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कविता संग्रह - सच मत बोल कौआ काट लेगा / जसबीर चावला

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जसबीर चावला

48, आदित्य नगर एबी. रोड सचखंड मार्ग, इंदौर


जन्म 12 दिसम्बर 1943 मांगट में (जिला गुजरात, अब पाकिस्तान में है) शिक्षा की सारी औपचारिक डिग्रियों का जिक्र उम्र और तजुर्बे के बाद बेमानी है । पर्याप्त अक्षर ज्ञान है । हिन्दी में लिखता हूँ और पंजाबी, गुजराती, अंग्रेजी भाषाएँ जानता हूँ । राजनीतिक लेख, व्यंग्य, कविताएं देश की ढेरों पत्र पत्रिकाओं ( अब वेब पत्रिकाओं) में दशकों से प्रकाशित हो रहे हैं । महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिदी विश्वविद्यालय वर्धा के अभिक्रम ' हिन्दी समय ' में भी कई रचनाएँ संगृहीत हैं ।

अखबार ५७३? - अलावा ऐसी नौकरियाँ की जिनसे पढ़ाई के साथ-साथ देश में घूमने के मौके मिले और अनुभव संसार का विस्तार हुआ । कई व्यापार किये पर पुस्तक पढ़ना-लिखना सतत जारी रहा, जो आज भी जारी है ।
' पांचवीं वर्ल्ड पंजाबी कान्फ्रेंस 1997 ' (मिलवाकी) विंस्कोंसिन स्टेट, अमेरिका में शामिल हुआ । पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला द्वारा आयोजित पंजाबी कान्फ्रेंस में कई बार शिरकत की । सांप्रदायिक एकता एवं सद्भाव हेतु स्वामी प्रणवानंद शांति पुरस्कार, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला द्वारा सांस्कृतिक उत्थान हेतु जेसीज इंटरनेशनल द्वारा विशिष्ट योगदान के लिये सम्मानित हुआ ।
प्राकृतिक, ऐतिहासिक स्थानों और विभिन्न संस्कृतियों को मौका मिलते ही देखने को भाग लेता हूँ । भूटान, अमेरिका, इजिप्ट, यूरोप के कई देशों में गया हूँ । देश में लेह-लद्दाख से कन्याकुमारी, अंडमान-निकोबार से कच्छ तक कई प्रांतों का भ्रमण किया है ।
सामाजिक, रचनात्मक, प्रगतिशील, मानवीय अधिकारों, सांप्रदायिक सौहार्द के लिये काम करने वालों से सक्रिय जुड़ाव है । परिवार में पत्नी, विवाहित पुत्र-बहू पुत्री-दामाद, पोते, नातिन-नाति हैं । सब खुश हैं । परिवार का आभारी हूँ जो मेरे से ज्यादा मुझे जानते और बर्दाश्त करते हैं ।

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कविता संग्रह के बारे में वरिष्ठ रचनाकारों का बयान -


जसबीर चावला की कविताओं का बड़ा हिस्सा उन कविताओं का है, जो अपने आस पास दैनन्दिन घट रही घटनाओं पर तीखी प्रतिक्रिया करता है । वर्तमान परिदृश्य के सभी संकेत यहाँ मौजूद हैं । अपने राजनीतिक परिदृश्य के बारे में आपकी सजग राजनीतिक सजगता का कायल होना पड़ता है ।इस तरह की स्पष्ट राजनीतिक कविताएँ हमारे आज के लिये बेहदजरूरी हैं ।

गजलों की अन्तर्वस्तु बहुत धारदार है । ।
हम आप सब एक ही नाव में सवार हैं और अपनी कोशिश भर लिख रहे हैं । इन कविताओं पर धार देने और देते रहने का काम हम सबको करना ही पड़ता है। अरुण कमल की यह पंक्ति बार बार दिमाग में कौंधती है कि-सारा लोहा उन लोगों का।अपनी केवल धार ।

राजेशजोशी

लेखक, कवि, पत्रकार (साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित)


जसबीर चावला के पास कविता की एक सहज भाषा है, जिसका इस्तेमाल वे अपनी पूरी क्षमता के साथ करते हैं । अपनी कविता में दूर की कौड़ी लाने में विश्वास नहीं करते बल्कि अपने आसपास दिखाई देने वाले बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से कविता रचने की सामर्थ्य रखते हैं । एक तरह का सामाजिक एवं राजनैतिक यथार्थ उनकी कविता में रचा बसा है । थे देश के आम आदमी की भाषा में आम आदमी की संवेदना को ही अभिव्यक्त करते हैं । राजनैतिक यथार्थ की तमाम विसंगतियां उनकी कविता में मुखर हो कर बोलती हैं । उनकी कविता के समय का बितान बहुत बड़ा है जो देश के विभाजन की त्रासदी से लेकर अद्यतन समय तक फैला हुआ है ।


