर्वनाम में ?
प्रार्थना में हो या अवहेलना में ?

तमाम प्रश्न चिन्हों के बीच उत्तर में भी तुम हो
हर रूप रंग आकार तुम्हारा है
सगुण भी तुम हो निर्गुण भी
साकार भी तुम हो निराकार भी
हर जगह पर तुम हो और सब पते तुम्हारे हैं
अमरत भी तुम हो मदिरा भी
योग भी तुम हो भोग भी
कला भी तुम हो कुरूपता भी
जीवन भी तुम हो मरण भी
मानव भी तुम हो पशु भी
दर्पण भी तुम हो अक्स भी
सबमें होकर भी तुम सबसे जुदा हो.

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परिचय
अनुपम सक्सेना कुछ किताबें लिख चुके हैं. 2016 में  कविता संग्रह " अपने अपने आकाश " इलाहाबाद के अंजुमन प्रकाशन से प्रकाशित हो चुका है. 

अनुपम सक्‍सेना /Anupam Saksena)
वरि. कार्यपालक (न .प्र - विधि एवं सुरक्षा.) 
भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड 
Sr. Executive (TAD-LEGAL & SECURITY)

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