हरीश कुमार ‘अमित’ की नई ग़ज़लें

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हरीश कुमार ‘अमित’ की नई ग़ज़लें

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ग़ज़ल


दर्द मेरा जाने न कोई,
मुझको पहचाने न कोई।

हरदम रहता हूँ मैं गुमसुम,
आए दिल बहलाने न कोई।

बेशक न हों प्यार की बातें,
पर दे मुझे ताने न कोई।

दी थी दावत सब यारों को,
आया लेकिन खाने न कोई।

ग़म के इस मौसम में यारो,
गाए ख़ुशी के गाने न कोई।   


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ग़ज़ल


कैसे-कैसे लोग मिले हैं बस्ती में,
शैतानी संजोग मिले हैं बस्ती में।

दूजों के दुख हर लेने की कोशिश में,
हमको ढेरों रोग मिले हैं बस्ती में।

जिस-जिसको भी हमने अपनाना चाहा,
उससे ही वियोग मिले हैं बस्ती में।

सच की पूजा करने वाले नहीं मिले,
झूठ के बस प्रयोग मिले हैं बस्ती में।

मिला न अब तक कोई मसीहा हमको,
सिर्फ़ स्वार्थ और भोग मिले हैं बस्ती में।


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ग़ज़ल


ज़िन्दा है न मुरदा है,
यह दिल कितना तन्हा है।

जीने का अरमान किसे,
फिर भी जीना पड़ता है।

हर कदम पर ठोकर है,
गिर जाने का ख़तरा है।

जो भी चाहा, मिला नहीं,
बस मुझको यही कहना है।

तुम बिन जीवन ने पहना,
जैसे ग़म का गहना है।


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ग़ज़ल


उसे समझना है मुश्किल,
अपना है या है संगदिल।

बिना बहाए ख़ून-पसीना,
मिल नहीं पाती है मंज़िल।

हर कोई चाहेगा तुमको,
बड़ा रखो गर अपना दिल।

इसी उम्मीद पे हैं हम ज़िन्दा,
शायद कहीं वे जाएँ मिल।

दिल अपना इतना मासूम,
बात-बात पे जाता छिल।


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ग़ज़ल


ज़ख़्म पुराने याद आए,
गए फसाने याद आए।

प्यार की जब भी बात चली,
हम दीवाने याद आए।

ख़ुशियों के लम्हों में अक्सर,
ग़म के तराने याद आए।

काम पड़ा जब यारों को,
जाम पिलाने याद आए।

बहुत दिनों में उनको देखा,
वक़्त सुहाने याद आए।


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ग़ज़ल


शहर सारा उदास है यारो,
कोई बात तो ख़ास है यारो।

ख़ुशबुओं की तो याद मर गई,
बची ग़म की बास है यारो।

खाते ही जिसे मर जाए कोई,
मिले अब ऐसी मिठास है यारो।

चुप रह के सब कुछ सहना होगा,
निकले न मन की भड़ास है यारो।

सबको पड़ी है अपनी-अपनी,
किसका किसे एहसास है यारो।


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ग़ज़ल


नज़र उनकी दूजों पर जमी रही होगी,
शायद हममें ही कुछ कमी रही होगी।

हमें यक़ीन है पूरा, बिछड़ते वक़्त हमसे,
उसकी आँखों में भी नमी रही होगी।

मिला होगा पैग़ाम जब मौत का हमारी,
सूरत सबकी ही मातमी रही होगी।

चेहरा देख के मेरा इक लम्बे अरसे बाद,
साँस उसकी कुछ पल तो थमी रही होगी।

उसकी बेवफ़ाई की ख़बर लानेवाले सुन,
ज़रूर तुझे कोई ग़लतफहमी रही होगी।


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ग़ज़ल


मुझे देख जब वे मुस्काए चोरी-चोरी,
मैंने अपने ख़्वाब सजाए चोरी-चोरी।

हमने उनकी ख़ुश्बू को महसूसा इकदम,
महफ़िल में जब भी वे आए चोरी-चोरी।

तरस बहुत अपने दिल की नरमी पे आया,
आँखों में जब आँसू आए चोरी-चोरी।

देखा प्यार से हमको जिस-जिस दिन उसने,
तन्हाई में हम मुस्काए चोरी-चोरी।

