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लघु कहानी /घाट का एक फूल /डॉ. रंजना जायसवाल

लघु कहानी

घाट का एक फूल

डॉ. रंजना जायसवाल

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    सूरज अपनी पूर्ण लालिमा के साथ अवसान के लिये तत्पर था और शायद कहीं मेरे भीतर भी बहुत कुछ डूब रहा था। घाट की सीढ़ियों पर बैठे मुझे घंटों हो गए थे,पर मैं चाह कर भी हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। हिम्मत उस बंधन से अपने आप को आज पूरी तरह से मुक्त कर देने की जिसने हर परिस्थिति में मेरा साथ दिया  ।......पर मैं  चाह कर भी जिसका  साथ न दे पाया।

     कैंसर से जूझती उसकी शिथिल देह पलकों से विहीन उसकी कातर दृष्टि जैसे बार-बार मुझसे कह रही हो...."जाने दो मुझे, अब तो जाने दो"।कंकाल हो चुके उस शरीर में जब नर्स अपने बेरहम हाथों से सुई चुभोती थी  ,उसकी आँखों के कोर आँसुओं से भीग जाते।  मैं दर्द और  वितृष्णा से मुँह फेर लेता पर मेरी खातिर वो एक बेजान सी मुस्कान बिखेर देती और मैं भी उसका साथ देने के लिए मुस्कुरा देता। उससे हमेशा के लिए अलग हो जाने के विचार मात्र से  ही मेरी आत्मा सिहर उठी, बेबसी से मैंने मुट्ठियां भींच ली और आँखें बंद कर ली। मैं अपनी आँखों  से उसे विदा होते नहीं देख सकता था....।शायद इसीलिए मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और मिट्टी के घड़े और अपनी समृतियों को गंगा के उस शीतल जल में प्रवाहित कर दिया।.....अब मैं कैसे रहूंगा उसके बिन,वो दूर जा रही है मुझसे दूर बहुत दूर....।उसने कहा था की" छोड़ दो मुझे अब तो जाने दो" पर.....।

        .....  पर घबरा कर मैंने आँखें खोल दी। गंगा के पावन जल पर उसके अवशेष और फूल बहते हुए पानी की धारा के साथ आगे बढ़ गए और मेरी आँखों से ओझल हो गए।

मैं भरे मन से चलने को उठा....पर। ...घाट की सीढ़ियों पर खर- पतवार में एक फूल अटक गया था और शायद कही मेरा मन भी....।

"रोक लो मुझे, मत जाने दो....."।

5 टिप्पणियाँ

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