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गांधी विचारविश्व और प्रवासी भारतीय साहित्यकार : हमकालीन परिदृश्य // - डॉ.साताप्पा लहू चव्हाण

गांधी विचारविश्व और प्रवासी भारतीय साहित्यकार : हमकालीन परिदृश्य // - डॉ.साताप्पा लहू चव्हाण

डॉ.साताप्पा लहू चव्हाण

ग्राम गणेशवाडी,तहसील करवीर,जिला कोल्हापुर (महाराष्ट्र) में जन्म. दि.न्यू कॉलेज, कोल्हापुर से स्नातक स्तर शिक्षा. शिवाजी विश्व्वविद्यालय,कोल्हापुर (महाराष्ट्र) से हिंदी में एम.ए.,एम.फिल.,पीएच.डी.उपाधि प्राप्त. मराठी पत्रकारिता का अनुभव. हिंदी–मराठी पत्रकारिता का तुलनात्मक अध्ययन. आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रो से हिंदी–मराठी विषयक वार्ताओं का प्रसारण. कई सम्मान प्राप्त. अनेक सामाजिक आंदोलनों में सहभागिता. विभिन्न राष्ट्रीय−अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में आलेख. सह−अध्येता, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS),राष्ट्रपति निवास शिमला. राष्ट्रीय सेवा योजाना के कार्यक्रम अधिकारीओं को विशेष मार्गदर्शन. शोध निर्देशक,सावित्रिबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय,पुणे.वर्तमान में अहमदनगर महाविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग में सहयोगी प्राध्यापक पद पर कार्यरत.

सम्प्रति :− शोध निर्देशक एवं एसोसिएट प्रोफ़ेसर, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,अहमदनगर महाविद्यालय,

अहमदनगर−414001(महाराष्ट्र)


ई−मेल : satappa.chavan@aca.edu.in

drsatappachavan@gmail.com

गांधी विचारविश्व और प्रवासी भारतीय साहित्यकार : हमकालीन परिदृश्य

- डॉ.साताप्पा लहू चव्हाण


विषय संकेत : प्रवासी भारतीय साहित्यकारों का रचना संसार, गांधीवादी विचारधारा,वैचारिक क्रांति और मानव जीवन, प्रवासी भारतीय उपन्यासों में गांधीवाद , वैश्विक साहित्य और गांधीवाद , अभिवंचित जनता और गांधीविचार, हामकालीन समाज और गांधीवाद की प्रासंगिकता.

भारतीय उपन्यास साहित्य में शुरू से सामाजिक सुधार को महत्त्वपूर्ण स्थान मिला है.बाबा पद्मनजी का मराठी उपन्यास ‘यमुना पर्यटन’, हरिनारयन आपटे का उषःकाल,सूर्योदय,वज्राघात, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का बांग्ला उपन्यास ‘दुर्गेशनन्दिनी’, नन्दशंकर तुलजाशंकर मेहता का गुजराती उपन्यास ‘करणघेलो’,नजीर अहमद का उर्दू उपन्यास ‘मिरातुल उरूस’,के वेंकटरत्न पटुलु का तेलुगु उपन्यास ‘महाश्वेता’, समुअल वेदनाथ पिल्लई का तमिल उपन्यास ‘प्रताप मुदलियर च्रित्रम्’, श्रीनिवास दास का हिंदी उपन्यास ‘परीक्षा गुरू’, पद्मनाथ गोहात्री बरूआ का असमिया उपन्यास ‘भानुमती’, अप्पु नेडुंगडी का मलयालम उपन्यास ‘कुंदलता’,फकीरमोहन सेनापति का उडिया उपन्यास ’छ मान आठ गुंठ’,मिर्जा क्लीच बेग का सिन्धी उपन्यास ’जीनत’, भाई वीरसिंह का पंजाबी उपन्यास ‘सुंदरी’, गुलवाडि वेंकट राव का कन्नड उपन्यास ’इंदिरा बाई’,आदि भारतीय उपन्यासों में सुधारवादी आंदोलनों, अंधविश्वासों,समाजिक उथल−पुथल का लेखा प्रस्तुत हुआ है. 1857 से 1903 तक का भारतीय उपन्यासों के विकास क्रम में 1904 के बाद हिंदी में प्रेमचंद ने व्यापकता से सामाजिक विकास की बात अपने उपन्यास प्रतिज्ञा, वरदान,सेवासदन, कर्मभूमि, गोदान के माध्यम से की, इस बात से हमें सहमति दर्शानी होगी.