अपने घर तो आए हैं न वे अब तक,
सपनों में अक्सर हम लाए चोरी-चोरी।


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ग़ज़ल


दर्द से पूरा भरा है,
हर जख़्म-ए-दिल हरा है।

उस दोस्त पर रखो यक़ीं,
वह तो जैसे सोना खरा है।

लगता हमको ऐसा अक्सर,
उनसे प्यार ज़रा-ज़रा है।

देख पाना है उनको मुश्किल,
दुनिया का सख़्त पहरा है।

बुरे वक़्त से मत घबरा,
वक़्त कभी न ठहरा है।


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ग़ज़ल


ग़म से भरा-भरा-सा रहता हूँ,
अक्सर डरा-डरा-सा रहता हूँ।

न जाने क्यों होता गुमां अक्सर,
उसके दिल में ज़रा-ज़रा-सा रहता हूँ।

वे मानें न मानें, पर उनके दिल में,
बन के ज़ख़्म हरा-सा रहता हूँ।

नफ़रत करते हैं लोग चेहरों से,
इसलिए बेचेहरा-सा रहता हूँ।

मुझको मेरे प्यार ने कर डाला पागल,
बनकर तभी तो सिरफिरा-सा रहता हूँ।


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परिचय

नाम हरीश कुमार ‘अमित’

जन्म 1 मार्च, 1958 को दिल्ली में

शिक्षा बी.कॉम.; एम.ए.(हिन्दी); पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

प्रकाशन 700 से अधिक रचनाएँ (कहानियाँ, कविताएँ/ग़ज़लें, व्यंग्य, लघुकथाएँ, बाल कहानियाँ/कविताएँ आदि) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. एक कविता संग्रह 'अहसासों की परछाइयाँ', एक कहानी संग्रह 'खौलते पानी का भंवर', एक ग़ज़ल संग्रह 'ज़ख़्म दिल के', एक बाल कथा संग्रह 'ईमानदारी का स्वाद', एक विज्ञान उपन्यास 'दिल्ली से प्लूटो' तथा तीन बाल कविता संग्रह 'गुब्बारे जी', 'चाबी वाला बन्दर' व 'मम्मी-पापा की लड़ाई' प्रकाशित. एक कहानी संकलन, चार बाल कथा व दस बाल कविता संकलनों में रचनाएँ संकलित.

प्रसारण - लगभग 200 रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण. इनमें स्वयं के लिखे दो नाटक तथा विभिन्न उपन्यासों से रुपान्तरित पाँच नाटक भी शामिल.

पुरस्कार-

(क) चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट की बाल-साहित्य लेखक प्रतियोगिता 1994, 2001, 2009 व 2016 में कहानियाँ पुरस्कृत

(ख) 'जाह्नवी-टी.टी.' कहानी प्रतियोगिता, 1996 में कहानी पुरस्कृत

(ग) 'किरचें' नाटक पर साहित्य कला परिाद् (दिल्ली) का मोहन राकेश सम्मान 1997 में प्राप्त

(घ) 'केक' कहानी पर किताबघर प्रकाशन का आर्य स्मृति साहित्य सम्मान दिसम्बर 2002 में प्राप्त

(ड.) दिल्ली प्रेस की कहानी प्रतियोगिता 2002 में कहानी पुरस्कृत

(च) 'गुब्बारे जी' बाल कविता संग्रह भारतीय बाल व युवा कल्याण संस्थान, खण्डवा (म.प्र.) द्वारा पुरस्कृत

(छ) 'ईमानदारी का स्वाद' बाल कथा संग्रह की पांडुलिपि पर भारत सरकार का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार, 2006 प्राप्त

(ज) 'कथादेश' लघुकथा प्रतियोगिता, 2015 में लघुकथा पुरस्कृत

(झ) 'राष्ट्रधर्म' की कहानी-व्यंग्य प्रतियोगिता, 2016 में व्यंग्य पुरस्कृत

(ञ) 'राष्ट्रधर्म' की कहानी प्रतियोगिता, 2017 में कहानी पुरस्कृत

सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक के पद से सेवानिवृत्त

पता - 304, एम.एस.4, केन्द्रीय विहार, सेक्टर 56, गुरूग्राम-122011 (हरियाणा)

ई-मेल harishkumaramit@yahoo.co.in

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