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व्यंग्य आलेख गड्ढा पुराण डा. सुरेन्द्र वर्मा

व्यंग्य आलेख

गड्ढा पुराण

डा. सुरेन्द्र वर्मा

गड्ढे कहाँ नहीं होते ? कुछ दृश्य कुछ अदृश्य होते हैं। कुछ समझ में आने वाले, कुछ रहस्यमय होते हैं। सामान्यत: हर सड़क पर गड्ढे होते हैं। आमतौर पर वे दिखाई दे जाते हैं। सो उनसे बच कर निकला जा सकता है। लेकिन इन दिनों शहरों को अपग्रेड किया जा रहा है। कहीं सीवर लाइन डालने के लिए गड्ढे खोदे जा रहे हैं तो कहीं बिजली के तार अंडरग्राउंड किए जा रहे हैं। साथ ही साथ सड़कें भी बनाई जा रहीं हैं। इतना सब किसी भी सड़क को एक साथ झेलना कितना कठिन हो सकता है आप आसानी से अंदाज़ लगा सकते हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि बरसात भी आ गई है। थोड़ी सी देर के लिए भी अगर पानी बरस जाए तो पता ही नहीं चलता गड्ढे में सड़क है की सड़क में गड्ढा है। हर तरफ पानी ही पानी दिखाई देता है –न सड़क दिखाई देती है और न गड्ढे। दोनों ही अदृश्य हो गए हैं। दृश्य-गड्ढों को तो एक बार किनारे करके निकल जाइए, लेकिन जो खतरा दिखाई ही न दे, उससे आप कैसे बचेंगे ? लोग सड़कों पर, सौरी, गड्ढों में गिर रहे हैं। स्कूटर गिर रहे हैं, तेज़ रफ़्तार बाइक गिर रहीं हैं। कार के पहिए फंस रहे हैं। पर-पीड़ा के यह दृश्य देख कर आनंद ही आनंद है। दर्शक हंस रहे हैं। फरमान आया था कि बरसात से पहले सारे गड्ढे भर दिए जाएं। फरमान अपनी जगह स्थिर है, और गड्ढे अपनी जगह दृढ़ता हे टिके हुए हैं। मंत्री जी नाराज़ हैं। बनारस में मुख्य मंत्री जी नाराज़ हो गए। सम्बंधित मंत्री जी की नाराज़गी इलाहाबाद में भी दिखाई दी। दूसरे शहर भी अपवाद नहीं रहे। अफसर नाराज़गी झेल रहे हैं पर जिद्दी गड्ढे भरने को तैयार ही नहीं होते। एक स्कूल है मथुरा के पास। गावों के कई बच्चे वहां पढ़ने जाते हैं। रास्ते में गड्ढे हो गए हैं। उनमें पानी भर गया है। चलना मुश्किल हो गया है। वहां के बच्चों ने मुख्य-मंत्री जी से मांग की है, स्कूल जाने के लिए उन्हें एक हेलिकोप्टर उपलब्ध कराया जाए।

गड्ढे कई तरह के होते हैं। कुछ मानव निर्मित तो कुछ प्रकृति-दत्त होते हैं। मानव निर्मित गड्ढे तो खैर भर भी सकते हैं। मनुष्य ने बनाए हैं तो मनुष्य चाहे तो उन्हें भर भी सकता है। पर मनुष्य ठहरा एक जलनशील प्राणी। जिससे जल गया समझो उसके लिए वह गड्ढा खोदे बिना नहीं रहता। सावधानी हटी – दुर्घटना घटी। राजनेता इस तरह के गड्ढे खोदने में काफी दक्ष होते हैं। प्रतिद्वंदियों को नुकसान पहुंचाने के लिए गड्ढे खोदते हैं। पिछली बार का आम चुनाव कुछ ऐसा ही हुआ था। कांग्रेस और अन्य सभी पार्टियां गड्ढे में ऐसी गिरीं की आज तक उभर ही नहीं पाई हैं। इस बार सब मिलकर मोदी जी के लिए गड्ढा खोद रहे हैं। देखना है कि कितनी कामयाबी मिलती है। दो हज़ार उन्नीस पास है। गड्ढा खोदने में सभी पार्टियां मिलजुल कर काम कर रही हैं। कहते हैं आदमी जब किसी दूसरे के लिए गड्ढा खोदता है तो खुद अपने ही खोदे गड्ढे में गिर जाता है। लेकिन यह बात तो बहुत कुछ शायद मन बहलाने के लिए ही कही गई है। गड्ढे में कौन गिरेगा कभी पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता।