जसबीर चावला अपने सामाजिक सरोकारों में बहुत स्पष्ट: और मनुष्य की गहन त्रासदी के प्रति संवेदना से लबरेज हैं । राजनीति और सामाजिक व्यस्था के धारदार जबड़ों के बीच फंसे मनुज की नियति को वे न केवल समझते हैं बल्कि उसके पक्ष में खड़े भी होते हैं । ऐसा करते हुए ३ए मनुष्य को किसी तरह की करुणा अथवा दया का पात्र नहीं बनाते, बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ उसकी मन स्थिति को रेखांकित करते हैं । जसबीर चावला की कविता एक भयानक समय में भी आस्था और संघर्ष की कविता है ।
-तेजिंदर

कवि , लेखक एवं पूर्व उप-महानिदेशक, दूरदर्शन राष्ट्रीय (डीडी 1)


संग्रह से कुछ चुनिंदा कविताएँ -


 

इतिहास का प्रहसन

क्या मायने हैं इतिहास के
राजाओं-बादशाहों की जंग
किस की जय किस की पराजय
जय पराजय दोनों का इतिहास है

कुछ लोग टीवी अखबार में रणभूमि रचते हैं
अतीत बिछाते हैं
जिनके पुरखे इतिहास की परीधि में न थे
टीवी में हथियार उठाते हैं
अखबारी पन्नों में दूसरों पर गोले दागते
दिवंगत इतिहास नायकों को जगाते हैं
काल्पनिक चरित्र रचते / कठपुतली समझ हाथों तलवारें थमाते हैं

इतिहास स्लेट पर लिखी इबारत नहीं जो मिट जायेगी
रेखा संग रेखा खींचने से बड़ी हो जायेगी
इतिहास के थाने में सदियों बाद एफआईआर नहीं होती
अतीत के रोजनामचे में नहीं आज की आमद दर्ज होगी
कायरों का भी इतिहास होता है
गैरहाजिरों को इतिहास नोंद करता है
अतीत में जाने से इतिहास नहीं मिटता
मसखरों की लीला से पराजित नहीं होता
अतीत में वर्तमान रोपा नहीं जा सकता ।

शूट आउट एट पेशावर


शकील का  खत अम्मी के नाम

अम्मी लो मैंने जिद छोड़ दी
नये बैग लंच बाक्स की
नई पानी की बोतल की
न चाहिये शार्पनर न इरेजर

सब कुछ तो ' इरेज ' कर दिया ' तालिबान ' ने
हाँ जरूर चाहिये ढेरों ' ब्लाटिंग पेपर '
खून के धब्बे पड़े हैं ' इल्म की किताबों ' पर
  कुछ किताबों को रखवा देना मस्जिद में

पाक ' कुरान ' के पास
मौलवी साहब को खास ताकीद करना
मदरसों में ' इन्हें ' भी पढाये
इंसानियत का पाठ पढाये
शायद कोई सचमुच तालिबे इल्म बन जाये
' मलाला ' आपा से कहना
' तालीम ' की राह में अब वो अकेली नहीं रही

हमने भी गोलियाँ खाई हैं
बराबर के हकदार हैं उसके ' नोबेल ' में
वो जो नये कपड़े कल ही सिल कर आये हैं
अब मुझे पहनाना
ठंडे पानी से अब जरा भी डर नहीं लगता
  जितना जी चाहे नहलाना ।

पेशावर में आर्मी स्कूल पर तालिबानी हमला जिसमें अनेकों बच्चे हताहत हुए थे.

इत्तेफाक नहीं रखता

इत्तेफ़ाक नहीं रखता
तुम्हारे झण्डे से
तुम्हारे डण्डे से
तुम्हारी मजहबी दास्तानों से
बाँधे जा रहे तावीज गंडे से
इत्तेफाक नहीं रखता
संविधान का दम घोंटती तुम्हारी उँगलियों से
कुतरी जा रही मेरी आजादी से
' सिरफिरों ' के हो रहे मुसलसल कत्लों से
बही में अगला नाम लिखने वाले पंडे से

हाँ मैं इत्तेफाक रखता हूँ
तुम्हारे चेहरे की नकाब सरकने से
कलई के खुल जानें से
पता नहीं सलामत रहेगा कौन कब तक
  फिर भी नाइत्तेफाकी है तुम्हारे एजेंडे से ।

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प्रकाशक -

बोधि प्रकाशन,

सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन

नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर 302006

मूल्य 150 रु.

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