समाजवादी उपन्यासकारों में ताराशंकर वंद्योपाध्याय, यशपाल, नागार्जून ऐतिहसिक उपन्यासकारों मे मुहमद अली तबीब, आर. बी. गुंजीकर,कन्हैयालाल मानकलाल मुंशी,रामन पिल्लई, वृंदावनलाल वर्मा आदि महत्त्वपूर्ण उपन्यासकार हैं.इन उपन्यासकरों में प्रेमचंद “ ‘प्रेमाश्रम ’उपन्यास में गांधीवाद के रास्ते जा रहे थे... प्रेमचंद ने महात्मा गांधी के स्वाधीनता आंदोलन का अपने साहित्य में व्यापक चित्रण किया है. महात्मा गांधी ने स्वदेशी पर बल दिया तो प्रेमचंद ने चरखा,खादी,विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार आदि का यथार्थपूर्ण चित्रण किया.‘रंगभूमि’ का नायक अंधा सूरदास तो महात्मा गांधी का प्रतिरूप है जो सत्य,धर्म तथा अहिंसा से अंग्रेज तथा अंग्रेज भक्त भारतीयों से असहयोग करता हुआ औद्योगीकरण के विरूद्ध ग्रामीण संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष करता है. ”1 कहना आवश्यक नहीं कि भारतीय उपन्यास सत्य का पुरस्कार करते नजर आते है.

‘एक बीघा गोईंड’, माटी की महक, मैला आँचल,ग्राम सेविका, पानी के प्राचीर, जल टूटता हुआ आदि उपन्यासों में गांधीवाद को प्रमुखता से चित्रित किया है. भारतीय उपन्यासकारों के साथ−साथ प्रवासी भारतीय उपन्यासकारों की रचनाओं में गांधीवाद का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है.सामाजिक समस्याओं को अपनी रचनाओं का विषय बनाने वाले और गांधी विचारधारा से प्रभावित प्रवासी साहित्यकारों की लंबी सूची उपलब्ध है. “ उनमें उषा प्रियंवदा, अचला शर्मा (ब्रिटेन), कृष्ण बलदेव वैद (अमेरिका), टी.एन. सिंह, तेजेन्द्र शर्मा (ब्रिटेन) , अभिमन्यु अनत (मारीशस), कृष्ण बिहारी (अबूधाबी), पूर्णिमा बर्मन (अबूधाबी), कविता वाचक्नवी (ब्रिटेन), सुषम बेदी (अमेरिका), अंजना संधीर (अमेरिका), डॉ. सुरेन्द्र गम्भीर, (अमेरिका), उषा राजे सक्सेना (ब्रिटेन), उषा वर्मा (ब्रिटेन), ओंकारनाथ श्रीवास्तव(ब्रिटेन), कीर्ति चौधरी(ब्रिटेन), डॉ. कृष्ण कुमार (ब्रिटेन), दिव्या माथुर (ब्रिटेन), पद्मेश गुप्त (ब्रिटेन), पुष्पा भार्गव (ब्रिटेन), मोहन राणा (ब्रिटेन), शैल अग्रवाल (ब्रिटेन), सत्येंद्र श्रीवास्तव (ब्रिटेन), लक्ष्मीधर मालवीय (ब्रिटेन), स्नेह ठाकुर (कनाडा), जकिया जुबेरी, प्रेमलता वर्मा (अर्जेण्टीना), प्रो. सुब्रह्माणियम (फिजी), अर्चना पेन्यूली (डेनमार्क), अमित जोशी (नार्वे), सुरेशचन्द्र शुक्ल (नार्वे), रामेश्वर अशांत (अमेरिका), डॉ. विजय कुमार मेहता (अमेरिका), डॉ. वेदप्रकाश बटुक (अमेरिका), विनोद तिवारी, (अमेरिका), सचदेव गुप्ता (अमेरिका), गौतम सचदेव (ब्रिटेन), डॉ. कमलकिशोर गोयनका (ब्रिटेन), धनराज शम्भू (मारीशस), धर्मानन्द(मारीशस), डॉ. ब्रिजेन्द्रकुमार भगत ‘मधुकर’(मारीशस), मुकेश जीबोध (मारीशस), मुनाश्वरलाल चिन्तामणि (मारीशस), राज हीरामन (मॉरीशस), सूर्यदेव खिरत (मारीशस), अजामिल माताबदल (मारीशस), अजय मंग्रा (मारीशस), डॉ. उदयनारायण गंगू (मारीशस), नारायणपत देसाई (मारीशस), प्रहलाद रामशरण (मॉरीशस), हेमराज सुन्दर (मारीशस), पूजाचंद नेमा(मारीशस), मार्टिन हरिदत्त लक्ष्मन (सूरीनाम), महादेव खुनखुन (सूरीनाम), सुरजन परोही (सूरीनाम), डॉ. पुष्पिता (सूरीनाम), बासुदेव पाण्डे (ट्रिनिडाड), डॉ. रामभजन सीताराम (दक्षिण अफ्रीका), उषा ठाकुर (नेपाल), डॉ. विवेकानन्द शर्मा (फिजी), डॉ. राजेन्द्र सिंह (कनाडा) आदि आते है।” 2 इन प्रवासी साहित्यकारों ने गांधीवाद का प्रचार−प्रसार विदेशों में किया हुआ परिलक्षित होता है.

