व्यंग्य // तुम , फिर ठगे गए कबीर // यशवंत कोठारी

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तुम , फिर ठगे गए कबीर

यशवंत कोठारी

कबीर तुम्हें फिर ठगा गया है. व्यवस्था, सरकार राजनीति, साहित्य, विश्वविध्यालय सब ने तुम्हें बार बार ठगा है. इस बार तुम चादर के नाम पर ठगे गए. पुण्य तिथि, जन्म तिथि के नाम पर ठगे गए. तुम यह सब जानते थे इसीलिए कह गए-कबीरा आप ठगाइए. तुमने यह भी ठीक ही कहता-कौन ठगवा नगरिया लूटल हो. आज नगर नहीं देश को ही लूटा जा रहा है. तुम छले गए कबीर.

साधो !ठगने वालों का काम ठगना है, हमारा काम ठगा जाना है. कबीर तुम्हें व्यवस्था, समाज ने छला है. व्यवस्था अपने स्वार्थ, के लिए अपने दुष्कर्मों को छुपाने के लिये बार बार मजार पर आती है और अपने कुकर्मों को धोने के लिए चादर साथ ले जा ती है. मगर तुम तो पहले ही कह गए –ज्यों की त्यों धर दिनी चदरिया. हिंदी के मठाधीशों ने तुम्हे खूब ठगा. वे आलोचक , प्रोफेसर , हो गए. पीठों पर बैठ गए, तुम पर किताबें लिखी, प्रकाशकों संपादकों अध्यापकों सब ने खूब चांदी काटी , तुम हर बार छले गए, ठगे गए. मरा कवि बड़े काम का होता है. मरे हुए कवि से व्यवस्था भरपूर लाभ कमाती है, वोटों की फसल काटती है, अगले आम चुनाव केलिए कुर्सी पक्की करती है. कबीर तुम्हारा सदुपयोग व्यवस्था ऐसे ही करती है. डंडे, झंडे लेकर पण्डे आ गए है. वे तुम्हारा पूरा फायदा लेंगे. बजट को ठिकाने लगाना है. अगला आम चुनाव आना है. दलितों को लुभाना है. ये सब करने के लिए तुम्हारी जरूरत है.

कबीर तुन नहीं जानते तुम्हारे नाम के क्या फायदे हैं. दक्षिण पंथी तुम्हे वाम बता सत्ता से विमुख कर दे रहे है ओर वाम पंथी वामपंथ को ही तुम्हारे सहारे खीँच रहे हैं . तुम तो राम की बहुरिया की तरह हो, लेकिन कबीर जगे और जग रोवे. तुम अमर हो गये कबीर .

साधो ! मेरी सुनता ही कौन हैं? व्यवस्था अपनी साख जमा रहीं है, यश लूटने की होड़ मची हुयी है,

. मैं तो न हिन्दू था न मुसलमान , काशी में मरा भी नहीं मगर मेरे नाम का यह उपयोग ?क्या करू ?मुझे तो खुद अपनी साखियाँ , दोहे, याद नहीं, होली तक भूल गया. ये नए शोधकर्ता पता नहीं कहाँ से नए नए कलाम ढूंढ लाते हैं.

वे मेरी शोभा यात्रा निकाल रहे हैं. व्यवस्था को टेंडर और कमिशन से मतलब है, कबीर का क्या करना है , एक बार हजूर की सवारी निकल जाय बस फिर सब ठीक हो जायगा और ये जो मास्टरनी चिल्ला रही है इसे अंदर कर दो. हमें चोर उच्चक्का बोलती है. दो कोडी की नौकरानी समझती क्या अपने आपको. कबीर को साधो ने दिलासा दिया –जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ. आजकल घर फूंकने का नहीं घर भरने का समय है कबीर दास जी. कबीर उदास है, देश चुप चाप देख रहा है. कबीर के साथ हर युग में ऐसा होता रहा है और होता रहेगा. व्यवस्था को इस से कोई मतलब नहीं कि कबीर व् उसके शिष्यों के पास रोटी या लंगोटी है या नहीं उन्हें तो बस वोट से मतलब है. कबीर भूखा तो हम क्या करे?

कबीर तुम को फिर धोखा दिया गया है, तुम इन आयोजनों की नाटकीयता को समझो. यदि तुम्हारी आत्मा की आवाज़ कराह नहीं रही है तो तुम आत्मा की आवाज़ को बुलंद करो. तुम तो जुलाहा हो धागा धागा जोड़ कर देश को जोड़ो, इन फालतू चक्करों में मत पडो. कबीर ये अख़बार, ये चेनल वाले ये सोशल मीडिया वाले तुम्हारी आग पर अपनी रोटियां सेक रहे है , इसे समझो. आजकल साधू सब बाबा हो गए है, जेल जाते रहते है , तुम बचना कबीर.

ये लोग तुम्हे बार बार मारेंगे अपने स्वार्थ के लिए. अपनी कुर्सी और वोट के लिए. वे तंत्र, मन्त्र, सब का सहारा लेंगे. तुम एक निरीह आत्मा किसी का क्या बिगड़ लोंगे , लेकिन तुम अमर हो. कबीर को समझना मुश्किल है, तुम ऐसा सोचते हो , लेकिन समझना कौन चाहता है, सब अपनी राजनेतिक रोटी सेकना चाहते है. कबीर ने बनारस छोड़ा , मगहर चले गए, आत्मा की शांति के लिए. वहां समाधी भी है और मजार भी टोपी पहनो या न पहनो कोई फर्क नहीं पड़ता. कबीर ने फिर कहा –माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोय , इक दिन ऐसा आएगा मैं रोंदुंगी तोय. वास्तव में ये दोहा आज की जनता की आवाज़ है. कबीर पंथी हो या न हो वोट पंथी जरूर कबीर तक पहुँचता है . यही कबीर की सफलता है . हर कवि को कबीर होना चाहिए.

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यशवंत कोठारी , ८६, लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बहार , जयपुर -३०२००२

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