किसी भी आदमी का गड्ढे में गिरना बड़ा स्वाभाविक है। आदमी निराशा के गर्त में, दुःख के गर्त में. अक्सर गिर जाता है। बड़ा मुश्किल होता है निकल पाना। एक बार आदमी अवसाद के गर्त में गिरा नहीं, अच्छे अच्छे मनोचिकत्सकों के भी उसे गर्त से निकालने में पसीने छूट जाते हैं। कभी कभी इंसान के दांतों में इतनी तकलीफ होती है कि उसे कोई न कोई दांत निकलवाना ही पड़ जाता है। जो भी दांत निकलता है, बस वहीं एक गड्ढा पड़ जाता है। लेकिन गालों पर कुदरती गड्ढे बड़े लुभावने होते हैं।

कहते हैं बीकानेर के रेगिस्तान में हाल ही में एक बड़ा सा गड्ढा, लगभग चालीस फीट का, बन गया। रात को सोकर सुबह उठे और लोगों ने देखा एक बड़ा सा गड्ढा बना हुआ है। यह गड्ढा कैसे बन गया कोई नहीं जानता। कम से कम मानव निर्मित तो नहीं था। कुछ सोते हुए लोगों का कहना है की रात में आकाश से एक चमकता हुआ गोला-सा उठा और गिर गया। शायद कोई उल्कापात हो| गड्ढे का रहस्य आज भी बना हुआ है।

एक गड्ढा है जिसे ‘कोला सुपर डीप होल’ कहा गया है। यह दुनिया का सबसे बड़ा गड्ढा है। कहते हैं रूस लगभग बारह किलोमीटर तक इसकी खोज में नीचे उतरा। वहां इसकी गरमी एक सौ अस्सी सेंटी. थी –असहनीय। वहां तक पहुंचते पहुंचते रोने-चीखने जैसी कुछ आवाजें भी सुनाई दीं। लोगों का विश्वास है कि ये आवाजें नरक में पडी आत्माओं की आवाजें हैं। गड्ढा हमेशा के लिए सील कर दिया गया है।

भारत में हम पाताल लोक की कल्पना करते हैं। अपने इह-लोक के नीचे और नीचे उतरते जाइए तो पाताल लोक मिलेगा। पाताल लोक इस लोक का सबसे गहरा गड्ढा है। किसी ने देखा नहीं है पर इसके अस्तित्व के बारे में विश्वास पक्का है।

शायद बहक गया। इह-लोक के नीचे का नहीं, इसी लोक के जो गड्ढे हैं मैं उनकी बात कर रहा था। बड़े करामाती हैं ये गड्ढे। इन्हें बनाया जाता है। इन्हें खोदा जाता है। ज़रूरत नहीं रहती तो इन्हें भर भी दिया जाता है, पाट दिया जाता है। इन्हें कभी कभी जानबूझ कर, कभी अनजाने ही, खुला भी छोड़ दिया जाता है। गड्ढों में लोग गिरते हैं, फँस जाते हैं। निकल आते हैं, हंसते हैं। गड्ढों का निर्माण-विनिर्माण हमारा राष्ट्रीय खेल है। हमारी अपनी यूनीक पहचान हैं।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा / सर्कुलर रोड, पिंक कोलोनी / इलाहाबाद -

4 टिप्पणियाँ

  1. गड्ढा पुराण सटीक पैना व्यंग्य है, राजनीति के साथ उसका संबंध जोड़कर जो संभावना दर्शाई आपने काबिले तारीफ है।यकीनन जो गद्धेमें नहीं गिरा है उसे किसी को गड्ढे में गिरा देखकर आनंद आता है पर यह बात जब दुर्घटना के रूप में सामने आती है तब असहनीय व दुखदायक बन जाती है और बच्चों के लिए ऐसा खास तौर पर कहा जा सकता है।

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल की प्रथम पुण्यतिथि : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  3. वाह डाक्टर साहेब, आपने तो असलियत को कागज के पन्नों पर परोसकर प्रशाद रूप में पाठकों को परोस दिया है ! हकीकत बयान किया है ब्यंग रूप में ! हल्का हथौड़ा जोर का मारा है प्रशासन की पीठ पर !बहुत सटीक, सिंपल ! हरेंद्र रावत (अवकास प्राप्त फौजी}

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