भारतीय ग्रामोद्योग,ग्रामीण सभ्यता,तप और त्याग, भारतीय ग्राम और संपूर्ण भारतीयता की मुकम्म्ल तस्वीर प्रवासी भारतीय साहित्यकारों के उपन्यासों.कहानियोंऔर कविताओं में प्रचुर मात्रा में दृष्टिगोचर होती है. साहित्यकार अभिमन्यु अनत (मारीशस) का उपन्यास ‘गांधीजी बोले थे’ इसका परिचय देता है.इस उपन्यास का नायक परकाश संघर्ष का प्रतीक बनकर गांधी विचारधारा को आत्मसात करता है. इन्होंने पच्चीस से ज्यादा उपन्यास लिखे हैं.उनके साहित्य में गिरिमिटिया मजदूर के अस्तित्व और अधिकार एवं त्रासदी और प्रताड़ना का यथार्थ-चित्रण मिलता है. “आज से सत्तर−अस्सी वर्ष पूर्व के मॉरिशसीय समाज में भारतीयों की जो स्थिति थी−मर्मान्तक गरीबी के बीच अपनी ही बहुविध जडताओं और गौरांग सत्तधीशों से उनका जो दोहरा संघर्ष था− उसे उसकी समग्रता में हम यहाँ बखूबी महसूस करते हैं.मदन,परकाश,सीता,मीरा,सीमा आदि इस उपन्यास के पात्र हैं,जिनके विचार,संकल्प,श्रम,त्यागऔर प्रेम संबंध उच्च मानवीय आदर्शों की स्थापना करते हैं और जो किसी भी संक्रमणशील जाति के प्रेरणास्रोत हो सकते है.”3 कहना आवश्यक नहीं कि अभिमन्यु अनत जैसे अनेक प्रवासी साहित्यकारों ने गांधी विचार को अपनी साहित्यकृतियों के माध्यम से पाठकों के सामने रखा है. गांधी विचार के मूल स्तंभ है सत्य और अहिंसा । सर्वोदय सत्याग्रह एवं रामराज्य गांधीजी के तीन आदर्श थे । इन आदर्शों की स्थापना अपनी साहित्य कृतियों के माध्यम से करने का प्रयास प्रवासी भारतीय साहित्यकारों ने किया है. ‘‘गांधीवाद है निरंतर आत्मपरिक्षण और प्रयोग गांधीजी की विशिष्टता रही है इसलिए गांधीवाद में कुछ तत्व प्राणरूप और स्थायी है तो कुछ देह रूप है और परिवर्तनशील एवं विकासशील है।’’4 इन तत्वों को पाठकों तक पहुँचाने में प्रवासी भारतीय साहित्यकार सफल हुए नजर आते हैं.भारतीयता की अवधारणा को मजबूत करना,एकता,सत्य, अहिंसा,साहस,दृढता,निष्ठा आदि की स्थापना करने में प्रवासी भारतीय साहित्यकार सफल हुए दृष्टिगोचर होते है. प्रवासी भारतीय साहित्यकारो में उषा प्रियंवदा का नाम गांधी विचारधारा की लेखिका के रूप में आता है.इनके प्रमुख उपन्यास ‘रुकोगी नहीं राधिका’, ‘शेष यात्रा’, ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’, ‘अंतर्वंशी’ और ‘भया कबीर उदास’ आदि में गांधीतत्त्व प्रमुखता से दृष्टिगोचर होते हैं.

प्रवासी भारतीय साहित्यकार कृष्ण बिहारी ने कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक आदि विधाओं के माध्यम से गांधी विचारों को प्रस्तुति दी है. इन्होंने रेखा उर्फ़ नौलखिया, पथराई आँखों वाला यात्री और पारदर्शियों आदि उपन्यास लिखे.इनकी ‘गाँधी के देश में’ शीर्षक से एकांकियों का संकलन मानवीय मूल्यों के प्रति की आस्था का उत्तम उदाहरण है.“गांधीजी ने उन सभी लोगों को सहारा दिया जो हिंसा के शिकार थे.”5 कहना आवश्यक नहीं कि प्रवासी भारतीय साहित्यकार गांधीवादी विचारधारा की प्रतिष्ठा कर विदेशों में आर्थिक स्वावलंबन का विचार प्रवासी भारतीयों को दे रहें हैं. प्रवासी भारतीय साहित्यकारों की रचनाओं का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि इन रचनाओं में विशेषतः उपन्यासों में गांधीवाद की अभिव्यक्ति हुई है. इस बात को हमें मानना होगा. सभी प्रवासी भारतीय साहित्यकार बहुमुखी प्रतिभा के धनी है, अतः सभी आयामों का विवेचन करना असंभव है. ‘सिमट गई धरती’ आत्मकथनात्मक उपन्यास के लेखक नरेश भारतीय ने हमकालीन जीवन की विषमताओं पर कटाक्ष किया है.लक्ष्मीधर मालवीय ने ‘दायरा’, ‘किसी और सुबह’, ‘रेतघड़ी’ और ‘यह चेहरा क्या तुम्हारा है?’ इन उपन्यासों द्वारा मेहनतकश समाज को केंद्र में रखकर मार्मिकता से गांधीविचारों का आदान−प्रदान करने का प्रयास किया है. हम जानते हैं,महात्मा गांधीजी ने जाति,वर्ग. भेदभाव का विरोध किया. विश्वशांति का मंत्र दिया.इस मंत्र को प्रवासी भारतीय साहित्यकारों की रचनाओं में पाया जाने के कारण ही हलकालीन प्रवासी भारतीय साहित्य गांधीवाद से ओतप्रोत दृष्टिगोचर होता है.“जातियों में बटे समाज का एक धीमी प्रक्रिया में क्रमिक विकास हुआ था ” 6 इस बात की ओर प्रवासी भारतीय साहित्यकार सचेत है. फिर भी वे गांधीजी की तरह जात पात नहीं मानते और अहिंसा और शांति में विश्वास रखते है. सुदर्शन प्रियदर्शिनी के उपन्यास ‘सूरज नहीं उगेगा’, ‘रेत की दीवार’ एवं ‘काँच के टुकड़े’ गांधी तत्त्वों को पाठकों के सामने रखते है. सुदर्शनजी गांधी विचारधारा के उपासक है. उनके जीवन और साहित्य,दोनों पर गांधीवाद का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है. ‘सूरज नहीं उगेगा’ उपन्यास इस विचारधारा को प्रस्तुति देता है. “उपन्यासकारों ने समाज सुधार की भावना से ही अछूत समस्या को उठाया है और उसका समाधान किया है.”7 प्रवासी भारतीय साहित्यकारोंने प्रवासी जीवन की पीड़ा, अकेलापन की समस्यापर समाधान खोजने का प्रयास किया है. प्रवासी भारतीय साहित्यकारों में सुषम बेदी नाम अग्रणी है. इनके ‘गाथा अमरबेल की’, ‘कतरा दर कतरा’, ‘इतर’, ‘मैंने नाता तोड़ा’ ‘हवन’, ‘लौटना’, ‘नव भूम की रसकथा’, एवं ‘मोर्चे’ आदि उपन्यासों में गांधीवादी आदर्शों को प्रस्तुति दी है. शारीरिक श्रम को सर्वश्रेष्ठ माना है. अमेरिकी पृष्ठभूमि पर लिखा गया

हवन उपन्यास वैश्विक साहित्य और गांधीवाद का उत्तम उदाहरण मानना होगा. “गांधीवाद के मूल तत्वों के अन्तर्गत सत्य, अहिंसा और सेवाभाव प्रमुख हैं. इनमें से सत्य और अहिंसा तो गांधीवाद के प्राण हैं. गांधीजी का समस्त जीवन दर्शन इन्हीं दोनों तत्वों से अनुप्राणित है. सत्य और ईश्वर को गांधीजी एक दूसरे से भिन्न नहीं मानते हैं.उनके अनुसार सत्य, ईश्वर का ही दूसरा रूप है. इसी कारण ईश्वर को सच्चिदानन्द अर्थात् सत् चित व आनन्द कहा जाता है.”8 कहना आवश्यक नहीं कि प्रवासी भारतीय साहित्यकारों ने सत् चित और आनंद के साथ अभिवंचित जनता के साथ अपने साहित्य को जोडने का प्रयास किया हुआ परिलक्षित होता है. “महात्मा गांधी अपनी प़कृति में आदर्श वादी पर अपने चिन्तन में व्यावहारिक थे. इस लिए उन्हें एक व्यावहारिक चिंतक और विचारक माना जा सकता है. उन के आदर्श थे स्वराज्य, समता मूलक समाज, सादा जीवन, घरेलू उद्योगों का विस्तार, जिसे स्वदेशी आन्दोलन के दौरान बल मिला. सत्य निष्ठा, अहिंसा और स्वराज्य उन के चिन्तन के मूलाधार थे, जिन के आधार पर गांधीवाद की मूर्त्ति गढ़ी गई.”9 हम जानते है, गांधीजी ने निर्भयता से दिए एक भाषण से प्रभावित होकर विनोबा भावे ने गांधीजी से पत्राचार शुरू किया था.

अतः कहना आवश्यक नहीं कि वर्तमान में प्रवासी भारतीय साहित्यकारों के साथ−साथ पाठक भी गांधीवाद से प्रभावित हुए हैं. गांधीयुग और गांधीवाद की प्रासंगिकता आज भी और भविष्य में भी बनी रहेंगी,इस में दो राय नहीं.“काल की गति पर ध्यान देने से ऐसा प्रतीत होता है कि गति ही उसका जीवन है. न उसका आदि है न अंत.मानव समाज अपनी सुविधा के लिये काल गति पर कुछ चिन्ह बना लेता है और उसी के आधार पर काल गनना करने लगता है. ये संवत्, ये सन उसी के उदाहरण है जिसे वर्ष,मास,दिन में विभाजित कर अपना काम चलाता है. पिछ्ले दिनों एक कालावधि को ‘गांधीयुग ’ कहा गया था. ”10 कहना उचित होगा कि इस युग में गांधीजी का प्रभाव सबसे अधिक था. प्रवासी भारतीय साहित्यकारों के रचना संसार का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि गांधीयुग का प्रभाव आज भी विश्व पर बना रहा है,इस बात को हमे मानना होगा. गांधीवाद संपूर्ण वैश्विक साहित्य के केंद्र में रहा है. आज भी विश्व साहित्य और संपूर्ण मानव समाज को गांधीवाद की आवश्यकता है, इस बात को सारा विश्व अपना रहा है.

निष्कर्ष

उपरोक्त विवेचन एवं विश्लेषण से विदित होता है कि भारतीय उपन्यास साहित्य में शुरू से सामाजिक सुधार को महत्त्वपूर्ण स्थान मिला है. भारतीय उपन्यासकारों के साथ−साथ प्रवासी भारतीय उपन्यासकारों की रचनाओं में गांधीवाद का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है. भारतीय ग्रामोद्योग,ग्रामीण सभ्यता,तप और त्याग, भारतीय ग्राम और संपूर्ण भारतीयता की मुकम्म्ल तस्वीर प्रवासी भारतीय साहित्यकारों के उपन्यासों.कहानियोंऔर कविताओं में प्रचुर मात्रा में दृष्टिगोचर होती है. गांधी विचार के मूल स्तंभ है सत्य और अहिंसा । सर्वोदय सत्याग्रह एवं रामराज्य गांधीजी के तीन आदर्श थे । इन आदर्शों की स्थापना अपनी साहित्य कृतियों के माध्यम से करने का प्रयास प्रवासी भारतीय साहित्यकारों ने किया है. भारतीयता की अवधारणा को मजबूत करना,एकता,सत्य, अहिंसा,साहस,दृढता,निष्ठा आदि की स्थापना करने में प्रवासी भारतीय साहित्यकार सफल हुए दृष्टिगोचर होते है. प्रवासी भारतीय साहित्यकारों में उषा प्रियंवदा का नाम गांधी विचारधारा की लेखिका के रूप में आता है.इनके प्रमुख उपन्यास ‘रुकोगी नहीं राधिका’, ‘शेष यात्रा’, ‘पचपन खंभे लाल दीवारें’, ‘अंतर्वंशी’ और ‘भया कबीर उदास’ आदि में गांधीतत्त्व प्रमुखता से दृष्टिगोचर होते हैं. प्रवासी भारतीय साहित्यकार गांधीवादी विचारधारा की प्रतिष्ठा कर विदेशों में आर्थिक स्वावलंबन का विचार प्रवासी भारतीयों को दे रहें हैं. प्रवासी भारतीय साहित्यकारों की रचनाओं का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि इन रचनाओं में विशेषतः उपन्यासों में गांधीवाद की अभिव्यक्ति हुई है. इस बात को हमें मानना होगा. सभी प्रवासी भारतीय साहित्यकार बहुमुखी प्रतिभा के धनी है, प्रवासी भारतीय साहित्यकारों ने सत् चित और आनंद के साथ अभिवंचित जनता के साथ अपने साहित्य को जोडने का प्रयास किया हुआ परिलक्षित होता है. वर्तमान में प्रवासी भारतीय साहित्यकारों के साथ−साथ पाठक भी गांधीवाद से प्रभावित हुए हैं. गांधीयुग और गांधीवाद की प्रासंगिकता आज भी और भविष्य में भी बनी रहेंगी,इस में दो राय नहीं.

संदर्भनिदेश

1. संपा.डॉ.एम. सलीम बेग− आधुनिक हिंदी साहित्य में गाँधीवाद, पृष्ठ−30

2. www.hindustanimedia.com Dtd.14/02/2017

3. अभिमन्यु अनत−गांधीजी बोले थे, ब्लर्ब से उदधृत

4. संपा. रामनाथ सुमन − लेखक की बात गांधीवाद की रूपरेखा, पृष्ठ−06

5. नारायणभाई देसाई – सौना गांधी (गुजराथी) ‚ पृष्ठ−213

6. राम पुनियानी – सामाजिक न्याय एक सचित्र परिचय‚ पृष्ठ−57

7. डॉ. तेज सिंह –राष्ट्रीय आंदोलन और हिंदी उपन्यास‚ पृष्ठ−145.

8. विश्वप्रकाश गुप्त, मोहिनी गुप्त− महात्मा गाँधी : व्यक्ति और विचार, पृष्ठ−45

9. www.gadyakosh.orgDtd.12/2/2017

10. संपा. डॉ. आनंद स्वरूप पाठक – नागरी−संगम(त्रैमासिक पत्रिका) , जुलाई –सितंबर ,2011,

पृष्ठ−04

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